बुधवार, 17 जुलाई 2013

अपनी ही कब्र खुदवाने के लिये बेबस उत्तराखंडी...

अपनी ही कब्र खुदवाने के लिये बेबस उत्तराखंडी...

पुण्य प्रसून वाजपेयी
नदी ,जंगल ,बुग्यालों और कच्चे पहाड़ों से पटे पड़े उत्तराखंड में विकास का रोड रोलर कैसे सबकुछ तबाह करने पर आमादा है, इसकी एक तस्वीर भर है मरघट में बदला केदारनाथ । सड़क, बांध, पन बिजली परियोजना और जंगल खत्म कर कंक्रीट का जंगल बसाने की जो सोच गढवाल में घुस चुकी है । उसमें हर बरस औसतन 60 लाख पेड़ काटे जा रहे हैं । 2 हजार किलोग्राम विस्फोटक पहाड़ों के तल में लगाये जा रहे हैं। 20 लाख घनमीटर मलबा नदियों में डाला जा रहा है । यानी जो जंगल हिमालय को बचाये हुये हैं, उन्हें खत्म करना ।
    जो कच्चे पहाड़ उत्तराखंड को सहेजे हुये हैं, उन्हें और कमजोर बनाने की पहल और अविरल बहती नदियों में परियोजनाओं के निर्माण से निकलने वाले मलबे को डालकर जीने का नायाब अंदाज उत्तराखंड का खौफनाक सच है । और यह सब बीते 10 बरस की रफ्तार है । मुश्किल तो यह है कि इन पहाड़ों पर बसे लोगो की त्रासदी भी दोहरी है । जीना है तो रोजगार के लिये अपनी जमीन पर खड़े होकर अपनी ही जमीन को खत्म करने की हिम्मत दिखानी है । जिस गढवाल को प्राकृतिक विभिषिका ने जड़ से हिला दिया है सिर्फ उस गढवाल का सच यह है कि मौजूदा वक्त में वहां 37 परियोजनाओं का निर्माण कार्य जारी है । जो 8 हजार से ज्यादा गढ़वाली परिवारों का पेट भर रहा है । लेकिन प्राकृतिक विभिषिका ने जो कहर गांव-दर-गांव बरपाया है उसने अब उत्तराकंड के उन्हीं मजदूरों के सामने नया सवाल पैदा कर दिया है कि वह बरसात के बाद क्या करें ? क्योंकि उत्तराखंड में मौजूदा सच यही है कि जल विघुत परियोजना पर काम लगातार जारी है । 9 निर्माणाधीन तो 30 प्रक्रिया में । हर परियोजना में 2 हजार किलोग्राम विस्फोटक का इस्तेमाल हो रहा है और पहाड़ में सेंध के लिये 28 हजार डेटोनेटर प्रयोग में लाये जा रहे हैं । निर्माणाधीन बांध की तादाद लगातार बढ़ रही है । कुल 70 बांध से नदी बांधने की तैयारी है । 1 बांध से 2 लाख घनमीटर मलबा निकलता है ।
    ऐसे में 70 बांध का मतलब है 1 करोड़ 40 लाख घनमीटर मलबा । वहीं सडक निर्माण लगातार जारी है। हर बरस हजार किलोमीटर सड़क निर्माण हो रहा है । बीते 10 साल में 60 लाख से ज्यादा पेड़ कटे गये और सामान्यत हर 10 किलोमीटर सड़क के लिये 60 हजार पेड़ स्वाहा हो रहे हैं । वहीं पर्यटन निर्माण में जबरदस्त तेजी है । नदियों की तलछट पर कंक्रीट और लोहे का इस्तेमाल हो रहा है । हर बरस औसतन 20 हजार टन सीमेंट/लोहा लग रहा है तो हर महीने 10 हजार वर्ग किलोमीटर में निर्माण यानी जंगल खत्म कर कंक्रीट का जंगल तैयार हो रहा है । ऐसे में तबाही के बाद अब उत्तराखंडियों के सामने यह सवाल है कि क्या पहले की तरह पहाड़ों तले डायनामाइट लगाते रहे, बांध बनाने के लिये मलबे को नदी में बहाते रहे या सड़क बनने वाली जगह पर पेड़ काटने में जुटे रहे या फिर देवभूमि को देव भूमि बनाये रखने के लिये विकास के रोडरोलर को रोकने के लिये संघर्ष का बिगुल फूंक दें ? या उसी दो जून की रोटी के सामने नतमस्तक रहे जिस दो जून की कमाई ने पहली बार चारधाम के जरिये कमाई करने वाले को भी मौत ने लील लिया ? और केदारघाटी के गांव के गांव पुरुष विहिन हो गये हैं । लेकिन समझना यह भी होगा कि प्राकृतिक विभिषिका से ठीक पहले केदारनाथ मंदिर के क्षेत्र में 150 दुकान , 80 धर्मशाला , 37 होटल , 23 रेस्ट हाउस , 6 आश्रम और 116 कच्चे मकान थे । यानी कोई शहर बल्कि केदारनाथ मंदिर को ही एक छोटा शहर बना दिया गया ।
    जिस केदारनाथ में पहुंचना सबसे कठिन होता था, वहां दुकान मकान से लेकर घर्मशाला और होटल तक जिस खुली आबोहवा में हिमालय को चिढ़ाते हुये बीते बीस-बाइस बरस में बेखौफ बनते चले गये और जब उसी जमीन को हक के साथ पहाड़ और नदियों ने दुबारा मनुष्य से छीन लिया है तो केदारनाथ हर किसी को मरघट सरीखा लगने लगा है । जबकि केदारनाथ का सच यह है कि मनोरम घाटी के बीच 1985 से पहले केदारनाथ मंदिर के इस पूरे इलाके में सिर्फ दो धर्मशाला, तीन आश्रम और पूजा सामाग्री की सिर्फ एक दुकान हुआ करती थी । लेकिन 1990 के बाद से जो दुकान मकान, कच्चे घर और होटलों का निर्माण शुरु हुआ उसने केदारनाथ को एक शहर में ही तब्दील कर दिया । और 2010 में तो उड़नखटोला यानी हेलीकॉप्टर सेवा ने भी केदारनाथ को हिमालय की छाती पर उडान भरने का नायाब सुख रईस भक्तों को दे दिया । भक्तों को केदारनाथ दर्शन कराने वाले केदारघाटी के दर्जनों गांव के सैकड़ों लोगों को प्राकृतिक विभिषिका एक झटके में खत्म कर दिया । अपनी तरह की पहली इस त्रासदी की वजह जो भी हो लेकिन अब का सच यह है कि कई गांवों में तो कोई पुरुष बचा ही नहीं है । क्योंकि केदारनाथ मंदिर में पूजा सामग्री बेचने वाले पांच सौ से ज्यादा लोग कहा गये किसी को नहीं पता ? बुजुर्गो को पालकी में बैठा कर लाने वाले तीन सौ ज्यादा गढ़वाली कहां गये अभी तक किसी को नहीं पता ? और तो और जो होटल, रेस्ट हाउस, धर्मशाला और कच्चे घरों में सैकड़ों गढ़वाली लगातार केदारनाथ के दर्शन करने वालो की सेवा में जुटे रहते थे वह तूफान के बाद कहा है किसी को नहीं पता ।
   मुश्किल यह है कि एक हजार से ज्यादा गढ़वाली केदारनाथ मंदिर के क्षेत्र में तीन से चार महीने तक कमाई के लिये रुकते और पूरे साल के लिये दो जून की रोटी का इंतजाम इसी यात्रा से हो जाता । और जब केदारनाथ बर्फ से ढक जाती तो उससे पहले ही उत्तराखंड के यह लोग अपनी अपनी कमाई कर लौट जाते । घर की जरुरत के सामान और बच्चो के सपने इसी कमाई से पूरी होती । लेकिन यह पहली बार है कि केदारनाथ में आये तूफान ने उत्तराखंड के लोगों का निवाला भी छिना है और लौटने का इंतजार करने वाले बूढे मां-बाप का सहारा भी छिना । नयी साड़ी-चूड़ियों का इंतजार करने वाली औरतों को विधवा बना दिया और बच्चों के सपने को भी चकनाचूर कर दिया ।