गुरुवार, 11 जुलाई 2013

आपदा के बाद उच्च न्यायालय के आदेशों ने उड़ाई सरकार की नींद

आपदा के बाद उच्च न्यायालय के आदेशों ने उड़ाई सरकार की नींद
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 9 जुलाई। नैनीताल उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले कि ‘‘नदी की जमीनों पर बने भवनों को सरकार 60 दिन के भीतर ध्वस्त करे और इस  तरह की जमीनों में किए गए आवंटनों को सरकार सात दिनों के भीतर ध्वस्त करे‘‘ पर प्रदेश सरकार कि मुसीबतें बढ़ गई हैं, क्योंकि राज्य बनने के बाद प्रदेश में काबिज भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने जहां तमाम सरकारी भवन नदी-नालों में बनवा दिए, वहीं इन सरकारों ने नदी-नालों की जमीनों को खैरात की  तरह तमाम ऐसे लोगों को आवंटित कर दी, जो उंची पहुंच वाले थे।
    प्रदेश में आई आपदा के बाद नैनीताल उच्च न्यायालय का यह फैसला मुख्य न्यायधीश बरीन घोष और न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त पीठ ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट में प्रस्तुत बिना बहुगुणा की जनहित याचिका पर दिया है। बिना बहुगुणा की ओर से सय्यद नदीम ने अधिवक्ता के रूप में इस प्रकरण की  पैरवी की। सरकार को दिए अपने आदेश में बैंच ने सरकार द्वारा नदी-नालों में भवन बनाने को लेकर दी गई स्वीकृति को सात दिन के भीतर निरस्त करने के आदेश दिए हैं और बैंच ने ऐसे तमाम निर्माणों को 60 दिन के भीतर ध्वस्त करने के निर्देश भी सरकार को दिए हैं और यह कहा है कि नदी को उसके स्वरूप  में वापस लौटाया जाए, वहीं न्यायमूर्तियों ने यह भी आदेश दिया है कि प्रदेश सरकार 16 हफ्तों के भीतर उच्च न्यायालय में इन आदेशों के परिपालन के संबंधी
शपथ पत्र भी न्यायालय में प्रस्तुत करें। उल्लेखनीय है कि यह निर्णय बिना बहुगुणा की जनहित याचिका संख्या 233/2008 के संदर्भ दिया गया है। उच्च न्यायालय के इन आदेशों के बाद प्रदेश सरकार सकते में है और हाईकोर्ट द्वारा निर्देशित आदेशों के पालन को लेकर समयसीमा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। मामले में हाईकोर्ट के कड़े रूख को देखते हुए राज्य सरकार के अधिकारी हाईकोर्ट के निर्देशों को लेकर विदि विशेषज्ञों के साथ  बैठक कर समाधान ढूंढने में जुट गए हैं।
  गौरतलब हो कि राज्य का विधानभवन सहित राज्य सरकार द्वारा पिछले 12 वर्षों में जितने भी महत्वपूर्ण निदेशालयों के भवन बनाए गए, जिनमें उत्तरांचल टैक्नीकल यूनिवर्सिटी भी शामिल हैं, करोड़ों रूपये की लागत के ये सभी भवन या तो नदी-नालों के बहाव क्षेत्र की भूमि  में स्थित हैं अथवा इनके तटों पर। इतना ही नहीं राजधानी देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों में तो अफसरशाही, सफेदपोशों और भूमाफियाओं के गठजोड़ के चलते नदी-नालों और खालों में बुरी तरह कब्जा कर नदीयों के बहाव क्षेत्र को संकुचित कर दिया गया है।
   राजनैतिक जानकारों के  अनुसार सफेदेपोशों और माफियाओं के इस गठजोड़ ने नदी-नालों में वोट की राजनीति के चलते ऐसे क्षेत्रों में कब्जा कराया है। समाज सेवकों का कहना है कि एक ओर तो अवैध रूप से नदी-नालों में बसे ये लोग नेताओं के वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होते रहते हैं, वहीं आपदा के समय मुआवजे के लिए ये लोग खड़े हो जाते हैं।  नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेश का प्रदेश की बेलगाम हो चुकी ब्यूरोक्रेसी और सफेदपोश नेताओं पर कितना असर पड़ेगा, यह तो न्यायालय की समयावधि समाप्त होने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन उच्च न्यायालय के इन आदेशों ने सरकार की नींद जरूर उड़ा दी है।