गुरुवार, 18 जुलाई 2013

एक माह में भी नहीं लगा आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम

एक माह में भी नहीं लगा आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम
राजेन्द्र जोशी
देहरादून  । उत्तराखण्ड में महाप्रलय के एक माह होने को हैं, लेकिन इस एक माह में न तो सरकार आज तक आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगा पाई है और न ही आपदा प्रभावितों के जीवन को पटरी पर लाने का ही उसने कोई प्रयास किया है। इतना ही नहीं अभी तक चार धाम यात्रा मार्ग ही खुल पाया है, वहीं सरकार जलप्रलय में हताहत हुए श्रद्धालुओं की संख्या को ही स्पष्ट कर पाई है। परिणामस्वरूप इस महा जलप्रलय में पूरी तरह से तबाह हो गये हजारों गांव के बाशिंदों में सरकार के खिलाफ एक बड़ी नाराजगी देखने को लगातार मिल रही है। सरकार दावे करती आ रही है कि आपदा पीड़ितों को  खाद्यान्न सामग्री, दवाईयां व राहत दी जा रही है लेकिन हकीकत यह है कि सरकार के इन दावों की पोल लगातार आपदा मंे उजड़ चुके गांववासी खोल रहे हैं। उनके मन में सरकार के प्रति एक बड़ा गुस्सा है और वे सरकार के राहत कार्यों व खाद्यान्न सामग्री बांटने के दावों को एक सिरे से नकारने में लगे हुए हैं। सरकार भले ही आपदा पीड़ितों का दर्द हरने में एक माह बाद भी नाकाम साबित हुई हो लेकिन वह अपने सरकारी जादूई आंकड़ों के खेल में सबको फेल करने में लगी हुई है?
प्रदेश के चारधाम यात्रा में बीती 15 जून को महा जलप्रलय आई जिसमें रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी व चमोली में महा विनाश की लीला पूरे देश के लोगों ने अपनी आंखों से देखी। सबसे ज्यादा नुकसान रुद्रप्रयाग में केदारनाथ व रामबाड़ा में हुआ जहां हजारों श्रद्धालुओं व पहाड़ों में रहने वाले हजारों बाशिंदों का आज तक कुछ पता नहीं चल पाया, आशंकाए लगातार उठ रही हैं कि केदारनाथ व रामबाड़ा में हजारों लोग भारी मलबे के नीचे दबकर मर गये। इतनी बड़ी तबाही के बावजूद भी सरकार को कई दिनों तक यह ही समझ नहीं आया था कि वह इस आपदा की घड़ी में क्या करे? हां उसे  चिन्ता सताई तो वो सिर्फ केन्द्र व पूरे देश से आर्थिक मदद मांगने की दिखाई पड़ी।
सरकार जादूई आंकड़ें देकर आवाम की भावनाओं से खेलती आ रही है। सरकार आज तक इस महा जलप्रलय में हुई मौतों का सही आंकड़ा देश के सामने पेश नहीं कर पाई , हालांकि मौत के आंकड़ों को लेकर सरकार में शामिल कई नेताओं के बीच जमकर महाभारत हुई थी। सरकार ने दावे किए की आपदा में मारे गये लोगों का अन्तिम संस्कार किया जाएंगा। लेकिन केदारनाथ में गिनती के लोगों का अन्तिम संस्कार करने का दावा किया गया। हालांकि सरकार पर उंगलियां उठ रही हैं कि जब प्रशासन ने दावा किया था कि केदारनाथ में मलबांे के उपर लगभग 250 शव पड़ें हुए हैं तो आज तक सिर्फ  93 शवों का अन्तिम संस्कार क्यों किया गया? सवाल उठ रहे हैं कि सैकड़ों शव आखिरकार कहां गायब हो गये? क्या इन शवों को ठिकाने लगाने का कुच्रक रचा गया जिसके चलते मौतों के आंकड़ों को कम दिखाई जा सके? सरकार दावे करती आई की केदारनाथ व रामबाड़ा में मलबों के नीचे दबे शवों को बड़ी-बड़ी मशीनों से बाहर निकाल लिया जायेगा, लेकिन सरकार की मंशा मलबों से शवों को बाहर निकालने के लिए तिनका भर भी दिखाई नहीं पड़ी? जिसका परिणाम यह रहा कि मलबों के नीचे दबे हजारों शव मलबे में विलीन हो गये और इन मलबों के नीचे किनके अपने हमेशा के लिए मौत की नींद सो गये इस पर जीवन भर के लिए संशय बना रहेगा। आपदा के बाद सरकार ने पुनर्वास व तबाह हो गये हजारों गांववासियों को आश्वासन दिया था कि जब तक पहाड़ का जन-जीवन पटरी पर नहीं आ जाता तब तक उन्हें खाद्यान्न सामग्री  मिलती रहेगी। लेकिन सरकार के ये दावे लगातार खोखले साबित हो रहे हैं।
आपदा के बाद एक माह के कार्यकाल में जहां हजारों गावंवासी खाने के संकट से लगातार जूझ रहे हैं वहीं उनके सामने बीमारी से लड़ने का भी बड़ा खतरा बना हुआ है। पहाड़ में डायरिया से कुछ लोग मौत के मुंह में चले गये। पहाड़ों में डॉक्टरों को तैनात करने के सरकारी दावों की ग्रामीण ही पोल खोलने में लगातार लगे हुए हैं।
पहाड़ के गांवों को जोड़ने वाली सड़कों के निर्माण के लिए अभी तक कोई पहल नहीं की गई जिसके कारण गर्भवती महिलाओं के अलावा नौनिहालों को शिक्षा के केन्द्र तक पहंुचने का बड़ा संकट खड़ा हुआ है। कई किलोमीटर दूर जाकर ग्रामीण खाद्य सामग्री लेने के लिए पहंुच रहे हैं जहां उन्हें प्रशासनिक अमला दुत्कार कर भगा रहा है जिससे ग्रामीणों के सब्र का बंाध टूटता जा रहा है। इस आपदा से निपटने के लिए जहां सरकार पूरी तरह से फेल हुई वहीं आपदा के एक माह बाद भी सरकार चारधाम यात्रा मार्गों पर पड़ने वाले जिलों को पटरी पर लाने में सफल नहीं हो पाई है। हजारों गांव के बाशिंदे आज जिन्दगी व मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। बाहरी प्रदेशों से आई खाद्यान्न सामग्री या तो गोदामों में सड़ रही है या उनकी बंदरबांट का खेल चल रहा है।
महा जलप्रलय में समा चुकी सड़कों को ठीक करने के लिए तेजी के साथ कोई पहल नहीं की जा रही है। जिससे मानसून में यह सड़कें कैसी बन पाएंगी अपने आपमें कई सवाल खड़ें कर रहा है। सरकार आपदा पीड़ितों का दर्द हरने के बजाए जिस तरह से आवाम के सामने जादूई आंकड़ें पेश कर रही है वह उसकी नाकामी को उजागर करता है।