शनिवार, 15 दिसंबर 2012

रोजगार तो नहीं दे पाई सरकार नशे का कर लिया इंतजाम



रोजगार तो नहीं दे पाई सरकार नशे का कर लिया इंतजाम

उत्तराखण्ड़ी महिलाओं को दुख पहुंचाने वाला है सरकार का निर्णय: शमशेर सिंह बिष्ट

राजेन्द्र जोशी
देहरादून 15 दिसम्बर। ‘‘नशा नहीं रोजगार दो‘‘ के नारे उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंगठनों द्वारा लगभग तीन दशक से लगाए जाते रहे हैं, सरकार बेरोजगारों को रोजगार तो उपलब्ध नहीं करा पाई, लेकिन नौनिहालों को नशे की गर्त में धकेलने का इंतजामात सरकार ने जरूर कर दिए हैं। अब सरकार शराब के रास्ते लोगों को रोजगार देने और माफियाओं को पैसे बटोरने का पूरा इंतजाम खुद ही कर रही है। सरकार के इस निर्णय से शराब माफियाओं अथवा शराब के कारोबारियों और सरकार के बीच गहरा रिश्ता स्वतः ही उजागर हो गया है।
    बीते दिन विधानसभा सत्र की समाप्ति के बाद हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने विदेशी तर्ज पर और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के रास्ते पर चलते हुए राज्य में बार लाईसेंस वाले होटल और रेस्तरा में माईक्रोपब ब्रूवरी खोलने का रास्ता साफ हो कर दिया। इनमें स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले खाद्यानों से बीयर बनाई जाएगी। जिसमें पांच फीसदी ऐल्काहॉल होगा, इतना ही नहीं बार लाईसेंस वाले होटर और रेस्टोरेंट मात्र तीन करोड़ का उपकरण लगाकर पीने वालों के लिए बीयर दे सकेंगे। इससे राज्य को प्रति ईकाइ 300 बल्क लीटर क्षमता वाली मात्र एक फैक्ट्री से प्रतिवर्ष 18.46 लाख का राजस्व मिलेगा। इतना ही नहीं सरकार ने राज्य में बॉटलिंग प्लांट (बोतल भरने की व्यवस्था) के रास्ते भी खोल दिए हैं। इससे बाहरी प्रदेश अथवा देशों  से आने वाली मदिरा की बॉटलिंग प्रदेश में ही की जाएगी। सरकार ने अनुमान के अनुसार एक माह में लगभग इस प्लांट में लगभग छहः लाख बोतले भरी जाएंगी और इससे सरकार को प्रतिवर्ष 19.46 करोड़ का राजस्व मिलेगा। यह बॉटलिंग प्लांट हरिद्वार नगर निगम के पूरे क्षेत्र, ऋषिकेश नगर और आस-पास जिसमें र्स्वग आश्रम, मुनुकीरेती, लक्ष्मणझूला और तपोवन में नहीं लगाया जा सकेगा।
    आखिर सरकार को राज्य में शराब व्यवसाय को पनपाने के पीछे क्या गणित नजर आई, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन सरकार का तर्क है कि इससे राज्य में शराब पीने वालों कई तरह की शराब मिल पाएगी और आपसी प्रतिस्पर्द्धा के चलते शराबियों को शराब की कीमत कम देनी पडे़गी और ऐसे शराब विक्रेता निर्यात शुल्क देकर ऐसी शराब का निर्यात भी कर सकेंगे। राज्य में वर्तमान में उधमसिंह नगर में खेतान, देहरादून में बोर्डमैन, काशीपुर में आईजीएल पहले से ही शराब की बॉटलिंग कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य में शराब व्यवसाय सरकार को एक कमाउ सौदा नजर आ रहा है, लेकिन राज्य सरकार को राज्य के बेरोजगारों की कतई चिंता नहीं दिखाई दे रही है कि राज्य के लगभग साढ़े आठ लाख बेरोजगारों के लिए राज्य सरकार ने क्या किया। जबकि राज्य के पर्वतीय इलाकों में नशा नहीं रोजगार दो के नारों से पूरो उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र आज भी गूंज रहा है। लोगों के पास रोजगार नहीं है और वे रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं, विश्लेषकों का कहना है कि जब राज्य के बेरोजगारों के हाथ में रोजगार नहीं होगा और जेब में पैसे नहीं होंगे तो सरकार की शराब को कौन खरीदेगा। विश्लेषकों का मानना है कि कहीं सरकार शराब के व्यवसाय को फैलाकर राज्य के युवाओं को नशेड़ी तो नहीं बनाने जा रही है। इस मामले पर लोक वाहिनी तथा नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के मुखिया रहे शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि यह राज्य 200 साल तक शराब विहीन था अंग्रेजों ने यहां शराब लाकर राज्य को बर्बाद करने का कार्य किया, जिसे कांग्रेस सरकार आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा उत्तराखण्ड की महिलाओं का शराब के खिलाफ आंदोलन और राज्य सरकार का यह निर्णय महिलाओं को दुख पहुंचाने वाला है। उन्होंने बताया कि नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के कार्यकर्ता सरकार के इस निर्णय का पुरजोर विरोध करेंगे।
    सरकार का यह निर्णय राजनेताओं, अफसारशाहों और शराब माफियाओं के बीच गठजोड़ का नमूना है, सरकार का यह निर्णय इस बात की भी तस्दीक करता है कि राज्य में शराब व्यवसाय में शराब व्यवसायियों और सफेद पोशों नेताओं व अधिकारियों के बीच कितना मित्रतापूर्ण संबंध है। सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि यह निर्णय बीती 17 नवंबर को पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड से पहले पोंटी चढ्ढा व राज्य के दो आईएएस अधिकारियों के बीच हुई डील का परिणाम है, जिसे सरकार ने अब जाकर मूर्त रूप दिया है।