मंगलवार, 9 जुलाई 2013

एक से निपटे दूसरी चुनौती बाकी

एक से निपटे दूसरी चुनौती बाकी
देहरादून, 5 जुलाई ।केदार घाटी में आई आपदा ने देशभर को हिलाकर रख दिया। मजबूत हौसले के साथ राहत को जुटे जवानों ने पफंसे लोगों को निकालकर एक चुनौती का सामना तो कर लिया। अब दूसरी बड़ी चुनौती भी घाटी में मुंह पसारे खड़ी है। लापता हजारों लोगों की तलाश करना, भवनों के मलबे और जगह-जगह पड़े शवों को निकालकर दाह संस्कार करना दूसरी चुनौती से निपटना होगा। साथ ही घाटी में मची भीषण तबाही जो दर्द छोड़ गई, उसे झेलते हुए स्थानीय निवासियों की जीविका को लेकर सामने आने वाले चुनौती से भी पार पाना होगा। सही मायने में राज्य सरकार के लिए राहत कार्य पूरा होने के बाद इन हालातों से निपटना किसी चुनौती से कम नहीं माना जा रहा। ताबड़तोड़ चले राहत अभियान के बाद अब घाटी में वीरानी का माहौल बनने लगा है। सैकड़ों स्थानीय लोग अपने अध्टूटे घरों को छोड़कर सुरक्षित जगहों पर पहुंच चुके हैं। संपर्क मार्गाें के टूटने से कई गांवो तक पहुंच पाने की चुनौती से किस तरह पार पाया जाएगा। यह विचारणीय विषय है कि घाटी में कितने समय बाद अब पुराने दिनों वाली नहीं तो कम से कम हल्के रूप में चहल-पहल का नजारा बनेगा। सेना-वायुसेना-आईटीबीपी और एनडीआरएपफ के जवानों ने अपने जान की परवाह न करते हुए खालों-क्षतिग्रसत सड़कों तक पहुंच बनाकर प्रत्येक जगह पफंसे तीर्थ यात्रियों को निकालने में सपफलता हासिल की। लेकिन इस दौरान स्थानीय स्तर पर लोगों को हुए बड़े नुकसान या उनकी बिगड़ी दिनचर्या को विशेष तवज्जो नहीं दी गई। मंशा यह नहीं कि चल रहे राहत कार्य स्थानीय स्तर पर कमी लिए हुए थे। कहना यह कि इस हादसे में स्थानीय जो लोग बेघर-बेकारोबार हुए हैं। उनके लिए राज्य सरकार आगे क्या कदम उठाती है। देश की सबसे बड़ी त्रासदी का राजनीतिकरण कतई उचित नहीं है। पर्वतीय इलाकों में बरसात के दौरान सड़कों का टूटना, उपफान मारती नदियों का पानी मकानों तक पहुंचना आम बात है। लेकिन जो नजारा इस त्रासदी में बना वह सचमुच हृदय विदारक रहा। बरसात अभी बाकि है, राज्य सरकार को प्रबंध् तंत्रों को और अध्कि मजबूती देकर अपने लोगों के सामने आई बेगारी की समस्या को लेकर सुदृढ़ रणनीति के तहत काम करना होगा।