गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मुख्यमंत्री के लिए वरदान, प्रदेशवासियों के लिए अभिशाप बनी आपदा

मुख्यमंत्री के लिए वरदान, प्रदेशवासियों के लिए अभिशाप बनी आपदा


प्रदेश सरकार के खिलाफ आम जन का विरोध स्वाभाविक
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 22 जुलाई। 16-17 जून को आई आपदा भले ही प्रदेश के लिए घातक साबित हुई, लेकिन यह आपदा मुख्यमंत्री के लिए वरदान साबित हुई। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से लगातार मुख्यमंत्री विरोधियों के स्वर तीखे होते चले गए और आपदा से एक सप्ताह पूर्व तक कांग्रेस विधायकों में से लगभग दो दर्जन विधायक मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत पर उतर आए थे। आपदा राहत कार्याें के बाद एक बार फिर मुख्यमंत्री पर प्रदेश की जनता का आक्रोश आपदा बनकर फूट रहा है। जहां तहां मुख्यमंत्री कैबिनेट के मंत्रियों और अधिकारियों का प्रदेश की जनता विरोध कर रही है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में प्रदेश सरकार ने जितनी तेजी से तीर्थयात्रियों को निकालने का काम किया, उतनी तेजी से उसने स्थानीय आपदा प्रभावितों को भुला दिया है। इसी का खामियाजा प्रदेश सरकार को भुगतना पड़ सकता है।
    गौरतलब हो कि आपदा से एक सप्ताह पूर्व तक प्रदेश के लगभग दो दर्जन विधायक मुख्यमंत्री से इसलिए नाराज हो गए कि वे अपनी-अपनी विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्याें में प्रदेश सरकार द्वारा शिथिलता को लेकर मुख्यमंत्री पर अपना गुस्सा उतार रहे थे। वहीं इन विधायकों के सुर में सुर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के मिलाए जाने के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई, जबकि केंद्रीय मंत्री हरीश रावत ने भी विधायकों और विधानसभा अध्यक्ष की बातों में मुहर लगाते हुए प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था। इस राजनैतिक घटनाक्रम से परेशान होकर आखिरकार मुख्यमंत्री को दिल्ली दरबार में हाजिरी लगानी पड़ी और सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि यदि प्रदेश में 16-17 जून को आपदा न आती तो, राज्य में 23 जून को मंत्रिमण्डल में व्यापक फेरबदल होने वाला था। पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस मंत्रिमण्डल परिवर्तन में एक-दूसरे से संबंध रखने वाले विभागों को एक ही मंत्री को देने और स्वास्थ्य मंत्रालय सुरेन्द्र सिंह नेगी से हटाकर डा. हरक सिंह रावत को दिए जाने पर पूरी तरह सहमति बन चुकी थी, लेकिन आपदा ने ऐन मौके पर आकर मुख्यमंत्री विरोधियों की मुहिम को झटका दे डाला और यह आपदा राजनैतिक कारणों से मुख्यमंत्री के लिए वरदान बन गई।
    आपदा प्रबंधन के सरकार के दावे इस आपदा ने पूरी तरह से नकार दिए और प्रदेश सरकार पर आपदा प्रबंधन में विफल रहने के आरोप जमकर लगे, इतना ही नहीं राज्य के राजनैतिक जानकारों का कहना है कि जितनी तेजी से आपदा के एक सप्ताह बाद प्रदेश सरकार ने केदारनाथ, गौरीकुण्ड, रामबाड़ा, गुप्ताकशी, मुनिस्यारी, धारचूला, हेमकुण्ड, गोविंदघाट और ब्रदीनाथ में फंसे यात्रियों को निकालने में सेना की मदद तेजी दिखाई, वहीं अब स्थानीय लोगों ने सरकार की आपदा प्रबंधन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकांश दूरस्थ इलाकों में आज भी खाद्यान और जरूरी सामान की भारी कमी है, तो वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा बनाए गए आपदा राहत गोदामों में खाद्यान सड़ रहा है। आपदा प्रबंधन में सामंजस्य न होने की बात तीर्थयात्री भी स्वीकार चुके हैं, अब स्थानीय लोग प्रदेश सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों सहित प्रदेश मंत्रिमण्डल के सदस्यों का जगह-जगह इसलिए विरोध कर रहे हैं कि उन्हें आपदा के 35 दिन बाद भी खाना और कपड़े की व्यवस्था प्रदेश सरकार नहीं कर पाई है। इतना ही नहीं प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का भी बहुत बुरा हाल हैं, गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के चलते सड़कों पर बच्चे जनने को मजबूर हैं, इतना ही नहीं गंभीर बीमारीयों से ग्रसित प्रदेश के स्थानीय लोग चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में तिल-तिल कर जीवन जी रहे हैं, ऐसे में प्रदेश सरकार के खिलाफ आम जन का विरोध स्वाभाविक नजर आता है।
    भले ही प्रदेश सरकार आपदा राहत कार्याें में पूरी शिद्दत के साथ जुड़े होने की बात करती है, लेकिन इस 16 जून से आज तक प्रदेश सरकार द्वारा किए गए राहत कार्य प्रदेश की जनता का विश्वास अर्जित नहीं कर पाए हैं। यही कारण है कि प्रदेश की जनता सरकारी नुमाइंदों के विरोध पर उतर आई है।