शनिवार, 2 अगस्त 2014

कांग्रेस में फिर गुटबाजी का दौरा शुरू,बहुगुणा गुट को चाहिए सत्ता की मलाई




बसपा कोटे के मंत्री थाम सकते हैं कांग्रेस का दमन !

राजेन्द्र जोशी

देहरादून एक फरवरी 2014 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कमान थामने वाले हरीश रावत को दो महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में जो झटका लगा उससे उबरने में भी उन्हें लगभग दो ही महीने लगे। मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव के लगभग दो माह बाद हुए तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव में जिस तरह से मोदी लहर पर सवार भाजपा को धूल चटाई और उसके कब्जे समेत तीनों सीटों को जीत कर कांग्रेस की झोली में डाला उसने देशभर में मरणासन्न कांग्रेस को नई संजीवनी मिली है। इस जीत ने जहां राज्य में पीडीएफ की बैसाखी के सहारे चल रही कांग्रेस को मजबूत किया और उसे बहुमत के बिल्कुल करीब ला कर खड़ा कर दिया वहीं हरीश रावत के विरोधियों को भी चारो खाने चित कर दिया। गर्दन की चोट से जूझ रहे मुख्यमंत्री को इस जीत ने आलाकमान सोनिया गांधी से तो प्रसंशा दिलवाई ही उनको आलाकमान से प्रदेश में खुलकर राजनीति करने की ताकत भी प्रदान की। लेकिन मुख्यमंत्री अभी जीत की खुमारी से जागे भी नहीं थे कि उनके धुर विरोधी और राज्य कांग्रेस के दूसरे मजबूत गुट के तौर पर स्थापित पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लोगों ने उनका इंद्रासन हिलाना शुरू कर दिया है। विजय बहुगुणा और उनका गुट मांग कर रहा है कि सीएम पीडीएफ की बैशाखी हटाए यानी पीडीएफ सदस्यों को मंत्रिमंडल से बाहर करें और उसकी जगह बहुगुणा गुट के कांग्रेस विधायकांे को मंत्रिमंडल में शामिल करें ताकि वो भी सत्ता की मलाई चाट सकें। बहुगुणा गुट का स्पष्ट कहना है कि विजय बहुगुणा के कार्यकाल में हरीश रावत गुट को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया गया इसलिए अब हरीश रावत को उनके नक्शेकदम पर चलते हुए बहुगुणा गुट को सत्ता में हिस्सेदारी देनी चाहिए। हालांकि मुख्यमंत्री ने इस बारे में स्पष्ट कर दिया है कि वे अभी किसी दबाव में पीडीएफ के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेंगे। लेकिन बहुगुणा गुट के क्रियाकलापों ने मुख्यमंत्री खेमे के कान जरूर खड़े कर दिए हैं।
हाल में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के तीनों विधानसभा सीटें जीतने के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत के लोगों का मानना है कि उनके सितारे एक बार फिर से बुलंदी पर हैं। उनका कहना है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा से बुरी तरह मात खाने वाली कांग्रेस के पिछले सप्ताह हुए उपचुनाव में तीनों सीटें धारचूला, सोमेश्वर और डोईवाला जीतने के बाद मुख्यमंत्री रावत की लोकप्रियता और काबिलियत का डंका चारों ओर बजने लगा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण तक हर कोई उत्तराखंड में कांग्रेस के प्रदर्शन का बखान कर रहा है जिससे रावत को एक नयी ऊर्जा मिली है।
बताते चले कि मुख्यमंत्री रावत ने स्वयं भी धारचूला विधानसभा उपचुनाव लड़ा और वहां से बीस हजार से भी ज्यादा मतों के अंतर से विजय हासिल की। यहां राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि उत्तराखंड में कांग्रेस को वैसे भी ऐसे समय पर जीत की संजीवनी मिली है जब पार्टी राष्ट्रीय स्तर के अलावा विभिन्न प्रदेशों में भी खराब दौर से गुजर रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव निकट हैं और उत्तराखड में मिली जीत को कांग्रेस ने एक अहम मुद्दा बना लिया है और भाजपा पर जोरदार प्रहार करते हुए कहा है कि केवल दो महीने के अंतराल में जनता का मोदी से मोहभंग हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी बिना कोई समय गंवाये रावत की पीठ थपथपायी और कहा कि इस जीत ने सिद्ध कर दिया है कि अब भी लोग कांग्रेस की तरफ आशा से देख रहे हैं। दूसरी तरफ, चव्हाण ने भी कांग्रेस को उत्तराखंड में मिली जीत की सराहना करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में भी पार्टी इसी प्रकार का प्रदर्शन दोहरायेगी।
बीती 16 मई को घोषित हुए लोकसभा चुनावों के परिणामों में कांग्रेस के भाजपा के हाथों पांचों सीटें गंवाने से प्रभावित हुई रावत की छवि को भी इस जीत ने काफी राहत दी है। लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस में चल रही अन्तर्कलह का दौर फिर उभर आया था जिसमें कभी रावत के साथ खड़े दिखायी देने वाले उनके ही मंत्रिमंडल के कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह और हरक सिंह रावत ने पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की अगुवाई वाले विरोधी गुट का दामन थाम लिया। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय जैसे पार्टी के कुछ कद्दावर नेताओं ने इस अन्तर्कलह को दबाने की कोशिश की है लेकिन विरोधी गुट के तेवर अब भी ढ़ीले नहीं पड़े हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बहुगुणा अपने लिये राज्यसभा की सीट और अपने चहेते विधायकों के लिये कैबिनेट में जगह चाहते हैं जिसके लिये उन्होंने हाल में पार्टी आलाकमान से भी बात की है।
हालांकि, जानकार सूत्रों का कहना है कि तीन सीटों पर विजय हासिल करने वाले रावत को पार्टी आलाकमान ने इस संबंध में खुद निर्णय लेने की खुली छूट दे दी है। इस संबंध में पूछे जाने पर मुख्यमंत्री रावत ने फिलहाल मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना से इंकार किया है जिससे भी इस बात की पुष्टि हो गयी है कि वह किसी प्रकार के दबाव में नहीं हैं। तीन विधानसभा सीटें जीतकर सदन में बहुमत के 36 के आंकड़े से सिर्फ एक सीट पीछे रह जाने का हवाला देते हुए बहुगुणा गुट रावत पर सात सदस्यीय प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चा (पीडीएफ) के सदस्यों को मंत्रिमंडल से बाहर किये जाने का दबाव बना रहा है। हालांकि रावत ने इस संबंध में भी साफ कर दिया कि पीडीएफ सरकार का सहयोगी है और आगे भी यह साथ बनाये रखा जायेगा।
वहीं दूसरी तरफ पीडीएफ के सदस्य व राज्य मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री सुरेन्द्र राकेश की तबियत ज्यादा खराब होने के चलते अब यह सीट भी कांग्रेस के खाते में वाली लगती है क्योंकि सुरेन्द्र राकेश इस सीट से अपने किसी परिजन अपनी पुत्री अथवा अपने भाई को इस सीट से कांग्रेस से लड़वाना चाहते हैं क्योंकि सुरेन्द्र राकेश व हरि दास वर्तमान में बसपा से निष्कासित चल रहे हैं। ऐसे में उनके सामने कांग्रेस में जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता,क्योंकि बीते ढाई सालों से वे कांग्रेस के सहारे ही अपनी नाव चला रहे हैं।
दूसरी तरफ, प्रदेश अध्यक्ष उपाध्याय ने इस बात पर जोर दिया कि सभी नेताओं से सामंजस्य बनाये रखा जायेगा और उनकी कोशिश रहेगी कि उपचुनाव में मिली जीत 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी दोहरायी जाये और पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करे। उपाध्याय ने कहा कि उन्होंने कैबिनेट मंत्री हरक सिंह से इस संबंध में बात की है और आग्रह किया है कि पार्टी के हित में सभी नेता मिलजुल कर काम करें।