शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

उत्तराखंड सरकार की इन गलतियों से विकराल हुई आपदा

उत्तराखंड सरकार की इन गलतियों से विकराल हुई आपदा

Vijay Bahuguna
उत्तराखंड में आए सैलाब के बाद तबाही इतनी विकराल नहीं होती, यदि राज्य सरकार ने गलतियां दर गलतियां ना की होती. चार धाम में आए सैलाब को 18 दिन हो चुके हैं और अब भी लोग पहाड़ पर फंसे हुए हैं. इनमें ज्यादातर स्थानीय लोग बताए जा रहे हैं. पूरे देश ने पहाड़ का जो दर्द झेला है, उसमें विजय बहुगुणा की सरकार ने 10 बड़ी गलतियां की हैं. यह सही है कि कुदरत के कहर पर किसी का वश नहीं, लेकिन विजय बहुगुणा सरकार ने ऐसी गलतियां की, जिसने पहाड़ पर आई त्रासदी को और भी विकराल बना दिया.
त्रासदी से पहले मौसम विभाग का अलर्ट नजरअंदाज किया
मौसम विभाग ने पहाड़ पर आए सैलाब से दो दिन पहले ही तबाही की चेतावनी दे दी थी, लेकिन सरकार कान में तेल डालकर सोई रही. ना तो लोगों को खतरे से बाहर निकाला गया और ना ही किसी को मौत के करीब जाने से रोका गया. इसके बाद जो हुआ, उसे देखकर पूरा देश रो पड़ा.
त्रासदी की गंभीरता समझने में सरकार नाकाम
चार धाम में आए सैलाब की गंभीरता अगर सरकार ने समझी होती तो जरूरतमंद लोगों तक समय पर मदद पहुंचाई जा सकती थी. लेकिन इसकी जगह सरकार मौतों का आंकड़ा देने में जुटी रही.
आपदा के बाद तीन दिन बाद तक हरकत में नहीं आई सरकार
उत्तराखंड सरकार ने त्रासदी की गंभीरता समझने और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने में काफी वक्त लगा दिया. तीन दिन तक सरकार हरकत में नहीं आई. और ये ही वजह है कि जो लोग पहाड़ से लौटे वो सेना और सुरक्षाबलों की जय-जयकार करते नजर आए.
आपदा के बाद राहत कार्यों में देरी की
आमतौर पर जुलाई से पहाड़ पर बारिश शुरू हो जाती है, चट्टानें खिसकने लगती हैं, आपदा की आशंका बढ़ जाती है. यह हादसा सिर्फ पंद्रह दिन पहले हुआ. बावजूद इसके सरकार के पास कोई तैयारी नहीं थी.
तीर्थयात्रियों की हिफाजत करने में नाकाम
चार धाम में आए सैलाब में होटल के होटल बह गए, जिनमें तीर्थयात्री खचाखच भरे हुए थे. लेकिन पहले से चेतावनी होने के बावजूद लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में सरकार चूक गई.
राहत कार्यों में प्रशासन नजर नहीं आया
राहत कार्यों में प्रशासन की सबसे ज्यादा जरूरत थी, लेकिन वही नदारद रहा. सरकार से उम्मीद थी कि स्थानीय प्रशासन के जरिए लोगों की मदद की जाती, लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला.
सेना, सुरक्षा एजेंसियों से तालमेल नहीं
विपदा में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए सेना और सुरक्षाकर्मियों ने रास्ता बना लिया, लेकिन पूरे मिशन में वो उत्तराखंड सरकार ही गायब रही, जिसे पहाड़ पर बने हर रास्ते का पता था.
18 दिन बाद भी हजारों लोग लापता
आपदा जितनी बड़ी थी, नाकामी उससे भी विकराल दिखी. हजारों लोग अब भी अपनों की तलाश में जुटे हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं.
स्थानीय लोगों के पुनर्वास का प्लान नहीं
पहाड़ पर बसे और रास्ते में फंसे लोगों को राहत मिले तो कैसे, जब शिविरों की हालत ही खस्‍ता है. पुनर्वास पूरी तरह सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.
राहत की जगह सियासत में उलझे रहे
लोगों को राहत पहुंचाने की जगह उत्तराखंड सरकार सियासत में ज्यादा उलझी रही. विजय बहुगुणा ने अपने मंत्रियों को मोर्चे पर भेजने की जगह विरोधी पार्टियों को जवाब देने में लगाए रखा. ऐसे में हालात तो बिगड़ने ही थे.