रविवार, 18 अगस्त 2013

आरक्षित वन क्षेत्र में अवैध खेती को बढ़ावा दे रहे आला वन अधिकारी

आरक्षित वन क्षेत्र में अवैध खेती को बढ़ावा दे रहे आला वन अधिकारी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून : वन विभाग के आला अधिकारियों, नेताओं और भूमाफियाओं के गठजोड़ के चलते उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्र की आरक्षित वन भूमि पर खेती कर आरक्षित वन भूमि को धीरे-धीरे कब्जाने का खेल बीते 10-15 सालों से चल रहा है। वन विभाग के आलाधिकारी भी आंख बद कर आरक्षित वन क्षेत्र की भूमि को माफियाओं को कब्जा करने दे रहे हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों में स्पष्ट उल्लेख है कि आजादी के बाद से जो वन भूमि आरक्षित वन क्षेत्र घोषित है, उसे किसी भी तरह परिवर्तित नहीं किया जा सकता है अथवा उसमें किसी भी तरह की मानव गतिविधियां प्रतिबंधित हैं, लेकिन वन विभाग के आलाधिकारी तराई क्षेत्र के इन आरक्षित वन क्षेत्रों में गैर वानिकी कार्य धड़ल्ले से करने दे रहे हैं। इस संबंध में उत्तराखण्ड शासन के प्रमुख सचिव वन ने 21 जून 2013 को प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखण्ड को इस आशय से पत्र लिखा कि तराई क्षेत्र के वन प्रभागों में उच्चतम न्यायालय के आदेशों का खुले आम उल्लंघन कर गैर वानिकी कार्य किया जा रहा है। इस संबंध में उन्होंने प्रमुख वन संरक्षक को अतिक्रमण की सूची और डिजिटल मानचित्र भी उपलब्ध कराने को कहा है। यह मामला प्रदेश सरकार के संज्ञान में तब आया जब नैनीताल के एक पर्यावरणविद् अजय सिंह रावत ने सदस्य सचिव सेंट्रल इम्पावर कमेटी नई दिल्ली को पत्र लिखा। इस पत्र के संदर्भ में सेंट्रल इम्पावर कमेटी के सदस्य सचिव एम.के. जिवराज ने उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव को 8 मई 2013 को पत्र लिखा कि प्रदेश में आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी कार्य किया जा रहा है, इस पत्र के संदर्भ में प्रमुख सचिव ने प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक को पत्र लिखा था।
    मामले में पिपुल फॉर एनिमल की सदस्य सचिव गौरी मौलिखी ने बताया कि आरक्षित वन क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियां वन विभाग के आलाधिकारियों के संज्ञान में नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता। उनका कहना है कि वन क्षेत्र में खेती से वन्य जंतुओं के जीवन के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने यह बताया कि वन्य जीव स्वछंद प्राणी हैं, लिहाजा वन क्षेत्र में गैर वानिकी कार्यों के कारण वे उस ओर आकर्षित होते हैं, जिनका फायदा पशु तस्कर उठाते हैं। उन्हांेने यह भी बताया कि जानवरों को मारने के लिए खेतों में कीटनाशक का प्रयोग और फंदो का प्रयोग किया जाता है, जिससे आरक्षित वन क्षेत्र में हो रही खेतों के आस-पास अकसर जानवरों की मौत होती रही है। उन्होंने कहा यह गंभीर विषय है, लिहाजा आरक्षित वन क्षेत्र और खत्तों में खेती पर वन विभाग को प्रतिबंध लगाना चाहिए।