बुधवार, 20 अगस्त 2014

अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश दे गयी नन्दा राजजात यात्रा -सम्पूर्ण यात्रा






राजेन्द्र जोशी

नंदा राजजात  - नौटी से ईड़ा बधाणी


नौटी (कर्णप्रयाग ) : पिछले दो  सालों  से घुमड़ रहे आशंका के बादल छंटे और आशा का सूरज चमक उठा। सोमवार सुबह नंदा धाम नौटी में जैसे ही सूर्य उदय  हुआ तो लगा मानो हिमालय पुत्री नंदा की विदाई का वह भी साक्षी बन रहा हो। 185 परिवारों वाले चमोली जिले के नौटी गांव में आस्था का सागर हिलारें ले रहा है। बच्चे, बूढ़े, जवान, विशिष्टि, अतिविशिष्ट और सामान्य लोग हजारों की संख्या में नंदा को विदा करने पहुंच रहे हैं। प्रत्येक बारह साल में ससुराल जाने वाली भगवती नंदा इस बार 14 साल बाद विदा हो रही हैं। वर्ष 2013 में आई आपदा के कारण यात्रा  स्थगित करना पड़ी थी। शुभ मुहूर्त पर पूर्वाह्न ठीक 11.35 बजे वैदिक मंत्रोच्चारण और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच डोली रवाना हुई और लगभग दस किलोमीटर की दूरी तय कर शाम 7.40 बजे ईड़ा बधाणी पहुंची। इसी के साथ हिमालयी महाकुंभ श्री नंदा राजजात शुरू हो गई है। 280 किलोमीटर लंबे सफर में बीस पड़ावों के बाद यात्र छह सितंबर को विश्रम लेगी। यात्र के महत्व को रेखांकित करते हुए नौटी पहुंचे राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी ने कहा "नंदा हिमालय की सांस्कृतिक विरासत का सशक्त प्रतीक हैं।"
    नंदा धाम नौटी में रविवार से ही गहमा गहमी बनी हुई थी। देर शाम जैसे ही राजकुंवरों के गांव कांसुवा से नंदा देवी राजजात समिति के अध्यक्ष राजवंशी डॉ. राकेश कुंवर चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) लेकर आये तो एक साल से घुमड़ रहे आशंका के बादल छंटे और आशा का सूरज चमक उठा। सोमवार सुबह नंदा धाम नौटी सूर्य के  प्रकाश से रोशन हुआ तो लगा मानो हिमालय पुत्री नंदा की विदाई का वह भी साक्षी बन रहा हो। 185 परिवारों वाले चमोली जिले के नौटी गांव में आस्था का सागर हिलारें ले रहा है। बच्चे, बूढ़े, जवान, विशिष्टि, अतिविशिष्ट और सामान्य लोग हजारों की संख्या में नंदा को विदा करने पहुंच रहे हैं। प्रत्येक बारह साल में ससुराल जाने वाली भगवती नंदा इस बार 14 साल बाद विदा हो रही हैं। वर्ष 2013 में आई आपदा के कारण यात्रा स्थगित करना पड़ी थी।
      शुभ मुहूर्त पर पूर्वाह्न ठीक 11.35 बजे वैदिक मंत्रोच्चारण और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच डोली रवाना हुई और लगभग दस किलोमीटर की दूरी तय कर शाम 7.40 बजे ईड़ा बधाणी पहुंची। इसी के साथ हिमालयी महाकुंभ श्री नंदा राजजात शुरू हो गई है। 280 किलोमीटर लंबे सफर में बीस पड़ावों के बाद यात्र छह सितंबर को विश्राम लेगी। यात्र के महत्व को रेखांकित करते हुए नौटी पहुंचे राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी ने कहा "नंदा हिमालय की सांस्कृतिक विरासत का सशक्त प्रतीक हैं।"
न भोले-भाले ग्रामीणों की भेंट स्वीकार करती मां नंदा सोमवार को नौटी से निकलकर सबसे पहले सिलंगी में अपनी बहन उफरांई से मिलीं। वचन निभाने के लिए ऊंचे पहाड़ों की तरफ निकलने की बजाय नंदा कर्णप्रयाग के पास ईड़ा बधाणी पहुंच गईं।
  दस किलोमीटर के इस पहाड़ी रास्ते में छह साल के बच्चे से लेकर 80 साल की बुजुर्ग महिलाओं ने नंदा के साथ सफर तय किया। नंदा भले ही ससुराल के लिए निकली हों पर गांव, पहाड़ी रास्तों में महिलाओं की भेंट स्वीकार करती नंदा के सामने पहाड़ की महिलाओं का मायके के प्रति अटूट प्रेम उभर कर सामने आया।
 सिलंगी में उफरांई के साथ गले मिलकर नाचती नंदा का मायके से निकलने का दर्द गांव की महिलाओं के गीतों में जब-तब उन शांत वादियों में गूंजता रहा।महिलाओं के मुंह से लय के साथ फूट रहे नंदा के जागर में ससुराल के कठोर जीवन, वहां के कष्ट नंदा को भेंट देती महिलाओं के सुरों में छलक आया।
 नंदा का मायका खूब भरा-पूरा है पर शिव का धाम उतने ही कष्टों से भरा। नौटी से करीब चार किलोमीटर की सीधी चढ़ाई चढ़ कर नंदा जब बगरखाल पहुंचीं तो छातौली गांव की महिलाओं के लिए नंदा को विदा करने की बेला थी। नौटी से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर के छातौली की महिलाओं ने नंदा को विदा किया। यहां से उनकी वापसी का समय था। अब बारी सिलंगी की थी।
   बगरखाल से करीब दो किलोमीटर की दूरी के गांव सिलंगी में नंदा की बहन उफरांई देवी का मंदिर है। यहां नंदा उफरांई से मिलीं तो पूरा गांव भाव विभोर था। जागर गूंज रहे थे। महिलाएं गा रही थी-स्वामी शिव मुझे मायके जाने दे । शिव ने डांटा- क्या रोज सुबह शाम मायके की बात करती हो। नंदा ने कहा-मायके से मैं तुम्हारे लिए बढ़िया खाने-पीने का सामान लाऊंगी। शिव बोले-ठीक है तुम्हारा भाई न्यूता (न्योता) लेकर आएगा तो जाना।
    ससुराल जा रही नंदा अपने मायके को नहीं भूल पा रही हैं। मां ने ससुराल वालों के लिए बढ़िया अरसे बनाए हुए हैं। उफरांई की देवी जिस महिला पर है उसका नाच थमने का नाम नहीं ले रहा है। नंदा की रक्षा के लिए साथ में निकला ''वीर''जैसे अलग ही दुनिया में है। सिलंगी में देवता धरा पर मानवों के बीच में उतर आए हैं। यह उनकी दुनिया, उनका क्षेत्र है। पुरुष पीछे हैं। महिलाएं आगे। देवी के साथ चल रहे चौसिंग्या मेढ़े (खाड़ू) को छूने, उसे भेंट देने की होड़ मची है। महिलाओं का आंचल पसरा है। ढोल, दमाऊं, रणसिंघा, भंकोरू की गूंज के बीच अक्षत के दाने आंचल में गिर रहे हैं। नंदा की यात्रा (राजरात) शुरू हो चुकी है।

 नंदा की यह यात्रा इसके बाद चौंडली, हिलोली होते हुए ईड़ा बधाणी शाम को सात बजे तक पहुंच चुकी है। रोड हेड के इस गांव में देवी रात को रुकेंगी। ससुराल जाते समय नंदा का इस गांव के लोगों ने खूब स्वागत किया था। नंदा ने उस समय गांव के प्रधान जमन सिंह जदोड़ा को वचन दिया था कि ससुराल जाते समय हर बार आऊंगी। देवी ने इस बार भी जमन सिंह के गांव जाकर अपना वचन निभाया।





नंदा राजजात - ईड़ा बधाणी से नौटी

यात्रा पहली व‌िदाई में क‌िया था हर बार आने का वादा

ईड़ा बधाणी: अपनी ससुराल शिवलोक प्रस्थान करते वक्त ईणा बधाणी में अपने स्वागत से अभिभूत मां नंदा ने तत्कालीन ग्राम प्रधान जमन सिंह जदोड़ा को ससुराल जाते समय हर बार आने का वचन इस बार भी निभाया। सोमवार को शुरू हुई राजजात मंगलवार को देर शाम ईड़ा बधाणी से नौटी लौट आईं। कुल दस किलोमीटर के पैदल सफर में नंदा कई गांवों के देवी-देवताओं से मिलीं।
        नंदा ने अगाध आस्था से भरी महिलाओं की भेंट स्वीकारी। नौटी की पूरी घाटी में पूरे दिन नंदा के मंगल गीत गूंजते रहे। देवी के अक्षत और आशीर्वाद के लिए महिलाओं का आंचल फैला रहा। बिटिया नंदा की विदाई की बेला में मायकेवासियों की आंखें आंसुओं से भीगी थीं। नंदा के हजारों सहयात्री मौजूद थे। इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है।
ईड़ाबधाणी से करीब दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई को पार कर नंदा जाख पहुंची तो यात्रा का रंग बदल गया।
     नंदा को विदा करने महिलाएं चढ़ी सीधी चढ़ाई ढोल, दमाऊं, रणसिंगा, भंकारू की आवाज के बीच नंदा की छंतोली और चौसिंग्या खाडू को छूने, देवी को भेंट देने के लिए जाख की महिलाएं उस जगह पहुंचीं जिसे मणताल कहा जाता है। धार की इस जगह से आसपास का पूरा नजारा दिखता है। गांव की देवी से नंदा की भेंट हुई। रोड हेड से कुछ दूर इस गांव में ढोल, दमाऊं के सुरों के बीच नंदा के जयकारे गूंज रहे थे।
      जाख के बाद के दयारकोट, कुकड़ई, कुडियाणी, गैरोली, नैणी पहुंची नंदा की छंतौली का भरपूर स्वागत हुआ। गांवों की सीमा पर नंदा से मिलने बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंचीं थीं। नंदा को विदा करने के लिए महिलाओं ने कई किलोमीटर खड़ी चढ़ाई चढ़ने से भी गुरेज नहीं किया।
अभी नंदा ने सिर्फ 20 किमी का रास्ता पार किया है। उन्हें 260 किमी की यात्रा और तय करनी है। नंदा अब अपने अगले पड़ाव कांसुवा के लिए बुधवार को निकलेंगी। राजा के प्रतिनिधि राज कुंवरों का यह गांव नंदा के भव्य स्वागत की तैयारी में जुटा हुआ है।

                                         

पारंपरिक रूट बदलने पर भड़के गैरोलीवासी, लगाया जाम

गैरोली। नंदा राजजात के दूसरे दिन परंपरागत मार्ग गैरोली से हटना आयोजकों को भारी पड़ गया। समय की बचत के लिए सदियों से यात्रा रूट पर स्थित गैरोली गांव को छोड़ देने पर भड़के स्थानीय लोगों ने जाम लगा दिया। यात्रा दूसरे दिन ईड़ा बधाणी गांव से शुरू होकर कई गांवों से होते हुए नौटी पहुंचती है। यात्रा का रूट परंपरागत और कई प्राचीन मान्यताओं से जुड़ा है।
 मंगलवार को पु़‌ड़‌ियाणी गांव के पास आयोजकों ने तय किया कि राजजात को गैरोली छोड़कर सीधे कनोट गांव ले जाया जाए। तर्क था कि गैरोली सड़क मार्ग से डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां जाने में अधिक समय लग जाएगा। इसपर गैरोलीवासी गुस्सा गए। गांववालों ने नौटी सड़क मार्ग पर धरना दे दिया और भजन कीर्तन करने लगे। सड़क के दोनों और वाहनों की लंबी कतार लग गई।
 आयोजन समिति और पुलिस को धरना स्थल पर लोगों को समझाने में खासी माथापच्ची करनी पड़ी। करीबन एक घंटे बाद सहमति बनी और यात्रा गैरोली होते हुए देरी से अपने गंतव्य पर पहुंची।










नंदा राजजात -  नौटी से कांसवा


कांसुवा: आंखों में उल्लास के आंसू और चेहरे पर बिछोह की नमी। राजजात के पड़ावों पर कुछ ऐसे ही दृश्य साकार हो रहे हैं। नंदा नौटी से पूरी तरह विदाई लेकर कांसुवा पहुंच चुकी हैं। बेटी की विदाई के बाद नौटी में खामोशी पसरी हुई है तो कांसुवा में चारों ओर उत्साह है। राजकुवंरों के गांव कांसुवा में स्वागत सत्कार में राजसी वैभव की छाप है और जयकारों के बीच हर कोई नंदा से भेंटने को आतुर। दूसरी ओर कुमाऊं के अल्मोड़ा में भी माहौल यहां से भिन्न नहीं है। नंदा मंदिर से कलशयात्रा निकाल राजजात का शुभारंभ हो गया है।
    अल्मोड़ा के नंदा मंदिर से डोली 24 अगस्त को रवाना होगी। यह डोली 26 अगस्त को नंदकेसरी में मुख्य राजजात में समाहित हो जाएगी।1इससे पहले मंगलवार रात 9.30 बजे डोली अपने पड़ाव ईड़ा बधाणी से नौटी पहुंची। गांव में यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। पूरी रात नौटी स्थित नंदा चौरा मंगल गीतों के साथ ही जागरों (भजन-कीर्तन) से गुंजायमान रहा। बुधवार सुबह ठीक छह बजे यहां के मुख्य पुजारी मदन मोहन मैठाणी के नेतृत्व में पूजा-अर्चना का कार्यक्रम शुरू हुआ। करीब चार घंटे तक चले कार्यक्रम के बाद विदाई की तैयारियां शुरू कर दी गईं। ठीक पूर्वाह्न 10.45 बजे डोली चौसिंग्या खाडू और राज छंतोली के साथ दस किलोमीटर दूर कांसुवा के लिए रवाना हुई। इस दौरान गांव में माहौल भावुक हो गया। तकरीबन पांच हजार से ज्यादा लोग शंख ध्वनि और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों के बीच नंदा के साथ कांसुवा की ओर बढ़े।
     गांव से एक किलोमीटर दूर स्थित रामेश्वर शिवालय में दर्शनकर यात्र आगे बढ़ी। इस बीच यात्र में देवलगढ़ सारी, मलेठी, नौना और नैनी की छंतोली भी शामिल हुईं। अब यात्र में राज छंतोली के साथ ही कुल छंतोलियों की संख्या पांच हो गई है। यात्र के दौरान विभिन्न गांवों के लोग अपनी-अपनी छंतोलियों के साथ यात्र में शामिल होंगे। यात्रा में विधानसभा उपाध्यक्ष अनुसूया प्रसाद मैखुरी भी मौजूद हैं। उत्साह से भरे ग्रामीण सुबह से ही नंदा पथ पर टकटकी लगाए यात्रा का इंतजार कर रहे हैं। डोली के पहुंचते ही लोग यात्रा में शामिल हो रहे हैं। दिनोंदिन यात्रियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की जा रही है। देवलगढ़ सारी, बैनोली, ऐरोली और रिठोली होते हुए राजजात देर शाम आठ घंटे की यात्रा के बाद शाम सात बजे कांसुवा पहुंची। गुरुवार को यात्र सेम के लिए प्रस्थान करेगी।
उधर, चमोली के घाट ब्लाक के कुरुड़ स्थित नंदा मंदिर से दशौली व और बधाण क्षेत्र की डोलियां कुरुड़ गांव से रवाना हुईं। ये दोनों डोलियां अलग-अलग रास्तों से होते हुए मुख्य जात में समाहित हो जाएंगी।

पहाड़ी महिलाओं की जिंदगी का आईना भी  है यह राजजात 


कथाओं, किवदंतियों और मिथकोंके प्रदेश में नंदा की एक नहीं कई कथाएं हैं। कुछ खुलकर गाई जाती हैं तोकुछ के बारे में दबी जुबान में बात की जाती है। उच्च हिमालयीक्षेत्र में स्थित शिवधाम के लिए निकली नंदा इन कथाओं, किंवदंतियों औरमिथकों को समेटती हुई आगे बढ़ रही हैं। नंदा के मांगल गीत नौटी से लेकर कांसुवा तक गूंज रहे हैं।
मान्यताके अनुसार मायके से ससुराल कैलास के लिए निकली नंदा की यह यात्रा पहाड़ीमहिलाओं की जिंदगी का आईना है जो मायके की मधुर स्मृति समेट, ससुराल केदुख, दर्द और दुश्वारियों को झेलती हैं। देवी होने के बावजूद नंदा उनकाप्रतिनिधित्व करती है !राजा के प्रायश्चित से जुड़ी है एक मान्यता राजजात से जुड़ी एक और मान्यता नंदा को राजा से सीधे नहीं जोड़ती। यहमान्यता दंड के भागी बने राजा के प्रायश्चित की है। नंदा की इस कथा कोबैनोली में दबी जुबान में सामने रखा गया।
नंदा से जुड़े मान्यता यहदूसरी धारा भी है, जो नंदा को एक देवी के रूप में स्थापित करती है। नंदा इसक्षेत्र के ईष्ट और मंगल की देवी है, जो रक्षक शिव के पास जा रही है। नंदाका यह स्वरूप अब इस यात्रा का खास आकर्षण है। आयोजन समिति, नौटी के नौटियाल, 12 थोकी ब्राह्मण, 14 सयाने नंदा के इस स्वरूप को ही आगे बढ़ाने में विश्वास करते हैं।
बैनोली में ही आदिशंकराचार्य का एक पुराना कुंआ है। गांव में नंदा का चौराहै, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यह पूर्व में सार्वजनिक जगह हुआकरती थी।पहाड़ को आपस में जोड़ती है राजजात नंदा की छंतोली एक ऐसेसंकल्प की ओर भी इशारा करती है, जो राज परिवारों के प्रायश्चित से जुड़ीहै। पर आज के समय में नंदा की यह यात्रा एक विराट, सांस्कृतिक, धार्मिक, उत्सव और ऊंचे पहाड़ों के चाल-खाल, बुग्याल की सुध लेने की भी है।
यह किसी को हैरान कर सकता है, नंदा की इस यात्रा में सड़क से दूर हटे गांवही शामिल हैं। मुख्यधारा से कटे इन गांवों को नंदा इस बारासाला (12 वर्षीय)उत्सव में अपने से ही नहीं, बल्कि नाते-रिश्तेदारों और बाकी देश-दुनिया सेभी जोड़ती है। किसी भी गांव के किसी भी परिवार के यह कोशिश होती हैकि जात के लिए वह अपने गांव पहुंच जाए। सामान्य रूप से सूने रहने वाले येगांव इन दिनों खासे गुलजार हैं। यात्रा जैसे बढ़ती है, तो गांव जैसे अपनेसदियों पुराने अंदाज में लौट आते हैं।






नंदा राजजात  - कांसवा से सेम 

  सेम(चमोली) : अद्भुत , अद्वितीय ,अविस्मरणीय और अतुलनीय है नंदा के प्रति अगाध श्रद्धा का यह दृश्य । कोई फूट-फूट कर रो रहा है तो कोई अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पा रहा है और नंदा के धुनों पर स्वरः स्फूर्त थिरक रहा है ,  नंदा गीतों की धुनों के बीच गढ़ नरेशों की प्राचीन राजधानी चांदपुरी गढ़ी के वीरान भग्नावशेषों में मानो राजसी वैभव लौट आया हो। किले के परकोटे के ठीक सामने घास के हरे-भरे मैदान में जमा 60 से 70 हजार का जन सैलाब देवी नंदा के दर्शनों को बेताब है। डोली के पहुंचते ही टिहरी राजपरिवार के प्रतिनिधि ठाकुर भवानी प्रताप सिंह यात्र का स्वागत सत्कार किया। करीब एक घंटे यहां ठहरने के बाद यात्र आगे बढ़ी और देर शाम अपने चौथे पड़ाव सेम पहुंची।
    बुधवार देर शाम राजकुंवरों के गांव कासुंवा पहुंची नंदा का भव्य स्वागत किया गया। राजजात की अगुआई कर रहे चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) और राज छंतोली की पूजा अर्चना के बाद भक्तों ने देवी नंदा के दर्शन किए। इस बीच नंदा के अगुआन कैलापीर, नंदा की बहन भराड़ी देवी और पुत्र गणोश की पूजा की गई। रातभर जागर और भजन कीर्तन का दौर चलता रहा। गुरुवार सुबह ठीक छह बजे एक बार फिर पूजा अर्चना का कार्यक्रम शुरू हुआ। दो घंटे तक चले कार्यक्रम के बाद राज छंतोली को राजकुंवरों के घर स्थित प्राचीन मंदिर में ले जाया गया। राजकुंवरों की ईष्ट देवी होने के कारण यहां नंदा राजराजेश्वरी के रूप में विराजमान हैं। मान्यता है कि देवी प्रत्येक बारह साल में स्वयं मंदिर के कपाट खोलती हैं। नंदा के कैलाश पहुंचने के बाद यात्र के विश्राम  लेने पर कपाट बंद कर दिए जाएंगे।
     मंदिर के कपाट खुलने के बाद राजकुंवरों के परिवार ने यहां पूजा अर्चना की। पूजा में राजकुंवर यशवंत सिंह, डॉ. राकेश कुंवर और कुंवर दिग्विजय सिंह आदि शामिल हुए। ठीक 10.45 पर डोली अपने अगले पड़ाव सेम के लिए रवाना हुई। कांसुवा से ढाई किलोमीटर दूर बिल्वेश्वर महादेव मंदिर में दर्शनों के बाद यात्र आगे बढ़ी और मिरोली, मंडल होते हुए 2.35 बजे गढ़वाल की प्राचीन राजधानी चांदपुर गढ़ी पहुंची। यहां टिहरी राजपरिवार के प्रतिनिधि ठाकुर भवानी प्रताप सिंह ने राजजात की अगवानी की। गढ़ी में गढ़वाल और कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों लोगों ने डोली के दर्शन किए। जन सैलाब का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस दौरान कर्णप्रयाग मार्ग पर करीब आठ किलोमीटर लंबा जाम लग गया।
    गढ़ी में स्थित दक्षिण काली मंदिर में पूजा अर्चना के बाद ठाकुर भवानी प्रताप ने कांसुवा के राजकुंवर डॉ.राकेश को पगड़ी और तलवार भेंट की। यहां से यात्रा  3.40 बजे रवाना हुई। राह में पड़ने वाले गांवों से यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। इसके बाद देर शाम 7.15 बजे यात्रा सेम पहुंची। 









नंदा राजजात  - सेम से कोटी




कोटी (चमोली) :  हिमालयी महाकुंभ के नाम से विख्यात नंदा राजजात यात्रा  अब धीरे-धीर मध्य हिमालय की ओर बढ़ती जा रही है। विषम भूगोल में भी उत्साह के साथ आगे बढ़ रही यात्रा  देर शाम समुद्र तल से 1685 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने  पांचवे पड़ाव कोटी गांव पहुंची। यहां डोली का भव्य स्वागत किया गया। शनिवार (आज ) सुबह डोली कोटी से भगौती के लिए प्रस्थान करेगी।
         शुक्रवार सुबह ठीक 9.30 बजे डोली अपने चौथे पड़ाव सेम से दस किलोमीटर दूर स्थित कोटी के लिए रवाना हुई। सेम गांव समुद्र तल से 1360 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां से आगे भागौलिक परिस्थियां विकट हैं और रास्ता दुरुह। घने जंगलों के बीच पगडंडियों से होते हुए खड़ी चढ़ाई पार कर चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) और राजछंतोली के साथ राजजात धारकोट गांव पहुंची। यहां ग्रामीणों ने यात्रा  का भव्य स्वागत किया। इसके बाद घंडियाल और सिमतौली गांवों में पूजा-अर्चना कर यात्र शाम 4.30 बजे कोटी पहुंची। दरअसल, गढ़वाल में कोटी का ऐतिहासिक महत्व है। गढ़ नरेशों की प्राचीन राजधानी भले ही चांदपुर गढ़ी रही हो, लेकिन सैन्य शिविर कोटी में था। इसके अलावा तत्कालीन समय में यहां न्यायालय भी लगता था। कोटी में गांव की सीमा पर नंदा का अपने भाई लाटू देवता से भावपूर्ण मिलन हुआ। इसके बाद लाटू देवता की अगुआई में नंदा गांव में स्थित मंदिर पहुंची, जहां पूजा अर्चना शुरू हुई। इस दौरान दैवीय शक्तियों के बीच रूठने-मनाने का दौर भी चला। हुआ यूं कि भगवती नंदा की छतोली लाटू देवता की छतोली के साथ पहले चली गईं। इससे अन्य छंतोलियां आगे नहीं बढ़ी। हालांकि बाद में सब कुछ सामान्य हो गया।
      शुक्रवार को यात्र में रतूड़ा, खंडूड़ा, चूलाकोट, थापली और बगोली की छंतोलियां भी शामिल हुईं। इसी के साथ छंतोलियों की संख्या 12 हो गई है। इससे पहले गुरुवार को यात्रा  के सेम पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया। यात्रा  की अगुआई कर रहे चौसिंग्या खाडू और राजछंतोली की पूजा अर्चना के बाद डोली के दर्शन किए गए। शुक्रवार सुबह फिर पूजा-अर्चना का दौर चला। इसके बाद यात्रा अगले पड़ाव की ओर रवाना हुई। गांव में एक बुजुर्ग के निधन के कारण सेम से राजजात सादगी से निकाली गई। इस दौरान गांव की सरहद तक वाद्ययंत्र नहीं बजाए गए। आखिर लोक की खुशी ही नंदा की खुशी और लोक का दु:ख उनका दु:ख है।
    दूसरी ओर गढ़वाल के विभिन्न गांवों से निकलने वाली डोलियां भी मुख्य राजजात की ओर बढ़ रही हैं। इनमें घाट ब्लाक के कुरुड़ से चली बधाण और दशोली की डोलियां खास है। इसके अलावा जोशीमठ ब्लाक के लाता से चली डोली भी 88 साल बाद यात्रा में शामिल हो रही है।



                                   धौली जैसी फाट गौरा न स्यूंदाल गाड़ीले,
                                          कुऔ जैसी बाट गौरा न भ्यंटुली बांधिले,        
                                   समुंदरी घाअ गौरा न घौंपेली बांधिले,
                                       सांकुरी लगैली देवी न मोत्यूं का झालर,
                                       पैर-पैर गौरा तू कानू का कुंडल,
                                       पैर-पैर गौरा तू फेण की घाघरी,
                                                                      पैर-पैर देवी तू रेशमी कांचुवा,
                                                                       पैर-पैर देवी तू मूंगा मोत्यूं हार।

ससुराल लौट रही नंदा का श्रृंगार अनुपम है। धौली गंगा जैसी उसकी मांग सजी है और कुएं में उतरते रास्ते जैसी चोटी, जिसे देख समुद्र की गहराइयों में उतरने का सा अहसास होता है। कानों के पास से लटकती मोती की झालर दैदीप्यमान हो रही है। पर मैतियों को इतने में ही संतुष्टि कहां। वह उसे कानों में कुंडल, फेन सी घघरी, उसके ऊपर रेशमी कांचुवा और साथ में मूंगा व मोतियों का हार पहनने को भी कह रहे हैं)। पूर्णमासी के चंद्रमा सा निखरा उठा है नंदा का सौंदर्य, जिसे देख निगाहें ठहर सी गई हैं।

आस्था के आगे बौने पड़ गए कठिन पहाड़ी रास्ते
आस्था के पथ पर पहाड़ सरीखी मुश्किलें भक्तों की परीक्षा तो ले सकती हैं, मगर उनका राह नहीं रोक सकती। हिमालय के अतिदुर्गम रास्तों व ग्लेश्यिरों से होकर गुजरने वाले 280 किलोमीटर लंबे नंदा पथ पर आगे बढ़ रहे भक्त भी ऐसे ही इरादे के साथ घर से निकले हैं। उत्तराखंड ही नहीं, देश के अन्य राज्यों से भी भगवती नंदा के भक्तों की अगाध आस्था उन्हें इस हिमालयी महाकुंभ में खींच लाई है।
      ईड़ा बधाणी से दियारकोट तक करीब चार किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार करने के बाद भी महाराष्ट्र के रामचंद्र जखताब के चेहरे पर रौनक है। शरीर जरूर थकान महसूस कर रहा है, मगर इरादों में लेसमात्र भी झोल नहीं। दिलचस्प पहलू यह है कि रामचंद्र ने नंदा देवी व राजजात का नाम तक जनवरी 2010 में ही पहली बार सुना। पूना के खड़की कैंटबोर्ड निवासी रामचंद्र बताते हैं कि 2010 में पूना में एक दुकान के बाहर उन्हें नंदा देवी राजजात की प्रचार सामग्री का एक कागज पड़ा मिला, जिसमें राजजात को दुनिया की सबसे लंबी एवं कठिन यात्र बताया गया था। मन में ख्याल आया कि दुनिया की कठिनतम पदयात्र उत्तराखंड में कैसे हो सकती है। इसी उत्सुकता के साथ राजजात के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की और मन में देवी नंदा के प्रति आस्था का भाव जागने लगा। बस! उसी वक्त ठान लिया कि जात में जरूर जाऊंगा।
    महाराष्ट्र समेत कई राज्यों की सीमाएं लांघकर उच्च हिमालयी क्षेत्र में कठिनतम धार्मिक पदयात्र का हिस्सा बनने पहुंचे रामचंद्र के इरादे भगोती नंदा के प्रति उनकी गहरी आस्था को प्रदर्शित कर रहे हैं। यूरोपीय देश पौलेंड से मार्ता पति व दस साल की बेटी के साथ नंदा देवी राजजात में पहुंची हैं। मार्ता कांसुवा गांव में मिलन केंद्र के पास लगे भंडारे में भक्तों के फोटोग्राफ्स खींचने में व्यस्त है। असल में मार्ता एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं और नंदादेवी राजजात में बड़ी उम्मीद एवं उत्साह के साथ शामिल हुई हैं। समाजसेवी एवं लेखक वेदिका वेद नंदादेवी राजजात में अकेले नहीं पहुंचे हैं।
     वेद के साथ उनकी 13 वर्षीय बेटी हरितिका भी राजजात का हिस्सा बनने पहुंची हैं। पिता के साथ कदम से कदम मिलाते हुए हरितिका देवी के प्रति अटूट आस्था के सहारे पहाड़ के कठिन रास्तों पर अपने छोटे-छोटे डग भरते हुए चली जा रही है। असल में वेद बिटिया को अपनी संस्कृति से रूबरू कराने के मकसद से साथ में लाए हैं। टिहरी जल विकास निगम में अपर महानिदेशक पद पर तैनात अविनाश चंद्र जोशी मूल रूप से पौड़ी के निवासी हैं, मगर उनकी ससुराल नौटी में है। शादी के बाद उनके मन में भी नंदा के प्रति आस्था जगी और इस बार राजजात में शामिल होकर लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं। अविनाश कहते हैं कि प्रकृति हमारे लिए देवी-देवताओं की सौगात है।




नंदा राजजात - कोटी से भगोती

                          नंदा की आगवानी के लिए केदारु मंदिर पहुंचे स्थानीय लोग                                                                                   


भगोती (चमोली):  कोटी से विदा लेकर नंदा मायके के अंतिम गांव भगोती पहुंची। नंदा की आगवानी के लिए हजारों की संख्या में लोग केदारू देवता के मंदिर में पहुंचे। जहां नंदा ने केदारु देवता से मुलाकात की। यहां से यात्रा छठे रात्रि पड़ाव भगोती पहुंचीं, जहां रातभ र मां की पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने नंदा के जागर और गीत गाकर माहौल नंदामय कर दिया।

शनिवार सुबह पांचवे रात्रि पड़ाव कोटी में पूजा अर्चना के बाद नंदा देवी राज जात यात्रा छठे रात्रि पड़ाव भगोती के लिए रवाना हुई। झिंझौड़ी, बमयाला, कंडवाल गांव, छेकुड़ा होते हुए यात्रा चौंराखाल पहुंची। यहां भ गवती की चौंरी (बैठने का स्थान) है। जहां बैठकर नंदा की कैलाश यात्रा के गीत गाए जाते हैं। घतूला के खेतों में मल्ल युद्ध भी हुआ। जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में नंदा भगवान शिव के साथ कैलाश के लिए जा रही थी। इस दौरान घतूला में भ गवान शिव ने नंदा की परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने नंदा की शक्ति का परीक्षण करने के लिए अपने गण भेजे। जिसके बाद नंदा ने भी अपने गण भेजे। यहां शिव और नंदा के गणों के बीच भीषण मल्ल युद्ध हुआ। तभी से घतूला में मल्ल युद्ध की परंपरा कायम है।
   एक अन्य मान्यता के अनुसार नंदा जब कैलाश के लिए रवाना हुई तो घतूला में दैत्यों ने उनकी राह रोकने का प्रयास किया। इस पर नंदा ने अपनी शक्ति से गण पैदा किए, जिन्होंने दैत्यों के साथ मल्ल युद्ध कर उनका संहार किया। तब से घतूला में नंदा राज जात के अवसर पर मल्ल युद्ध की परंपरा है।
देर शाम यात्रा केदारु मंदिर पहुंची, जहां बड़ी तादाद में स्थानीय लोग उनकी आगवानी के लिए पहुंचे। केदारु से मिलने के बाद नंदा ढोल-दमाऊं की धुनों और जयकारों के साथ भगोती पहुंची। देर रात तक मां की पूजा अर्चना कर श्रद्धालुओं ने उनका आशीर्वाद लिया। यहां सिलोडी ब्राह्मणों ने नंदा और दाणु केदारु की पूजा अर्चना की। जबकि भंडारी लोगों ने नंदा के धर्म भाई लाटू की पूजा की।
    रविवार को यात्रा बधाण क्षेत्र में प्रवेश कर कुलासारी पहुंचेगी। यहां से नंदा के ससुराल का इलाका प्रारंभ हो जाता है। यहाँ के बाद आगे की यात्रा में ससुराल के लोगों का प्रभुत्व दिखायी देगा। समुद्रतल से 1410 मीटर की ऊंचाई पर स्थित भगोती गांव की राह अब तक के पड़ावों में सबसे मुश्किल थी। 
    मध्य हिमालय से गुजरती राजजात के लिए दिनोंदिन प्रकृति की चुनौतियां बढ़ने लगी हैं। शनिवार को सुबह 10 बजे डोली कोटी से भगोती के लिए रवाना हुई। चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) और राजछंतोली के साथ करीब एक किलोमीटर लंबी ढलान उतरने के बाद शुरू हुआ कठिन चढ़ाई का दौर। बांज और बुरांश के जंगलों के बीच से गुजरता यह रास्ता इंसानी जीवट को चुनौती देता प्रतीत होता है। भगोती तक 12 किलोमीटर लंबे सफर में आधा रास्ता खड़ी चढ़ाई वाला है। यह अलग बात है कि उखड़ती सांसों के बीच गूंजते नंदा के जयकारे और जगह-जगह यात्रा के स्वागत में जुटे ग्रामीणों का आतिथ्य न केवल मनोबल बढ़ा रहा है, बल्कि ऊर्जा देने वाला भी है। आखिरकार दो किलोमीटर चढ़ाई चढ़ने के बाद यात्रा घंतौड़ा गांव पहुंची।
    यहां यात्रा का स्वागत किया गया। गांव के पास ही एक छोटे से मैदान में पौराणिक कथाओं पर आधारित संग्राम हुआ और देवी के गणों ने असुरों को मल्ल युद्ध में परास्त किया। इसके बाद राजजात आगे बढ़ी। रास्ते में कनवाल और छेकुड़ा-मनौड़ा गांव की छंतोली यात्रा में शामिल हुईं। इस प्रकार यात्रा में अब कुल छंतोलियों की संख्या 14 हो गई है। नौलापाणी, बमियाला, कंडवाल और छेकुड़ा-मनौड़ा में अपने आत्मीयों से भेंट करते हुए नंदा देर शाम 7.45 बजे भगोती पहुंची। यहां यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। मान्यता है कि भगोती गांव देवी को सबसे ज्यादा प्रिय था, इसीलिए भगवती के नाम पर गांव का नाम पड़ा। इससे पहले शुक्रवार देर शाम यात्रा कोटी पहुंची। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ देवी का सत्कार कर चौसिंग्या खाडू और राज छंतोली की पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान देवी ने गांव के पास स्थित कुंड में स्नान भी किया। उधर कुमांऊ के रानीखेत और पिथौरागढ़ क्षेत्र से डोलियां रवाना हो गईं हैं।





नंदा राजजात - भगोती  से  कुलसारी  


आंसुओं के सैलाब और भावनाओं के ज्वार के साथ भगोती से कुलसारी पहुंची नंदा

ससुराल क्षेत्र के पहले रात्रि पड़ाव में नंदा का हुआ जोरदार स्वागत


कुलसारी (चमोली): मायके की सीमा पार कर नंदा ससुराल क्षेत्र के पहले रात्रि पड़ाव कुलसारी पहुंची। दर्जनों युवतियों और महिलाओं पर देवी अवतरित हुई और उन्होंने देव छंतोलियों को केवर गधेरे पर बना पुल पार करने से रोका। नंदा के साथ क्षेत्र की महिलाएं भी दहाड़े मारकर रो पड़ी। महिलाओं ने मांगल गीत गाकर और समझा बुझाकर नंदा को कैलाश के लिए विदा किया। चांदपुर और श्रीगुर पट्टी की दर्जनों छंतोलियों और हजारों श्रद्धालुओं ने मां नंदा को आश्वासनों के साथ ससुराल क्षेत्र की सीमा में प्रवेश कराया।

     मां नंदा के मायके क्षेत्र से विदाई और अपनों से बिछुडकर रोने का दृश्य मौजूद सभी श्रद्धालुओं को द्रवित कर गया। रविवार सुबह भगोती के केदारू देवता नंदा से मिलने प्राचीन मंदिर में पहुंचे। मां नंदा और केदारू देवता के मिलन को देखने के लिए आस-पास के गांवों से हजारों लोग मंदिर में पहुंचे। यहां से विदा लेकर नंदा केवर गांव के लिए रवाना हुई। केवर गांव में पूजा अर्चना के बाद नंदा केवर गधेरे में पहुंची। मान्यता है कि प्राचीन समय में केवर क्षेत्र में केले के बगवान (बड़ा बगीचा) हुआ करता था। नंदा जब अपने पति शिव के साथ ससुराल जा रही थी तो यहां पहुंचकर वह केले के पेड़ों के बीच छुप गई। नंदा बार-बार लौटकर केले के पेड़ों के बीच छुप जाती। तभी से इस स्थान का नाम केवर पड़ा। तभी से केवर गधेरे को पार करने के दौरान नंदा कई बार वापस मायके की ओर लौटती है। महिलाओं के शरीर में अवतरित होकर नंदा देव छंतोलियों और अन्य श्रद्धालुओं को भी गधेरा पार करने से रोकती है। तब गांव की महिलाएं और नंदा के भाई उन्हें समझा-बुझाकर कैलाश के लिए विदा करते हैं।

      नंदा के मायके की ओर जाने और बार-बार लौटकर अपनों से लिपटकर रोने का दृश्य बेहद भावुक करने वाला होता है। सगे-संबंधियों, सखी-सहेलियों और भाई-बहनों को छोड़कर ससुराल जा रही नंदा भी खुद को रोने से नहीं रोक पाते। यहां से पंती, मींग गधेरा, हरमनी, मलतुरा होते हुए यात्रा सातवें रात्रि पड़ाव कुलसारी पहुंची। जहां से बुटोला थोकदारों और सयानों से यात्रा का आगवानी की। कुलसारी में सुबह से ही नंदा के स्वागत की तैयारियां की गई। देर शाम श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा के साथ यात्रा का स्वागत किया। कुलसारी सिद्ध पीठ में नंदा के काली स्वरूप की पूजा होती है। देर रात तक श्रद्धालु नंदा की पूजा-अर्चना में जुटे रहे। सोमवार को यात्रा आठवें रात्रि पड़ाव चेपड़ों के लिए रवाना होगी। इस दौरान थराली में विशाल मेला आयोजित किया जाएगा।

   
कुलसारी में हुई श्रीयंत्र की पूजा

    कुलसारी के प्राचीन कालिंका देवी मंदिर में नंदा की पूजा अर्चना होती है। परंपरा के अनुसार यात्रा अमावस्या की रात्रि मंदिर परिसर में पहुंची। कहा जाता है कि मंदिर में एक पौराणिक श्रीयंत्र है, जो भूमिगत रहता है। राज जात के मंदिर में पहुंचने पर अमावस्या के अवसर पर भूमिगत श्रीयंत्र को बाहर निकालकर उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद रातभर श्रीयंत्र और मां नंदा की विशेष पूजा अर्चना की जाती है।


कुलसारी से चेपडों पहुंची नंदा देवी राज जात

बुटोला थोकदारों ने किया नंदा का स्वागत

चेपडों (चमोली) : कुलसारी में रात्रि विश्राम के बाद नंदा देवी राज जात यात्रा सोमवार को आठवें रात्रि पड़ाव चेपडों पहुंची। जहाँ बुटोला थोकदारों ने नंदा का स्वागत किया। उससे पहले थराली में हजारों श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा के साथ माँ नंदा का स्वागत किया। स्थानीय रामलीला मैदान में श्रद्धालुओं ने पवित्र मेढ़े और छन्तोलि के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। सोमवार सुबह नंदा देवी राज जात यात्रा कुलसारी से चेपडों के लिए रवाना हुई। इससे पूर्व कुलसारी में माँ के काली स्वरूप की पूजा हुई। कांसुवा के राज पुरोहितों और राज कुंवरों ने दक्षिण काली के श्रीयंत्र की विशेष पूजा अर्चना की। यहाँ नैन विनायक, ज़बरकोट, पस्तोली और कुमारी भगवती की छन्तोलि भी पूजा में शामिल हुई। सुबह पूजा अर्चना के साथ यात्रा थराली के लिए रवाना हुई। इस दौरान थराली में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने माँ के दर्शन किए। रामलीला मैदान में यात्रा की छन्तोलि का मिलन हुआ। जहाँ चौंड़ा गढ़ के लाटू की छन्तोलि यात्रा में शामिल हुई। दर्शन और आशीर्वाद के बाद नंदा केदारबगड़, राड़ीबगड़ होते हुए चेपडों पहुंची। जहाँ बुटोला थोकदारों ने नंदा का स्वागत और आगवानी की। यहाँ देर रात तक माँ नंदा की पूजा अर्चना के बाद भक्तों ने माँ का आशीर्वाद लिया।


दर्शन नहीं कर पाएंगे कई गांवों के हजारों श्रद्धालु

थराली (चमोली): सरकार की लापरवाही के कारण हजारों श्रद्धालु माँ नंदा के पवित्र मेढ़े और छन्तोलि के नज़दीक से दर्शन नही कर पाएंगे। दरअसल पिछले वर्ष आई आपदा के दर उरण पिंडर नदी पर बना झूला पुल टूट गया। यह पुल चेपडों और आस पास के दर्जनों गावों को जोड़ने का एकमात्र साधन था। इस पुल के टूटने के बाद प्रशासन ने औपचारिकता निभाने के लिए ट्रोली लगा दी। इसके सहारे नजदीकी गावों के लोग जरुरत का सामान लेने के लिए चेपडों पहुँचते हैं। ट्रोली से एक बार में अधिकतम तीन से चार लोग ही नदी पार कर सकते हैं। ऐसे में नदी के दूसरी तरफ के गाँव त्रिकोट, सेरा, विजयपुर, असु और ल्वाडा समेत दर्जनों गाँव के लोग यात्रा में मुश्किल से ही शामिल हो पाएंगे।


                पवित्र मेढ़े और छन्तोलि का स्थान बदलने पर विवाद

चेपडों (चमोली) : नंदा देवी जात जात यात्रा के पवित्र मेढ़े और छन्तोलि का स्थान बदलने पर विवाद हो गया। स्थानीय लोगों ने नंदा का स्थान बदलने पर आक्रोश जताया। जिसको लेकर देर रात तक हंगामा होता रहा। सोमवार देर शाम नंदा देवी राज जात यात्रा आठवें रात्रि पदव स्थल चेपडों पहुंची। कुरुड़ की नंदा की डोली भी थराली गाँव, केदारबगड़, राड़ीबगड़ होते हुए चेपडों पहुंची। बताया जा रहा है कि यहाँ कुरुड़ की नंदा के आँगन से राज जात ले जाने का स्थानीय लोगों ने विरोध किया। उन्होंने कहा की कुरुड़ की नंदा की जात पवित्र जात है। जबकि राज जात प्रायश्चित की यात्रा है। जिसको लेकर स्थानीय लोगों और राज जात आयोजन समिति के लोगों में काफी देर तक विवाद हुआ। बाद में आयोजन समिति के पदाधिकारी पवित्र मेढ़े और छन्तोलि को मूल स्थान से दूसरी जगह ले गये। इसको लेकर भी स्थानीय लोगों ने विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि यात्रा का संचालन परम्पराओं के अनुसार ही होना चाहिए। पुराने समय से जो मार्ग और मान्यताएं नियत की गयी हैं उनमें अनावश्यक फेरबदल नही होना चाहिए।

   नंदा देवी राज जात पर माओवादी हमले का खतरा

  उच्च हिमालयी क्षेत्र में श्रद्धालुओं पर हमला कर सकते हैं माओवादी

  खुफिया विभाग ने जारी किया अलर्ट

पहाड़ों में काम्बिंग कर रहे हैं एसएसबी और आईटीबीपी के जवान

थराली (चमोली):  विश्व की सबसे लम्बी दुर्गम पैदल धार्मिक यात्रा नंदा देवी राज जात पर माओवादी खतरे की आशंका मंडरा रही है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि वाण से ऊपर के निर्जन उच्च हिमालयी क्षेत्र में माओवादी श्रद्धालुओं को निशाना बना सकते हैं। माओवादी हमले के खतरे को देखते हुए खुफिया विभाग ने अलर्ट जारी किया है। जिसके बाद से वाण के आगे के निर्जन क्षेत्र में एसएसबी और आईटीबीपी के जवान लगातार काम्बिंग कर रहे हैं।
नंदा देवी राज जात यात्रा आठवें रात्रि पड़ाव चेपडों पहुँच चुकी है। चार दिन बाद यात्रा आबादी क्षेत्र को छोड़कर निर्जन स्थान में प्रवेश कर जाएगी। यह पूरा क्षेत्र सड़क और मोबाइल कनेक्टिविटी से अछूता है। साथ ही निर्जन क्षेत्र होने के कारण यहाँ तक पहुंचना और आवागमन करना भी ख़ासा मुश्किल है। वाण से आगे का यह सफ़र बेहद दुरूह और मुश्किलों भरा है। पिथौरागढ़ की सीमा से लगा यह पूरा क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील है। उच्च हिमालयी क्षेत्र की सीमा चीन और बागेश्वर के सीमान्त क्षेत्र से लगती है। इन क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों का खतरा बना रहता है। नंदा राज जात यात्रा का मार्ग इससे लगा होने के कारण इस पर भी माओवादी हमले की आशंका मंडरा रही है। सूत्रों के अनुसार हमले के खतरे को देखते हुए खुफिया तंत्र बेहद चौकन्ना है। बताया जा रहा है कि माओवादी हमला कर पर्यटकों को नुकसान पहुंचा सकते हैं या अपहरण कर सकते हैं। अलर्ट जारी होने के बाद से शासन-प्रशासन में हड़कम्प मचा हुआ है। एसएसबी और आईटीबीपी के जवान निर्जन स्थानों पर काम्बिंग कर रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर पुलिस विभाग के दो उच्च अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की। हालांकि उन्होंने अन्य कोई जानकारी देने से इनकार किया है।



                    

चेपडों   से  नंदकेशरी पहुंची  राजजात
मंगलवार को नन्दा राजजात यात्रा अपने 9वें पड़ाव नन्दकेशरी पहुंची, नन्दकेशरी वह स्थान हैं जहां पर शिव व पार्वती (नन्दा) का मन्दिर है। यहीं पर कुरुड़  की राजराजेश्वरी नन्दा तथा कुमाऊ की देव छतौलियों का मिलन होता है . गढ़वाल व कुमाऊ के संस्कृतियो का भी यह केन्द्र बन गया है, यहां से वाण तक देवड़ोली व देव छतोलियां साथ-साथ चलेगीं उत्तरांखण्ड की समृद्व सांस्कृतिक विरासत की झलक यहां देखने को मिल रही है बडी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने इस यात्रा को वास्तव में नन्दामय बना दिया है, अल्मोडा से चली नन्दादेवी की यात्रा के साथ सोमेशवर में चौखुटिया, द्वाराहाट व रानीखेत की छतोली शामिल हुई, जबकि मर्तोली से चली यात्रा में बागेश्वर, गरूड की छतोली बैजनाथ में शामिल हुई ये दोनो यात्रायें सोमवार को कोटभ्रामरी मन्दिर में रूकी तथा मंगलवार को नन्द केशरी पंहुची     
       नंदा देवी राज जात के नौवें रात्रि पड़ाव नन्दकेशरी में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है । हजारों श्रद्धालु नंदा की सात बहनों के मिलन की घडी के साक्षी बने। भक्तों ने माँ नंदा के जयकारों और पुष्पवर्षा के साथ माँ नंदा का स्वागत किया। नन्दकेशरी गढ़वाल और कुमाउं की समृद्ध संस्कृति के मिलन का गवाह बना। मंगलवार को नंदा देवी राज जात यात्रा चेपडों से नन्दकेशरी के लिए रवाना हुई। उससे पहले चेपडों में बुटोला थोकदारों ने माँ नंदा की पूजा अर्चना की। इसके बाद यात्रा नन्दकेशरी के लिए रवाना हुई। पूजा अर्चना के साथ कुरुड़ की माँ राज राजेश्वरी की डोली भी नन्दकेशरी के लिए रवाना हुई। यह डोली दोपहर में कोठी गाँव में विश्राम के बाद देर शाम नन्दकेशरी पहुंची। इसके बाद अल्मोड़ा और नैनीताल की नंदा भी नन्दकेशरी पहुंची। चंद्र वंश के राजा के वंशज माँ की छन्तोली और कटार लेकर नन्दकेशरी पहुंचे। चंद्र वंश के राजा के वंशज केसी बाबा कटार लेकर पहुंचे। माना जाता है कि नंदा की सात बहनें हैं। जिनमें से पांच का मिलन नन्दकेशरी में होता है। नंदा की दशमद्वार और दशोली की छन्तोलि वाण गाँव में यात्रा के साथ मिलती है। इसके साथ ही आस पास के क्षेत्रों की दर्ज़नों छन्तोलियां भी यात्रा में शामिल हुई। नंदकेशरी में नंदा के मिलन का दृश्य बेहद भावपूर्ण हो उठा। सात बहनों के 14 वर्ष बाद मिलन पर भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। हजारों की तादाद में मौजूद श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर माँ नंदा का स्वागत किया। नन्दकेशरी में रात भर माँ के विभिन्न स्वरूपों की पूजा अर्चना हुई। 14 सयाने, कांसुवा के राज कुंवर और राज पुरोहित, कुरुड़ की नंदा के पुजारी गौड़ ब्राह्मण समेत अन्य पुजारी विशेष पूजा अर्चना में शामिल हुए।



वीआइपी लोगों का रहा खूब  जमावड़ा
यात्रा के नन्द केशरी पहुँचने और पांच बहनों के मिलन की घड़ी का गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी पहुंचे।पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल , विधानसभा स्पीकर गोविन्द सिंह कुंजवाल,  डिप्टी स्पीकर अनसूया प्रसाद मैखुरी, ऐबिनेत मंत्री प्रीतम पंवार, दिनेश धनै, सांसद भगत सिंह कोश्यारी, अजय टम्टा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत, नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट, संसदीय सचिव व स्थानीय विधायक डॉ जीत राम ने नंद केशरी पहुँच कर माँ नंदा का आशीर्वाद लिया।
     वहीँ इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल, उपाध्यक्ष डा. ए.पी.मैखुरी तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्यय व पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा उपस्थित रहे, जबकि सोमवार को चेपडियूं पहंची नन्दा राजजात यात्रा में प्रदेश के पर्यटन मंत्री दिनेश धनै नगर विकास मंत्री प्रीतम सिंह पंवार व कांग्रेस के आनन्द सिंह रावत आदि भी शामिल रहे।
बुद्ववार को राजजात यात्रा अपने 10वे पड़ाव फल्दिया गांव के लिये प्रस्थान करेगी। 

वहीँ दूसरी तरफ नंदा देवी मंदिर कोट भ्रामरी बागेश्वर में माँ के भक्तो का जमावड़ा लगा हुआ है यहाँ पर सभी कुमाऊं मण्डल के भक्त एकत्रित है। जो बुधवार  सुबह नंदा देवी की आगे की यात्रा में शामिल हों











नन्दकेशरी से फल्दिया गांव पहुंची नंदादेवी राजजात यात्रा


मौसम ने भी बदला मिज़ाज़














   
श्री नंदा देवी राजजात यात्रा के फल्दिया गांव में पहुंचने पर जुटे श्रद्धालु
श्री नन्दा देवी राजजात यात्रा बुधवार को नन्दकेशरी से अपने निर्धारित 10वें पड़ाव फल्दिया गांव पहुंची, राजजात यात्रा नन्दकेशरी से पूर्णासेरा, देवाल, इच्छोली, हाटकल्याणी होते हुए 10वें पड़ाव फल्दियां गांव में विश्राम कर रही है। बुधवार को कर्णप्रयाग से समूचे राजजात मार्ग पर भारी वर्षा व ऊंचाई वाले इलाकों में ठंड बढऩे से यात्रा और कष्टकारक हो गयी है लेकिन श्रद्घालुओं के उत्साह में कहीं कोई कमी दिखायी नहीं दे रही है।
     एक जानकारी के अनुसार वाण से रूपकुण्ड मार्ग पर भी भारी वर्षा से अचानक तापमान में कमी आ गयी है। रास्ते में यात्रा मार्ग पर विभिन्न गांवों के निवासियों द्वारा यात्रा का स्वागत किया गया, हजारों की संख्या में लोग इस देव यात्रा में शामिल हो रहे हैं। राजजात यात्रा में अब कुरूर की बधाण की नन्दा तथा कुमाऊं की देव छतोलिया साथ साथ चल रही है, यात्रा में अब देव डोली के साथ ही बढ़ी संख्या में छतोली शामिल है, नन्दकेशरी वह स्थान है जहां पर शिव व पार्वती नन्दा का मन्दिर है। यहीं पर कुरुड़ की राजराजेश्वरी नन्दा तथा कुमांऊ की देव छतौलियों का मिलन होता है।

  यहां से वाण तक देवड़ोली व देव छतोलियां साथ चलेंगी। अल्मोड़ा से चली नन्दादेवी की यात्रा के साथ सोमेश्वर में चौखुटियाए द्वाराहाट व रानीखेत की छतोली शामिल हुई। जबकि मर्तोली से चली यात्रा में बागेश्वर व गरूड़ की छतोली बैजनाथ में शामिल हुई। ये दोनों यात्रायें सोमवार को कोटभ्रामरी मन्दिर में रूकीं तथा नन्द केशरी पहुंची थी। नन्दकेशरी में कुमाऊं मंडल की छंतोलियों के मिल जाने के बाद यात्रा का आकार भी काफी बड़ा हो गया है। यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा है। प्रशासन द्वारा सभी पड़ावों पर यात्रियों के आवास व भोजन आदि की व्यवस्था करायी जा रही है। सभी पड़ावों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जा रहा है। बुधवार को यात्रा फल्दिया गांव में विश्राम के बाद अपने 11वें पड़ाव मुन्दोली के गुरुवार को प्रस्थान करेगी।





फल्दिया गांव : दस दिन में 109 किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी नंदा राजजात उच्च हिमालयी क्षेत्र से महज दो पड़ाव दूर है। शुक्रवार को यात्रा समुद्रतल से 2444 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वाण गांव पहुँचेगी। इसके बाद हिमालय का निर्जन क्षेत्र शुरू हो जाएगा। जैसे-जैसे यात्रा दुर्गम इलाके की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं का उत्साह और संख्या भी बढ़ती जा रही है। नंदकेसरी से फल्दिया गांव पहुँची यात्रा में तकरीबन 15 हजार श्रद्धालु शामिल थे। मंगलवार को नंदकेसरी में गढ़वाल और कुमाऊं की डोलियों के महा मिलन के बाद राजजात में यात्रियों का सैलाब उमड़ पड़ा।
गढ़वाल से कुरुड़ की डोली, कुमाऊं से अल्मोड़ा की नंदा,मुनस्यारी से देवी सुनंदा, हिंडोली की नंदा और कोट-भ्रामरी की कटार राजजात का हिस्सा बन गईं हैं। बुधवार सुबह पूजा-अर्चना के बाद यात्रा ठीक 10.45 पर अपने अगले पड़ाव फल्दिया गांव के लिए रवाना हुई। अब हिमालय के दुर्गम इलाके की ओर बढ़ रही यात्रा के पड़ाव की ऊंचाई बढ़ती जा रही है। फल्दिया गांव समुद्रतल से 1325 मीटर की ऊंचाई पर है, जबकि अगले पड़ा मुंदोली की ऊंचाई 2120 मीटर है। नदी के किनारे-किनारे सर्पीली सड़क से होते हुए दोपहर बाद एक बजे यात्रा आठ किलोमीटर दूर पिंडर और कैल नदी के संगम स्थल देवाल पहुँची। यहां नंदा के दर्शनों के लिए हजारों लोग इंतजार कर रहे थे। उत्साह, सौहार्द और सत्कार के बीच चमोली जिले की पिंडर घाटी का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोहने वाला है। चटख रंग के पारंपरिक वस्त्रों में सजे ग्रामीण माहौल का भव्य स्वरूप प्रदान कर रहे हैं। अनेकता में एकता के दर्शन कराती यात्रा में संस्कृति के बहुआयामी रूप तो दिख ही रहे हैं, बदलता भूगोल इसे विशिष्ट भी बना रहा है। बांज और बुरांश के जंगलों की जगह अब चीड़ के वनों ने ले ली है। देवाल से आगे बढ़ यात्रा ने पिंडर घाटी पार कर कैल घाटी में प्रवेश किया और इच्छोली व हाट-कल्याणी होते हुए यात्रा शाम 6.30 बजे फल्दिया गांव पहूँची। अब यहाँ से यात्रा मुन्दोली जाएगी




फल्दिया गांव से मुंदोली पहुंची नंदा राज जात
  
मुंदोली: हिमालयी महाकुंभ के नाम से विख्यात नंदा देवी राजजात के अति दुर्गम सफर के निकट पहुंचते ही मौसम ने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। लगातार दूसरे दिन बारिश के बीच यात्रा अपने अगले पड़ाव मुंदोली पहुंची। गरजते मेघों के बावजूद यात्रियों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। शुक्रवार को राजजात वाण पहुंचेगी और अगले दिन यहां से नंदा के धर्मभाई लाटू देवता की अगुआई में उच्च हिमालय में प्रवेश कर जाएगी। इसके बाद 96 किलोमीटर तक यात्रा निर्जन पड़ावों से होकर गुजरेगी।इसके अलावा लोहाजंग से वेदनी के लिए हेलीकाप्टर सेवा शुरूकी गई है।
समुद्रतल से 2444 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वाण में अब तक दस हजार से ज्यादा लोग नंदा के दर्शनों के लिए एकत्र हो चुके हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही। यहां यात्रियों का स्वास्थ्य परीक्षण कर ही आगे जाने की अनुमति दी जाएगी। मेलाधिकारी और चमोली के अपर जिलाधिकारी मेहरबान सिंह बिष्ट ने बताया कि वाण से विकट परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन डेढ़ से दो हजार लोगों को ही आगे जाने की अनुमति देगा। दरअसल, निर्जन क्षेत्र में पहली बार सरकार यात्रा की सभी व्यवस्थाएं कर रही है। पूर्व में यात्री स्वयं अपने इंतजाम कर यात्रा करते थे, लेकिन इस बार पिछली बार आई आपदा के दृष्टिगत सरकार ने यह जिम्मेदारी ली है।
इससे पहले बुधवार रातभर फल्दिया गांव में ग्रामीण झौड़ा और चांचड़ी नृत्यों पर थिरकते रहे। ग्रामीणों के आतिथ्य से यात्री अभिूभत नजर आए। शाम को हुई बारिश से टेंट गीले होने के बाद ग्रामीणों ने यात्रियों के लिए अपने घरों में ही व्यवस्था की। इतना ही नहीं ग्रामीणों ने सामूहिक तौर यात्रियों के लिए भोजन बनाया। गुरुवार को यात्र पूर्वाह्न 10.45 बजे फल्दिया गांव से मुंदाली के लिए रवाना हुई। कैल नदी के किनारे-किनारे होते हुए राजजात दोपहर को पिलफाड़ा गांव पहुंची। पिलफाड़ा के बारे में मान्यता है कि यहां देवी पिलवा नाम दैत्य का वध किया था। कैलघाटी से गुजरती यात्रा ल्वाणी और बगरिगाड होते हुए देर शाम 8.15 बजे मुंदोली पहुंची। 
   दूसरी ओर गुरुवार को पहले दिन हेलीकॉप्टर से 150 लोग लोहाजंग से वेदनी बुग्याल पहुंचे। थराली के एसडीएम विवेक प्रकाश ने बताया कि राजजात के लिए डेक्कन कंपनी ने वेदनी तक सेवाएं शुरू की हैं। इसके लिए नागरिक उड्डयन महानिदेशालय से अनुमति ली गई है। पहले दिन हेलीकाप्टर ने 27 चक्कर लगाए। चमोली के पुलिस अधीक्षक सुनील कुमार मीणा ने बताया कि वेदनी तक जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। केवल राजजात में शामिल यात्रियों के लिए वाण में स्वास्थ्य परीक्षण और रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है।



52 वर्ष बाद बंद मंदिर से निकलेंगे लाटू (जहाँ आँखों पर पट्टी बांधकर खोले जाते हैं कपाट) 


  भगोती नंदा के धर्मभाई एवं भगवान शिव के साले लाटू की माया ही निराली है। लाटू देवाल क्षेत्र (चमोली) के ऐसे देवता हैं, जिनके दर्शन भक्त तो दूर, खुद पुजारी भी नहीं कर सकता। इनके मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक दिन के लिए बैसाख पूर्णिमा को खुलते हैं और उसी शाम बंद भी कर दिए जाते हैं। भक्त तब भी उनके करीब नहीं जा सकते। पुजारी भी आंख-मुंह पर पट्टी बांधकर कपाट खोलता है और ऐसे ही पूजा भी करता है।
राजजात का आबादी वाला अंतिम पड़ाव वाण इन्हीं लाटू देवता का गांव है। यहां लाटू युगों से कैदखाने में हैं और यह कैदखाना ही उनका मंदिर भी है। मंदिर के अंदर क्या है, किसी को नहीं मालूम। बैसाख पूर्णिमा को भी कपाट खुलते ही मंदिर के मुख्य द्वार पर पर्दा डाल दिया जाता है, ताकि कोई अंदर झांक न सके। बारह बरस बाद जब नंदा मायके (कांसुवा) से ससुराल (कैलाश) जाते हुए वाण पहुंचती है, तब नौटियाल ब्राह्मणों द्वारा पूजन के लिए मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इस दौरान नंदा का लाटू से भावपूर्ण मिलन होता है। इस दृश्य को देख यात्रियों की आंखें छलछला जाती हैं। यहां से लाटू की अगुआई में चौसिंग्या खाडू के साथ राजजात होमकुंड के लिए आगे बढ़ती है। लेकिन, वाद्य यंत्र राजजात के साथ नहीं जाते।
लाटू क्षेत्र के ईष्टदेव हैं, लेकिन महिलाएं उनके दर्शनों को मंदिर में नहीं जाती। अन्य भक्त भी मंदिर से दस मीटर दूर रहकर पूजा-अर्चना करते हैं। कहते हैं कि लाटू कन्नौज के गर्ग गोत्र के कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। जब शिव के साथ नंदा का विवाह हुआ तो बहन को विदा करने सभी भाई कैलाश की ओर चल पड़े। इनमें लाटू भी शामिल थे। मार्ग में लाटू को इतनी तीस (प्यास) लगी कि वह पानी के लिए इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उन्हें एक घर दिखा और वो पानी की तलाश में इस घर के अंदर पहुंच गए। घर का मालिक बुजुर्ग था, सो उसने लाटू से कहा कि कोने में रखे मटके से खुद पानी पी लो। संयोग से वहां दो मटके रखे थे, लाटू ने उनमें से एक को उठाया और पूरा पानी गटक गए। प्यास के कारण वह समझ नहीं पाए कि जिसे वह पानी समझकर पी गए, असल में वह मदिरा थी। कुछ देर में मदिरा ने असर दिखाना शुरू कर दिया और वह उत्पात मचाने लगे। इसे देख नंदा क्रोधित हो गई और लाटू को कैद में डाल दिया। साथ ही आदेश दिया कि इन्हें हमेशा कैद में रखा जाए। माना जाता है कि इस कैदखाने (मंदिर) में लाटू एक विशाल सांप के रूप में विराजमान हैं। इन्हें देखकर पुजारी डर न जाएं, इसलिए आंखों पर पट्टी बांधकर मंदिर के द्वार खोलते हैं।
मान्यता यह भी है कि वाण में ही लाटू सात बहिनों (देवियों) को एक साथ मिलाते हैं। यहीं पर दशौली (दशमद्वार की नंदा), लाता पैनखंडा की नंदा, बद्रीश रिंगाल छंतोली और बधाण क्षेत्र की तमाम भोजपत्र छंतोलियों का मिलन होता है। अल्मोड़ा की नंदा डोली व कोट (बागेश्वर) की श्री नंदा देवी असुर संहारक कटार (खड्ग) वाण में राजजात से मिलन के पश्चात वापस लौटती है।


नंदा राज जात पहुंची  --वाण


वाण:  राजजात भारी उत्साह और मौसम की आँख मिचोली के बीच वाण पहुंच गई। यहां तकरीबन पचास हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने यात्रा का भव्य स्वागत किया। पारंपरिक वाद्यों की धुन और नंदा के जयकारों की गूंज के बीच दशोली, पैनखंडा, बंड और कपीरी की डोली छंतोलियों के भावपूर्ण मिलन देख यात्री मुग्ध हो गए। यहां से यात्रा की अगुआई चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) के साथ नंदा के धर्मभाई लाटू देवता करेंगे। शनिवार राजजात उच्च हिमालय में प्रवेश कर जाएगी। इस क्षेत्र में पहला पड़ाव समुद्र तल से 3354 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गैराली पातल होगा ।
चमोली जिले के अंतिम गांव वाण से आगे यात्रा निर्जन क्षेत्र से होकर जाएगी। यहां यात्रियों का स्वास्थ्य परीक्षण और रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है। यह प्रक्रिया शनिवार को यात्रा के रवाना होने तक जारी रहेगी। उच्च हिमालयी क्षेत्र में यात्रा को लेकर प्रशासन सतर्कता बरत रहा है। प्रशासन का प्रयास है कि वेदनी बुग्याल से यात्रियों की संख्या सीमित रखी जाए। अब नंदा अपने ससुराल के काफी निकट पहुंच चुकी हैं। पांच दिन में 53 किलोमीटर की दूरी तय करने बाद तीन सितंबर को अंतिम पड़ाव होमकुंड में नंदा को चौसिंग्या खाडू के साथ कैलास के लिए विदा कर दिया जाएगा। यहां से सभी यात्री वापसी की राह पकड़ेंगे। 43 किलोमीटर पैदल सफर के बाद यात्री सुतोल पहुंचेगे। इससे पूर्व गुरुवार देर शाम मुंदोली पहुंची राजजात का भव्य स्वागत किया गया। पूजा अर्चना के बाद रातभर मंगलगीतों और लोक नृत्यों का दौर चलता रहा। इस दौरान गांव में शायद ही कोई परिवार सोया हो। शुक्रवार को नंदा चौक में सुबह पांच बजे से ही पूजा-अर्चना शुरू हो गई। आसमान में छाए काले बादलों के बीच पूर्वाह्न साढ़े दस बजे राजजात 15 किलोमीटर दूर वाण के लिए रवाना हुई और आधे घंटे बाद लोहाजंग पहुंची।
लोक मान्यता के अनुसार देवी ने कैलास यात्रा के दौरान यहां लोहासुर नामक असुर का वध किया था। यहां तकरीबन पांच हजार से ज्यादा श्रद्धालु मां नंदा की प्रतीक्षा कर रहे थे। चोटी पर बसे लोहाजंग पर प्रकृति पूरी तरह से मेहरबान है। बताते हैं कि यहां से हिमालय की खूबसूरत चोटियों में शुमार नंदा घूंघटी साफ नजर आती है। हालांकि बादल छाने के कारण यात्री इस चोटी के दर्शन नहीं कर पाए। लोहाजंग के बाद हवा में घुली ठंडक हिमालय की निकटता का अहसास कराने के लिए काफी थी। सुरईं (देवदार जैसा दिखने वाला वृक्ष) के आकाश चूमते पेड़ों की छांव में यात्रा बांक, पुनदो, माइना और कुलिंग गांव होते हुए देर शाम वाण पहुंची। वाण में लाता की डोली और डिम्मर से आई बदरीनाथ की डोलियां और छंतोलियां मुख्य जात से मिली। मुंदोली में पौड़ी गढ़वाल के सांसद भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने भगवती की पूजा अर्चना की।
    वाण में नन्दा का मन्दिर गाँव के बीच में नया बनाया गया है। इसके अलावा गोलू देवता, काली, दानू देवता का मन्दिर भी यहाँ पर स्थित है। वाण में कपीरी, कुमाऊं, दशोली, बधाण, पैनखण्डा आदि क्षेत्रों के देवी देवताओं की डोलियां, निशान, कटार, एवं भोजपत्र की छंतोलियां शामिल होती हैं। वाण गाँव यात्रा का अन्तिम गाँव है तथा यह इस यात्रा का बस्ती में अन्तिम पड़ाव है। इसके बाद निर्जन पड़ावों में रात्रि विश्राम होता है। मुन्दोली जो यात्री नहीं पहुँच पाते हैं वे सीधे ही वाण आते हैं। वाण में दशोली कुरूड़ की नन्दा, लाटू, कण्डारा, हिन्डोली, दशमद्वार की नन्दा, केदारू पौंल्या, नौंना की नन्दादेवी, नौली का लाटू, मेठा का लाटू, वालम्पा देवी, कुमजुंग से ज्वाल्पा देवी की डोली, लासी का जाख, खैनूरी का जाख, मझोटी की नन्दा, फरस्वाण पफाट के 6 यक्ष देवता, सैंजी का आदित्य देवता, बण्ड की नन्दा, कुरूड़, पगना का भूमियाल, सरतोली का पस्वा, द्यौ सिंह देवता, काण्डई, लाखी का रूपदान, जस्यारा, कपीरी, बद्रीश छंतोली डिम्पर, द्यो सिंह सुतोल, कोट डंगोली की कटार, स्येरा भैंटी की भगवती, वूरा की नन्दा, रामणी का भुम्याल, राजकोटी लाटू, घूनी का गोरिया आदि 200 से अध्कि देवी देवताओं का मिलन होता है। वाण से यहां का प्रसिद्ध लाटू देवता राजजात की अगुवाई करता है। लाटू देवता का मन्दिर देवदार के पेड़ो से घिरा हुआ है। अन्दर का कपाट मात्रा राजजात में ही खोला जाता है। लाटू के डंगरिया के अतिरिक्त कोई अन्दर नहीं जा सकता है।
राजजात यात्रा पंचायती चौक में रूकती है। यहां पर लाटू का निशान होता है। यहाँ पर यज्ञ तथा सभी देवी देवताओं की पूजा होती है। यहां पर गाये जाने वाले झोड़ा-चांचड़ी विशेष उल्लेखनीय हैं।
मान्यता है कि वाण गाँव वालों को नंददेवी का आदेश है कि जिस दिन मेरी यात्रा तुम्हारे गाँव में आयेगी उस दिन तुम्हें अपने घरों पर ताले नहीं लगाने होंगे तथा मेरे साथ आये यात्रियों की सेवा करनी होगी। जो मेरे आदेश का पालन नहीं करेगा उसे कुष्ठ रोग हो जायेगा। माना जाता है कि इस यात्रा के अवसर पर वे मकानों की सफाई कर उन्हें राजजात यात्रियों के लिए खुला छोड़ देते हैं स्वयं सपरिवार गोशालाओं में चले जाते हैं। वाण गाँव के सहयोग से ही हजारों तीर्थ यात्री संसाधन हीनता के बावजूद भी सुकून से एक रात्रि बिता पाते हैं।


देवताओं की भी अपनी पसंद

देवताओं की भी अपनी पसंद होती है। यह वाण में तब देखने को मिला, जब लाता की भगवती यहां पहुंची। भगवती ने अपने ठहरने के लिए स्थान चुना। दो बार वह गांव में घूमी और दो अलग-अलग स्थानों पर कुछ देर के लिए ठहरी भी लेकिन उसे यह स्थान पसंद नहीं आए। यहां भक्तों की भीड़ और कीर्तन भजनों का शोर चरम पर था। भगवती यहां से उठ गई और रात को अपने भाई लाटू के मंदिर में आ गई। देवी ने भाई के निवास पर ही रात्रि विश्राम किया। लोगों का कहना था कि भगवती को जो पसंद नहीं होता, वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह अपनी इच्छा और पसंद से ही अपने बैठने और ठहरने के स्थान का चयन करती है। लाता से राजजात में 88 वर्ष बाद भगवती की डोली शामिल हुई है।ऊंचे हिमालय की ओर यात्रा के बढ़ने के साथ ही अब नंदा की कई और कहानियां इन खूबसूरत वादियों में तैर रही हैं। लाता की भगवती नंदा इस बार बेदनी से ही लौट जाएगी। बीती रात वाण में नंदा ने लाटू से आगे जाने की आज्ञा मांगी थी। लाटू ने देवी को बेदनी तक जाने के लिए कहा। लाटू की भगवती बेदनी से सुतोल के रास्ते घाट होते हुए लाता लौट जाएगी।

हिमालय में देव आज्ञा सर्वोपरि है। यहां मानव ही नहीं, देवता भी परंपराओं से बंधे हुए हैं। जिस लाता की भगवती नंदा का राज पूरी नीति घाटी पर है, वही भगवती अपने धर्म भाई लाटू का कहना मानकर बेदनी तक जा रही है। गांव के लोग वाण से ही वापसी के पक्ष में थे, पर रात को भगवती ने लाटू से बात की, तो लाता की भगवती के साथ अब गांव के करीब ढाई सौ लोग बेदनी तक जा रहे हैं।


    शनिवार को यात्रा वाण से गैरोली पातळ को प्रस्थान करेगी 

                                               वाण से गैरोली पातळ



   वाण से नंदा की कैलास की विदाई का माहौल हो जाता है। वाण के बाद नंदा की यह यात्रा जहां प्रकृति के साक्षात दर्शन कराती है, वहीं यात्रा के कई रहस्यों से भी भक्तों को अवगत कराती है। गैरोली पातल का भी इस यात्रा में विशेष महत्व है। मान्यता है कि यहां पर मां नंदा ने राक्षसों का वध किया था। राक्षसों का मांस खाने के लिए गरुड़ आए थे, तभी से इस स्थान का नाम गैरोली पातल पड़ा, जिसका लोक जागरों में भी उल्लेख है।
   नंदा की यह यात्रा गांव से लेकर हिमालय तक के सफर में एक के एक बाद कई कथाओं को समेटे हुए है। यात्रा से जुड़े हर पड़ाव में नंदा विभिन्न रूपों में पूजी जाती हैं। नंदा एक ओर बेटी है तो वहीं पिंडर और कैल घाटी में बहू हैं।
जागर गायिका बसंती बिष्ट की 81 वर्षीय मां बिरमा देवी कहती हैं कि नंदा अपने भक्तों का भला करती हैं। नंदा यहां हर रूप में विराजमान हैं। जागर के माध्यम से वे गैरोली पातल नंदा की लीला का वर्णन यूं करती हैं-
नंदा ले धरो काली को रूप
बायां मारो दैंतों दय्यां ढलको।
दयां मारो दैंतों बथ्यां ढलको
पापी दैंतों को संहार करियालो।
(नंदा ने काली का रूप धारण कर लिया है और वह राक्षसों को मारने लगी है।)

मान्यता है कि गैरोली पातल में देवी ने सैकड़ों राक्षसों को मारा था। मारते-मारते जब रक्तबीज पैदा होने लगे, तो देवी ने अपने पसीने से मक्खियां पैदा कीं, जिन्होंने जमीन पर पड़े खून को चाट लिया, जिससे देवी ने सारे राक्षसों को मार दिया। यहां पर देवी ने जौला मंगरी में स्नान किया और अपने पूर्व के रूप में लौट आईं।


राजजातः 14 साल बाद अपने भाई लाटू से म‌िली बहन  नंदा

     नंदा राजजात यात्रा में 14 साल बाद आखिरकार वह क्षण आया, जब नंदा अपने भाई लाटू से मिल पाई। सुबह ठीक 9.35 बजे निर्जन पड़ाव की यात्रा के लिए निकली नंदा वाण गांव से करीब एक किमी ऊपर लाटू देवता के मंदिर में पहुंची, तो मंदिर का नजारा ही बदल गया।
    कुरूड़ की नंदा के साथ-साथ लाता की डोली और सप्तकुंड की डोली सहित अन्य डोलियां और छंतोलियां मंदिर में पहुंची। पूजा-अर्चना के बीच लाटू मंदिर से बाहर निकले, तो पहले कटार भेंट कर उन्होंने नंदा की परीक्षा ली। नंदा इस परीक्षा में पास हुई तो उसके बाद वर्षों बाद मिले भाई-बहन का मिलन हो पाया। लाटू सीधे-साधे देवता है और ज्यादा बोल नहीं पाते हैं। हावभाव में लाटू ने बहन नंदा के आगे की यात्रा के लिए पथ-प्रदर्शक होने का निमंत्रण स्वीकार किया। ठीक 10.35 मिनट पर लाटू की अगुवाई में नंदा अब कैलास यात्रा के लिए रवाना हो गई। आगे के निर्जन पड़ाव है और लाटू की अगुवाई में ही अन्य डोलियां और देव छंतोलियां आगे बढ़ रही है। यात्रा देर शाम रणकधार होते हुए गैरोली पातल पहुंची है। यहां देवी खुले आसमान के नीचे विश्राम करेगी।
यात्रा के पहले निर्जन पड़ाव में मुख्यमंत्री हरीश रावत के दावों कलई खुलकर सामने आ गई। गैरोली पातल में देवी भगवती के जयकारे के बजाय उत्तराखंड सरकार के खिलाफ खूब नारेबाजी हुई। ज्यादा गुस्सा यात्रा समिति को है।
आरोप है कि सारी व्यवस्था अपने हाथ में लेने वाली सरकार ने निर्जन पड़ाव में भी कोई व्यवस्था नहीं की है। यात्रियों का कहना है कि वे रविवार को बेदनी पहुंच रहे मुख्यमंत्री हरीश रावत का विरोध करेंगे। छोटी सी जगह गैरोली पातल में 100 से अधिक टेंट लगे हैं, लेकिन बरसात और नम मौसम के चलते ये टेंट यात्रियों को राहत देने वाले साबित नहीं हो रहे हैं। वन विभाग की चौकी में एक दुकान लगी है, जिसमें दुगने रेट पर यात्रियों को सामान दिया जा रहा है। सरकार की तरफ पड़ाव पर नि:शुल्क भोजन व्यवस्था का दावा किया गया था, पर गैरोली पातल में ऐसी कोई व्यवस्था यात्रियों को नहीं मिली। खुद पड़ाव अधिकारी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ते रहे कि उन्होंने तीन दिन से खाना नहीं खाया है। मुसीबत यह है कि यात्रा का यह पहला निर्जन पड़ाव है और सारी छंतोलियों और डोलियों को यहीं पर रात्रि विश्राम करना है।


    शिवधाम कैलास के लिए चली नंदा अब हिमालय क्षेत्र में पहुंच चुकी है। ससुराल क्षेत्र अब कुछ ही दूर है। रविवार की शाम नंदा गैरोली पातल से होते हुए अपने दूसरे निर्जन पड़ाव बेदनी पहुंचेगी। बेदनी को पहली बार 20वां पड़ाव बनाया गया है।
बेदनी में सोमवार को नंदा सप्तमी की पूजा होगी। हर वर्ष होने वाली मां नंदा की लोकजात और 12 वर्ष में होने वाली राजजात में बेदनी का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां पर नंदा भक्त और राजकुंवर कुंड में अपने पित्रों को तर्पण देते हैं। कुंड में हिमालय का संपूर्ण प्रतिबिंब दिखाई देता है। मान्यता है कि यहां पर मां पार्वती के पुत्र भगवान गणेश जी ने वेद लिखे थे, इसलिए यहां का नाम बेदनी है। समुद्रतल से 3450 सौ मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की वादियों में कई मील तक खुले स्थान के रूप में बिखरा बेदनी बुग्याल के मध्य कुंड कई प्राचीन किवदंतियों को संजोए है।
मान्यता है कि नंदा ने महिषासुर मर्दिनी के रूप में महाकाली बनकर रक्तबीज दैंत्य का वध किया था। तब भगवान शिव ने उन्हें इसी कुंड में स्नान कराया था, जिससे वे पुन: महागौरी के रुप में आ गई थी।
मान्यता यह भी है कि 12 वर्ष या उससे अधिक समय में होने वाली नंदा की कैलास यात्रा में बेदनी पहुंचने पर भगवान शंकर और महागौरी का विवाह संस्कार किया जाता है। एक सूत (धागे) को फेर कर सात फेरे लगाए जाते हैं। बेदनी प्रकृति की अनुपम धरोहर के रूप में भी विख्यात है, लेकिन बेदनी कुछ समय से प्रकृति की मार झेल रहा है। वर्ष 2011 से भूस्खलन से बुग्याल कई जगहों पर दरक रहा है। कुंड के बाहरी ओर भी गहरी दरारें पड़ी हैं, जो लगातार बढ़ रही हैं। कुंड से पानी रिस रहा है।ऐसी मान्यता है क‌ि 9वीं सदी में कन्नौज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती पत्नी बल्लभा सहित पूरी सेना के साथ हिमालय यात्रा पर आए थे। मौसम की खराबी और अन्य कारणों से यात्रा में शामिल कान्यकुब्ज गर्ग गोत्री ब्राह्मण और अन्य जातियों के यजमान थकान से बेदनी कुंड के समीप ही रुक गए। लेकिन राजा नहीं रूका और सेना के साथ आगे बढ़ गया। पातरनचौणियां और रुपकुंड जाते-जाते राजा पूरी सेना के साथ काल का ग्रास बन गया। मान्यता है कि कान्य कुब्ज गर्ग गोत्री ब्राह्मण और यजमानों ने स्वयं के सकुशल होने पर बेदनी कुंड में महागौरी, महाकाली और भगवान शिव की मूर्तियां स्थापित की।







गैरोली पातळ से  वेदनी बुग्याल

 

नंदा ने पहली बार बेदनी में किया रात्रि विश्राम

मौसम बिगड़ने से गड़बड़ाई यात्रा पड़ावों की व्यवस्थाएं

देहरादून: आस्था और विश्वास की प्रतीक नंदा देवी राज जात यात्रा अपने बारहवें रात्रि पड़ाव बेदनी बुग्याल पहुंच गई। हजारों की तादाद में शामिल यात्रियों ने मां के जयकारों से समूचे हिमालय क्षेत्र को गुंजायमान कर दिया। पहली बार रात्रि पड़ाव बनाए गए बेदनी में रात्रि विश्राम के बाद यात्रा आज सुबह पातर नचौणिया के लिए रवाना होगी। दुनिया की सबसे लम्बी पैदल दुर्गम धार्मिक यात्रा नंदा देवी राज जात रविवार सुबह गैरोली पातल से बेदनी बुग्याल के लिए रवाना हुई। बेदनी बुग्याल को पहली बार रात्रि पड़ाव बनाया गया है। 13वें रात्रि पड़ाव गैरोली पातल में नंदा की पूजा-अर्चना के बाद उन्हें कैलाश के लिए विदा किया गया। मां के जयकारों के साथ श्रद्धालुओं का काफिला निर्जन जंगलों से होते हुए बेदनी बुग्याल के लिए रवाना हुआ।
बेदनी में सोमवार को नंदा सप्तमी की पूजा की जाएगी। प्रत्येक 12 वर्ष में होने वाली नंदा देवी राज जात और प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली लोकजात में बेदनी का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां कांसुवा के राज कुंवरों के साथ ही हजारों की संख्या मेंश्रद्धालुओं ने अपने पितरों को तर्पण दिया। हिमालय की गोद में करीब 3450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस कुंड के संबंध में कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि नंदा ने महिषासुर मर्दिनी का वेश धरकर रक्तबीज रूपी दैत्य का संहार किया। जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें इस कुंड में स्नान कराया, जिससे वह पुन: महागौरी के रूप में लौटी। कहा जाता है कि प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल में होने वाली राज जात यात्रा के बेदनी पहुंचने पर भगवान शिव और नंदा के विवाह संस्कार की रस्में निभाई जाती है। यहां पूजा अर्चना के बाद नंदा आज पातर नचौणियां के लिए रवाना होगी। वहीं दोपहर बाद से लगातार यात्रा के कारण श्रद्धालुओं को खासी परेशानी झेलनी पड़ी। निर्जन रास्तों पर लोगों को सिर छुपाने की जगह भी नहीं मिली। वहीं बेदनी में भी सरकार और निजी संस्थाओं की व्यवस्थाएं भी प्रभावित हुई। खाने और ठहरने में यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ी।

सोमवार को पातर नचौणिया पहुंचेंगे
नंदा देवी राज जात यात्रा सोमवार को 15वें रात्रि पड़ाव पात नचौणिया पहुंचेगी। कहा जाता है कि 14 वीं शताब्दी में कनौज के राजा जसधवल (जसोधर) ने जब गढ़वाल नरेश के लाख मना करने पर भी यात्रा प्रारंभ की। वह यात्रा में अपने शाही शौकों को पूरा करने के लिए अपनी गर्भवती रानी बलम्पा, दास- दासियों और पातरों (नर्तकियों) समेत पूरे लाव-लस्कर के साथ कैलाश पहुंचा। जिन पवित्र स्थलों पर कई निषेधाज्ञाएं लागू थी वहां राजा जसधवल ने पातरों से नृत्य शुरू करवा दिया। उसने विलासिता की हदें पार कर दी। तब रुष्ट होकर माँ नंदा ने राजा जसधवल को सबक सिखाने के लिए सभी पातरों को पत्थरों में तब्दील कर दिया। तभी से इस स्थान को पातर नचौणिया कहा जाता है।


वेदनी बुग्याल से पातर नचौणिया


नंदा ने खुले आसमान के नीचे काटी रात

पातर नचौणिया (चमोली): नंदा अब अपने ससुराल के नजदीक पहुंच गई है। वर्षों से चली आ रही परम्पराओं और मान्यताओं का पालन करते हुए नंदा लगातार आगे बढ़ रही है। नंदा के साथ उसके धर्म भाई लाटू, दर्जनों देव छंतोलियां और हजारों की तादाद में श्रद्धालु भी हैं। पहाड़ की बेटी नंदा को उसके ससुराल तक सकुशल छोड़ने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। पातर नचौणिया पहुंची नंदा ने परंपरानुसार खुले आसमान के नीचे रात गुजारी। यात्रा आज यहां से शिला समुद्र के लिए रवाना होगी।
दुनिया की सबसे लम्बी पैदल दुर्गम धार्मिक यात्रा नंदा देवी राज जात सोमवार सुबह बेदनी बुग्याल से पातर नचौणिया के लिए रवाना हुई। बेदनी बुग्याल को पहली बार रात्रि पड़ाव बनाया गया था। जहां रात्रि विश्राम के साथ मां की पूजा अर्चना की गई। बेदनी में नंदा सप्तमी की पूजा भी हुई। बेदनी के पवित्र कुंड में कांसुवा के राज कुंवरों और श्रद्धालुओं ने अपने पितरों को तर्पण दिया। दूर तक फैले मखमली बुग्याल में रंग-बिरंगे वस्त्रों में सजे हजारों यात्रियों ने नई आभा बिखेर दी। सुबह यात्रा मां के जयकारों के साथ पातर नचौणिया के लिए रवाना हुई है।
पातर नचौणिया यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां नंदा रात को खुले आसमान के नीचे विश्राम करती है। कहा जाता है कि 14 वीं शताब्दी में कनौज के राजा जसधवल (जसोधर) ने जब गढ़वाल नरेश के लाख मना करने पर भी यात्रा प्रारंभ की। वह यात्रा में अपने शाही शौकों को पूरा करने के लिए अपनी गर्भवती रानी बलम्पा, दास- दासियों और पातरों (नर्तकियों) समेत पूरे लाव-लस्कर के साथ कैलाश पहुंचा। जिन पवित्र स्थलों पर कई निषेधाज्ञाएं लागू थी वहां राजा जसधवल ने पातरों से नृत्य शुरू करवा दिया। उसने विलासिता की हदें पार कर दी। तब रुष्ट होकर माँ नंदा ने राजा जसधवल को सबक सिखाने के लिए सभी पातरों को पत्थरों में तब्दील कर दिया। तभी से इस स्थान को पातर नचौणिया कहा जाता है।
यात्रा में अव्यवस्थाओं और सीमित संसाधनों पर लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। पातर नचौणियां में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से व्यवस्थाएं गड़बड़ा गई। यात्रियों ने सरकार पर पर्याप्त व्यवस्था न करने का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा भी काटा। प्रशासन ने किसी तरह समझा-बुझाकर उन्हें शांत कराया। वहीं बेदनी के बाद बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु वापस भी लौटने लगे हैं। हालांकि बड़ी संख्या में पर्यटक पहले ही शिला समुद्र पहुंच चुके हैं।

                          पातर नचौणिया से शिला समुद्र

पातर नचौणिया से मंगलवार को शिला समुद्र के लिए रवाना होगी नंदा







शिलासमुद्र :: आज का पडाव

आज, 02 सितम्बर 2014 को नन्दादेवी राजजात पातरनचौणियां से शिलासमुद्र को प्रस्थान करेगी। एक किमी की खड़ी चढ़ाई के बाद 14000 फीट पर कैलुवाविनायक आता है यहां पर प्रथम पूजनीय पार्वती पुत्र भगवान गणेश का पौराणिक मन्दिर है। शिवधाम कैलाश होमकुण्ड जाने से पूर्व कैलाश के द्वार पर विराजमान भगवान गणेश की आराधना के बाद ही आगे का मार्ग निष्कंटक हो सकता है। यहां से रूपकुण्ड, ज्यूरांगली, त्रिशूली व नन्दाघुघटी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। दो किमी आगे बगुवावासा है जहां पर रानी वल्लभा स्वैलड़ा है। बगुवासा में ब्रहमकमल बहुतायत में मिलते हैं। और रूपकुण्ड की तलहटी में फेनकमल भी मिलते हैं। यहां दुर्लभ कस्तूरी मृग, मोनाल, हिमालयन थार, बरड़ आदि जंगली जानवर भी यदा कदा दिख जाते हैं। बगुवावासा से चार किमी की कठिन यात्रा के बाद रहस्यमयी रूपकुण्ड के दर्शन होते हैं।
रूपकुण्ड के नर कंकालों को देखने हर साल हजारों पर्यटक यहां आते हैं। यह यात्रा का सबसे कठिन चरण है। रूपकुण्ड से दो सौ मीटर पर ज्यूरांगलीधार 17500 फीट का शिखर आता है जो त्रिशूली के सामने पड़ता है। इसके एक ओर रूपकुण्ड बगुवावासा की घाटी है तो दूसरी ओर शिला समुद्र की विशाल घाटी। आगे ढ़लान पर उतरने के बाद आती है ग्लेशियरों पर टिका एक विशाल पत्थरों का समुद्र रहस्यमयी घाटी जहां ग्लेशियरों के टूटने की आवाजें आती रहती हैं। यहां पर एक छोटी गुफा और मन्दिर बना है जिसके बगल से नन्दाकिनी नदी बहती है। शिलासमुद्र में रात्रि निवास के बाद राजजात कल प्रातः होमकुण्ड के लिये रवाना होगी।



शिलाओं के समुद्र में श्रद्धालुओं ने रहस्य के  संसार में लगाये गोते हर कोई प्रकृति के रूप को देख हुआ अचंभित

रूपकुंड का रूप देख रोमांचित हो उठे श्रद्धालु और पर्यटक

यात्रियों ने पार किया ज्यूरागली  यात्रा का सबसे दुर्गम और अद्भुत खतरनाक इलाका

शिला समुद्र (चमोली): यात्रा अपने सबसे खतरनाक एवं दुर्गम पथ पर है। 15 किलोमीटर लंबे इस सफर में रहस्य ही रहस्य बिखरे पड़े हैं मंगलवार सुबह पूजा अर्चना के बाद नंदा रात्रि पड़ाव स्थल शिला समुद्र के लिए रवाना हुई। रात्रि विश्राम स्थल पातर नचौणिया के बाद से रास्ता बेहद दुर्गम और खड़ी चढ़ाई वाला है। यहां से होकर श्रद्धालु द्यौसिंह देवता के क्षेत्र कलुवा विनायक पहुंचे। यहां पर वह मां नंदा की अगुवाई करते हैं। यहां कांसुवा के राज पुरोहितो, राज कुंवरों और श्रद्धालुओं ने भगवान गणेश की पूजा अर्चना की। जिसके बाद यात्रा करीब दो किमी की खड़ी चढ़ाई पारकर भ गुवाबासा पहुंची। जहां से करीब चार किमी का कठिन सफर तय कर श्रद्धालु रूपकुंड पहुंचे। समुद्रतल से 16,499 फीट की ऊंचाई पर रूपकुंड में बर्फ की चादर के बीच स्थित कुंड और आस-पास बिखरे नर कंकालों ने रोमांच और आस्था के मिले-जुले भाव बिखेरे।
   रूपकुंड का सौंदर्य देखकर श्रद्धालु ठिठक गए। भगुवाबासा से चार किलोमीटर की प्राणांतक चढ़ाई के बाद रहस्यमयी रूपकुंड (समुद्रतल से 16499 फीट) के दर्शन होते हैं। इस झील में आज भी चौदहवीं शताब्दी के अस्थि-पंजर पड़े हुए हैं। रूपकुंड पार कर श्रद्धालु इस यात्रा के सबसे मुश्किल क्षेत्र ज्यूरागली पहुंचे। रूपकुंड से दो किलोमीटर आगे समुद्रतल से 17500 फीट ऊंची ज्यूंरागलीधार आती है यह यात्रा का सर्वाधिक ऊंचाई वाला स्थान है। करीब 5333 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ज्यूरागली एक पतली पगडंडी है, जिसके दोनों तरफ गहरी खाई है। इसलिए श्रद्धालु यहां से बेहद सावधानी से गुजरते हैं। मान्यता है कि लाटू देवता ने यहां से गुजरने पर कर लगाने का प्रावधान किया था। यह परम्परा आज भी चली आ रही है। इसके बाद यात्रा रात्रि विश्राम स्थल शिला समुद्र पहुंची। करीब साढ़े सत्रह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित शिला समुद्र को शिलाओं का रहस्यमय संसार कहा जाता है। मान्यता है कि यह पूरा क्षेत्र एक ग्लेशियर पर टिका हुआ है। इसके बाईं तरफ भारत का सबसे ऊंचा शिखर नंदा देवी, नंदा घुंघटी है। प्रकृति के औलोकिक और दिव्य सौंदर्य को देखकर श्रद्धालुओं की पूरी थकान उतर गई। उन्होंने मां नंदा के जयकारे लगाकर पूजा-अर्चना हुई ।
    बुधवार को नन्दादेवी राजजात शिलासमुद्र से पवित्र होमकुण्ड को प्रस्थान करेगी। १२ किमी की कठिन यात्रा के बाद छोटा होमकुण्ड आता है इसी के समीप दोदांग पड़ता है। यहां से तीन किमी की कठिन व दुर्गम यात्रा के बाद दर्शन होते हैं उस पवित्र, पावन, अद्भुत, अलौकिक, और अन्तिम लक्ष्य श्री होमकुण्ड और लोक गीतों के छाया-चैराड़ी के जहां पर यह रहस्यमयी कुण्ड है। यहां मां भगवती का पौराणिक मन्दिर है जिसमें माता शिलारूप में स्थापित है। बगल में छोटा मन्दिर लाटू का है। मैदान के एक ओर शक्तिरूपी विशाल शिला है तो दूसरी ओर सात बहनों की निशानियां सात शिलायें विद्यमान हैं। ठीक पीछे रहस्यमयी और विशाल ग्लेशियर है। मान्यता है कि देवी की सात बहनें भी उन्हें विदा करने इसी स्थान तक आती थीं धर्मभाई लाटू भी यहां से वापस लौट जाते हैं। यहां से आगे मां नन्दा की भेंट लेकर चैसिंगा मेढ़ा अकेले कैलाश की ओर यात्रा करता है। होमकुण्ड में नवमी को हवन के उपरान्त राजछंतोली को विसर्जित कर दिया जाता है एवं डोलियां वापस लौट आती हैं। वापसी के समय बारिश भी होती रहती है इसलिये सभी जल्दी-जल्दी घर की ओर लौटते हैं। डोलियां चन्दनियाघट व जामुनडाली में रात्रिविश्राम करती हैं।

शिला समुद्र से होमकुंड 
 
नंदा के साथ एक नहीं इस बार पांच खाडू हुए रवाना हुए कैलाश

 दस      हजार       श्रद्धालुओं ने दी नंदा को विदाई
होमकुंड : हिमालय की तलहटी स्थित मायके से उच्च हिममंडित भगवान शिव के धाम कैलास की ओर प्रस्थान कर रही मां नंदा बुधवार को यात्रा के अंतिम पड़ाव  होमकुंड पहुंच गई। यहां राजजात की अगुवाई कर रहे चौसिंग्या खाडू (मेढ़े) की विदाई करके सांकेतिक रूप से मां का ससुराल पहुंचना मान लिया गया। इसी के साथ ही मां नंदा ससुराल पहुंच गई और 14 वर्षों का इंतजार भी खत्म हो गया।
बुधवार की सुबह 11 बजकर 40 मिनट पर होमकुंड में हवन पूजन किया गया। जिसके बाद यात्रा में चल रहे पांचों खाड़ुओं को कैलाश रवाना कर दिया गया। होमकुंड से यात्रियों के वापस लौटने का दौर जारी है। इस बार मुख्य पूजा छोटा होमकुंड में हुई।
   
इस मौके पर करीब दस हजार से ज्यादा श्रद्धालु उपस्थित थे। संवेदनशील परिस्थितियों और दुर्गम मार्ग की चुनौतियों के मद्देनजर बुधवार को यात्र जल्द ही शुरू कर दी गई। शंख ध्वनि, रणसिंघा और भंकोरे की गूंज के साथ राजजात सुबह सात बजे होमकुंड के लिए रवाना हुई। यात्र करीब पौने बारह बजे होमकुंड पहुंची। यहां मुख्य यजमान कांसुवा के राजकुंवर की उपस्थिति में करीब आधे घंटे तक अनुष्ठान संपन्न कराए गए। इसके बाद हजारों श्रद्धालुओं ने मां नंदा को श्रृंगार सामाग्री और गहने इत्यादि समेत चौसिंग्या खाडू के साथ कैलाश की राह पर विदा कर दिया। विदायी के पलों में वहां मौजूद लोग भी भावुक हो गए। इस दौरान देवी प्रतिमा और राजछंतोली का भी विसर्जन किया गया। बाद में होमकुंड के जल से भरे घड़े का पानी राजकुंवरों में प्रसाद के तौर पर वितरित किया गया। जल से भर यहा घड़ा राजकुंवरों के गांव कांसुवा और राजगुरु के गांव नौटी ले जाया जाएगा। जहां यह जल देवी देवताओं को समर्पित किया जाएगा। जोखिम पूर्ण सफर को देखते हुए यात्र ने कुछ ही देर में वापसी राह पकड़ ली और तीन घंटे के सफर के बाद चंदनियाघट में पड़ाव डाला।


होमकुंड में हुआ  यज्ञ और राजछंतोली का विसर्जन
होमकुंड में पूजा-अर्चना के साथ नंदा का चौसिंगा खाडू

रूपकुंड(चमोली) :   कहा जाता है कि विदाई के इस अद्भुत क्षण में चौसिंग्या खाडू की आंखों से आंसू टपक पड़ते हैं। इस भावनात्मक क्षण में यात्री भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाते हैं। यह पल भाव विह्वल रूप में सामने आता है। 16 दिन से यात्रा में साथ चला खाडू जब अनंत आकाश की ओर जाने के चलते उनसे बिछुड़ जाता है तो इससे लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। आस्था व भक्ति का संदेश लेकर यह चौसिंग्या खाडू नंदा के पास जाता है। कहा जाता है कि यह खाडू कैलाश स्थित भगवान शिव की कुटिया में मां पार्वती (नंदा) के लिए कलेवा लेकर जाता है। इस तरह चौसिंग्या खाडू की यह विदाई कम भावुक कर देने वाली नहीं होती है। कुछ ही पलों में यह चौसिंग्या खाडू त्रिशूल पर्वत की दिशा में बढ़कर अनंत कैलाश को चले जाता है। यहां से विदाई के वक्त इस चौसिंग्या खाडू को देखने की मनाही भी रहती है। हालांकि कई लोग जिज्ञासावश इस क्षेत्र में जाने का मन भी बनाते हैं किंतु आस्था व भक्ति के आगे वे भी इस तरह की कोशिशें नहीं करते हैं। यहां पर सारी धार्मिक क्रियाएं पौराणिक रीति रिवाजों के बीच संपन्न की जाती हैं । इस बार जबकि राजकुंवर के रूप में कुंवर तेजेंद्र सिंह तथा राज गुरु के रूप में अतुल नौटियाल ने इन सभी धार्मिक क्रियाओं का निर्वहन किया  । वैसे कुंवर राकेश सिंह तथा भुवन नौटियाल को ही इस दायित्व का निर्वहन करना था किंतु अचानक स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण उन्हें यह दायित्व तेजेंद्र सिंह तथा अतुल को सौंपना पड़ा। यहीं पर पंडित दीपक नौटियाल, सुभाष मैठाणी, कुनियाल तथा गौड़ ब्राह्मण  राजजात की इन सभी पौराणिक धार्मिक क्रियाओं को संपादित किया ।







होमकुंड से वापसी सुतोल घाट
श्री नन्दादेवी राजजात यात्रा वापसी के निर्जन पड़ावों को पार कर आवादी के क्षेत्र के पड़ावों की ओर

   चमोली : श्री नन्दादेवी राजजात यात्रा वापसी के निर्जन पड़ावों को पार कर आवादी के क्षेत्र के पड़ावों की ओर अग्रसर हो गयी है। यात्रा अपनी वापसी के अन्तिम पड़ाव घाट पहुंच गई है। शनिवार को यात्रा नौटी पहुंच जायेगी। इस प्रकार 18 अगस्त से प्रारम्भ हुई यात्रा नोटी में आयोजित कार्यक्रम के पशचात यात्रा का समापन हो जायेगा। घाट से नन्दप्रयाग, लंगासू, कर्णप्रयाग तथा ईडाबधाणी में सुफल देते हुए यात्रा नौटी पहुंचेगी। तत्पश्चात राजवंष के प्रतिनिधि भी कांसुआ को प्रस्थान करेगे।
        इससे पूर्व वृहस्पतिवार को राजजात यात्रा चन्दनियाघाट से लाटा की खोपड़ी, तातड़ होते हुए सुतोल पहुंची। सुतोल पहुंचने पर देव डोलियों व निशानों का क्षेत्र वासियों द्वारा परम्परागत ढंग से स्वागत किया गया। सुतोल में विश्राम के पष्चात अधिकांष देव डोलियां एवं छंतोलियां अपने-अपने गतव्य को प्रस्थान कर गई। सुतोल वासियों के स्वागत सत्कार से श्रद्धालु अविभूत थे यात्रियों के विश्राम, आवास व भोजन आदि की व्यवस्था प्रषासन द्वारा की गई थी। जो श्रद्धालु सुतोल से सीधे अपने गन्तव्य की ओर जाना चाहते थे प्रषासन द्वारा उन्हें लगभग दो दर्जन शासकीय वाहनों एवं 2 दर्जन अन्य छोटे वाहनों से घाट तक पहुंचाया गया। वेदनी के बाद के तीन उच्च हिमालयी क्षेत्र के निर्जन पड़ावों में विश्राम एवं दुर्गम रास्तों को तय कर यात्रा सुतोल पहंुची थी। देर रात तक अधिकाषं श्रद्धालू सुतोल से घाट पहुंच गये थे। घाट से भी आवश्यक परिवहन निगम के वाहनों की व्यवस्था आगे के आवागमन के लिये की गई थी। शुक्रवार को भी शासकीय एवं निजि वाहनों से श्रद्धालुओं को सुतोल से घाट तक लाया गया।
    यात्रा व्यवस्थाओं की निगरानी आयुक्त गढ़वाल मंडल सी.एस. नपलच्याल, डी.आई.जी. संजय गुंज्याल, अमित सिन्हा, जिलाधिकारी एस.ए. मुरूगेशन, पुलिस अधीक्षक सुनील कुमार मीणा द्वारा व्यापक रूप से की जा रही थी, ये अधिकारी निर्जन यात्रा पडावों से लेकर सुतोल तक यात्रा में मौजूद रहकर सभी व्यवस्थायें सुनिश्चित कर रहे थे।


क्यों दिया माँ काली ने दिया शाप .....किसको दिया माँ काली ने शाप

 
देवी-देवताओं के आपसी विवाद के चलते माहौल  बेहद गर्माया
राजजात यात्रा का पड़ाव सुतोल दो क्षेत्रों और देवी-देवताओं के आपसी विवाद के चलते माहौल बेहद गर्माया हुआ है। राजराजेश्वरी नंदा के सुतोल में न पहुंचने पर गांव की रक्षक काली बेहद खफा है। गांव ने भी इसे मान-सम्मान का सवाल बना लिया है। बृहस्पतिवार को ग्रामीणों ने देवी से पूछा, बता हम क्या करें। गांव के चौक में लगे मजमे में काली अवतरित हुई और उसने साफ कहा कि इसमें राजराजेश्वरी नंदा को कोई कसूर नहीं है। उसने गांव के लोगों से कहा कि तुम ये बताओ तुम नंदा का मान करते हो या नहीं। रही नंदा को जबरन गांव से बाहर ही बाहर ले जाने की बात, तो वाण को इसका फल भुगतना पड़ेगा। देवी के इस वचन के बाद गांव का माहौल कुछ शांत हुआ। अभी यह सवाल अधर में है कि सुतोल अपने इस मान-सम्मान के सवाल को प्रशासन, नौटी और कांसुवा के लोगों के सामने किस तरह उठाते हैं। 
सुतोल और वाण का यह झगड़ा पातरनचौण्यिा के बाद शुरू हो गया था। सुतोल का भूम्याल देवता द्यो सिंह हैं और गांव के लोग यह मानते हैं कि कैलुवाविनायक के बाद यात्रा की अगुवाई द्यो सिंह करता है। राजजात समिति ने भी सुतोल को एक पड़ाव माना था और यह कहा था कि सुतोल में सारे देवी-देवताओं का मिलन होता है। इसके बाद सब अपनी-अपनी राह पकड़ लेते हैं। पातरनचौण्यिा में वाण और कनोल के लोगों ने सुतोल के लोगों को राजराजेश्वरी नंदा की डोली देने से इंकार कर दिया। 
पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में ही यहां पर भारी झगड़े की नौबत आ गई थी, पर वाण और कनोल के लोगों की अधिकता को देखते हुए सुतोल के लोग बैकफुट पर आ गए थे। इसके बाद शिलासमुद्र में भी इस बात को लेकर विवाद हुआ, पर वाण के लोगों ने डोली को सुतोल को नहीं सौंपा। बृहस्पतिवार सुबह राज राजेश्वरी नंदा की डोली सुतोल से आधा किमी पहले वाण जाने वाले रास्ते पर पहुंची, तो वाण और कनोल के लोग वहां एकत्र थे। विवाद को देखते हुए प्रशासन ने वहां पर पुलिस बल तैनात किया था। 
पिछले दो दिन से सुतोल में हंगामा मचा हुआ है। पातरनचौण्यिा में सुतोल के लोगों का साथ न देने पर गांव के लोगों में पुलिस प्रशासन को लेकर भी नाराजगी है। मामला यहां तक बड़ा कि गांव के लोगों ने प्रशासन के किसी भी आदमी को कमरा देने से इंकार कर दिया। पुलिस और बाकी सभी अधिकारियों ने टेंटों में रात गुजारी। 
देवी-देवताओं को यह झगड़ा वाण और सुतोल के बीच हदबंधी को लेकर भी है। कैलुवाविनायक के बाद से ही सुतोल अपना सीमा क्षेत्र मानता है। जड़ी-बूटी से लेकर कीड़ाजड़ी से संपन्न यह क्षेत्र वाण और सुतोल के बीच खींचतान का मामला पहले से रहा है।



अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश दे गयी नन्दा राजजात यात्रा
गढ़वाल और कुमायूं को भी एक सूत्र में पिरो गयी यात्रा

देवभूमि उत्तराखण्ड धार्मिक आस्थाओं का भी प्रतीक है। वर्षभर यहां पारम्परिक रीतिरिवाजों के अनुसार विभिन्न धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। विषम भौगोलिकस्थिति के वावजूद अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव के नाते यहां आयोजित होनेवाले कार्यक्रमों में प्रवासी उत्तराखण्ड वासी अपनी भागीदारी निभाते रहे हैं । इस वर्ष आयोजित श्री नन्दा देवी राजजात यात्रा में सम्मिलित होने पहुंचे क्षेत्र वासियों की बडी संख्या इस बात का प्रतीक है कि इन पहाडों में उनके पूर्वजों ने जो समृद्व सांस्कृतिक व सामाजिक विरासत की शुरूआत की है, वे उसे आगे बढ़ाने के लिये वे लालायित हैं।

    प्रत्येक 12 वर्ष बाद आयोजित होने वाली इस राजजात यात्रा का सामाजिक व सांस्कृतिक सरोकारों को जोड़ने में बड़ा योगदान है। यद्यपि नन्दा राजजात मुख्यतः देवीनन्दा का अपने मायके से ससुराल जाने की यात्रा है, किन्तु यह यात्रा अपने साथ यात्रा मार्ग व पड़ावों के गांवों को ही नहीं अपितु पूरे उत्तराखण्ड़ के जनमानस को अपने साथ जोड रही है। मुख्यतः गढ़वाल के राजवंश के वंशजों के गांव कांसुवा से 17 अगस्त को आरम्भ हुई यह यात्रा जब अपने कुलपुरोहितों के गांव नौटी पहुंचती है तभी से क्षेत्र का पूरा वातावरण नन्दा की भक्ति में समाया हुआ है। भक्ति की शक्ति का प्रतीक यह आयोजन अपनी पुत्री को ससुराल के लिये विदा करने की तैयारियों ही जैसा है। सभी क्षेत्रवासी अपनी सामर्थ्य  व श्रद्धा  के अनुसार मां नन्दा की आराधना व सेवा में जुडे है। आज जबकि आधुनिकता के दौर में लोग अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे है ऐसे में श्री नन्दादेवी राजजात यात्रा का पर्व उन्हें अपनी लोक संस्कृति व धार्मिक परिवेश से परिचित कराने में सफल हो रहा है। पलायन पहाड़ की आज बडी समस्याबनी हुई है। हालांकि लगभग तीन चौथाई आवादी बेहतर भविष्य की उम्मीद व आजीविका के लिए शहरों की आवादी का हिस्सा बन गई है। ऐसे में खाली पडे इन गांवों के निवासी अपने गांवों को लौटे हैं, पुराने पडे़ जीर्ण-शीर्ण भवनों को ठीक-ठाक कर रहने लायक बना रहे हैं, मां नन्दा की यह दैविक यात्रा उन्हें अपने पैतृक गांवों में लायी है, इससे कुछ ही समय के लिये सही लगभग सभी गांव आवादी से भरे पडे़ है दशकों बाद लोग एक दूसरे से मिल रहे है अपनी आपबीती व पुरानी यादों को ताजा कर रहे हैं। उम्मीद है मां नन्दा उन्हें अपने गांवों से जुडे रहने का आशीर्वाद देगी ताकि खाली हो रहे गांव पहले की तरह आवाद हो सके। यह पर्व महिलाओं के सम्मान से भी जुड़ा है। मातृशक्ति की भक्ति की प्रतीक यह यात्रा देश व दुनियां को महिलाओं के सम्मान का भी सन्देश दे रही है। यह देवी की शक्ति का ही प्रतिफल माना जा रहा है कि यात्रा आरम्भ होने से लेकर आबादी के अपने अन्तिम गांव के पड़ाव तक पहुंचने में न कोई कठिनाई हुई और नही पानी बरसने की विशेष समस्या सामने आयी। इससे हजारों की संख्या में लोगों को इससे जुड़ने का मौका मिला।

   नन्दा राजजात यात्रा ने पहाड़वासियों को अपनी जड़ों से जुड़ने का सन्देश भी दिया है। इस यात्रा का सुखद पहलू यह भी रहा कि यात्रा मार्ग के सीमान्त गांवों में लोग अभी भी अपने पूर्वजों की परम्पराओं को संजोये हुए हैं। गावों की महिलायें हो या पुरूष अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक व सामाजिक परिवेश को बनाये हुए है। नौटी ईड़ाबधाणी से लेकर आखिरी गांव वाण तक की यात्रा में विभिन्न पड़ावों व आसपास के ग्राम वासियों ने तन-मन-धन से जिस प्रकार यात्रा की अगवानी की तथा अपनी-अपनी परम्परा व रीति रिवाजों के साथ देवी नन्दा से आत्मीयता से जुडे़, यह वास्तव में यहां की समृद्ध सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत का परिचायक है। तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी अपनी जमीन से जुडे़ रहने, अपनी परम्पराओं के निर्वहन में महिलाओं की भागीदारी देखने को मिली। पहाड़ के लगभग हर गांव में शिव व देवी के मंदिर है। ये मन्दिर उन्हें जीवन की कठिनाइयों से उबरने की प्रेरणा देते हैं। यहां के गांवों में भादो का महीना यद्यपि प्रतिवर्ष नन्दामय रहता है। सभी गांवों में देवी नन्दा की पूजा होती है। उसके अपने मायके से ससुराल जाने की परम्पराओं का धार्मिक आयोजन होता रहता है, किन्तु प्रत्येक 12 वर्ष बाद आयोजित होने वाली इस राजजात यात्रा का अपना विशेष महत्व है।
   यह यात्रा पहाड़ वासियों के लिए आपसी एकता का सन्देश लेकर आयी है। इस यात्रा में जुडे़ लोग धार्मिक यात्रा का साक्षी बनने के साथ ही यहां की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, लोकजीवनशैली तथा लोक संस्कृति से भी रूबरू हुए हैं। इस यात्रा में प्रकृतिप्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण विद, जैव व भूविज्ञानी, छायाकार, पत्रकार, वृत्तचित्र निर्माता व सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोग अपने-अपने उदे्श्यों की प्राप्ति के लिये यात्रा का हिस्सा बने रहे। साहसिक पर्यटन भी इससे जुड़ा है। बडी संख्या में लोग इससे भी जुडे है। यहां का सुरभ्य प्राकृतिक वातावरण हिमालयी चोटियां व घाटियां सुन्दर मखमली बुग्यालों का आकर्षण उन्हें बार-बार यहां आने की प्रेरणा निश्चित रूप से देंगे। यात्रा में अपने परिवेश, अपने अतीत, अपनी विरासत व युवाओं के अपनों से जुड़ने का अद्भुत मिलन निश्चित रूप से पहाड़ के हित के लिये शुभ संकेत है।

यह यात्रा किसी को आध्यात्मिक शान्ति तो किसी को साधना का मार्ग प्रशस्त कर गई है। प्रकृति का यह अनुपम क्षेत्र आत्मिक शान्ति की राह भी लोगों को दिखा गई है। कहा जा सकता है कि इस यात्रा ने प्रवासियों को अपनी माटी से जुड़ने का अवसर दिया, तो बीती आपदा से सहमे लोगों के मन में साहस की नई उमंग भी भरी। अपनी आराध्य देवी अपनी लाड़ली (ध्याणी) के इस उत्सव में जिस तरह आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा उसके चलते यह राजजात वर्षो-वर्षो तक याद रहेगी।

 रविवार को नौटी में पूजा के बाद नंदा राज जात  का हुआ समापन