मंगलवार, 13 जनवरी 2015

उत्तराखंडी समाज और संस्कृति के लिए कुछ प्रयास जरूर करें.......!

वर्ष में एक-दो बार अपने घर-गाँव का रुख अवश्य करें
वसुंधरा नेगी ( लाजो )

किसी भी समाज की पहचान का आधार उस समाज की संस्कृति से होता हैं जिसमें उस समाज के रीति रिवाज, जीवन-शैली, खानपान, बोली-भाषा, परम्पराएं, सामाजिक और धार्मिक मान्यताएं, वेश-भूषा आदि सम्मलित होती हैं । अपने उत्तराखंड के परिपेक्ष में बात करें तो इसे देवभूमि के अलंकरण से बिभुषित किया गया हैं और ये बार अक्षरत: सत्य हैं कि इसी देवभूमि के अलंकरण के कारण यहाँ देश-दुनियां के शैलानी और तीर्थयात्री वर्ष भर अपनी उपस्थति दर्ज करातें रहतें हैं, जो इस प्रदेश के निवासियों की आजीविका के महत्वपूर्ण आधार हैं | इस प्रदेश को शोर्य की धरती भी कहा जाता हैं, यहाँ के अनेक बेटे देश की आन-बान-शान के लिए शहीद हो गए ! प्रकृति ने इस प्रदेश को इतनी नेमत बक्शी हैं कि इसका दीदार करने लोग दूर-दूर से आकर इसकी गोद में सकून पातें हैं !
इस सब के बावजूद क्या आप को नहीं लगता देव भूमि उत्तराखंड दिन-प्रतिदिन अपनी पहचान खोती जा रही हैं, हम इसके प्रति लापरवाहीपूर्ण व्यवहार करने की तरफ बढ़ रहे हैं ! सोशियल साइट्स जैसे फेस बुक आदि पर बहुतायात लोग अनगिनत कमेंट्स पोस्ट जैसे गर्व से कहो हम उत्तराखंडी हैं, मेरा प्यारा उत्तराखंड आदि करते हैं .... कुछ लोग उसको पढ़ते हैं, वो या उस पर कमेंट्स करेंगें या लाइक करेंगें, जितने लाइक मिले और कितने कमेन्ट मिले हम इस पर इतराते फिरते हैं ! हम इसी को समाज सेवा मान बैठतें हैं, शहरों में बसने वाले लोग साल में एक-दो मंचीय कार्यक्रम करा दें तो हो गयी उनकी ओर से संस्कृति व अपनी विरासत की रक्षा !
हमको ये पता रहता हैं कि फ़िल्मी तारिकाएं कितने बॉय फ्रेंड बदलती, ये भी पता है कि अमुख फ़िल्मी कलाकार ने क्या खाया-पीया-कहा, मगर ये पता नहीं कि आज उत्तराखंड में कितने मांए अपने बेटे के फ़ोन का इन्तजार करते-करते सोयी होंगी, कितनी माएं पथराई नजरों से अपने बेटे की राह तक रही हैं ! कितने दलालों ने झूठे दस्तखत करवा कर कितने पैसे खाए और कितने लोगों की जमीन हड़पी हैं, किसके घर में खुशिया आई और कितने घर में मातम मना हैं !
एक समय था जब अपनी देवभूमि में घरों पर ताले लगाना अशुभ माना जाता था किन्तु आज उत्तराखंड के कई घरों पर ताले लग चुके हैं, कई घर खंडर तो कई इसकी खंडर होने की तरफ बढ़ रहे हैं, सब रोजी-रोटी, शिक्षा और बेहतर जीवन की आस में घरों को छोड़-छोड़कर शहर की तरफ भागे जा रहे हैं, इस भागम-भाग का नतीजा ये हैं कि गांव युवा-विहीन होते जा रहे हैं, गाँवों की जग्वाल की जिम्मेदारी बुजुर्ग कन्धों पर आ गयी हैं, क्या पता ये बुजुर्ग काँधे कब तय ये बोझ उठाने लायक रहते हैं ! जो किसी तरह शहर नहीं पहुँच पाए वो नवीन सड़क संस्कृति के कारण वसे कस्बों को अपना आशियाना बना रहे हैं, एक अलग प्रकार के समाज और संस्कृति की नीवं अपने पहाड़ में पड़ चुकी हैं, जहां ना आत्मीयता हैं कोई ना अपनापन, नजरिये ही बदल गए, पहाड़ी होने के !
मूल प्रश्न ये हैं कि आना-जाना लगा रहा हैं और ये लगा रहेगा किन्तु हमको अपने आप से ये सवाल जरूर करना चाहिए कि कहीं हम अपने घर, गाँव, समाज और संस्कृति के प्रति लापरवाह तो नहीं बने हुए हैं ! आखिर ! क्यों हमको चोकलेट डे, रोज डे, वेलेन्टाइन दे याद हैं किन्तु अपनी संगराद और माह में आने वाले त्यौहार ऐसे ही निकल जाते हैं ! हम अपने बच्चों को हिन्दी अंग्रेजी सहित दुनियां की अनेक भाषाओँ के ज्ञान कराने के लिए लालायित रहते हैं किन्तु अपनी जौनसारी, गढ़वाली और कुमाउनी बोली-भाषा से इनको दूर रखते हैं ! हम दुनियां भर के परिधानों को अंगीकृत करते हैं किन्तु अपने पारम्परिक परिधानों को पिछडेपन का सूचक मानने लगे हैं ! अब ढोल-दमाऊ की थाप पर हमारे पाँव थिरकते हैं, डिस्को के अभ्यस्त जो हो चले हैं, आने वाली पीढ़ी को हम शैलानी बनाने पर तुले हैं जो नाम से तो पहाड़ी होंगे किन्तु बोली-भाषा-यहाँ के संस्कारों के नाम पर उनके पास बड़ा सा शून्य होगा ! क्या इस स्थिति में बच पाएगी हम सब और साथ ही देवभूमि की पहचान, मेरी नजर से बिल्कुल नहीं !
अपने उत्तराखंड के प्रति यदि हमारे मन में थोड़ा भी अनुराग हैं तो हमको एक बार जरूर विचार करना चाहिए इसकी वर्तमान स्थिति पर कि यदि ऐसे ही चलता रहा तो होगा क्या इस देवभूमि का (?) सम्भव हों तो कुछ प्रयास अवश्य करें जैसे कि वर्ष में एक-दो बार अपने घर-गाँव का रुख अवश्य करें, देश-दुनियां में जो परिवर्तन हो रहे हैं उससे जो अभी भी गाँव में लोग रह रहे हैं उनसे परिचित कराएं, लोगों के साथ सम्वाद बनाने का प्रयत्न करें, वर्तमान में जिस भी स्थान पर रह रहे हैं, वहाँ अपने तीज-त्यौहार की याद ताजा करने के लिए उनको मनाने का प्रयास जरूर करें, इससे एक तो अपने समाज के लोग एक साथ जुडेंगें, दूसरे इन त्योहारों से अन्य समाज के लोग भी परिचित होंगें ! इस कार्य से एक महत्वपूर्ण काम और होगा कि जो बच्चे शहरों में पैदा हुए हैं या पाले-बढ़े हैं उनका भी इनके बारें में ज्ञान वर्धन होगा ! अपने घरों में अपनी दुधबोली बोले जाने का माहौल बनाने का प्रयत्न करों ! यदि ऐसा कर पाएं तो वो दिन दूर नहीं जब देवभूमि की सांस्कृतिक सुंगंध पहाड़ क्या देश की फिजाओं को भी अनवरत महकाती रहेगी !