शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

लाशों को लंघ कर निकल रहे लोग: अश्विनी चौबे

लाशों को लंघ कर निकल रहे लोग: अश्विनी चौबे
हेमकुंड के नीचे बसे छह गांवों का मिट गया नामोनिशान: हरभजन
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने उत्तराखंड से लौटकर आपबीती बताई है। उन्होंने देहरादून में कहा कि केदारनाथ में इतनी भीषण आपदा के बावजूद प्रशासन या सरकार की ओर से कुछ भी नहीं किया जा रहा है। वे अपने परिवार के साथ अपने दम पर वापस लौटे हैं। उनका कहना था कि चारों ओर लाशें बिछी हुई हैं लेकिन उन्हें उठाने वाला भी कोई नहीं है। बचे हुए लोग लाशें लांघ कर निकल रहे हैं।
केदारनाथ में बचाव कार्य चल रहा है। लेकिन फिलहाल केवल हवाई मार्ग से ही काम हो रहा है। इसलिए इसमें मुश्किल आ रही है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक 19 हजार से अधिक लोगों को अब तक निकाला जा चुका है। लेकिन अब भी करीब 62 हजार लोग उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों में फंसे हुए हैं।
अश्विनी चौबे का कहना था कि उनके राजस्थान और गुजरात के कई लोग थे जिन्होंने सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ दिया। गुरुवार तक सरकार या प्रशासन की ओर से कोई व्यवस्था नहीं की गई। 15 दिनों में सात हजार लोगों में से सिर्फ सात सौ लोग बचे थे। अकेले रामबाड़ा में ही पांच हजार लोग थे, जिनका कोई अता-पता नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी बहू और बच्चे 11 किमी पैदल चलकर आए तो देहरादून पहुंचे। वे अपने परिवार के आठ लोगों के साथ रात भर सड़क पर ठंड में रहे, वहां कपड़े, दवा या खाने का कोई इंतजाम नहीं था। चौबे का कहना था कि इससे बुरा इंतजाम नहीं हो सकता। ऐसी सरकार किसी काम की नहीं है।
हेमकुंड में फंसे क्रिकेटर हरभजन सिंह ने देहरादून पहुंचने के बाद बताया, इतनी बारिश होगी किसी को नहीं पता था। एक मिनट के लिए भी बारिश नहीं रुकी, तूफानी बारिश थी। मैंने जिंदगी में ऐसी तूफानी बारिश नहीं देखी। हेमकुंड के नीचे बसे छह गांवों का नामोनिशान मिट गया है। उन्होंने कहा कि वह 12 लोगों के साथ गए थे। सेना ने छह लोगों को देहरादून पहुंचाया। बाकी बचे छह लोगों के भी जल्दी पहुंचने की उम्मीद है। हरभजन ने कहा है कि उन्हें अगर मौका मिलेगा तो वे दोबारा हेमकुंड, केदारनाथ के दर्शन करने जरूर जाएंगे।
उत्तराखंड में फंसे कुछ यात्रियों से बात हुई है। केदारनाथ यात्रा पर गए जालंधर के रोहित जामवाल ने फोन पर बताया, मैं गौरीकुंड में फंसा हूं। मुझे बचा लो। यहां चारों तरफ लाशें बिछी हैं और उनके बीच बिखरे पत्ते खाकर गुजारा कर रहा हूं। परसों हेलीकॉप्टर आया था। खाने के कुछ पैकेट गिराए। कुछ ही लोगों के हाथ आए। पानी के बाद भुखमरी फैल गई है। पहले लोगों, गाडिय़ों को सूखे पत्ते की तरह बहते देखा। जल्द इंतजाम नहीं हुए तो आदमी को भूख से मरते देखना पड़ेगा। अभी गौरीकुंड के पास गौरी गांव में हूं। गांव के एक परिवार ने हम 500 लोगों को शरण दे रखी है। दूसरे घरों में हैं। कोई मदद नहीं। कोई मददगार नहीं। हम सब मिलकर यहां हैलीपेड बनाने में लगे हैं। इस आस में कि कोई हेलीकॉप्टर यहां उतर जाए और हमें ले जाए। इस मोबाइल फोन का भी भरोसा नहीं। जाने कब बंद हो जाए। अब रखता हूं।