बुधवार, 17 जुलाई 2013

राज्यवासियों की भावनाएं भवनों में कैद होकर तो नहीं रह जाएगी!

राज्यवासियों की भावनाएं भवनों में कैद होकर तो नहीं रह जाएगी!राजेन्द्र जोशी
राज्य आंदोलन का राजधानी के रूप में केंद्र बिन्दु रहा गैरसैंण 21 वर्ष बाद आज भी वैसा ही है जैसा 19 नवंबर 1991 को था। तत्कालीन भाजपा सरकार ने यहां अपर शिक्षा निदेशक कार्यालय का शिलान्यास कर पत्थर तो लगा दिया, लेकिन कहने भर को यह कार्यालय यहां रहा। लगभग 21 वर्ष बाद एक बार फिर गैरसैंण गैर न होकर फिर अपना हो गया और बहुगुणा सरकार ने यहां विधानभवन सहित कई अन्य भवनों का बड़े जोर-शोर से शिलान्यास कर दिया, लेकिन पर्वतीय क्षेत्र के लोगों में आज भी सरकार के प्रति वह विश्वास नजर नहीं आता जो उनमें आना चाहिए था। पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को डर है कि कहीं उनकी भावनाओं के साथ छलावा तो नहीं किया जा रहा है। क्योंकि 21 वर्ष पहले जो पत्थर भाजपा ने लगाया था उस पर उम्मीदों का भवन आज तक नहीं बन पाया है। ऐसे में बीते दिन हुए शिलान्यास को लेकर आम जन में संदेह होना लाजमी है। उनके मन में यह संदेह भी पनप रहा है कि यदि गैरसैंण में विधानभवन बन भी गया तो मात्र एक सप्ताह की विधानसभा के लिए मजमा जुटने के बाद ये भवन फिर बीरान हो जाएंगे और राज्य वासियों की भावनाएं एक बार फिर इन भवनों में कैद होकर रह जाएगी। क्षेत्रवासियों का संदेह इसलिए भी लाजमी लगता है कि लगभग दो दशक पूर्व भराड़ीसैंण में विदेशी पशु प्रजनन केंद्र बनाया गया था, जो तत्कालीन उत्तर प्रदेश के दौरान एक मात्र ऐसा केंद्र था, जहां डेनमार्क, फिन्लैण्ड आदि यूरोपीय देशों की गायों की नस्लें आयात कर मंगाई गई थी। जिनसे स्थानीय गांयों का प्रजनन कराकर विदेशी और हिंदुस्तानी नस्लों की गाय बछड़े पैदा किए गए। जिनकी दुग्ध क्षमता स्थानीय गायों से कहीं अधिक थी। राज्य के अस्तित्व में आने के बाद प्रदेश में काबिज सरकारों से गैरसैंण की तरह भराड़ीसैंण के इस पशु प्रजनन क्षेत्र को भी भुला दिया और करोड़ों रूपये की लागत से यहां बने भवन और डेयरी क्षेत्र में काम आने वाले विदेशी उपकरण धूल फांकने लगे। आज लगभग मृतप्राय हो चुके इस क्षेत्र को देखकर स्थानीय निवासियों की तल्ख टिप्पणी लाजमी है कि कहीं यहां विधानभवन और अन्य भवन बनकर तैयार होने के बाद उनकी भी कहीं ऐसी दुर्दशा तो नहीं होगी।
राज्य आंदोलन से लेकर राज्य प्राप्ति तक गैरसैंण राज्य आंदोलन का जहां प्रतीक रहा है वहीं शहीदों की उम्मीदों की राजधानी, राज्य वासियों की भावनाओं की इस राजधानी को लेकर तत्कालीन उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड के अस्तित्व में आने तक कई बार रायशुमारी के बाद राजधानी चयन के लिए दो आयोगों ने इस पर काम किया। कौशिक समिति ने जहां गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने को लेकर अपनी रिपोर्ट पर्वतीय जन मानस के पक्ष में दी वहीं दीक्षित आयोग की रिपोर्ट को तत्कालीन भाजपा सरकार ने भले ही सार्वजनिक न की हो लेकिन राज्यवासियों में खासकर पर्वतीय अंचलों के निवासियों में गैरसैंण राजधानी के रूप में उनके जेहन में रचा बसा है। इसके पीछे जहां यह तर्क रहा है कि पर्वतीय राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में हो वहीं इसे सम्पूर्ण पर्वतीय क्षेत्र के विकास से भी जोड़ा गया। इतना ही नहीं इस राजधानी को बेरोजगारी और पलायन से भी जोड़कर देखा गया। क्योंकि इनका मानना है कि इससे समूचे पर्वतीय अंचल का जहां विकास होगा वहीं क्षेत्र की मूल समस्याओं से भी राज्यवासियों को  निजात मिलेगी।
गैरसैंण राजधानी को लेकर राज्य आंदोलन का प्रमुख घटक दल रहा उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार का कहना है कि छोटे से राज्य में दो-दो राजधानियां नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि सरकार को चाहिए कि वह गैरसैंण में राजधानी के वह तमाम आधारभूत संसाधनों को जुटाए ताकि राज्य के केंद्र बिन्दु से ही राज्य की सरकार संचालित की जा सके। उनका कहना है कि 25 जुलाई 1992 को राज्यवासियों की भावनाओं का आदर करते हुए राज्य आंदोलन के जनक स्वर्गीय इंद्रमणी बडोनी व काशी सिंह ऐरी ने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम से गैरसैंण को चंद्रनगर नाम देते हुए यहां राजधानी का शिलान्यास किया था। उनका कहना है कि गैरसैंण मात्र एक स्थान नहीं बल्कि यह राज्य आंदोलनकारियों व राज्यवासियों की भावना की राजधानी भी है। लिहाजा सरकार को चाहिए कि वह जनमानस को देहरादून के नाम पर भ्रमित न कर गैरसैंण को पूर्ण राजधानी का स्वरूप दे।
वहीं भाजपा के नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट का कहना है कि गैरसैंण में जब तक आधारभूत व्यवस्थाओं का निर्माण नहीं किया जाएगा मात्र विधान भवन बनाने से राज्य का भला नहीं होने वाला उनका कहना है कि यहां अवस्थापना सुविधाओं को भी यहां सुदृढ़ करना होगा। उन्होंने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने की बात भी कही।