मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

पुलिस अधिकारी दुराचार मामले में पुलिस गहरी नींद में

पुलिस अधिकारी दुराचार मामले में पुलिस गहरी नींद में
ऐसे तो मित्र पुलिस से उठ जाएगा महिलाओं का विश्वास!
देहरादून। उत्तराखण्ड में महिलाएं कितनी महफूज हैं, यह बात प्रदेश पुलिस बड़े-बड़े बैनर और नारे देकर तो कर सकती है, लेकिन यथार्थ में ऐसा कुछ नहीं है। जहां दिल्ली में बीती दिसंबर व इस माह एक युवती व बालिका से बलात्कार के बाद समूचा जनमानस इस अपराध के खिलाफ सड़कों पर उतर गया था, वहीं राज्य में एक पुलिस अधिकारी द्वारा महिला के साथ दुराचार के बाद राज्य के समाजिक संगठन व पुलिस गहरी नींद में दिखाई दे रही है। दिल्ली में जहां एसपी स्तर के एक अधिकारी द्वारा एक महिला को थप्पड़ मारने पर बर्खास्त किया गया, वहीं उत्तराखण्ड में दुराचार के बाद भी प्रदेश सरकार ऐसे अधिकारी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाई। ऐसे में राज्य में कानून व्यवस्था के रखवाले ही जब भक्षक के रूप में सामने आएंगे तो प्रदेश की जनता का विश्वास प्रदेश की मित्र पुलिस से उठना लाजमी है।
उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिला कि एक युवती ने आवाम की रक्षा के लिए तैनात किए गए एक एसपी सिटी पर चीख-चीखकर खुला आरोप लगाया है कि उसने उसे शादी का झांसा देकर कई बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। 25 दिन से युवती डीजीपी सहित कई पुलिस अधिकारियों से न्याय की भीख मांग रही है कि उसके साथ बलात्कार करने वाले एसपी प्रमेन्द्र डोभाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे इंसाफ दिलाया जाए। हालांकि प्रदेश के अंदर एसपी की ताकत से राज्य के अंदर महिला सुरक्षा के बड़े बड़े दावे तार-तार होते नजर आ रहे है। दिल्ली में एक युवती के साथ हुए गैंगरेप के बाद सरकार के मुखिया व प्रदेश के डीजीपी ने ऐलान किया था कि प्रदेश के अंदर महिलाओं की सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। इतना ही नहीं डीजीपी ने तो यहां तक दावा कर डाला था कि अगर कोई पीड़ित युवती या महिला गैंगरेप या किसी अन्य तरह से पीड़ित हुई है तो उसे थाने तक में जाने की जरूरत नहीं है और वह एक डाक द्वारा शिकायती पत्र थाने में भेजेगी तो तत्काल मुकदमा दर्ज कर
आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। लेकिन लगता है कि प्रदेश में अगर रेप या छेड़खानी का दाग किसी बड़े अफसर पर लगता है तो सारे नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाकर दागी को बचाने का खेल शुरू हो जाता है। सवाल उठ रहा है कि क्या एसपी के लिए प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर कोई अलग कानून बनाया गया है। जिसके चलते बलात्कार का दंश झेल रही युवती को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश में अब तक के सबसे बड़े ईमानदार डीजीपी खामोश होकर क्यों बैठे हुए है, इसको लेकर राज्य के अंदर पुलिस मुखिया की खामोशी पर भी लगातार सवाल उठने शुरू हो गए है। वहीं राज्य में तथाकथित महिला हिमायती संगठनों की भी इस घटना ने पोल खोलकर रख दी है। महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर हो-हल्ला मचाने वाले ये सामाजिक संगठन इस घटना पर क्यों मौन है, यह समझ से परे है।
    गौरतलब हो कि महिलाओं व युवतियों से देश के अंदर हो रहे बलात्कार व छेड़खानी की घटनाओं के चलते सभी एक जुट होकर हवस के दरिंदों को सबक सिखाने के लिए आगे आए हुए है। उनका साफ तौर पर कहना है कि ऐसा कानून बनना चाहिए कि जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। प्रदेश सरकार के मुखिया ने भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस मुख्यालय में एक अलग सेल का गठन कर वहां महिला आईपीएस को तैनात किया था तथा प्रदेश के डीजीपी सत्यव्रत ने पूरे राज्य के पुलिस कप्तानों को फरमान जारी किया था कि वह अपने इलाकों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ठोस से ठोस कदम उठाएं, इतना ही नहीं डीजीपी ने यहां तक दावा कर दिया था कि अगर कोई महिला या युवती ऐसी घटनाओं का शिकार हुई हो तो उसे थाने व चौकी में जाने की कोई जरूरत नहीं है। वह सीध सरकारी डाक से अपनी शिकायत थाने व चौकी में भेज दे, जिसके तुरंत बाद उसकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। राजधानी में महिलाओं की सुरक्षाओं को लेकर बड़े होर्डिंगस सड़कों पर इस कदर लगाए हुए है कि मानो पुलिस ने संकल्प ले लिया हो कि अगर किसी भी महिला या युवती के साथ अश्लीलता होगी तो उसके आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जब हल्द्वानी की एक युवती ने डीजीपी के सामने चीख चीखकर आरोप लगाया कि हल्द्वानी के एसपी सिटी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार यौन शोषण किया है तो खाकी पर लगे अब तक के इतिहास में सबसे बड़े दाग पर पूरा पुलिस महकमा एसपी सिटी को बचाने की गुप्त मुहिम में लगा हुआ है। सवाल उठ रहे है कि डीजीपी साहब, राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस महकमा दोहरा चरित्र क्यों अपना रहा है। क्योंकि अगर यही दाग किसी दरोगा पर लगा होता तो उसके खिलाफ मुकदमा कायम कर उसे जेल तक भेज दिया गया होता। लेकिन जब एक एसपी सिटी पर एक युवती ने 25 दिन पूर्व डीजीपी के सामने लिखित मेें आरोप लगाया कि एसपी प्रमेंद्र डोभाल ने उसे शादी को झांसा देकर उसके साथ यौन शोषण किया और अब वह उसे धमकाकर जान से मारने तक की धमकी दे रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे है कि आखिरकार एक एसपी राज्य में इतना बड़ा हो गया है कि उसके लिए नियम कानून को पुलिस मुख्यालय ने भी ताक पर रख दिया है। युवती को इंसाफ मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन कहीं उसका हाल मधुमिता शुक्ला, भंवरी देवी, गीतिका जैसा न हो जाए, इसकी गारंटी कौन लेगा?
    उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह हल्द्वानी की एक युवती ने वहीं के एसपी सिटी पर शादी का झांसा देकर उससे दुराचार करने की शिकायत डीजीपी के दरबार में पेश होकर इस उम्मीद से दी थी कि उसे न्याय मिलेगा, लेकिन डीजीपी ने इस मामले में मुकदमा न कायम कराकर डीआईजी नैनीताल से जांच कराने की बात कही लेकिन डीजीपी के आदेश से डीआईजी संजय गुंज्याल भी गाफिल है और उनका कहना है कि उनके पास ऐसी कोई जांच नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सीआरपीसी 154 में साफ अंकित है कि किसी शिकायत पर तत्काल मुकदमा कायम कर फिर उसकी की जायेगी, तो जब एक एसपी पर यौन शोषण का खुला आरोप एक युवती द्वारा लगाया गया तो इस मामले में जांच कराने की नौटंकी क्यों की जा रही है। उत्तराखण्ड का पुलिस मुख्यालय वैसे तो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े ढोल पीटता आ रहा है। मुख्यालय में महिला सेल का गठन कर वहां का एक फोन नंबर प्रकाशित किया जिसपर महिलाएं व युवतियां अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। लेकिन यह सेल भी मात्र एक दिखावा बनकर रह गया है। पांच अप्रैल को एक युवती ने डीजीपी के सामने चीख चीखकर कहा कि हल्द्वानी के एसपी प्रमेंन्द्र डोभाल ने उसे शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार दुराचार किया। डीजीपी ने इस मामले की जांच नैनीताल के डीआईजी को सौंपने व 26 अप्रैल को प्रगति का रिमाइंडर भेजने की बात कही थी। लेकिन जब 27 अप्रैल को इस जांच के बारे में डीआईजी संजय गुंज्याल से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि कौन सी जांच की बात कह रहे हो। जब उन्हें हल्द्वानी के एसपी सिटी के खिलाफ मिली जांच के बारे में पूछा गया तो उनका साफ कहना था कि उन्हें इस तरह की कोई जांच नहीं मिली है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यह जांच डीआईजी नैनीताल के पास नहीं है तो फिर यह जांच आखिरकार कहां करा रहा है। 154 सीआरपीसी में साफ तौर पर अंकित है कि संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक इतिला, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक दी गई है तो उसके द्वारा या निदेशाधीन लेखबद कर ली जाएगी और इतिला देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसे इतिला पर चाहे वह लिखित रूप से दी गई हो या पूर्वोत्तफ रूप में लेखबद की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। जो उसे दे, और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो  उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जायेगी जिसे राज्य सरकार इस नियमित चिन्हित करें, प्रविष्ट किया जायेगा। इस धारा की उपधारा 1 के अधीन अभिलिखित इतिला की प्रतिलिपि इतिला देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी।
    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड सरकार एक ओर तो कुमाऊ के एक बड़े आईएएस अधिकारी को भ्रष्टाचार के मामले में निलंबित कर रही है। वहीं प्रदेश के एक एसपी पर यौन शोषण करने का खुला दाग लगने पर सरकार की खामोशी से कई सवाल उठने शुरू हो गए है। कितनी हैरानी वाली बात है कि दिल्ली में एक एएसपी ने जब एक युवती थप्पड़ मारा तो उसे तत्काल निलंबित कर दिया गया था। लेकिन उत्तराखण्ड में 25 दिन पूर्व हल्द्वानी के एसपी सिटी प्रमेन्द्र डोभाल पर वहीं की एक युवती ने आरोप लगाया कि अधिकारी ने उसकेे साथ यौन शोषण किया है, तो भी पूरा पुलिस महकमा इस एसपी को बचाने की जुगत में कहीं न कहीं लगा हुआ है।