शनिवार, 8 दिसंबर 2012

मूल निवास पर मचा बवाल


मूल निवास पर मचा बवाल
वास्तविक मूल निवासियों के हक पर डाका है सरकार का यह निर्णय: नरेन्द्र सिंह नेगी
आखिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं मानती सरकार

राजेन्द जोशी
देहरादून, 08 दिसम्बर। मूल निवासी और स्थाई निवासी पर संसदीय कार्य मंत्री के विधानसभा सदन में दिए गए बयान कि राज्य स्थापना के वक्त उत्तराखण्ड में निवास करने वालों को मूल निवासी माना जाएगा पर बवाल मचना शुरू हो गया है। संसदीय कार्य मंत्री के इस ताजा बयान से राज्य के पर्वतीय लोगों में जहां घोर निराशा हुई है, वहीं राज्य आंदोलनकारी और राज्यवासी मूल निवास को लेकर एक और आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं।
 
गौरतलब हो कि बीते दिन विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश पाठक ने सदन को यह जानकारी दी कि राज्य गठन के वक्त अर्थात नौ नवम्बर 2000 तक उत्तराखण्ड में निवास करने वाले राज्य के मूल निवासी माने जाएंगे। वहीं यह भी उल्लेखनीय है कि मूल निवास और स्थाई निवास प्रमाण पत्र को लेकर उपजे विवाद के बाद हाईकोर्ट में स्थाई और मूल निवास प्रमाण पत्र पर यह ओदश दिए कि, स्थाई निवासी को ही मूल निवासी माना जाएगा। हाईकोर्ट के इस फैसले पर भी राज्यवासी खुश नहीं थे और राज्य आंदोलनकारी संगठनों से सरकार को कहा कि वह इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में विरोध दर्ज करें। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया है कि 1952 में जो जहां रह रहा है, उसे वहां का मूल निवासी माना जाएगा। जबकि इसके बाद वे देश के विभिन्न हिस्सों में हुए पलायन के बाद जो जहां रह रहा है, उसे वहां का स्थाई निवासी तो माना जा सकता है, लेकिन मूल निवासी नहीं। ताजे प्रकरण पर पर्यावरण विद् सुंदरलाल बहुगुणा का कहना है कि सरकार जन भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है, उनका साफ कहना है कि किसी राज्य का मूल निवासी वही व्यक्ति हो सकता है, जिसकी पीढ़ियां वहां निवास करती आई हैं। उन्होंने तल्ख लहेजे में कहा कि राज्य गठन के बाद यहां धंधे बाज और ठेकेदारों ने रूख किया है और सरकार की परिभाषा के अनुसार वे स्थाई निवासी के साथ मूल निवासी भी हो गए, जो कतई उचित नहीं है। उन्होंने असम में भड़की हिंसा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की हिंसा के मूल में भी स्थाई निवासियों को मूल निवासी बनाया जाना रहा है। उन्होंने कहा जब किसी क्षेत्र विशेष में बाहरी लोग आते हैं और उन्हें वहां के संसाधनों का हक दे दिया जाता है, यहीं असंतुलन का कारण है, इससे जहां जन भावनाएं भड़कती हैं, वहीं आपसी सौहार्द भी समाप्त हो जाता है। उत्तराखण्ड क्रांति दल ‘‘पी‘‘ के केंद्रीय अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार का कहना है कि राज्य गठन के वक्त यहां रहने वाले लोगों को मूल निवासी मानने वाली राज्य सरकार जन हितों की अनदेखी कर रही है, उन्होंने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए राज्यवासियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने राज्य स्थापना के वक्त से यहां रह रहे लोगों को मूल निवासी मानने का फैसला दिया था, लेकिन सरकार को उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए थी, मगर उसने ऐसा नहीं किया बल्कि इस फैसले की आड़ में अपने हित साधने की कोशिश की। उन्होंने मूल निवासी पर तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा 16 अगस्त 1950 में तय निती की जानकारी देते हुए बताया कि उस वक्त यह तय किया गया था कि 16 अगस्त 1950 से भारत के जिन प्रदेशों में जो रह रहा है, वह वहां का मूल निवासी होगा। उन्होंने कहा कि हम भी इस बात को मानने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार जान बूझकर जन भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड क्रांति दल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जन भवनाओं की रक्षा के लिए अपील दायर करेगा।
   
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद की पूर्व अध्यक्ष उषा रावत का इस प्रकरण पर कहना है कि राज्य आंदोलन 1953 में शुरू हुआ था और इसकी निर्णायक लड़ाई 1994 में शुरू हुई जो नौ नवम्बर 2000 को राज्य गठन के साथ समाप्त हुई। उन्होंने सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि राज्य गठन के वक्त यहां रहने वालों को वह मूल निवासी मान रही है, जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह फैसला उन लोगों के लिए कुठाराघात है, जिन्होंने राज्य के लिए कुर्बानी दी और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। राज्य आंदोलनकारी इंद्र दत्त शर्मा का कहना है कि राज्य गठन के वक्त से यहां रहने वालों को यहां मूल निवासी मानने संबंधी सरकार का यह फैसला उन लोगों के लिए कुठाराघात है, जिन्होंने राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा हकीकत में आजादी के बाद केंद्र सरकार ने जो कट ऑफ डेट तय की थी, उसी के आधार पर मूल निवासी की परिभाषा तय होनी चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी मंच के ओमी उनियाल का कहना है कि यह राज्य की अवधारणा के साथ-साथ शहीदों का अपना अपमान भी है। राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय की गाईड लाईन का भी अनादर कर रही है। राज्य आंदोलनकारी सरकार के इस निर्णय को बर्दाश नहीं करेंगे। यूकेडी (डेमोक्रेटिक) के केंद्रीय अध्यक्ष डा. शक्ति शैल कपर्वाण का कहना है कि परपरांत वासी को मूल निवासी का दर्जा देने का प्रदेश सरकार का निर्णय राज्य की संस्कृति और मूल निवासियों की पहचान को मिटाने की एक साजिश है, उन्होंने सरकार के इस निर्णय का विरोध करने की भी घोषणा की है। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी का कहना है मूल निवास का शब्द हमें जमीन से जोड़ता है और मूल से ही संस्कृति का जन्म हुआ और सरकार संस्कृति को ही मटियामेट करने पर तुली है, उनकी पार्टी इसका विरोध करेगी। उत्तराखण्ड महिला मंच की संयोजक कमला पंत ने कहा कि संविधान लागू होने के बाद जो उत्तराखण्ड में रह रहा है, वह यहां का निवासी है, बाद में यहां रहने वाला स्थाई निवासी तो हो सकता है मूल नहीं, हम सरकार के निर्णय का विरोध करेंगे। राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष गीता ठाकुर का कहना है कि सरकार यहां के निवासियों के हक पर डाका डालने का जा रही है, जिसका जमकर विरोध किया जाएगा। वहीं उत्तराखण्ड के लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का कहना है कि मूल निवास आज रोजगार और सरकारी योजनाओ का लाभ देने का जरिया बन गया है, प्रदेश सरकार का यह निर्णय राज्य के वास्तविक मूल निवासियों पर डाका है, उन्होंने भी उच्चतम न्यायालय के उस निर्देश का अनुपालन करने का सुझाव सरकार को दिया, जिसमें 50 वर्ष तक राज्य में निवास करने वालों को मूल निवासी का दर्जा दिया गया है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकरी मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष जे.पी. पाण्डे का कहना है कि राज्य सरकार मूल निवासियों का मूल ही मिटाना चाहती है, उन्होंने कहा 1952 से जो लोग यहां रह रहे हैं, उन्हें ही कानून संवत मूल निवासी माना जाना चाहिए। वहीं राज्य आंदोलनकारी निर्मला बिष्ट, अमर सिंह, मीरा रतूड़ी, ऋषि बल्लभ, द्वारिका बिष्ट सहित दर्जनों आंदोलनकारियों ने कहा कि राज्य सरकार के गैर जरूरी बयान राज्य को नुकसान ही करेंगे, वोट बैंक राजनीति में मूल निवासियों के हित प्रभावित नहीं होने चाहिए, सरकार के ऐसे निर्णयों से मूल निवासियों के अस्तित्व को समाप्त करने की साजिश सरकार की लगती है।
   
मूल निवास के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सभी पक्षों की व्यवहारिकता को जानने के लिए 16 मई 2012 को हुए कैबिनेट मीटिंग में उपसमिति का गठन किया गया था, जिसमें डा. इंदिरा हृदयेश पाठक, दिनेश अग्रवाल, सुरेन्द्र राकेश और सुरेन्द्र सिंह नेगी सदस्य मनोनित किए गए थे। इस समिति को व्यवहारिक और कानूनी बिंदुओं पर विस्तार से जानकारी लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी थी, लेकिन यह उपसमिति आज तक अपनी रिपोर्ट सरकार को नहीं सौंप पाई है, लेकिन इसके बीच बीते दिन संसदीय कार्य मंत्री ने राज्य गठन से पूर्व राज्य में रहने वालों को मूल निवासी संबंधी बयान देकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।