शनिवार, 4 मई 2013

निकाय चुनाव परिणामों ने हिलाई बहुगुणा की कुर्सी की चूलें!

निकाय चुनाव परिणामों ने हिलाई बहुगुणा की कुर्सी की चूलें!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। स्थानीय निकाय चुनाव के परिणामों के नतीजों ने मुख्यमंत्री बहुगुणा की कुर्सी की चूलें तक हिला दी हैं। भले ही मुख्यमंत्री बहुगुणा इन परिणामों को हल्के में ले रहे हों, लेकिन यह बात सरे आम है कि चुनाव परिणामों की गूंज दिल्ली दरबार तक पहुंच गई है। इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनाव की घोषणा से कुछ ही दिन पहले राजधानी देहरादून आए कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नसीहत भी उत्तराखण्ड कांग्रेसियों को रास नहीं आई। इसका यह परिणाम रहा कि कांग्रेस ने तराई क्षेत्र में स्वंय बनाए नगर निगमों तक में अपना खाता नहीं खोला।
    प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखण्ड के इन चुनाव परिणामों से राहुल गांधी काफी मायूस हैं और उनकी इस मायूसी की गाज़ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर गिर सकती है, क्योंकि देशभर में आने वाले वर्ष में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में उत्तराखण्ड में कांग्रेस को मिली हार की प्रतिछाया वह लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ने देना चाहेंगे। उत्तराखण्ड के चुनावों की हलचल दिल्ली में भी दिखाई दे रही है। राज्य में चुनाव परिणामों को लेकर कांग्रेस फिलहाल कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव के सम्पन्न होने तक नहीं करेगी। कर्नाटक में पांच मई को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा, इसके बाद ही उत्तराखण्ड के चुनाव नतीजों पर कांग्रेस के भीतर विचार-विमर्श होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। सबसे खास बात यह है कि उत्तराखण्ड में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के तमाम झण्डावरदार नेता अपने ही क्षेत्रों में अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को नहीं जीता पाए हैं। इस स्थानीय निकाय चुनाव में जहां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनके परिवार ने जहां देहरादून नगर निगम के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर लड़ा था, वहीं हल्द्वानी क्षेत्र से कैबिनेट मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश पाठक ने अपने पुत्र की जगह हेमंत बगड़वाल को पहली बार नगर निगम बने हल्द्वानी में मेयर का चुनाव लड़ाया, वहीं रूड़की और हरिद्वार में भी कांग्रेस की रणनीति फेल साबित हुई है, हालांकि कांग्रेस सरकार में केंद्रीय नेता हरीश रावत यह कह रहे हैं कि चुनाव में उतारे गए प्रत्याशियों का नाम उनकी इच्छा से नहीं फाईनल किया गया, लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में हरिद्वार और रूड़की में मिली हार को उन्हें न चाहते हुए भी स्वीकार करना होगा। इतना ही नहीं पर्वतीय क्षेत्र की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में कांग्रेस द्वारा प्रचारित किए जा रहे गैरसैंण को लेकर भी कांग्रेस को निराशा मिली है, वहां की जनता ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को नकार कर निर्दलीय प्रत्याशी को नगर पंचायत की बागडोर सौंपी है। वहीं पौड़ी में भी सतपाल महाराज का प्रभाव नहीं चल पाया, वहां भी निर्दलीय प्रत्याशी व पूर्व विधायक यशपाल बेनाम एक बार फिर नगर पालिका में पहुंचे हैं।
    कुल मिलाकर उत्तराखण्ड में स्थानीय निकाय चुनावों को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दल लोकसभा चुनाव के रिहर्सल बता रहे थे और चुनाव परिणामों ने काफी हद तक तस्वीर भी साफ कर दी है कि वह राजनैतिक दलों के छलावे में आने वाले नहीं है और प्रदेश सरकार को इस बात का भी जनता ने संदेश दिया है कि विकास के हवाई वादों से जनता को कोई सरोकार नहीं है।