बुधवार, 4 सितंबर 2013

राहत कार्यों में सड़क ही बनी सबसे बड़ी बाधा

राहत कार्यों में सड़क ही बनी सबसे बड़ी बाधा

राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखण्ड में आई आपदा के दो महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है, लेकिन आपदा के दंश प्रभावित इलाकों में आज भी मौजूद हैं। जिंदगी को अपने रास्ते पर आने की कोशिश में खस्ताहाल सड़कें सबसे बड़ी बाधा बनी हुई हैं, लेकिन राज्य सरकार के तमाम दावों के बाद भी राज्य के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों सहित राज्य की 328 सड़कें बंद हैं। सड़क बनाने का काम अभी मौसम के चलते शुरू नहीं हो पाया है।
    आपदा ने पहाड़ की जिंदगी को और भी मुश्किल बना दिया है। 16-17 जून में आए भीषण सैलाब और भूस्खलन के बाद बर्बाद हुई सड़कों के कारण स्थानीय पहाड़ के लोग तंग हाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं। आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लोग आज भी तंबूओं में तंग जिंदगी जी रहे हैं। एक-एक तंबू में दो-दो, तीन-तीन परिवार किस तरह गुजर-बसर कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में सड़कें बंद होने के कारण खाद्यान्न का संकट भी गहरा गया है। मुख्यमंत्री और प्रशासनिक अधिकारी तो हैलीकाप्टर के जरिए दौरे कर लेते हैं, लेकिन आम आदमी आज भी परेशान और हताश नजर आ रहा है। आपदा की मार सबसे ज्यादा बुजुर्गों और बीमारों पर पड़ी है, जो सड़कें बंद होने के कारण तिलतिल कर मरने को मजबूर हैं। प्रकृति के कहर ने उत्तराखण्ड की 328 सड़कें बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दी हैं, इन सड़कों का एक से लेकर दो किलोमीटर तक का हिस्सा पूरी तरह बह गया है, जिस पर अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है, वहीं राष्ट्रीय राजमार्गों का भी कमोबेश यही हाल है। मुख्यमंत्री इसके लिए सीमा सड़क संगठन को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन सच तो यह है कि राज्य में सड़क बनाने की ज्यादातर जिम्मेदारी राज्य सरकार के पास है और जिसके मंत्री के रूप में दायित्व मुख्यमंत्री के पास ही है। प्रदेश में सड़क बनाने के लिए केंद्र पहले ही 150 करोड़ की सहायता मुहैया करा चुका है। ऐसे में राज्य में सड़क न बनने की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर ही आती है, इसको लेकर वह विपक्ष के निशाने पर है। महाप्रलय के चलते बर्बाद हुई सड़कों को बनाने की डेड लाईन 30 सितंबर तय की गई है और केदारनाथ में पूजा करने की तारीख 11 सितंबर ऐसे में सबसे बड़ा यह सवाल उठ खड़ा हो रहा है कि जब केदारनाथ तक पहुंचने के लिए मार्ग ही उपलब्ध नहीं होगा, तो आखिर केदारनाथ में पूजा को लेकर सरकार इतनी जल्दबाजी में क्यों है और वह पूजा किसके लिए कराई जा रही है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान में आपदा के बाद से लेकर अब तक केदारनाथ धाम में होने वाली पूजा ऊखीमठ के ओमकारेश्वर मंदिर में हो रही है। ऐसे में सरकार का 11 सितंबर तक केदारनाथ में पूजा करने पर  अड़िग रहना किसी के गले नहीं उतर रहा है, जबकि शास्त्रों की जानकारी रखने वाले लोगों का भी कहना है कि 11 सितंबर की तारीख पूजा कराने के लिए माकूल नहीं है। सच तो यह है कि अभी तक इन आपदा प्रभावित सड़कों से मलबा हटाने का काम ही शुरू हुआ है, बह गई सड़कों का बनना अभी भी बाकी है, ऐसे में पहाड़ के लोग क्या करें, उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा है।