बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बहुगुणा सरकार का कारनामा : डोबरा -चांटी पुल तो बना नहीं कर डाला पूरा भुगतान

राजेन्द्र जोशी

देहरादून : उत्तराखंड में टिहरी बांध की झील के ऊपर बनने  वाले डोबरा चांटी पुल के निर्माण में सौ करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले का मामला सामने आया है।  खास बात यह है कि देश के इस सबसे बड़े सस्‍पेंशन पुल का निर्माण बीते चार सालों  से अभी तक पूरा नहीं हुआ है, जबकि पुल बनाने वाली ठेकेदार कंपनी को 120 करोड़ रुपये की लगभग पूरी लागत का भुगतान कर दिया गया है, और इस इलाके के लोग इस पुल के निर्माण को लेकर आन्दोलनरत हैं।  
गौरतलब है कि टिहरी से प्रतापनगर की 4-5 किलोमीटर की दूरी पुल के डूब क्षेत्र में आ जाने के बाद बढकर करीब 70 किलोमीटर हो गई थी. जिसके बाद टिहरी बांध परियोजना पुर्नवास निदेशालय ने 440 मीटर लंबे डोबराचांटी पुल की परियोजना तैयार की. पुल की लागत 129.43 करोड़ रुपये प्रस्तावित थी. जिसका ठेका चंडीगढ़ की मै.वीके गुप्ता एंड एसोसिएट्स को दिया गया. लेकिन 2006 में निविदाएं आमंत्रित किए जाने के बाद से अब तक पुल के दोनों छोर पर केवल पिलर ही बन पाये हैं. जबकि ठेकेदार कंपनी को 124 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है.
उत्तराखंड सरकार के इस गड़बड़झाले का खुलासा राजेश्वर पैन्यूली नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर आरटीआई के जरिए हुआ है. इस पुल के न होने से टिहरी से प्रतापनगर और आसपास के दर्जनों गांवों को भारी परेशानी का सामना करना करना पड़ रहा है. आरटीआई में मिली जानकारी के अनुसार इस पुल के लिए कुल लागत का 50 फीसदी केन्द्र सरकार द्वारा दिया जाना था, जबकि बाकी 50 फीसदी राज्य सरकार द्वारा खर्च होना था. योजना के लिए कुल 128.53 करोड़ की राशि टिहरी बांध परियोजना पुर्नवास निदेशालय को दी गई थी. वहीं, 2006 में निविदा स्‍वीकृत होने के बाद से इस साल अप्रैल तक निर्माता ठेकेदार ने 124.44 करोड़ रुपये खर्च कर दिये, इस पुल पर अब तक लगभग 130 करोड़ रुपये खर्च किये जा चके हैं .
  पुल भले ही नहीं बना हो, लेकिन इस पुल के लिए तकनीकी सहायता के नाम पर अधिकारियों ने 10 से ज्‍यादा बार विदेश यात्राएं की हैं. यही नहीं, इस पुल की तकनीक के लिए आईआईटी खड़गपुर से अनुबंध भी किया गया था. जानकार बताते हैं कि यह पुल आम झूला पुल से काफी अलग है, लेकिन सरकार इसे केवल एक इंजीनियर के भरोसे बना रही है, जबकि इसके लिए अंतरराष्‍ट्रीय निविदाएं मंगाई जानी चाहिए थी.
पुल के निर्माण में भ्रष्‍टाचार का आलम यह है कि यहां रेत बजरी तैयार करने के लिए कंपनी द्वारा अवैध ढंग से स्‍टोन क्रेशर भी लगा लिया गया. इस क्रेशर से पुल के निर्माण के लिए नाममात्र मैटेरियल तैयार किया जाता और बाकी अवैध रूप से खुले बाजार में बेचा जा रहा था. जानकारी मांगने पर अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि अवैध संचालन के कारण क्रेशर सीज कर लिया गया.
राष्‍ट्रमंडल खेल से लेकर कोयला घोटाले का दंश झेल रही कांग्रेस सरकार इस नए घोटाले से सकते में हैं. राज्‍य की कांग्रेस सरकार जो अब तक इस पूरे मामले में आंखे मूंदी बैठी थी, आरटीआई से खुलासे के बाद हरकत में आई है. उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मिनिस्‍टर मंत्री प्रसाद नैथानी ने मामले में सरकार द्वारा जांच करवाने की बात कही है
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004  में जब टेहरी बांध परियोजना की सुरंग संख्या चार को पूर्णरूप से बंद कर दिया गया तो एक एक कर के भागीरथी और भिलंगना नदी पर बने पुल एक एक कर के डूबने लगे। नदी पर बने यह पुल ही उस पार बसे सम्पूर्ण प्रतापनगर क्षेत्र की जीवन रेखा हुआ करते थे , आवागमन के लिए दो हल्का मोटर वाहन पुल बनाये गए जो कर्मश: पीपल डाली और स्यांसू नामक स्थानों में बनाये गये। इन पुलों से मात्र हल्के वाहन ही गुजर पाते है और भारी वाहनों को उत्तरकाशी या घनसाली होते हुए यहाँ पहुचना पड़ता है जिसके लिए उन्हें लगभग सौ किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है, अतिरिक्त दूरी तय करने के कारण माल भाड़े में वृद्धि हुई और यहाँ पहुचने वाले सामान की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हो गयी है जहाँ एक और देश की जनता महगाई से त्रस्त है वही दूसरी और इस क्षेत्र की जनता पर दोगुनी महगाई का बोझ पड़ रहा है , कोई भारी मोटर मार्ग न होने की वजह से जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है प्रत्यक्ष रूप से लगभग दो लाख लोग सीधे रूप से प्रभावित हो रहे है और लाखो लोग परोक्ष रूप से। वर्ष 2006  में जनता के आक्रोश को देखते हुए डोबरा चांठी नामक पुल को स्वीकृति दी गयी थी जो अब तक तैयार नहीं हो पाया है।