बुधवार, 17 जुलाई 2013

वो खौफनाक सात दिन...

 
 



वो खौफनाक सात दिन... 
बारिश के मौसम में पहाड़ों पर जो मनोहारी दृश्य होता है, वो शब्दों में बयान करने में ना जाने कितने शायरों, कविय़ों और लेखकों के कलम की स्याही खत्म हो गयी होगी. ऐसा कोई श्ख्स नहीं मिलेगा जिसने पहाड़ों पर बिखरी पड़ी हरियाली में अपने और अपनों के लिये मनपसंद गीत ना गुनगुनाये हों. बारिश की वजह से जगह-जगह पहाड़ों से झरने गिरते ऐसे लगते हैं मानों पूरे माहौल में चार चांद लगा रहे हों. जगह-जगह, कई जगह और हर जगह कल-कल बहता पानी आंखो को गजब का सुकून देता है. और जब चारों तरफ जीवनदायिनी पानी नजर आ रहा हो... वहां पर डर कैसा.
लेकिन..... पहाड़, झरने, नदियां, बारिश ये सब कुछ सामने रहते हुये भी मेरी जिंदगी के ये वो सात दिन थे जब हर पल ये पानी, पानी ना लगकर जहर लग रहा था, खौफनाक लग रहा था, काल लग रहा था. जीवन देने वाला पानी, जीवन लील लेने वाला पानी बन चुका था.
केदार बाबा के दर्शन करने गये हजारों श्रद्धालुओं की जिंदगी के साथ किस्मत और मौसम ने जो घिनौना मजाक किया वो कवर करने जाने वाले सैकड़ों रिपोर्टरों में से मैं भी एक था. हालांकि जब मैं खंड-खंड हुय़े उत्तराखंड पहुंचा तब इस त्रासदी का दसवां दिन था. तब तक मोटे तौर पर रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा हो रहा था. हजारों-लाखों लोग जान बचाकर लौट रहे थे. पहाड़ों पर चीत्कार कम थी लेकिन जमीनी इलाकों में मारा मारी और तनाव बढ़ रहा था.
देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश में हजारों की तादाद में अपनों को ढूंढते परिजन अस्पताल से लेकर बस अड्डे, स्टेशनों और हवाई अड्डों पर ऐसे भाग रहे थे, मानों जरा देर हुई तो जिंदगी की रेस में हमेशा के लिये पिछड़ जाएंगे. दस-ग्यारह दिन तक जब आपको अपने मां-बाप, बेटे-बेटी, बहन-भाई या बीवी-बच्चों के बारे में कोई खबर ना मिले तो मेरे ख्याल से आपका या मेरा भी यही हाल होता. अफरातफरी फैली हुई थी. सभी अपने रिश्तेदारों के बारे में सबसे पहले जान लेना चाहते थे. सब्र की तमाम सीमायें टूट चुकी थीं. अब गुस्सा गहरा रहा था. सरकार से गुस्सा, प्रशासन से गुस्सा, भगवान से गुस्सा, यहां तक कि मीडिया से गुस्सा.
पहले ही दिन कुछ उग्र तत्वों ने आजतक के कैमरामैन पर जानलेवा हमला इसलिए कर दिया कि मीडिया उनके रिश्तेदारों की तस्वीर नहीं दिखा रहा था. बगैर सोचे-समझे हुए इस जानलेवा हमले में मेरे सहयोगी नदीम के चेहरे पर 6 टांके आये. नदीम या मेरे साथी कुमार अभिषेक, पिनाकी सेन या मुझे एहसास तक नहीं हुआ कि आखिर क्यों और कैसे ये सब हुआ. लेकिन नदीम का सरकारी अस्पताल में इलाज कराते कराते ये बात समझ में आ चुकी थी. गुस्साई भीड़ किसी की नहीं सुनती और उग्र भीड़ को भडकाने में किसी को भी वक्त नहीं लगता. शायद इसी माहौल का फायदा उठाकर कहीं की खुंदक मेरे साथी पर निकली.
पहले दिन की ऐसी शुरुआत ने परेशान तो किया, लेकिन ये जानने के लिये भी उकसाया कि आखिर क्यों ये हुआ? नदीम की क्या गलती थी? आखिर उसे किसके गुस्से का शिकार होना पड़ा? क्या ये गुस्सा या खीझ सरकार के खिलाफ थी? आखिरकार सरकार कहां है? प्रशासन कहां है? आपदा नहीं रोकी जा सकती थी, लेकिन मरहम तक लगाने में सरकारी अमला कैसे चूक रहा है? इन्हीं कुछ सवालों और खयालों के साथ हमारा कारवां पहाड़ों की चढ़ाई नापने लगा. ऋषिकेश से गढ़वाल के श्रीनगर पहुंचने में जो 4-5 घंटे लगते हैं वो सफर 7 घंटे में पूरा हुआ क्योंकि जैसे गाड़ी ऊपर की तरफ जा रही थी, रास्ते में तबाही की तस्वीरें साफ होती जा रही थीं. सड़कें जगह-जगह से टूटी पड़ी थी.
हादसे के दस दिन बाद धीरे-धीरे अब सेना की मदद से जिंदगी को पटरी पर लाने की कवायद असलियत के धरातल पर दिखने लगी थी. बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन यानी बीआरओ के जवान इस खौफनाक मंज़र में अपाना घर-परिवार को छोड़कर जगह-जगह से टूट चुकी सड़कों की मरम्मत में दिन रात एक किये हुये थे. ऐसे ही जवान मंजीत सिंह ने हमको बताया कि ज़मीन इतनी कच्ची और पोली हो चुकी है कि 200 मीटर के इस टुकड़े को बनाने में हमें सात दिन हो रहे हैं और तीन बार भारी बारिश के कारण सारी मेहनत बरबाद भी हो चुकी है. ना जाने कब हम अपना काम पूरा कर पाएंगे. इतना कहकर वो फिर अपने साथियों को इकठ्ठा करके जेसीबी चलाने में एक बार फिर जुट जाता है.
परिस्थितियां साफ हो रही थीं. पहाड़ों का राजा उत्तराखंड तार-तार हो गया था. तबाही के तांडव की दुर्गंध साथ बहती अलकनंदा से भी रह रहकर आ रही थी. ना जाने कितनी जिंदगियां ये जीवनदायिनी नदी लील चुकी थी. मेरा और मेरे सहयोगी पिनाकी का तो ये आलम था कि साथ गिरते झरनों का पानी पीना तो दूर इनमें हाथ लगाने में डर लग रहा था. ना जाने कौन सा अजूबा ऊपर से आ गिरे.
खैर.. जीवन है चलते रहने का नाम. हम भी चले और खूब चले. प्राकृति के तांडव के पूरे होने में दो हफ्ते का वक्त हो रहा था. सेना, सरकार, प्रशासन का सारा ध्यान केदारनाथ समेत चार धामों में फंसे तमाम लोगों को बचाने का था. जिनमें ज्यादातर सैलानी थे और कुछ स्थानीय जो रोजगार के चक्कर में इन जगहों पर इस सीज़न में पहुंच जाते थे. लेकिन सरकार की इस मेहमाननवाज़ी से खुद उत्तराखंडी अब उकताने लगे थे. उन्हें खीझ आ रही थी कि सरकार अपनों के बीच क्यों नहीं आ रही है.
रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, गोचर के रास्ते तो इतने ज्यादा प्रभावित नहीं थे. यहां पर इतना ज्यादा नुकसान भी नहीं हुआ था. लेकिन जब हमने अंदरूनी इलाकों में जाने की कोशिश की जैसे नाराय़ण-बग्गड, थराली और देवाल, चमोली जिले के ये तीनों तहसील पूरी तरह से मुख्य मार्ग से कट चुके थे. इन तक पहुंचने के लिये हमने 5 जगहों पर पहाड पर ट्रैक किया और कच्चे रास्तों और फिसलन भरे रास्तों पर ट्रैक करने का ना तो हमें अनुभव था और ना ही कोई तैयारी.
लेकिन जब स्थानीय लोगों खासकर औरतों को 20 किलो के अनाज और राशन की बोरियां कंधों पर लादे देखा तो ना सिर्फ हौसला आया, बल्कि हिम्मत भी आई कि हम भी चल सकते हैं. ऐसे ही बिपिन नाम के 14 साल के लड़के से बात करते हुये जब हम हारमनी नाम की जगह पर पहाड़ चढ़ रहे थे तो उस बच्चे ने बताया कि घर में खाना खत्म हो चुका है. पिताजी का कोई पता नहीं है, मां और छोटे भाई-बहन बेहद परेशान और भूखे हैं तो अपने मास्टरजी का घर जो कि यहां से 8 किलोमीटर दूर से वहां से ये कुछ खाने पीने का सामन लेकर लौट रहा हूं. बिपिन की पथराई आंखों में कोई भाव नहीं था. वो सिर्फ तेजी से चलना चाह रहा था. उसकी बातें सुनकर मेरा दिल मुंह को आ रहा था लेकिन मुझे लगा इस वक्त विपिन के साथ हमदर्दी दिखाकर उसे अपनी मंजिल से डिगाना ठीक नहीं है. और मैं चुप रहा और बिपिन तेजी से आगे निकल गया.
ऐसी ना जाने कितनी कहानियां मिलीं. हरेक शख्स के पास अपनी परेशानी, अपना किस्सा, अपना अनुभव. थराली होते हुये देवाल तक पहुंचने में हमारी हिम्मत जवाब देने लगी थी. लेकिन एक बात पूरे रास्ते समान रही थी वो ये कि हमारी सरकार हमारे पास नहीं आ रही. सीएम या मंत्री तो दूर डीएम, एसडीएम कोई नहीं हमारी सुध लेने आया. कुछ उग्र समाजसेवकों ने तो हमको यहां तक कहा कि क्योंकि हमारे इलाकों में किसी की मौत नहीं हुई तो प्रशासन हमारी सुध नहीं ले रहा. अगर नारायणबग्गड़ और थराली जैसे इलाकों में सैकड़ों मकानों और दुकानों के मटियामेट होने की बजाय 10-20 लोग मरे होते तो हादसे के तुरंत बाद सरकारी अमला हमारे यहां आ चुका होता. ये लोग अब आदोलनों की धमकी दे रहे थे. इनका दर्द यहां तक फूटा कि जब आज तक का कैमरा तमाम कच्चे रास्तों से होता हुआ यहां आ सकता है तो डीएम और सीएम क्यों नहीं.
वहीं सरकारी स्कूलों में राहत शिविर में जो लोग अपना सारा घर-बार गंवाकर रह रहे हैं उनके सामने अलग मुसीवत है. ना रहने को सिर के ऊपर छत बची है और ना ही पैर रखने को ज़मीन. खेत, मकान और दुकान पिंडर नदी के प्रकोप में समा चुके हैं. पिंडर नदी ने सैकड़ों सालों के बाद अपना रास्ता भी ठीक उसी जगह पर बदला जहां पर सबसे ज्यादा आबादी उसके आसपास रह रही थी. मजबूरी में राजा और रंक एक ही कक्षा में दरी पर सोने को मजबूर थे. यहां रहने वाले प्रधान, अशोक अंकल, प्रमिला देवी जैसे तमाम लोगों को अब ये डर सता रहा था कि जब स्कूल खुल जायेंगें तो ये जो अस्थायी छत मिली हुई है उससे भी महरूम रह जाएंगे. और अगर स्कूल ना खुले तो उनके बच्चों के भविष्य का क्या होगा. यानी जाएं तो जाएं कहां.
ये सब घटनाएं कचोटती हैं कि आखिर क्यों. इन मासूमों से किस बात की नाराजगी निकाली कुदरत ने. लेकिन एक मन ये भी कहता है कि हम खुद ही दोषी हैं. हम ही को तो चाहिये होता है रिवर-व्यू वाला कमरा. पहाड़ों पर छुट्टियां मनाने जाना जैसा की आवश्यक हो गया है. साल में चार नहीं तो दो बार तो पहाड़ों पर जाना ही है. नदी के किनारे मंडली मारकर बैठना, वहीं खाना-पीना, गंदगी छोड़ देना. और ये काम हम ही नहीं हमारे जैसे हजारों लोग, हर रोज कर रहे हैं. तो जब हम कुदरत पर सितम ढाएंगे तो कुदरत की मार तो सुनाई भी नहीं देती.
इन हालातों को और बिगाड़ दिया सरकारी कामचोरी, सरकारी भ्रष्टाचार और हमारी बेईमान नीयत ने. जहां तहां बेतरतीब से क्रंस्ट्रक्शन, जमीनों पर अवैध कब्जा. और फिर हर तरीके से प्रकृति का दोहन और शोषण ताकि खुद की जेबें झमाझम भरी रहें.
ऐसे में सरकारों को अगर कोसा जाता है तो वो कोई गलत नहीं है. लेकिन अब वक्त है हमको भी अपने गिरेबान में झांकने का. और कुछ करें ना करें लेकिन कुदरत का सम्‍मान करना अगर शुरू कर दें तो शायद हालात को संभाला जा सकता है.
इन्हीं तमाम आंकलनों के बाद उत्तराखंड से हम लौट आये लेकिन 8 दिनों में ये समझना मुश्किल नहीं था कि खंड खंड हुये इस राज्य को आर्थिक और सामाजिक तौर पर बसाने में 5 से 7 साल का वक्त लगेगा, तभी ये राज्य प्रगति के रास्ते पर बाकी राज्यों के साथ पंक्ति में खड़ा हो पायेगा.