सोमवार, 6 अगस्त 2012

आपदा प्रबंध नहीं, खैरात के प्रबंधन में जुटे हुक्मरान

कैसा कहर प्राकृतिक या सरकारी
आपदा प्रबंध नहीं, खैरात के प्रबंधन में जुटे हुक्मरान

http://www.devbhoomimedia.com/component/k2/item/411-आपदा-प्रबंधन-नहीं,-खैरात-के-प्रबंध-में-जुटे-हुक्मरान
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, । जब से धरती अस्तित्व में आयी, साल दर साल हिमालय के पर्यावरण में मानसून को बरसाने को मजबूर किया है। देश के बाकी हिस्सों में जहां हलक तक बूंद-बूंद के लिए तरसते हैं वहीं हिमालय में पूरे साल हरियाली का
मंजर होता है। जो बरसात तोहफे के रूप में पहाड़ों को सरसब्ज करती है। वहीं बरसात बिजली बनाने के लिए, खेतों को सींचने के लिए पानी तो देती है साथ ही, जो मिट्टी पहाड़ों से कटती है उसे रेत और पत्थर बना कर नदी के तटों में छोड़ जाती है। हमारे आशियानों को बनाने के लिए। प्रकृति के इसी तोहफे का इंतजार पिछले दो महीनांे से बड़ी बेसब्री से हो रहा था लेकिन आज कुदरत के इस तोहफे को हमें कहर कहना पड़ रहा है और सरकारी ल∂जों में ये प्राकृतिक आपदा है। सवाल है क्या सचमुच प्राकृतिक आपदा आयी है या नौकरशाहों या राजनेताओं की पिछले छह दशकों से सोई हुई जमात में प्रकृति के मार्ग में मानव जनित अवरोधक डाल कर स्वयं आपदा को न्यौता दिया है। बरसात हर साल आती है, अगले बरस भी आयेगी तो इसे प्राकृतिक आपदा कहा जाय  या फिर सरकार जनित आपदा।  पिछले चैबीस घंटों के दरमियान उŸारकाशी के आसमान में हाॅलीकाप्टर भी मंडराया है और जमीन पर लालबŸाी जड़ित गाडियां भी रंेग रही है। जनता को इस बात का अहसास करने लिए कि सरकार और सरकारी मशीनरी जागी हुई है आपदा का जायजा लेकर प्रबंध का स्टीमेंट बनाने के लिए। दूरभाद्दा पर देश के प्रधानमंत्री से भी बात हो रही है, दिल्ली से बड़ी खैरात भी लाई जा रही है। कुल मिलाकर सरकारी अमला आपदा के आगे जगा हुआ दिख रहा है। लेकिन इतिहास के पन्नों को जरा पलटिये तो ये नजारे कुछ नए नहीं हैं। बीते सालों में भी आपदा आई, बीते साल भी दर्जनों मौत हुई, हजारों लोग बेघर हुए, दर्जनों बस्तियां जमींदोज हुई, आसमान में हाॅलिकाप्टर भी मंडराये, दून से लेकर दिल्ली तक के हुक्मरानों ने हवा और जमीन से तबाही के मंजरों को देखा और करोड़ों रूपये के स्टीमेट तैयार कर खैरात भी उŸाराखंड पहुंची, लेकिन
अफसोस कि उस खैरात से उŸाराखंड के जिन प्रभावितों को मरहम लगाना था, देहरादून से सफर तय करके वो उनके उजडे़ आशियानों के पुर्नस्थापना के लिए एक ईंट तक भी नहीं पहुंचा पाई।
   आपदा के आगे जागी हुई सरकार, जागे हुए मुख्यमंत्री और उनके साथी। आज जागे हैं अहसास अच्छा लग रहा है। लेकिन सवाल है कि क्या विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, प्रभारी मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल, स्थानीय मंत्री प्रीतम पंवार और संसदीय सचिव विजयपाल सजवाण ने क्या जिंदगी में पहली बार बरसात को देखा है। माना कि मुख्यमंत्री का जन्म और यौवन उŸार प्रदेश के मैदानों में गुजरा है लेकिन टिहरी लोकसभा में आये हुए उन्हें करीब डेढ़ दशक भी तो हो गया है। विजयपाल सजवाण को तो तिवारी सरकार ने आपदा के प्रबंध के लिए इतना बेहतर माना कि उन्हें आपदा प्रबंधन का उपाध्यक्ष बना कर राज्य मंत्री का दर्जा दिया हुआ था। भारी भरकम महकमों के लिए एक बार कोपभवन तक जाने वाले आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य कि सिंचाई महकमे के लिए जो बरसात किसी वरदान से कम नहीं उन्होंने ना वरदान सहेजने का प्रबंध किया और ना आपदा से बचने का जुगाड़। प्रबंधन के नाम पर जिन तम्बुओं और छप्परों में लोग ठहरे हुए हैं वहां जिंदगी को देखिए.... रोटी तो क्या अभी तक कायदे से पीने का पानी भी मयस्सर नहीं है।
   आपदा ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रखा हुआ है। जैसे जैसे दिन आगे बढ़ेंगे प्रबंध को लेकर समाचार लिखे जायेंगे। लेकिन सवाल है कि हर साल आने वाली इस बरसात को हम कहर के बजाय वरदान बनाने की अगर चिंता करते तो आपदा
प्रबंधन मंत्रालय को सिर्फ बादल फटने से होने वाली हानि और पुल बहने के अलावा बाकि किसी भी नुकसान का ना जायजा करना पड़़ता और ना ही प्रबंध। आजादी से लेकर आज तक नदी-घाटी बचाओ के नाम पर चल रही विभिन्न परियोजनाओं, पर्यावरण और जलचर संरक्षण, विभिन्न विकास प्राधिकरणों और धर्मस्व और साहसिक पर्यटन के नाम पर जितनी करोड़ो-करोड़ की धनराशि आवंटित हुई है। उसमें से आधी भी अगर योजनाबद्ध  तरीके से खर्च होती तो नदियों और घाटियों में निर्मित बस्तियां व व्यवसायिक बाजारों को तटों से हटाकर कहीं और सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित किया जा सकता था, जिससे ना सिर्फ नदियों पर तटबंध और रमणीक पार्क व घाटों की स्थापना होती वरन आधा प्रदूद्दाण भी खुद खत्म हो जाता। लेकिन अफसोस सरकारी सरपरस्ती में गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक नदियों के तट कंकरीट के जंगलों से लगातार पट रहे हैं। और हर साल प्रकृति के इस वरदान के सामने खड़े होकर हम स्वयं आपदा को न्यौता दे रहे हैं।
  आपदा के प्रबंधन के लिए जो स्टीमेट बना कर खैरात का प्रबंध किया जा रहा है, अच्छा होगा अगर वो खैरात प्रभावितों के जख्मों को थोड़ा मरहम लगा पाये। लेकिन जागी हुई सरकार को जागृत तब माना जाय जब अगले बरस प्रकृति के इसी वरदान को हमें फिर से कहर लिखने के लिए मजबूर ना होना पड़े।



2010 की आपदा, मुआवजा आज तक नहीं
कब मिलेगा आपदाओं का मुआवजा
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, । मां चंद्रबदनी के छांव स्थल का गांव नवाकोट। 75 साल के रिटायर्ड मास्टर शम्भुप्रसाद रतूड़ी की गोद में कागजों की पोथी, हाथ मां चंद्रबदनी मंदिर की ओर जोड़कर नजर आसमान पर, मन्नत सिर्फ एक, कि प्रकृति का कहर कभी ना बरपे। घर आने वाले हर अतिथि को शम्भुप्रसाद कागज की पोथियों को पढ़ाते हैं। साल 2010 की आपदा से घर का आंगन बह गया, मकान में दरारें पड़ी हुई हैं। किसी रात का भरोसा नहीं कि कब छत भरभरा कर गिर पड़े और वो नींद कहीं ऐसी ना हो जाय जिससे कभी जागना संभव नहीं। प्रकृति से रहम की भीख मांग रहे शम्भुप्रसाद को कागजों से आज भी उम्मीद है। हाथ मेंतब के सांसद व आज के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का पत्र, तत्कालीन आपदा प्रबंधन मंत्री खजान दास, जिलाधिकारी टिहरी, तहसीलदार जाखणीधार की रिपोर्ट के साथ और भी बहुत कुछ है। दस्तावेज ना सिर्फ आपदा की गवाही के है बल्कि उसके प्रबंध के लिए जो दिल्ली और देहरादून से करोड़ की खैरात पहाड़ों को चली थी उससे शम्भु प्रसाद को मिलने वाली मुआवजे की हकदारी और तरफदारी के भी हैं। 2010 से आज के दौर में विजय बहुगुणा ने सांसद से मुख्यमंत्री का सफर तय कर लिया लेकिन अफसोस कि उनके दस्तखतों की असमत अगर भाजपा सरकार के लिए गौण थी तो अब उनकी ही सरकार के लिए भी उनके दस्तख़तों की शायद कोई अस्मत नहीं है क्यों कि मुआवजा अब भी नहीं मिला। लेकिन शम्भुप्रसाद रतूडी को आज भी उम्मीद है कि मुख्यमंत्री के अपने दस्तखतों की कोई तो लाज होगी, पहाड़ के हर दूसरे गांव में ऐसे कई शम्भु प्रसाद कई मौजूद है और उनके हाथों में भी उम्मीद भरे चिट्ठों का पुलिंदा है।