सोमवार, 6 अगस्त 2012

बयान, बवंडर और निहितार्थ

राजेन्द्र जोशी
देहरादून : विधायक हरभजन सिंह चीमा के एक बयान को लेकर उत्तराखण्ड की राजनीति में एक भूचाल सा दिखायी दे रहा है कोई भी उनके इस बयान को पचा नहीं पा रहा है इतना ही नहीं उन्हे पहाड़ विरोधी तक करार दिया जा रहा है,लेकिन क्या किसी ने उनके इस बयान की गंभीरता अथवा उसके भीतर झांक कर देखा कि उन्होने कितना गलत व कितना सही कहा। हांलांकि अब बयान पर बवंडर मचता देख चीमा भी यह कहने लगे हैं कि वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और वे अपनी बात को ठीक से मीडिया से सामने नहीं रख पाये। लेकिन क्या इसमें भी कुछ सच है सच तो यह माना जा सकता है कि वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन जो बयान उन्होने दिया उसमे ज्यादा पढ़ाई या लिखाई से क्या संबध यह समझ से परे है। लेकिन एक बात तो साफ है और इस बात को तमाम उन उत्तराखण्डियों को भी आत्मसात करनी होगी कि चीमा के बयान में कहीं भी कुछ गलत नहीं, हां राजनैतिक रूप से यह बयान जरूर किन्ही राजनैतिक दलों को बुरा लग सकता है वैसे उनके बयान को यदि गंभीरता से पढ़ा जाय तो उसमें कही भी कुछ गलत नहीं है उन्होने कहा कि ‘‘ पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करके आ रहे लोगों के दबाव से जहां पहाड़ को नुकसान हो रहा है वहीं तराई क्षेत्रों पर भी इसका दबाव बढ़ रहा है। उन्होने समग्र विकास किये जाने की बात भी अपने बयान में कही है‘‘
 विधायक चीमा के कहने का क्या मंतव्य था लेकिन, यह कटु सत्य है कि पहाड़ के सुविधाभोगी लोगों ने तराई क्षेत्रों की ओर बीते 10 सालों के भीतर ही नहीं बल्कि उत्तरप्रदेष के जमाने से ही रूख करना षुरू कर दिया था, पहाडवासी वे परिवार जो थोड़ा भी सम्पन्न थे वे पहाड़ी क्षेत्र की तलहटी याने हलद्वानी,रामनगर,खटीमा, टनकपुर, उधमसिंह नगर,कोटद्वार, हरिद्वार, ़ऋषिकेष, विकासनगर तथा देहरादून में आ बसे । इनके यहां आने के कारण उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्रों में जहां धान, गेहूं तथा नकदी फसलों के अलावा लीची, अमरूद आम आदि के बाग, बगीचे तथा खेत खलिहान लगभग सभी समाप्ति के कगार पर हैं। वहीं इसका दूसरा पहलू यह भी है कि पर्वतीय क्षेत्र भी पलायन के कारण लगभग धीरे-धीरे खाली होते जा रहे है जिसका खामियाला पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को विधानसभा की छह सीटें कम होने के कारण भुगतनी पड़ी है। इतना ही नहीं सुरक्षा की दृष्टि से राज्य के सीमांत जिलों के बार्डर वाले इलाकों के खाली होने के कारण देष की सुरक्षा को भी खतरा बढ़ता जा रहा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जम्मू कष्मीर क्षेत्र के कारगिल इलाके में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की जानकारी सबसे पहले वहां के लोगों ने ही भारतीय सेना को दी। यह उदाहरण यहां इसलिए भी उचित है कि पर्वतीय क्षेत्र होने के नाते उत्तराखण्ड राज्य की सीमाएं तीन स्थानों पर अंर्तराष्ट्रीय सीमाओं से लगती है ऐसे में राज्य के साथ ही देष की सुरक्षा के लिए भी राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय लोगों का होना जरूरी है।
 जहां तक विधायक चीमा के बयान पर मचे बवंडर का सवाल है कांग्रेस इस बयान का राजनैतिक लाभ लेने की फिराक में हैं जबकि यूकेडी इस बयान पर पहाड़ बनाम मैदान का खेल खेलना चाहती है, वहीं भाजपा इस पर बचाव की मुद्रा में दिखाई तो दे रही है साथ ही वह चीमा का बचाव कर अपने कुनबे को संभालती दिखायी दे रही है। लेकिन इस सभी राजनैतिक दलों में से किसी ने भी चीमा के बयान की गहराई में डुबकी लगाकर यह खोजने की कोषिष नहीं की कि आखिर उनके इस बयान में कितनी सत्यता है। पर्वतीय सरोकारों से जुड़े कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि चीमा ने क्या गलत बोला। उनका कहना है जनता तो तराई की ओर राजनीतिक लोगों की देखा देखी में आ रही है। इनका  कहना है जब मुख्यमंत्री बहुगुणा, पूर्व मुख्यमंत्री खण्डूड़ी, निषंक, पूर्व मंत्री दिवाकर भटट सहित वर्तमान मंत्री हरक सिंह रावत, प्रीतम सिंह पंवार, प्रीतम सिंह चौहान, मंत्री प्रसाद नैथानी, यषपाल आर्य, विधायक सुबोध उनियाल,विजयपाल सजवाण, राजेन्द्र भण्डारी आदि सहित केन्द्रीय मंत्री हरीष रावत व सतपाल महाराज आदि चुनाव तो पर्वतीय क्षेत्रों से लड़ते हैं लेकिन इन्होने अपनी रिहायष अब तराई क्षेत्र के प्रमुख  षहरों में बना दी है। इनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों के साथ ही पष्चिमी उत्तरप्रदेष के तमाम धनाढ्यों ने राज्य के तराई क्षेत्र की लगभग काफी कुछ खेती की जमीन खरीद डाली है और यहां मूल निवासियों ने धन के लालच में पुष्तैनी जमीनों को बेच डाला है, इसका परिणाम है कि तराई में भी कृषि भूमि दिन प्रतिदिन संकुचित होती जा रही है जिसका खामियाजा राज्य में भूमि की दरों में अप्रत्याषित बढोत्तरी के रूप में सामने आ रहा है। कहने का यह मतलब है कि विधायक चीमा के बयान के दूसरे पहलू को भी देखने की जरूरत है और इसे बिना वजह तूल नहीं दिया जाना चाहिए बल्कि इसकी गंभीरता को समझना होगा। http://www.devbhoomimedia.com/राज्य/uttarakhand/item/261-बयान,-बवंडर-और-निहितार्थ