शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

उत्तराखण्ड त्रासदी का आखिर कौन है जिम्मेदार !



                                     उत्तराखण्ड त्रासदी का आखिर कौन है जिम्मेदार !




    उत्तराखण्ड में आयी त्रासदी ने हजारों का जीवन लील लिया है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ताना-बाना बुरी तरह से ध्वस्त हो गया है। गंगोत्री-यमुनोत्री, बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा जब अपने चरम पर थी तब लाखों देषी-विदेषी यात्रियों से देवभूमि ठसाठस भरी थी। एकाएक ऐसा जलजला आया कि पूरा देष इस हादसे से हिल गया। आधुनिक दुनिया और  विज्ञान के युग के दौर में प्रमाणित हो गया कि यहां सब कुछ भगवान भरोसे था।
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जून को षुरू हुई अतिवृश्टि ने 17 जून तक सब कुछ बदल कर रख दिया। मानसून एडवांस था और मौसम विभाग ने उत्तराखण्ड में भारी बारिष की सम्भावनाओं की भविश्यवाणी कर दी थी। इस भविश्यवाणी से सजग हो राज्य सरकार ने कोई सुरक्षा उपाय नही किये और न ही यात्रियों व स्थानीय जनता को सुरक्षित स्थानों में जाने के लिए आगाह किया। केदारनाथ मंदिर के उपर पर्वत में जो अतिवृश्टि हुई उसे जरूर प्राकृतिक  आपदा कहा जा सकता है। लेकिन बाकी उत्तराखण्ड में हुई तबाही पूर्णतया मानवजनित व जनविरोधी विकास की देन है।
    
सन् 2004 में केन्द्र सरकार ने उत्तराखण्ड में मसूरी और नैनीताल में मौसम का पूर्वानुमान लगाने हेतु 2 रडार स्थापित करने हेतु 30 करोड़ रूपया राज्य सरकार को दिया था। लेकिन पिछले 9 साल में देहरादून में सत्तासीन नारायणदत्त तिवारी, भुवन चन्द्र खण्डुड़ी, रमेष पोखरियाल, विजय बहुगुणा की सरकार रडार के लिए जमीन तक मुहैया नही करा सकी। आज जब कि मौसम का सटीक अनुमान लगाने के लिए विष्वसनीय डोपलर प्रणाली मौजूद है। उत्तराखण्ड में इस प्रणाली के बारे में सरकार के एक काबीना मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी ने एक प्रसिद्ध टीवी चैनल पर अपनी अनभिज्ञता जतायी। समझा जा सकता है कि प्रदेष सरकार की अज्ञानता व पिछड़ापन कितना षर्मनाक है। 50 करोड़ रूपये खर्च कर यदि इस उपकरण को स्थापित किया गया होता तो मौजूदा विनाषलीला से हजारों जान बचायी जा सकती थी। हजारों के जीवन को संकट में डालने से रोका जा सकता था। जो सरकारें उपलब्ध धन से रडार तक के लिए जमीन मुहैय्या न करा सकी, जिसने आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया तथा  कॉरपोरेट घरानों व धन्नासेठों की सेवा को अपना धर्म मान लिया- उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। पिछले वर्श उत्तरकाषी में जब असीगंगा ने तबाही मचायी थी तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पीड़ितों को भजन करने की सलाह दी थी। इस त्रासदी से कुछ दिन पूर्व हल्दूचौड़ हल्द्वानी में उन्होंने भरी सभा में तंत्र-मंत्र सीख समस्याओं के समाधान की बात कही थी।
    
इतने बड़े पैमाने पर आयी तबाही के बाद केन्द्र सरकार ने मात्र एक हजार करोड़ रूपया राहत फंड में दिया है। इसे राश्ट्रीय आपदा मानने से इंकार कर दिया है। सेना, वायुसेना, आईटीबीपी व अन्य संस्थाओं के मैदान में उतरने से राहत कार्यक्रम षुरू जरूर हुए हैं। लेकिन जिस पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है, इसे नाकाफी कहा जायेगा। सबसे षर्मनाक बात तो यह है कि प्रदेष सरकार के मंत्री, विधायक व छुटभैय्ये नेता उपलब्ध हैलीकॉप्टरों का दुरूपयोग करने से बाज नही आ रहें हैं। यात्रा मार्ग में फंसे यात्रियों और प्रदेष की पीड़ित जनता ने इसका कड़ा विरोध किया है। इसके बावजूद गत 23 जून को देहरादून के सहस्त्रधारा हैलीपैड से राहत सामग्री लेकर जाने वाले हैलीकॉप्टर पर प्रदेष के कृशि मंत्री हरक सिंह रावत दो पत्रकारों को लेकर चढ़ गये। पायलट ने वजन ज्यादा होने की बात कही तो मंत्री ने राहत सामग्री उतारकर वजन कम करवा दिया । यह उदाहरण सरकार की मानसिकता को समझने के लिए काफी है। अभी भी हजारों यात्री विभिन्न मार्गों पर फंसे हैं। कईं बीमारी व भूख व अन्य अभावों से दम तोड़ रहे हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्टाें से पता चल रहा है कि कई यात्रियों के पेट खाली थे। खुले आसमान के नीचे तमाम अभावों के बीच हजारों का जीवन अभी भी संकट में है। जगह-जगह स़ड़ रही लाषों के ढ़ेर और उन पर टूटते जंगली जानवरों को नरभक्षी हो जाने का डर निष्चित है। सड़ती लाषों से महामारी फैलने का डर अलग है। उत्तराखण्ड में अतीत में आयी हुई आपदाओं में सरकारों और नुमाइंदों ने राहत राषि व सामग्री की जो बंदरबाट की है उसे उत्तराखण्ड की जनता आज तक नही भूली है। अबकि बार भी बड़ी त्रासदी के साथ ही एक बड़े घोटाले की सम्भावना से इंकार नही किया जा सकता है।
    
चारधाम यात्रा राज्य की अर्थव्यवस्था का एक खास पहलू रहा है। स्थानीय लोगों की आमदनी में भी इसका खासा योगदान रहता है। लेकिन इस बार जो मार पड़ी है उससे उबर पाने में काफी समय लगेगा। केदारनाथ धाम की यात्रा सुचारू रूप से षुरू होने में वर्शों लग सकते हैं।
    
उत्तराखण्ड में आयी इस त्रासदी ने विकास की रणनीति की बहस को राश्ट्रीय पटल पर ला दिया है। उत्तराखण्ड की जल विद्युत परियोजनाएं, भीशण विस्फोटों द्वारा बनायी जा रही सड़कों, बड़े पैमाने पर हो रहा खनन , नदी किनारे किये गये अवैध निर्माणों और पर्वतीय क्षेत्र में बन रहे अभयारण्यों पर अब जोरदार ढंग से सवालिया निषान लगने लगे हैं। यद्यपि यह सवाल पहले भी उठते रहे हैं और जोरदार विरोध भी होता रहा है। लेकिन अबकि बार उत्तराखण्ड के विकास पर हो रही राश्ट्रीय बहस उत्तराखण्ड में विकास की दिषा पर जनगोलबंदी को बड़ा आयाम दे सकती है।
    
उत्तराखण्ड राज्य निर्माण की लड़ाई में जल-जंगल-जमीन और बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन केन्द्रीय विशय थे। लेकिन राज्य बनने के बाद देहरादून बैठने वाली सरकारों की कार्यप्रणाली ने जल-जंगल-जमीन को आम जनता से दूर कर दिया है। इन संसाधनों पर लूटेरे वर्ग की पकड़़ और मजबूत हुई है। कांग्रेस-भाजपा की सरकार ने लूट-खसोट की राजनीति को परवान चढ़ाते हुए माफिया राज को इतना मजबूत कर दिया है कि आम आदमी संत्रास में जीने या पलायन के लिए मजबूर हो गया है।  विकासमान मध्य हिमालय के इस क्षेत्र के भूगर्भीय अध्ययन के सबसे विष्वसनीय भूगर्भ षास्त्री खड़ग सिंह वल्दिया ने उत्तराखण्ड में समय समय पर आयी आपदाओं के बाद अपने सुझाव दिये हैं। लेकिन सरकारें कानों में रूई डालकर इस क्षेत्र की बर्बादी पर आमादा रही हैं। अभी आयी आपदा के बाद जो डा0 वल्दिया ने कहा है (देखें- लिंक ीजजचरूध्ध्ूूूण्इइबण्बवण्नाध्ीपदकपध्पदकपंध्2013ध्06ध्130623ऋोऋअंसकपलंऋनजजंतंाींदकऋतदेण्ेीजउसभविश्य के लिए उसे गाइडलाइन मान कर गम्भीरता से विचार करना जरूरी है।
    
ऐतिहासिक रूप से देखें तो अंग्रेजों ने पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों का बड़े पैमाने पर व्यवसायिक दोहन किया और बाद में आजाद देष की सरकारों ने उसी परिपाटी को जारी रखा।  सन् 1960 में पर्वतीय क्षेत्र के चीड़ के जंगलों को 40 पैसा कुन्टल के हिसाब से सहारनपुर के बाजुरिया की पेपर मिल से अनुबंध किया गया था तो तत्कालीन उत्तर प्रदेष की विधानसभा में उत्तराखण्ड के सभी विधायकों ने इसका अनुमोदन किया था। सन् 1980 में छात्र युवाओं के जबरदस्त विरोध के कारण इस समझौते का नवीनीकरण नही हो सका था। लेकिन सरकारों के मानसिक दिवालियापन के चलते सड़कों, जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में निर्मम व अवैज्ञानिक तरीके से अबाध गति से जंगलों का दोहन हुआ है। इसने पहाड़ों में होने वाले लैंड स्लाइड की घटनाओं की तीव्रता को कई गुना बढ़ा दिया है।
    
विकास का ढोल पीटने वाले भाजपा-कांग्रेस के लोग अपने विकास के तर्क को चीन के पर्वतीय क्षेत्र में चीन द्वारा पंहुचाई गई सड़कों व रेलमार्ग को राश्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे की तरह पेष करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि चीन कि पीपुल्स आर्मी ने वहां तबाही के लिए मषहुर रही हव्ांग हो नदी के किनारे युद्ध स्तर पर वृक्ष लगाकर पाट दिये। जिससे वहां बराबर हो रही तबाही पर विराम लगा। चीन ने अवष्य ही हिमालयी क्षेत्रों में सड़कों, रेलमार्ग का निर्माण किया है और आधुनिक खेती करके दिखायी है। इसका मुख्य कारण उनके सोच में आम जनता की भलाई और वैज्ञानिक दृश्टिकोण रहा है। अपने देष के षासकवर्ग ने उत्तराखण्ड में अंग्रेजों के विकास के औपनिवेषिक नजरिये को पल्लवित करने का काम किया है। नतीजा सामने है- विनाष और पलायन।
     
राजा बहुगुणा केन्द्रीय कमेटी सदस्य, भाकपा(माले) ने कहा कि 25 जून को दिये एक अखबार दिये साक्षात्कार में प्रदेष के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने प्रदेष में आयी आपदा को पूर्णतया प्राकृतिक कहा है। यह बयान सच्चाई से मुंह मोड़ने वाला है। सच्चाई यह है कि बद्रीनाथ के गोविंदघाट इलाके में जो तबाही आयी है, उसका मुख्य कारण लामबगड़ में जेपी कम्पनी की विश्णुप्रयाग के लिए बनी जल विद्युत परियोजना के बैराज का पूर्णतया ध्वस्त हो जाना है। साथ ही उत्तरकाषी की मुख्य बर्बादी का कारण पिछले वर्श असीगंगा पर बन रही जल विद्युत परियोजना से आयी तबाही का ही विस्तार है । श्रीनगर में हुई तबाही के लिए जीवीके कम्पनी की जल विद्युत परियोजना पूर्णतया जिम्मेदार है। इसके अलावा पिथौरागढ़ जिले व अन्य स्थानों पर जन-विरोधी विकास ने ही पलटवार किया है। इन तथ्यों से प्रदेष सरकार कितना ही मुंह मोड़े स्थानीय जनता उ से छोड़ने वाली नही है। 3 वर्श पहले सीएजी ने भी जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण पर अपनी आपत्ति जाहिर की थी। जिस पर राज्य सरकार ने कोई गौर नही किया। उत्तराखण्ड में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं, बड़े पैमाने पर हो रहे खनन, नदियों के किनारे हुए अवैध निर्माण और विस्फोटों के दम पर बनी सड़कों और उनसे निकलने वाले मलवे का नदियों में डम्प किया जाना इस तबाही का एक केन्द्रिय कारक है।
    
यह एक तथ्य है कि हिमालय क्षेत्र की नदियों का आयतन गल रही बर्फ से पहले ही अधिक था और एडवांस में आये मानसून की अतिवृश्टि ने नदियों के आयतन को बर्फ को और बड़े पैमाने पर गलाते हुए बढ़ा दिया था। अपने तर्काें पर पैबंद लगाने के लिए प्रदेष सरकार कह रही है कि टिहरी बांध की वजह से बड़ी तबाही होने से बच गयी। छोटी परियोजनाओं से मौजूदा त्रासदी की भूमिका अबकी बार आयी तबाही से स्पश्ट हो चुकी है। यदि भविश्य में कभी टिहरी बांध का बैराज टूटा तो ऋशिकेष, हरिद्वार सहित पष्चिमी उत्तर प्रदेष तक तबाही मच जाएगी। सर्वविदित है कि मध्य हिमालय के क्षेत्र में बना विषालकाय टिहरी बांध हमेषा ही विवादों के घेरे मेें रहा है। हिमालय क्षेत्र का बदलता मिजाज टिहरी बांध पर कभी भी प्रहार कर सकता है।
    
उत्तराखण्ड में वर्शो से हो रही तबाही के चलते सैकड़ों गांव को सुरक्षित स्थानों पर पुर्नवासित करने की योजना के बावजूद प्रदेष सरकार पिछले साल  एक गांव की आधी जनता को ही पुर्नवासित कर सकी।  अबकि बार हुई तबाही से काफी संख्या में आबादी घरविहीन हो गई है। इसके अलावा सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक गांव पर्वतीय क्षेत्र में असुरक्षित स्थानों पर हैं। लेकिन सरकार की सूची में उन्हें षामिल नही किया गया है।
    
उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन को यह त्रासदी और बढ़ायेगी। पुर्नवास की बाट जोह रहे गांव यूं ही जिंदगी और मौत के बीच झूलने के लिए विवष रहेंगे। पर्वतीय क्षेत्र के ऊपरी इलाके अभयारण्यों के लिए और नदी घाटी के इलाके जल विद्युत परियोजनाओं के लिए रिजर्व कर दिये गये हैं। आखिर आम जनता कहां जायेगी? योजनाकारों के औपनिवेषिक नजरिये  ने उत्तराखण्ड की जनता को हर तरह से विस्थापन का दंष झेलने को विवष कर दिया है।
    
उत्तराखण्ड की बर्बादी के लिए जिम्मेदार कंाग्रेस-भाजपा अब त्रासदी से उत्पन्न स्थिति पर घटिया राजनीति करने पर उतारू हो गयी हैं। बर्बादी के इतने बड़े मंजर के बीच नरेन्द्र मोदी केदारनाथ मंदिर के परिसर निर्माण की जिम्मेदारी लेने के बयान से बाज नही आये। जबकि राहत के लिए सबसे सम्पन्न राज्य का मुख्यमंत्री होने का दावा करने वाले मोदी ने मात्र 2 करोड़ रूपये ही दिये। लाषों के ढेर , हजारों यात्रियों के खतरनाक स्थितियों में फंसे होने,   स्थानीय आबादी के बड़े हिस्से के बेघरबार हो जाने के बीच मंदिर को लेकर भाजपा और कांग्रेस में होड़ षुरू होना उनके चरित्र का परिचायक है। संकट में फंसी जिंदगियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना तथा अनियोजित व शणयंत्रकारी विकास को खारिज कर जन केन्द्रित विकास ही आज उत्तराखण्ड का प्राथमिक एजेण्डा है। इससे किसी भी तरह का विचलन लोकतंत्र की हत्या ही कहा जायेगा।