रविवार, 12 अगस्त 2012

और............... अब आपदा पर राजनीति

राजेन्द्र जोशी
देहरादून  ।  उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाके जिनकी नियती बन चुका है आपदा, इन इलाकों में कब,कहां और कैसे प्रकृति इनसे रूठे और इसके बाद अपना ÿोध दिखाये कहा नहीं जा सकता, लेकिन एक बात तो जरूर है इन पर्वतीय इलाकों में रहने वाले लोगों पर आपदा के बाद जो राजनीति होती है उससे तो यह कहीं भी नहीं लगता कि नेताओं में इनके प्रति कहीं भी कुछ संवेदना होगी। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल जहां उनके  घावों पर मरहम लगाने का नाटक करता है तो विपक्षी दल उन हरे घावों को कुरेदने का, दोनों ही दलों का सिर्फ एक ही मकसद होता है कि चुनाव तक उनके घावों पर नयी पपड़ी न जमने पाये। उनको लगता है कि यदि पपड़ी जम गयी तो वे कैसे और किस मुद्दे पर उनसे वोटों की राजनीति करेंगे। ठीक यही हाल इस वक्त उत्तरकाशी के आपदा प्रभावित क्षेत्र के लोगों का है। जहां कांग्रेस क्षेत्र के लोगों को यह कहकर बहला रही है कि प्रदेश सरकार उनके साथ न्याय कर रही है जबकि भाजपा के लोगों का कहना है कि कांग्रेस की केन्द्र में सरकार के होते हुए भी वह प्रभावित क्षेत्रों के लिए आशातीत व्यवस्था नहीं कर पायी है। दोनों ही दलों के कार्यकर्ता प्रभावित क्षेत्रों के लिए लोगों के फटे पुराने कपड़े जूते इत्यादि इकठ्ठा कर वाहवाही लूटने में लगे हैं तो कई नेता इस कबाड़ भरे वाहनों को हरी झंडी दिखाने तथा फोटो खिंचवाने को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। यहां यह बात भी दीगर है कि पर्वतीय क्षेत्र के आत्मसम्मानी लोगों ने जब 1992 में उत्तरकाशी भूकम्प के दौरान इस तरह के कपड़ों व जूतों को लाने वालों के मुंह पर ही मार दिया और कहा कि वे उनकी गैरत को ललकार रहे हैं उनका कहना था कि उन्होने अपने परिजनों अपने नाते रिश्तेदारों को भले ही खो दिया है लेकिन उनका आत्मसम्मान अभी भी जीवित है और जीते जी वे कभी भी इस तरह से खैरात में बंटने वाले कपड़े और सामान को नहीं ले सकते, ठीक इसी तरह इस बार भी प्रभावित क्षेत्रों में देखा जा रहा है। लेकिन राजनीति तो राज भी करती है और नीति निर्धारण भी सो सब कुछ गवां चुकने के बाद भी इनके हिमालय जैसे आत्मसंम्मान को रखने वाले सुदूर अंचलों के ये सीधे-साधे पहाड़ी लोगों के गैरत को राजनीति करने वाले नहीं डिगा पाये तो इसे इस क्षेत्र की विलक्षणता ही कहा जा सकता है जो कहीं और नहीं दिखायी देती। यहीं कारण है कि बार-बार प्रकृति की मार झेलने के बाद भी खड़े होने का इनका जज्बा आज भी कायम है। जहां तक सरकारी इमदाद की बात की जाये तो वह उंट के मुंह में जीरे के समान होती है या यूं कहें कि उन तक उतनी इमदाद नहीं पहुंच पाती जितनी पहुंचनी चाहिए शेष बीच में ही कहीं समा जाती है। बीते सालों में यदि उत्तरकाशी व चमोली को मिली सरकारी मदद को देखा जाये तो इतनी रकम में कई गांव नये बसाये जा सकते थे लेकिन यह पैसा किनके जेबों में भरा गया या यों कहें कि यह पैसा किन राजनेताओं की तिजोरियों की शोभा बढ़ा रहा है कहा नहीं जा सकता लेकिन मालूम सबको है। कभी-कभी लोग चुनाव से पहले बंटने वाले कम्बलों में आपदा राहत सामग्री की पहचान कर लेते हैं। सन् 1992 में आये भयावह भूकम्प के बाद से ही ऐसे कम्बल आपदा के समय राजनीतिक गोदामों में पहुंचा कर चुनावी वर्ष में बांटना शायद उत्तराखण्ड की नियती बन गयाी है।
 आगे भी आसमान में बादल दिखायी देंगे, आगें भी बादल फटेंगे और तबाही होगी और ठीक इसी तरह का मंजर होगा लेकिन तब और ही चेहरे होगंे जो इमदाद लेकर उन तक पहुंचेगे।  सवाल यह उठता है कि क्या लोग यूं ही जिन्दा दफन होते रहेंगे, क्या सरकारों के पास कोई ऐसी ठोस नीति नहीं है जो गंगा, यमुना,अलकनंदा तथा सरयू के इस प्रदेश के सूदूर अंचलों के लोगों के लिए ऐसी कोई ठोस नीति बनाये जो भविष्य में इस तरह की विभीषिका से बचा जा सके। इस पर वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रकृति है और प्रकृति से मानव कभी भी टक्कर नहीं ले सकता हां उसके प्रभाव को कम जरूर कर सकता है। सरकारों को चाहिए कि वह राज्य के भीतर बहने वाली तमाम नदियों के किनारे कम से कम दो सौ फीट तक दोनों छोरों पर किसी को न बसने की इजाजत दे इतना ही नहीं सरकारों को चाहिए कि वह इन नदियों के दोनों छोरों पर सघन वृक्षारोपण कराये ताकि पानी के प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके। वहीं उनका कहना है कि इन नदियों के तटों पर पार्क, घाट इत्यादि का निर्माण कराया जाय ताकि सर्दियों व गर्मियों के मौसम में लोग प्रकृति का आनन्द भी उठा सकें। काश यदि हो जाय तो हम बरसात को आपदा नहीं प्रकृति का वरदान कहेंगे।