बुधवार, 4 सितंबर 2013

बहुगुणा के साथ कुल नौ, तो बाकी विधायक किसके साथ!

बहुगुणा के साथ कुल नौ, तो बाकी विधायक किसके साथ!


जब बहुगुणा खुद को सर्वमान्य नेता बता रहे, तो क्यों कर रहे

विधायक बहुगुणा की वकालत!

राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का कहना है कि वे सर्वमान्य नेता हैं और कहीं कोई झगड़ा नहीं है। उनका यह बयान आज ऐसे समय पर आया, जब उनके पक्ष में नौ विधायक दिल्ली में हैं और वे पार्टी के आला नेताओं से इसलिए मिल रहे हैं कि बहुगुणा को उत्तराखण्ड से न हटाया जाए। मुख्यमंत्री के इस बयान की हवा तब निकल जाती है, जब कांग्रेस आलाकमान ने अभी तक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को बदलने का कोई संकेत नहीं दिया है। आखिर वह कौन सी वजह है कि मुख्यमंत्री को नौ विधायकों को अपने पक्ष में वकालात करने को दिल्ली भेजना पड़ा। राजनैतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री की कार्यशैली से केंद्रीय नेतृत्व खुश नहीं है, लिहाजा वह अंदरूनी तौर पर नेतृत्व परिवर्तन के बारे में सोच तो जरूर रहा है, लेकिन उसने पार्टी के बाहर इस तरह की कोई बात अभी तक सार्वजनिक नहीं की है।
राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार मुख्यमंत्री इस समय हटो-बचो की राजनीति पर काम कर रहे हैं और उनके द्वारा नौ विधायकों को अपनी पैरवी के लिए दिल्ली भेजे जाने से मुख्यमंत्री की छवि पर ही बुरा असर पड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि जब प्रदेश में मुख्यमंत्री को हटाने को लेकर विरोधी खेमा वर्तमान में शांत है, तो आखिर मुख्यमंत्री को अपनी पैरवी के लिए नौ विधायकों को दिल्ली भेजने की जरूरत क्यों आन पड़ी, जबकि बीते दिन इन विधायकों के खेमें से ही यह हवा उड़ी थी कि मुख्यमंत्री के पक्ष में 11 विधायक दिल्ली कूच कर गए हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के पक्ष में केवल सुबोध उनियाल, प्रदीप बत्रा, फुरकान अहमद, विजय पाल सजवाण, विक्रम सिंह नेगी, मदन बिष्ट, उमेश शर्मा (काऊ), राजकुमार और शैलेंद्र मोहन सिंघल ही दिल्ली जा पाए। इन विधायकों से जब दिल्ली जाने का कारण पूछा गया तो कुछ ने तो केदारनाथ पूजा के लिए आलाकमान को आमंत्रण देने के लिए आने की बात कही, तो कुछ ने भोजन गारंटी योजना अध्यायदेश पर आला नेताओं को बधाई देने को, लेकिन अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश सह प्रभारी संजय कपूर की रिपोर्ट ही इन विधायकों के दिल्ली जाने का कारण बनी, क्योंकि प्रदेश सह प्रभारी संजय कपूर ने प्रदेश की ताजा स्थिति केंद्र के समक्ष रखी है। जिसे बहुगुणा सरकार पचा नहीं पा रही है, क्योंकि इस रिपोर्ट में बहुगुणा सरकार की उन खामियांे का भी जिक्र है, जिसकी वजह से आपदाकाल के दौरान कांग्रेस सरकार की खासी किरकिरी हुई थी।
हालांकि इस सब के बावजूद जहां इस मर्तबा हरीश रावत लॉबी कुछ भी कहने से बच रही हैं, वहीं सतपाल महाराज ने बीते दिन मुख्यमंत्री को आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हो रहे कार्यांे के निरीक्षण पर कार से जाने का सुझाव दिया था। ऐसे में बहुगुणा समर्थकों की नींद हराम होनी लाजमी है।
कुल मिलाकर बहुगुणा की पैरवी के लिए गए विधायकों के इस दल को न तो राहुल गांधी ही मिल पाए और न ही अहमद पटेल, जो मिले उनमें गिरिजा व्यास और जर्नाधन द्विवेदी ही रहे। सूत्रों ने जो जानकारी दी है, उसके अनुसार गिरिजा व्यास ने उन्हें इस बात पर झिड़क किया कि आप लोगों को मुख्यमंत्री की पड़ी है और यहां फूड सिक्योरिटी बिल को लेकर कांग्रेस परेशान है। काबिलेगौर यह भी है कि उत्तराखण्ड के इतिहास में यह घटना पहली बार हुई है, जब किसी मुख्यमंत्री का विरोध ही न हुआ हो और उसको बचाने के लिए मुख्यमंत्री समर्थक विधायक दिल्ली के आलानेताओं से संपर्क कर रहे हों। राजनैतिक रस्सा-कस्सी के बीच मंगलवार को बहुगुणा का यह बयान कि ‘‘मै सर्वमान्य नेता हूं और नेतृत्व को लेकर कोई झगड़ा नहीं है‘‘ कि हवा स्वतः ही निकल जाती है कि कहीं कुछ न कुछ जरूर पक रहा है, जिसके परोसे जाने से मुख्यमंत्री बहुगुणा की परेशानियां बढ़ सकती हैं।