शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

उत्तराखंड आपदा में लाशों पर हो रही राजनीति





उत्तराखंड आपदा में लाशों पर हो रही राजनीति



 देहरादून। प्रदेश में आई भीषण प्राकृतिक आपदा में एक तरफ जहां सरकारी आकड़ों में सैकड़ों लोग अपनी जान गवां चुके है वहीं हमारे देश के राजनेता उन लाशों पर राजनीति करने का मौका तलाश रहे हैं। किसी को अपनी कुर्सी बचाने की पड़ी है तो किसी को अपनी इमेज।लेकिन लोगों की जान बचाने के नैतिक और संवैधानिक दायित्व को लोग पूरी तरह भुलाए बैठे हैं।
15 और 16 जून 2013 को केदारनाथ धाम और प्रदेश के अन्य हिस्सों में आई बाढ़ एवं भूस्खलन ने हजारों लोगों के घर उजाड़ने के साथ ही राजनेताओं की पोल भी खोलकर रख दी है। मुख्यमंत्री और उनका अमला जहां इस आपदा की भीषणता का अंदाजा लगाने में बुरी तरह फेल रहा वहीं अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मृतकों की सही संख्या बताने को आज भी नहीं तैयार है जबकि राज्य सरकार ने यदि सही आकड़ा केन्द्र को बताया होता तो अब तक इस आपदा को जो सही मायनों में राष्ट्रीय आपदा है को कानूनी रूप से भी राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जा चुका होता और राहत एवं बचाव कार्याे में और मदद केन्द्र से मिलती लेकिन मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी जाने डर से अब तक सही आकड़ा बताने को तैयार नहीं।
दूसरी तरफ केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे आज देहरादून में पत्रकारों से यह कह कर कि राष्टी्रय आपदा घोषित करने से क्या फायदा होगा पीड़ितों के जख्मों पर नमक लगाने का काम किया है। हकीकत यह है कि देहरादूनएऋषिकेश और हरिद्वार के सभी होटल और धर्मशालाएं पूरी तरह से उन लोगों से फुल हो गई है जो अपने परिजनों की तलाश में आए है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस आपदा में कितने लोगों की मौत हुई है। तमाम पीड़ितों के बयानों पर विश्वास किया जाए तो इस आपदा में मरने वालों लोगों की संख्या पन्द्रह से बीस हजार तक पहुंच सकती है। इस आपदा ने सरकार की बदइंतजामी की कलई खोलकर रख दी है।
सरकार न सिर्फ मौसम विभाग के आकलन को नजरअंदाज किया बल्कि जब पूरी केदारघाटी मौत के आगोश में सो गई थी तब राज्य के मुख्यमंत्री कैबिनेट बैठक में लोकसभा चुनाव को लेकर लोकलुभावन योजनाओं पर चर्चा करने में मसगूल थे। 16 जून को जब केदारघाटी तबाह हो गई थी सरकार तब उस पर आपात कैबिनेट बैठक की बजाय 17 जून 2013 को आयोजित नियमित कैबिनेट बैठक में आपदा पर चर्चा करने की जरूरत भी नहीं महसूस कर रही थी। लेकिन 17 को दोपहर बाद जब मौसम थोड़ा ठीक हुआ और मीडिया माध्यमों से तबाही की खबर पूरे देश में फैली तो मुख्यमंत्री आपदा में हुए नुकसान का कोई सही आकलन किए बिना ही दिल्ली पहुंच गए आपदा राहत राशि मांगने। लोगों का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री में संवेदना होती तो वे आपदा प्रभावित क्षेत्र में जहां तक पहुंचना संभव होता वहां तक पहुंच कर कैंप करते तो शायद मरने वालों लोगों की संख्या को कम किया जा सकता था।
बहरहाल अब बाहर के जो यात्री आपदा क्षेत्रों में मर्मान्तक पीड़ा भोगकर वापस लौटने में सफल हो रहे वे तो मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को कोश ही रहे है वे स्थानीय लोग जो अभी भी कहीं न कहीं फंसे हुए वे भी सरकार के लिए क्या विचार रखते होंगे इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल नहीं।