बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

सूचना विभाग का वित्त अधिकारी ,पड़ा सब पर भारी

वित्त अधिकारी ने कब्जाया सचिव सूचना का कार्यालय कक्ष
सूचना निदेशालय घोटाला - 4
 उत्तराखंड प्रदेश में सूचना विभाग ही एक ऐसा विभाग होगा जहाँ दूसरे विभाग के एक अदने से अधिकारी ने सूचना सचिव तक के ऑफिस के कमरे पर कब्ज़ा ही नहीं  जमाया बल्कि किराये के ऑफिस में दो -दो जगह अपना कमरा बना दिया है, सूचना सचिव का कमरा तो डील के लिए प्रयोग हो रहा है तो विभाग द्वारा आवंटित कक्ष धुम्रपान करने को। लोगों की समझ में यह नहीं आ रहा है कि आखिर इस वित्त अधिकारी के पास ऐसे कौन सी बूटी है जो महानिदेशक से लेकर सचिव सूचना तक इसके प्रभाव में हैं। इस मामले में सहायक निदेशक सूचना ने बताया कि  विभागीय तौर पर वित्त अधिकारी के सचिव महोदय के कक्ष में बैठने के कोई आदेश नहीं हैं। जबकि इस मामले में सचिव सूचना विनोद फोनिया का कहना है उनको इस बात की जानकारी नहीं है यदि ऐसा है तो उनके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी।
   एक जानकारी के अनुसार सूचना  विभाग में वे आदेश लागू  होते है जो  राज्य के किसी अन्य विभाग में नहीं राज्यभर में 5600 ग्रेड पे वाले इस अधिकारी को अन्य उच्च पदों पर काबिज  की तरह  किराये पर कार दी गयी है जिसका प्रयोग ये अधिकारी अपने कार्यालय के कार्यों के अतिरिक्त घरेलु कार्यों में भी करता है जिससे तीस हज़ार रुपये प्रति माह  सूचना निदेशालय को चूना  लगाया जा रहा है इस तरह अब तक लगभग 5  लाख से ज्यादा का चूना विभाग को लग चूका है जबकि ये वित्त अधिकारी राजधानी देहरादून के नगर निगम के भी वित्त अधिकारी हैं , ऐसे में वित्त अधिकारी का पूरा खर्च सूचना  विभाग द्वारा वहां किया जाना कितना तर्क संगत है  यह तो विभाग ही बता सकता है लेकिन आमजन की नज़र में यह खर्च सूचना विभाग की जेब पर डाके के सामान है। यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि  सुचना महानिदेशक दलीप जावलकर के कार्यकाल के दौरान गाड़ी को लेकर उन्होंने इसका जवाब तलब भी किया था लेकिन इस अधिकारी ने आज तक उनके पत्र जा जवाब तक देना मुनासिब नहीं समझा।
    इस मामले में एक और रोचक पहलु यह भी सामने आया है कि  इस विभाग के उच्चाधिकारियों  ने वित्त विभाग के इस अदने से अधिकारी को सूचना विभाग का आहरण -वितरण अधिकारी तक बना दिया है जबकि नियमानुसार व शासनादेशों  के अनुसार वित्त विभाग का अधिकारी किसी अन्य विभाग का आहरण-वितरण अधिकारी नहीं हो सकता,जब तक कि  वह कार्यालय अध्यक्ष घोषित नहीं हो जाता। इससे तो यह साफ़ है कि  इस अधिकारी द्वारा महानिदेशक  को  या तो गुमराह किया गया है या महानिदेशक को वित्तीय मामलों की जानकारी कुछ कम है। इतना ही नहीं बीते दिनों इस वित्तीय अधिकारी ने विभाग के मातहत अधिकारियों को गुमराह कर महानिदेशक से सीधे विभागीय कार्यों का विभाजन अपने आप करवा दिया।
  इतना ही नहीं जब विभागीय ऑडिट हुआ तो पता चला कि  जिस अधिकारी को प्रदेश सरकार ने वित्तीय मामलों पर नियंत्रण के लिए नियुक्त किया हुआ है उसी ने गड़बड़ी कर डाली ..मामला कुछ इस तरह जानकारी में आई है कि  इस अधिकारी ने चेनलों का भुगतान गैरयोजनागत मद से कर डाला  जबकि इसका भुगतान योजनागत मद के फिल्म निर्माण मद से किया जाना चाहिए था .......





सूचना निदेशालय घोटाला - 3 :  कैश नहीं लिफाफे से लेता है रिश्वत की रकम
देहरादून : 90  करोड़ रुपयों के विज्ञापन तमाम न्यूज़ चेनलों में चलाने व कुछ अख़बारों  में प्रकाशित करवाने को लेकर उत्तराखंड प्रदेश का सूचना निदेशालय इन दिनों सुर्ख़ियों में है । इतनी मोटी  रकम ठिकाने लगाने के बाद विभागीय वित्त अधिकारी का यह तुर्रा कि  इससे प्रदेश सरकार को दान दातव्य में मोटी  रकम मिली है। उत्तराखंड के सूचना विभाग को अपनी उँगलियों पर नचाने वाले इस अधिकारी के बारे में जो जानकारी मिली है वो तो और भी चौंकाने वाली है। उल्लेखनीय है कि  इस अधिकारी के पास वर्तमान में सूचना  निदेशालय सहित देहरादून नगर निगम के वित्त अधिकारी का भी कार्यभार है लेकिन यह सर्वाधिक वक़्त सूचना  निदेशालय को ही देता है क्योंकि यहाँ से उसकी अच्छी कमाई हो रही है यही कारण  है कि  यह अधिकारी नगर निगम को  वक़्त नहीं दे रहा है जितना इसको वहां देना चाहिए। प्रदेश के सूचना महानिदेशक जिस तरह सूचना  निदेशालय में न बैठ मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण के कार्यालय में ही सूचना की फाइल मंगवाकर वही से निदेशालय चला रहे हैं ठीक उन्ही की तर्ज पर यह वित्त अधिकारी भी सूचना निदेशालय में बैठकर नगर निगम देहरादून चला रहे हैं।
   सूत्रों के बताया है कि सूचना निदेशलय में कुर्सी तोड़ रहा ये वित्त अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक  चेनलों व अख़बारों के कुछ लोगों से रिश्वत की रकम सीधे सीधे नकद नहीं बल्कि लिफाफे  में लेता है ,इस बात की तस्दीक कई लोगों ने भी की है। इतना ही नहीं सूत्रों ने तो यहाँ तक भी बताया है कि चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वेर में भी यह वित्त अधिकारी काफी चर्चित रह चुका है व गोपेश्वर में इनकी कारगुजारियों को लेकर इनके खिलाफ आन्दोलन तक भी हुए .   देहरादून नगर निगम के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सूचना निदेशालय में  बतोर वित्त अधिकारी होने के चलते इस अधिकारी ने  कुछ एक ठेकेदारों से मिलीभगत कर नगर निगम में करोड़ों  की निविदाओं को सूचना निदेशालय में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ऐसे अख़बारों में निविदा  का विज्ञापन छपवा डाला जिनका प्रसारण सीमित था, ताकि अपने चहेतों को वह मनमाफिक कार्य दिलवा सके। मामला खुल जाने  नगर निगम के मुख्य नगर अधिकारी ने इनका जवाब तलब भी किया था।  इतना ही नहीं बीते दिनों इसी अधिकारी ने नगर निगम में एकत्रित कबाड़ की निविदा में भी गड़बड़ी कर डाली ,जिस पर बीते तीन -चार दिन पूर्व कबाडियों ने नगर निगम में जमकर बबाल भी काटा था वहीँ हंगामा होने के बाद जहाँ मुख्य नगर अधिकारी को वो निविदाएँ स्थगित करनी पड़ी थी वही  इस मामले में अपर सचिव वित्त आर.सी.अग्रवाल ने भी इसकी जमकर क्लास ली थी। इतना ही नहीं सूचना विभाग में भी जो विज्ञापन डी ए वी पी दरों पर निर्गत किये जाने चाहिए थे इस विवादित अधिकारी ने उनको भी व्यवसायिक दरों पर अपने चहेतों में बंटवा दिए।
  

सूचना निदेशालय का बड़ा घोटाला - 2 :   चोर को कहा चोरी कर कोतवाल को कहा जागते रहो
देहरादून। उत्तराखण्ड सरकार की नाक के नीचे जो हो जाए वह कम है। यहां थानेदार को ही चोरी करने का पूरा मौका दे दिया जाता है। राज्य में आई  भीषण आपदा के बाद से ही राज्य का सूचना एंव लोक संपर्क विभाग सुर्खियां बटोरता रहा है। आपदा प्रभावित लोगों को प्रभावी विस्थापन के बजाय मुख्यमंत्री इस विभाग का सदुपयोग पूरे देश के मीडिया संस्थानों को विज्ञापन बांटकर अपनी छवि सुधारने का नाकाम प्रयास करते रहे हैं । हाल ही  में खुलासा हुआ कि  यह चर्चित  विभाग  मुख्यमंत्री के इशारे पर 90 करोड़ रूपए से अधिक के विज्ञापन और न्यूज डायरी के नाम पर बांट चुका जिसकी चर्चा पूरे देश में है ।
     सूचना विभाग में एक और कारनामा इन दिनों सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री  के अध्ीन इस विभाग में वित्त विभाग के जिस व्यक्ति  को वित्तीय गड़बडियों को पकड़ने की जिम्मेदारी दी गयी थी उसी व्यकित को बिल पास करने की भी अनुमति दे दी गयी  है। यानि वह खुद ही गड़बड़ी करेगा व बाद में खुद ही वित्त अधिकारी बनकर उस गड़बड़ी पर मुलम्मा लगाएगा.इतना ही नहीं इस अधिकार को विभाग का आहरण -वितरण (डी डी ओ ) भी बना दिया गया है .  अब यह बात आम आदमी के  समझ से परे है कि जो व्यक्ति विभागीय बिल पास करेगा, वह वित्तीय गड़बडियों पर कैसे अंकुश लगा सकता है । आम तौर पर व नियमतः  विभागीय मुखिया के पास बिल पास करने की जिम्मेदारी होती है या वह काम के बोझ को देखते हुए अपने ही विभाग के किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह अधिकार दे देता है न कि  अपने विभाग से इतर किसी अन्य विभाग के अधिकारी को  यह जिम्मेदारी दी जा सकती है।
         यहां अजब तमाशा यह भी  हुआ कि महानिदेशक  ने विभागीय अधिकारियों को दरकिनार कर किसी दूसरे विभाग के अधिकारी को वह जिम्मा दे डाला  जिसको  सरकार  ने उस विभाग की वित्तीय अनियमितताओं  के खुलासे के लिये नियुक्त किया गया है ,इतना ही नहीं वित्त विभाग के इस  अधिकारी को 2 - 2  लाख रूपए तक के बिलों को पास करने का अधिकार तक भी दे दिया गया है ।
   उल्लेखनीय है कि  सूचना विभाग में तैनात वित्त विभाग के इस वित्त अधिकारी के पास सूचना विभाग के अतिरिक्त नगर निगम देहरादून के  वित्त अधिकारी की भी जिम्मेदारी है। नियमतः  वित्त अधिकारी का काम विभाग में आर्थिक घोटालों का पता लगाकर उन पर प्रभावी कार्रवाही  करना वित्तीय अनियमितताओं को रोकने की होती है, मगर सूचना विभाग में शासन में बैठे उच्चाधिकारियों ने उल्टी गंगा ही बहा दी। सूचना विभाग में तैनात इस वित्त अधिकारी को  2 लाख रूपए तक के बिलों के भुगतान का भी अधिकार देकर नियमतः वित्त अधिकारी के अधिकार को बौना कर दिया गया है । यही नहीं पूरे प्रदेश के साथ देश के विभिन्न प्रदेशों से राज्य सूचना विभाग से होने वाले पत्राचार को जांचने को ठेका भी  इसी वित्त अधिकारी को दे दिया गया है । अब शासन में बैठे उच्चाधिकारियों को कौन समझाए कि पत्राचार में मीडिया से संबंधित विभिन्न मसलों को विभाग के सम्मुख रखा जाता है और उन सब चीजों को समझने के लिए विभाग के अधिकारियों से बेहतर कोई  नहीं होता। वित्त विभाग का अधिकारी मीडिया से संबंधित मामलों पर कितना प्रभावी निर्णय ले सकता है, यह शासन में बैठे उच्चाधिकारी ही बेहतर जानते होंगे। लेकिन प्रशासन के इस निर्णय ने यह साफ कर दिया कि विभाग की ओर से बांटे गए विज्ञापनों के घोटाले को ढकने के लिए सूचना विभाग से इतर अधिकारी को यह जहाँ घोटाले करने की छूट दे दी है वहीँ उसी को इन घोटालों को दबाने का अधिकार भी दे दिया है ताकि घोटाले सार्वजनिक न हो पायें और फाइलों में ही दफ़न होकर रह जाएँ ।
     यहाँ  हुए घोटालों का सबसे रोचक पहलू तो यह भी है कि  प्रदेश सरकार ने अब तक लगभग 90  करोड़ के विज्ञापन देश भर की मीडिया को इसलिए दे डाले ताकि आपदा के बाद मुख्यमंत्री की दागदार हो रही छवि को देश के सामने साफ़ सुथरी बनाकर पेश की जाये चाहे आपदा प्रभावित इलाकों में सरकार ने कोई कार्य किया हो अथवा नहीं . इस मामले में प्रदेश के सूचना विभाग में तैनात वित्त विभाग के इस अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी का किस तरह से निर्वहन किया इसकी एक बानगी यह है कि  जहाँ इस विभाग ने राज्य से प्रकाशित होने  वाले  पत्रों को डी ए वी पी से निर्धारित अथवा सूचना  निदेशालय से निर्धारित न्यूनतम दरों पर विज्ञापन जारी किये वहीँ देश अथवा राज्य से प्रसारित होने वाले चेनलों को विज्ञापन देने में न तो न्यूनतम दरों का ही ध्यान रखा गया और न डी ए वी पी से निर्धारित दरों का . इस समूचे प्रकरण में घोटाले की बू तब साफ़ आती  है जब प्रदेश में मात्र एक या आधा घंटे का स्लॉट लेकर चेनल चलाने वालों को राज्य में स्थापित 24 घंटे प्रसारित होने वाले चैनलों से  दो से तीन गुना अधिक रुपयों का पैकेज दिया गया।  इतना ही नहीं राज्य में मात्र एक आध स्थानों पर ही दिखाई देने वाले चैनलों  पर भी विभाग ने जमकर मेहरबानी की है वो भी व्यावसायिक दरों पर ।  ऐसे में सूचना  विभाग में वित्तीय अनियमितताओं को रोकने के लिए  वित्त विभाग के इस अधिकारी की जिम्मेदारी पर  भी सवालिया निशान लगता है जिसने सरकारी खजाने को मुक्त हाथों से लूटने दिया।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वित्त विभाग के इस गड़बड़ झाले की जानकारी कांग्रेस के तमाम आला नेताओं  द्वारा मुख्यमंत्री तक को की जा चुकी है लेकिन अब यह देखना होगा अब तक तमाम विवादित लोगों चाहे वह  आयुष विभाग के  रजिस्ट्रार का मामला रहा हो या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव या कोई अन्य को उत्तराखंड की धरती पर लाने  वाले मुख्यमंत्री इस मामले में क्या निर्णय लेते हैं इसका इंतजार प्रदेश की जनता कर रहीं है।



डीएवीपी दरों को दरकिनार कर व्यवसायिक दरों पर निर्गत हुए विज्ञापन
राजेन्द्र जोशी
 राज्य में आई भीषण आपदा के बाद प्रदेश सरकार ने लगभग 90 करोड़ के विज्ञापन समाचार पत्रों और इलैक्ट्रानिक चैनलों को मुख्यमंत्री की छवि सुधारने के लिए बांटे हैं। इतनी बड़ी रकम से मुख्यमंत्री की छवि भले ही सुधरी हो या न सुधरी हो, लेकिन प्रदेश की जनता की गाढ़ी कमाई और आपदा के बाद राज्य पर तरस खाने वाले लोगों द्वारा दान में दी गई एक बहुत बड़ी राशि पर यह डाका नहीं तो और क्या है, जबकि इस पैसे से प्रदेश के कई स्कूलों की छत, कई किलोमीटर सड़क, कई अस्पतालों में दवाईयां, कई गांवों को पेयजल और कई आपदा प्रभावित परिवारों को दो जून की रोटी दी जा सकती थी। वहीँ सरकारी जानकारी के अनुसार 30 सितम्बर तक इस मद में 23 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम खर्च कि जा चुकी है जबकि इससे तीन गुनी राशि का भुगतान अभी बाकी है
    यह जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में प्रदेश के सूचना विभाग ने हल्द्वानी निवासी आरटीआई कार्यकर्ता गुरविंदर सिंह चड्ढा को अपने पत्रांक 544/सू.एवं.लो.स.वि.(प्रशा)255/
2013 दिनांक 3 अक्टूबर 2013 को दी। प्रदेश सरकार द्वारा दिए गए जवाब में यह बताया गया है कि प्रदेश सरकार ने कुल 22 करोड़ 77 लाख 42 हजार पांच सौ दस रूपये के विज्ञापन आपदा के बाद दिए हैं। मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार ने 30 सितम्बर 2013 तक सहारा समय को 20 लाख 59 हजार 896 रूपये, टीवी-100 को 58 लाख 52 हजार 881 रूपये, साधना न्यूज 58 लाख 23 हजार 386 रूपये, चडदीकला टाईम टीवी को 33 लाख 28 159 रूपये, जैन टीवी को 17 लाख 69 हजार 670 रूपये, वाईस ऑफ नेशन को 57 लाख छहः
हजार 079 रूपये, श्री न्यूज चार लाख 13 हजार 91 रूपये, ए टू जेड न्यूज आठ लाख 23 हजार 150 रूपये, सी न्यूज सात लाख 58 हजार 431 रूपये और बुलंद समाचार न्यूज प्लस को 22 लाख 22 हजार 703 रूपये के विज्ञापन रेवड़ियों की तरह बांटे गए। जबकि इस सूचना में प्रदेश का प्रमुख न्यूज चैनल ईटीवी का जिक्र तक नहीं है। इतना ही नहीं सबसे बड़ा घोटाला तो इन चैनलों को विज्ञापन देने में सामने आया है, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भारत सरकार के दृश्य एवं प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) द्वारा नियत दरों से कई अधिक दरों पर इन चैनलों को विज्ञापन बांटे गए। जबकि सरकार द्वारा जारी विज्ञापनों को डीएवीपी द्वारा जारी दरों पर ही दिया जाना चाहिए था न कि व्यवसायिक दरों पर, लेकिन विज्ञापनों की बंदरबांट में सरकारी आदेशों और निर्देशों को भी ताक पर रखा गया। जिससे प्रदेश को करोड़ों रूपये का नुकसान भी हुआ है। वहीं मिली जानकारी के अनुसार ईटीवी को एक करोड़ 78 लाख 33 हजार 650 के विज्ञापन दिए गए हैं, जबकि इंडिया न्यूज को लगभग 50 लाख व देश के प्रमुख आज तक, इंडिया टीवी, आईबीएन 7 आदि का तो इस पत्र में जिक्र ही नहीं किया गया है, जबकि सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार लगभग 60 करोड़ रूपये के विज्ञापन इन सब को बांटे गए हैं। वहीं इसी पत्र में दी गई जानकारी के अनुसार 16 जून 2013 से 31 अगस्त 2013 तक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक समाचार पत्र-पत्रिकाओं को दो करोड़ 28 लाख 40 हजार 603 रूपये के विज्ञापन जारी किए गए, जबकि इस बीच पड़ने वाले महत्वपूर्ण कार्यक्रमों पर प्रदेश सरकार ने दो करोड़ 31 लाख 87 हजार 292 रूपये विज्ञापनों में खर्च कर ड़ाले, जबकि समाचार पत्रों के अनुरोध पर 41 लाख 50 हजार 51 रूपये के विज्ञापन जारी किए गए।
सबसे ज्यादा चौकाने वाली जानकारी तो यह है कि विज्ञापन के अलावा न्यूज डायरी के नाम से विभिन्न समाचार चैनलों को दिए गए पैसे का तो कहीं उल्लेख ही नहीं है। इससे यह साफ होता है कि प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री की छवि चमकाने के लिए प्रदेश की जनता की गाढ़ी कमाई पर किस तरह से हाथ साफ किया है। समाचार चैनलों व समाचार पत्रों को इतनी मोटी रकम दिए जाने का औचित्य तो सरकार ही जाने लेकिन इतनी मोटी रकम से आपदाग्रस्त इस प्रदेश के कुछ गांवों का तो भला हो सकता था। विज्ञापन के ऐवज में मोटी रकम की बंदरबांट ने यह भी साबित कर दिया है कि प्रदेश में सरकारी धन की किस तरह लूट मची हुई है। जहां प्रदेश की जनता खाद्यान्न के एक-एक दाने के लिए तरस रही है, आने वाली सर्दियांे में उसके पास ओढ़ने के लिए कम्बल और बिछाने के लिए बिस्तर नहीं है, सिर की छत आपदा लील गई, वहीं प्रदेश में अभी भी सैकड़ों गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है, अस्पताल और स्कूलों की तो बात ही कुछ और है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बच्चे आज भी स्कूलों के भवन जमींदोज होने के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और कई अस्पताल भी इस आपदा में समाप्त हो चुके हैं। ऐसे में सरकार की यह फिजूलखर्ची प्रदेश की भोली-भाली जनता के जेब पर डाका नहीं तो और क्या है।

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

अगले कुछ दिनों में अस्तित्व में आ जायेगा उत्तराखंड का लोकपाल विधेयक

देहरादून :  भ्रष्‍टाचार पर लगाम कसने वाले लोकायुक्‍त विधेयक को राष्ट्रपति ने उत्तराखंड में मंजूरी दे दी है। यह विधेयक भाजपा की बीसी खंडूरी सरकार के दौरान पारित हुआ था। एक-दो दिन में इसका नोटीफिकेशन जारी कर दिया जाएगा। नोटीफिकेशन के साथ ही यह प्रदेश में कानून के तौर पर लागू हो जाएगा। राष्ट्रपति को भेजा गया विधेयक का ड्राफ्ट अगर किसी संशोधन के बगैर मंजूर हुआ है तो अब राज्य के सरकारी दफ्तरों में कार्यरत चपरासी (चतुर्थ श्रेणी कार्मिक) से लेकर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर तक लोकायुक्‍त के दायरे में होंगे।
 चारों तरफ भ्रष्टाचार व सरकारी पैसे पर मौज करने के आरोपों से जूझ रही प्रदेश कि बहुगुणा सरकार के किये यह लोकपाल बिल प्रदेश में लागू करवाना खुद के लिए समस्या बन कर खड़ा होने वाला है क्योंकि राष्ट्रपति कि मंजूरी के बाद इसको लागू करना प्रदेश सरकार कि मज़बूरी बन गयी है .  प्रदेश में लागु होने वाले इस कानून के अधीन न्यायपालिका भी होगी जबकि हाईकोर्ट के जजों को इससे मुक्त रखा गया है। भाजपा सरकार में भुवनचंद्र खंडूरी ने दूसरी बार नेतृत्व संभालने के बाद अक्तूबर 2011 में मजबूत लोकायुक्‍त की घोषणा की थी और पखवाड़ेभर की मशक्कत में समाजसेवी अन्ना हजारे सहित अरविन्द केजरीवाल व साथियों के सहयोग से लोकायुक्‍त का ड्राफ्ट तैयार कर कैबिनेट में मंजूर कराया गया और फिर विधानसभा से पास करवा कर राज्यपाल को भेजा गया। तत्कालीन राज्यपाल मार्ग्रेट आल्वा ने भी ड्राफ्ट पर अपनी स्वीकृति देते हुए विधायी विभाग को भेज दिया था। इसके बाद विधायी विभाग ने नवंबर 2011 में विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया था। विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में करीब दो साल लग गए और बीती सितम्बर में यह पास होकर राज्य में लागु करने के लिए भेज दिया गया था लेकिन प्रदेश की नौकरशाही ने इसको सचिवालय कि फाइलों में धूल फांकने को छोड़ दिया था. जो उप लोकायुक्त की ताजपोशी के बाद बाहर निकल आयी.
 तत्कालीन भाजपा सरकार के शासन काल में पारित इस कानून के तहत लोकायुक्‍त का चयन एक चयन समिति करेगी इस समिति में सात सदस्य होंगे। चयन समिति द्वारा एक सर्च कमेटी बनाई जाएगी, जो आवेदन एकत्रित कर प्रत्येक पद के लिए तीन-तीन नामों का पैनल चयन समिति को मुहैया कराएगी। चयन समिति फिर लोकायुक्‍त की नियुक्ति करेगी। लोकायुक्त का कार्यकाल अधिकतम पांच साल अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरा हो) का होगा।
  लोकायुक्त के दायरे में मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्य, विधायक, उत्तराखंड के सभी राजकीय सेवक (सभी अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी सहित), पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व मंत्री, सेवानिवृत्त अधिकारी, स्थानीय निकाय के निर्वाचित सदस्य एवं कर्मचारी, सहकारी समितियों के निर्वाचित सदस्य एवं कर्मचारी, सार्वजनिक उपक्रम, निगम, विकास प्राधिकरण, परिषद, सरकारी कंपनी, आयोग, राज्य के विश्वविद्यालय और राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली संस्थाएं शामिल होंगी.
 इस कानून के लोकायुक्‍त का चयन जितना मुश्किल भरा है, उससे कहीं ज्यादा कठिन उसे हटाना है। विधेयक के मुताबिक लोकायुक्‍त के अध्यक्ष अथवा सदस्य को उसके पद से राज्यपाल द्वारा सुप्रीमकोर्ट की संस्तुति पर ही हटाया जा सकेगा।
लोकायुक्त को तभी हटाया जा सकेगा जब संबंधित के विरुद्ध दुर्व्यवहार अथवा कदाचार में दोषी पाया जाएगा। अथवा मानसिक और शारीरिक अस्वस्थता के कारण अपना कार्य करने में असमर्थ हो गया हो। दीवालिया घोषित हो गया हो या फिर अपने कार्यकाल अवधि में दूसरे किसी रोजगार में संलग्न हो गया हो।
वहीँ प्रमुख सचिव विधायी एवं संसदीय कार्य केडी भट्ट ने बताया कि यहां से भेजे गए लोकायुक्‍त विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। विधेयक देखने के बाद राष्ट्रपति की संस्तुति के मुताबिक एक-दो दिन में नोटीफिकेशन कर दिया जाएगा।

मुख्यमंत्री का काउंट डाउन शुरू : सामान पैक करने में कितना समय लगेगा : साहब आधा घंटा

राजेन्द्र जोशी
बीते दिन प्रदेश प्रभारी अम्बिका सोनी से प्रदेश के मुख्यमंत्री की  सिर्फ पांच मिनट की मुलाकात ने यह साफ़ कर दिया ही की अब विजय बहुगुणा प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ज्यादा दिन नहीं बैठ पायेंगे क्योंकि हवा का रुख भी कुछ इसी तरह का है और ये बात मुख्यमंत्री भी खुद समझ चुके है कि  अब वो ज्यादा दिन उस कुर्सी पर नहीं बैठ पाएंगे शायद तभी उन्होंने अपने आवास पर कर्मचारियों को भले ही मजाक के लहजे में कहा कि  यदि मेरा सामान पैक करना हो तो कितना समय लगेगा तो कर्मचारियों ने कहा साहब कुल आधा घंटा , कर्मचारियों के जवाब पर वो सकपकाते हुए बोले कि  बस इतना कम समय तो कर्मचारी बोले साहब आपके तो केवल कपडे ही तो यहाँ हैं बाकि तो सारा सामान सरकारी है। यह बात प्रमाणित करती है कि  ये वो भी मान चुके हैं कि  वे अब ज्यादा दिन मुख्यमंत्री नहीं रह पायेगे।
   उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद गुजरिश्ता 13  सालों में उत्तराखंड राज्य में सात  मुख्यमंत्री बन चुके हैं और एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सत्ता के गलियारों से ताजा हवा निकल रही है। लगातार मीडिया में सुर्खियां बन रहे इस मुददे पर मुख्यमंत्री कैंप का मौन, यह बताने के लिए काफी है कि नेतृत्व परिवर्तन का यह धुंआ बिना आग के हवा में यों ही नहीं तैर रहा है। दरअसल मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की ताजपोशी के बाद से ही विरोध के सुर तेज हो गये थे, किसी तरह एक साल पूरा हो पाया था कि जून मध्य में आये जल प्रलय ने सरकार को हिलाकर  दिया। हालांकि शुरूआती हीलहवाली के बाद राहत व बचाव कार्य तो कर दिया गया लेकिन इस दौरान सरकार की जो भूमिका रही, वो आपदा के पहले दिन से ही सवालों के घेरे में घिरी रही।
स्थानीय लोगों के पुर्नवास का मामला अधर में लटकना भी मुख्यमंत्री की नाकामी में गिना जा रहा है। यह मुददा आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर भारी पड सकता है। सरकार व संगठन के बीच के फासले व राज्य के बडे काग्रेसी नेताओं के बीच अपसी खींच तान ने मुखिया की परेशानी बढा दी है। शायद इस बात को समझते हुए ही नये निजाम को कुर्सी पर बैठाने की कवायद की जा रही है। लेकिन पांच राज्यों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो जाने के बाद फिल्हाल मुख्यमंत्री बहुगुणा को इस आफत से राहत मिलती दिखाई दे रही है।
विजय बहुगुणा उस राजनेता के राजनीतिक वारिश हैं जिसने हमेशा सिद्वातों की राजनीति की। हेमवतीनंदन बहुगुणा को कभी भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। अपने दम पर वो भारतीय राजनीति का केन्द्र रहे। लेकिन उनके पुत्र व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री के अब तक के कार्यकाल में कभी भी ऐसा नहीं दिखा कि वो एचएन बहुगुणा की विरासत से जुडे हैं। सरकार की कमान संभालने के बाद से शायद ही कभी बहुगुणा सरकार पटरी पर दौडती नजर आई हो। अफरसरशाही के हावी होने की बात की जाती रही है। कभी भाजपा सरकार में सर्वेसर्वा रहा एक अधिकारी इन दिनों कांग्रेस सरकार का थिंकटैंक बना हुआ है। देहरादून हो या दिल्ली यह ब्यूरोक्रेट मुख्यमंत्री बहुगुणा से चिपका दिखाई देता है। असल में मुख्यमंत्री बहुगुणा में राजनीतिक अनुभव की कमी के चलते सरकार न तो जनआकांक्षाओं पर खरी उतर पा रही है और नहीं पार्टी संगठन संतुष्ट हो पा रहा है। पार्टी संगठन से जुडे कुछ नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर गुस्सा शांत करने की कोशिश भी सरकार की छवि सुधारने में मददगार नहीं हो सकती है। इसके अलावा मुख्यमंत्री के सामने सबसे बडी चुनौति पार्टी के कददावर नेताओं को मनाने की है। जो शायद ही मनाये जा सकें।
अब सूबे में नये निजाम के आने की चर्चाएं जोर पकड रही हैं। हालांकि कांग्रेस हाईकमान की ओर से इस संदर्भ में ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है लेकिन कांग्रेस के पार्टी प्रभारी के इस मुददे पर चुप्पी साधने के चलते राजनीतिक समीक्षक अपनी अपनी ओर से अर्थ निकालने में लगे हैं। अब चूंकि पांच राज्यों का चुनाव कार्यक्रम चुनाव आयोग की ओर से घोषित कर दिया गया है ऐसे में अब उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की गुंजाइश वेहद कम नजर आ रही है। आठ  दिसम्बर को इन राज्यों में मतगणना होगी । इस बीच दिसम्बर माह में पंचायत चुनाव होने हैं। पंचायत चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री बदला जायेगा, इसमें संशय है। हां यह जरूर है कि त्रि स्तरीय पंचायत चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस यदि उम्मीदों के मुताबिक प्रर्दशन करने में नाकाम रही तो, एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की आवाज गुंजने लगेगी। दूसरी ओर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा खेमा भी यही उम्मीद पाले हुआ था कि किसी तरह पांच राज्यों का चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाय और सरकार इस दौरान आपदा प्रभावितों के पुर्नवास के साथ ही कुछ लोककल्याणकारी योजनाओं की घोषणा कर दी जाय, जिससे पार्टी को पंचायत चुनाव में लाभ मिल सके। यह बहुगुणा कैंप की अपनी रणनीति है।
पीडीएफ की भूमिका होगी महत्वपूर्ण: 
राज्य विधान सभा में सत्ताधारी कांग्रेस के 33 सदस्य हैं, जबकि 3  वहुजन समाज पार्टी व 4  निर्दलीय विधायकों का भी सरकार को समर्थन है। इस सबको मिलाकर वर्तमान समय में सरकार को 40  विधायकों का समर्थन है। विपक्षी भाजपा के राज्य विधानसभा में 30  सदस्य हैं। अंकों के खेल के लिहाज से सरकार को समर्थन दे रहे सात विधायकों की नेतृत्य परिवर्तन में अहम भूमिका रहेगी। भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पीडीएफ नहीं चाहता है कि इतनी जल्दी नेतृत्त में बदलाव हो। बहुगुणा कैंप को यूनाईटेड डेमोकेटिक फं्रट के सात विधायकों का भी सर्मथन है। फं्रट के नेता व सूबे के माध्यमिक शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी का कहना है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन से पहले फं्रट से उनकी राय भी पूछी जानी चाहिए। उनका यह कहना कहीं न कहीं मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए राहत अवश्य है।
तो क्या पंचायत चुनाव तक मिला है अभयदान:
लोगों की उम्मीदों पर खरा न उतरने के आरोप में घिरे मुख्यमंत्री बहुगुणा को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तक अभयदान मिल गया है। हालांकि विरोधी गुट की ओर से हर हाल में नेतृत्व परिवर्तन की बात को सही ठहराया जाता रहा। यहां तक की श्राद्घ पक्ष के तुरंत बाद मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चाएं खूब चली। वकायदा तिथि तक गिनाई जाने लगी, लेकिन चर्चाओं से आगे मामला नहीं बढा। अब कयास लगाये जा रहे हैं कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बदलना तय है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस को जोर का झटका लगेगा। सरकार की हर मोर्चे पर विफलता व पार्टी के अंदर शीर्षस्थ नेताओं के अंर्तविरोध के चलते विपक्षियों का काम आसान हो जायेगा। लेकिन सवाल फिर वही कि क्या त्रिसस्तरीय चुनाव में हार के बाद कांग्रेस हाई कमान सूबे में नेतृत्व परिवर्तन करेगा।

आखिर कहाँ बनेगा विधान भवन, कहाँ होगी स्थायी राजधानी

देहरादून : गैरसैंण का मामला उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का पीछा छोडऩे को तैयार नहीं है, देहरादून में दूसरा विधानसभा भवन तैयार करने की योजना को अंतिम रूप देते ही इस मसले को फिर से हवा मिलती दिख रही है। राज्य के आंदोलनकारियों को खुश करने के लिहाज से मुख्यमंत्री ने जनवरी में चमोली जिले के गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाने की नींव रखी थी। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने देहरादून में विधानसभा का दूसरा भवन बनाने के सरकार के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि सरकार को पहले राज्य की स्थायी राजधानी के मसले को सुलझाना होगा। देहरादून फिलहाल इस पहाड़ी राज्य की अस्थायी राजधानी है। कुंजवाल को केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत का समर्थक माना जाता है।
विधान सभा स्पीकर कुंजवाल ने  कहा कि सरकार को सबसे पहले स्थायी राजधानी का मसला सुलझाना चाहिए और उसके बाद विधान भवनों की ओर ध्यान देना चाहिए। कुंजवाल ने कहा, 'जहां तक बात विधानभवनों की है तो इन पर कोई भी फालतू खर्च नहीं किया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि अगर सरकार देहरादून में विधान सभा की इमारत बनाने की योजना बना रही है तो इसे राज्य के स्थायी राजधानी के मसले को भी सुलझाना चाहिए।Ó कुंजवाल गैरसैंण को राज्य की स्थायी राजधानी बनाना चाहते हैं। वह कहते हैं, 'अगर आप चाहते हैं कि देहरादून राजधानी बने तो विधानसभा यहां होनी चाहिए। लेकिन अगर आप गैरसैंण में विधानसभा भवन बना रहे हैं तो आपको राज्य की राजधानी के तौर पर उसकी स्थिति भी स्पष्ट करनी होगी।

कभी सड़क पर चला करो मुख्यमंत्री जी: केन्द्रीय राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह

राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 4 अक्टूबर। मुख्यमंत्री जी कभी सड़क से भी यात्रा किया करो, क्या अभी तक आप सड़क से कहीं गए हो, इस सवाल पर मुख्यमंत्री बगलें झांकने लगे। यह सवाल मुख्यमंत्री पर दागा केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह ने। रक्षा राज्य मंत्री ने सचिवालय के चतुर्थ तल पर स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय में यह सवाल दागा। इतना ही नहीं इस सवाल के बाद कुछ देर सन्न रहने के बाद मुख्यमंत्री बोले उपर से ही देखा है, किन्तु अब तो कुछ ठीक हो गई है सड़क। इस पर केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने फिर चुटकी लेते हुए कहा कि एक बार सड़क से जाकर देखिए तब कहीं आपको पता चलेगा कि स्थितियां क्या है। उस वक़्त वहां कई मंत्री व विधायक भी मौजूद थे , इस सारे वाक्ये से पहले मुख्यमंत्री सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के सड़क निर्माण कार्यों की सुस्त रफ्तार पर बीआरओ को कई बार जितेन्द्र सिंह के सामने कोस चुके थे, लेकिन जब जितेन्द्र सिंह ने उनसे ये सवाल किए तो उन्होंने अचानक यू टर्न ले लिया और वे भी जितेन्द्र सिंह के सुर में सुर मिलाने लगे। वहीं जितेन्द्र सिंह ने प्रैस वार्ता में बीआरओ की जमकर पीठ ही नहीं थपथपाई, बल्कि उन्होंने यह तक कहा कि आपदा के दौरान जिन विकट परिस्थितियों में बीआरओ ने काम किया है देश की कोई और एजेंसी नहीं कर सकती थी। वहीं मुख्यमंत्री को एक और असहज स्थिति का सामना तब करना पड़ा, जब पत्रकार वार्ता में यह सवाल उठा कि जब बीआरओ इतना अच्छा कार्य कर रही है, तो राज्य सरकार आखिर क्यांे उसकी मुखालफत कर रही है, इस पर जितेन्द्र सिंह के साथ बैठे मुख्यमंत्री बगलें झांकने लगे और सकपकाते हुए उन्होंने सफाई दी कि बीआरओ ने काबिले तारीफ काम किया है, इतना ही नहीं उन्होंने यहां तक कह दिया कि राज्य सरकार को बीआरओ से कोई शिकायत नहीं है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आपदा के बाद जब राहत कार्यों की समीक्षा बैठकें हुई, इन तमाम बैठकों में एक चर्चित प्रमुख सचिव सहित मुख्यमंत्री बीआरओ के सुस्त रफ्तार और उसकी कार्यप्रणाली पर शिकायत ही करते रहे, इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने तो कई बार बीआरओ के केंद्र के नियंत्रण में होने की बात कहकर अपना पल्ला भी झाड़ा था। मुख्यमंत्री के अचानक बदलें सुरों से पत्रकार वार्ता में मौजूद बीआरओ अधिकारियों की समझ में यह माजरा नहीं आया कि आखिर मुख्यमंत्री के सुर अचानक क्यों बदल गए हैं।

उत्तराखंड शहीदों का सपना नहीं हुआ साकार: कुंजवाल

मुजफ्फरनगर। विधानसभा उत्तराखंड के अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा कि 'जल, जंगल, जमीन व जवानी' बचाने का जो सपना उत्तराखंड पृथक राज्य की लड़ाई के वक्त शहीदों ने देखा था, वह आज तक साकार नहीं हो सका है। उत्तराखंड में आने वाली सरकारें तरक्की की सही नीति नहीं बना सकीं। उत्तराखंड गठन के बाद पर्वतीय इलाकों के विकास का मकसद पूरा नहीं हुआ।
बुधवार को विस अध्यक्ष ने शहीद स्मारक पहुंचकर रामपुर तिराहा कांड के शहीदों को श्रद्धाजंलि अर्पित की। मुजफ्फरनगर के रामपुरम में पत्रकार संजीव चौधरी के आवास पर पत्रकारों से बातचीत में विधान सभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सोच सभी को साथ लेकर देश की तरक्की करने की थी। उनके सिद्धांत अपनाकर देश में असमानता की खाई पाटी जा सकती है।
उत्तराखंड पृथक राज्य गठन में शहीदों के बलिदान को याद करते हुए कहा कि 'जल, जंगल, जमीन, जवानी' बचाने के नारे के साथ राज्य गठन की लड़ाई लड़ी गई थी। शहीदों की शहादत के कारण अलग प्रदेश जरूर मिल गया, लेकिन तरक्की का जो सपना शहीदों ने देखा था, वह आज तक प्रदेश की सरकारें साकार नहीं कर सकीं। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में विकास के लिये नीति तैयार हुई थी, लेकिन बाद की सरकारें सुस्त पड़ गई।
सबसे पहले उत्तराखंड के युवाओं के बढ़ते पलायन को रोजगार परक नीति बनाकर रोकना होगा। आम आदमी की आर्थिक आमदनी बढ़ाने को कदम उठाना होगा। उन्होंने पृथक राज्य की मांग को दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर बर्बरता को दुखद बताते हुए कहा कि रामपुर तिराहा कांड के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बनाये रखने के लिये अपराधिक लोगों के प्रवेश को बंद करना होगा।

राहुल ने कसा तंज: साकेत या राकेश शर्मा क्यों नहीं हो सकते उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री

राजेन्द्र जोशी
देहरादून  । साकेत या राकेश शर्मा में से किसी एक को बना दिया जाए उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री, क्योंकि ये उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि देश भर में चर्चाओं में है, यह कहना है कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का। पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 18 सितम्बर को जब उत्तराखण्ड की विधानसभा अनुदान मांगों को लेकर चल रही थी, तो अचानक मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सदन से उठकर दिल्ली चले गए। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 11 बार राहुल गांधी से मिलने का समय न मिल पाने के बाद आखिरकार उनको बारहवीं बार राहुल गांधी ने उनको समय दिया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने प्रदेश में आई आपदा के बाद किए गए कार्यों का ब्यौरा उनके सामने रखा, लेकिन राहुल गांधी ने उनके इस ब्यौरे पर कोई खास टिप्पणी नहीं की। बल्कि उन्होंने कहा कि इस छोटे से प्रदेश में आखिर कितने मुख्यमंत्री हैं, उन्होंने मुख्यमंत्री को फटकार लगाते हुए कहा कि उत्तराखण्ड में आपके कुर्सी संभाले जाने के बाद कई और भी मुख्यमंत्री हो गए हैं, जिनमें साकेत बहुगुणा और राकेश शर्मा तो हैं ही साथ ही कोई बता रहा है कि इलाहाबाद से सरकार चल रही है तो कोई यह बताता है कि दिल्ली से उत्तराखण्ड की सरकार चल रही है। राहुल गांधी यहीं पर चुप नहीं हुए, उन्होंने मुख्यमंत्री को कहा कि सुलतानपुर और सितारगंज से भी प्रदेश की सरकार चल रही है। सूत्रों ने तो यह भी बताया है कि राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री को यह भी कहा कि उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री निवास क्या केवल देखने भर के लिए है, वहां की जनता की कांग्रेस से कितनी अपेक्षाएं हैं, उसका किसी ने ध्यान रखा है। राहुल गांधी ने प्रदेश की आपदा की पीड़ा को आत्मसात किया है और प्रदेश के मुख्यमंत्री को आपदा राहत कार्यों पर कागजों में राहत कार्य देने के बजाए जमीनी हकीकत में राहत कार्यों के साथ पुर्ननिर्माण और पुर्नस्थापन के कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाने की हिदायद भी दी।
    कुल मिलाकर राहुल गांधी ने प्रदेश की स्थिति को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री को नैतिकता का पाठ भी पढाया है, यह मुख्यमंत्री के कितने समझ में आया यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन कुल मिलाकर राहुल गांधी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के अब तक के कार्यों से खुश नहीं बताए जा रहे हैं।

प्रदेश में नेतृत्व को लेकर राजनैतिक अस्थिरता के माहौल

राजेन्द्र जोशी
देहरादून  । उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चायें एक बार फिर से तेज हो गई हैं। सरकार के साथ और सरकार के विरोधी विधायक लगातार घटनाओं पर नजर रखे हुये हैं। दोनों ही गुट अपने-अपने दावे कर रहे हैं। इस बीच कांग्रेस ने प्रदेश में सरकार के कामकाज को लेकर सर्वे भी कराया है। राज्य कांग्रेस के कई दिग्गज नेता इस बीच सक्रिय हो गये हैं और-अपने अपने पक्ष में लॉबिंग भी करने लगे हैं।
    उत्तरखंड कांग्रेस में एक बार फिर से गुटबाजी तेज होती हुई दिखाई दे रही है। दिल्ली में उत्तराखंड की राजनीति और सरकार का भविश्य तय करने की खबरें पिछले कई दिनों से चल रही है। खबर है कि आलाकमान उत्तरखंड में बहुगुणा सरकार की कार्यशैली और बेलगाम अफसरशाही से काफी नाराज है। यही वजह है कि बहुगुणा सरकार पर खतरा दिख रहा है। वहीं बदलते घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री के करीबी नरेन्द्र नगर विधायक सुबोध उनियाल का कहना है कि इस तरह की खबरेें लगातार आती रही हैं और जो लोग एसी खबरों को हवा दे रहे हैं उनको इस बार भी मुंह की खानी पड़ेगी।
    वहीं प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का कहना है कि बहुगुणा के सहयोगी और विरोधी इससे पहले अपनी बात आलाकमान तक पंहुचाने के लिए एक गुट लेकर दिल्ली का दौरा कर चुके हैं। नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच विरोधी खेमा भी एसी खबरों के आते ही सक्रिय हो गया है। नेतृत्व परिवर्तन की खबरें आने के बाद उत्तराखंड के दिग्गज कांग्रेसी भी अपने अपने पक्ष में लॉबिंग करने में जुट गये हैं। इस बीच कांग्रेस पार्टी राज्य के हालात पर जनता का मूड़ भापने के लिए लगातार सर्वे करा रही है।
    उत्तराखंड में हो रहे कांग्रेस पार्टी के सर्वे के रिजल्ट ही बहुगुणा सरकार का भग्य तय नहीं करेंगें, इसके लिए दिल्ली दरबार से हरी झंडी मिलना भी बेहद जरूरी है। अब देखना ये होगा कि उत्तरखंड की राजनीति अगले कुछ दिन किस दिशा में चलती है। वहीं विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने आलाकमान के सामने यह दलील दी है कि उनको हटाए जाने के बाद निर्दलीय विधायकों द्वारा दिया जा रहा समर्थक कांग्रेस को नहीं मिलेगा। वहीं सूत्रों का यह भी दावा है कि बहुगुणा के करीबी सरकार बनाने में मददगार रहे उन निर्दलीय विधायकों जिनको मंत्री का दायित्व दिया गया है पर पैनी नजर रखे हुए हैं, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि जिन निर्दलीय समर्थकों के दम पर कांग्रेस ने सरकार बनाई थी भाजपा में सरकार द्वारा प्रदेश में सरकार बनाने के दावे के बाद वे निर्दलीय चार विधायक ही नहीं बल्कि कुछ अन्य विधायक भाजपा के संपर्क में हैं।
    कुल मिलाकर प्रदेश में एक बार फिर राजनैतिक अस्थिरता के माहौल व्याप्त है। विधानसभा से लेकर सचिवालय तक सोमवार प्रातः कार्यालय खुलने से लेकर सांय तक प्रदेश में सरकार को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म था।

बहुगुणा और आर्य पर श्राद्ध पक्ष समाप्ति के बाद कभी भी गिर सकती हैं गाज़

देहरादून।  7  अगस्त 2013  को हमने ये  खबर की थी कि  15 अगस्त के बाद कभी भी छिन  सकती है मुख्यमंत्री की कुर्सी अब सही होने जा रही है  ... उत्तराखंड में जून में आई आपदा ने इस पर्वतीय प्रदेश की सियासत को गर्म कर दिया था, आपदा इतनी भीषण थी की केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व ने उत्तराखंड सरकार और वहां के मुख्यमंत्री को आपदा से निपटने के लिए पूरी छूट दे दी थी, पूरे देश ने इस आपदा से निपटने में वहां की सरकार का पूरा साथ दिया। लाखो लोग उत्तराखंड आपदा से प्रभावित हुये, चार धाम यात्रा भी पूरी तरह से रोक दी गई। उत्तराखंड में आई उस विनाशलीला में बाबा केदारनाथ का धाम और पूरी केदारघाटी तबाह हो गई।
कांग्रेस नेतृत्व ने मुख्यमंत्री वजय बहुगुणा को आर्थिक, सैन्य बल और सिस्टम सपोर्ट देकर आपदा प्रभावित लोगो को राहत पहुंचाने के लिए हर सम्भव मदद की थी इस बीच विजय बहुगुणा की सुस्ती और उनके काम करने के तरीके को लेकर भी सवालिया निशान लगने शुरू हो गए। वही बहुगुणा सरकार में शामिल उन्ही के सहयोगी उनके लिए गड्ढा खोदने का काम करने लगे। आपदा के समय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की निष्क्रियता को लेकर स्थानीय कांग्रेसियों ने कांग्रेस नेतृत्व और आलाकमान सोनिया गांधी के सामने उनकी बखिया उधेड़ कर रख दी।
विजय बहुगुणा के विरोधियों का नेतृत्व खुद केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत ने किया वजह साफ़ थी जिस तरह विधानसभा चुनावों के बाद विजय बहुगुणा ने अपने ब्राह्मण होने का फायदा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने के लिए उठाया था वो हरीश रावत को नागवार गुजरा था, विधानसभा चुनावों के बाद अगर विजय बहुगुणा कांग्रेस आलाकमान से अपनी नजदीकियों का फायदा उठाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुये थे उसने अन्दर ही अन्दर हरीश रावत गुट को आंदोलित कर दिया था।
हरीश रावत इस आपदा के बहाने विजय बहुगुणा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छिनने की पूरी तैयारी कर चुके थे लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने आपदा को प्राकृतिक आपदा मान कर उन्हें जीवनदान दे दिया था। विजय बहुगुणा भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपदा के राहत कार्य के साथ साथ पार्ट के अन्दर उठ रहे विरोध के स्वर को थामने पर भी लगे थे, इसी बीच उन्ही के मंत्रिमंडल के हरक सिंह रावत ने उत्तराखंड की राजनीति को अस्थिर करने के लिए नई राजनीतिक चाल चली जिसमें उन्होंने कांग्रेसी विधायको का मन टटोलने के लिए अपने आवास पर एक डिनर पार्टी आयोजित की थी जिसमें ऐसी घटना घटी जिसने हरक सिंह रावत की मुख्यमंत्री की कुर्सी हलाने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
हरक सिंह रावत की इस डिनर पार्टी के दौरान हुई फायरिंग में दो लोगो के जख्मी हो गए| कांग्रेस के खानपुर विधायक और वन विकास निगम के अध्यक्ष कुंवर प्रणव सिंह के चैंपियन पर गैरकानूनी फायरिग करने का आरोप हैं| कृषि मंत्री ने के यहाँ आयोजित इस भोज में प्रदेश के कई बड़े-बड़े मंत्री और विधायक शिरकत करनें पहुंचे थे। करीब 9 बजे खानपुर विधायक और वन विकास निगम के अध्यक्ष कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन भी समारोह में सम्मलित होनें पहुंचे प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हरक सिंह रावत से मुलाकत करनें के बाद उन्होंने हवाई फायर किये| इसके बाद कुंवर सिंह चैंपियन नें डाइनिंग हॉल में जाकर भी हवाई फायरिंग का प्रदर्शन किया। इसी दौरान एक गोली छिटकर कांग्रेस नेता विवेकानंद खंडूरी के पाँव में जा लगी और दूसरी गोली हरिद्वार के नेता रवींद्र सैनी को लगी।
हरक सिंह रावत की इस डिनर पार्टी में खुद मुख्यमंत्री भी शामिल होने वाले थे लेकन उसके पहले ही हुई इस फायरिंग ने बहुगुणा के कार्यक्रम को रद्द करा दिया साथ ही हरक सिंह की मुख्यमंत्री बनने के सपने को भी तोड़ दिया था। हरक सिंह रावत स पार्टी के बहाने अपनी ताकत दिखाना चाहते थे। दिल्ली दरबार से आ रही ख़बरों के मुताबिक लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस नेतृत्व उतराखंड में परिवर्तन के संकेत दे चुका है, विजय बहुगुणा इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे है वही उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी और राजनीतिक विरोधी उनकी कुर्सी के पाये उखाड़ने पर लगे हुये है।
विजय बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्या से भी उनकी प्रदेश की अध्यक्षी वापस ली जा रह है कांग्रेस ने उनको हटाने के लिए एक व्यक्ति एक पद का फार्मूला दिया है। लोकसभा चुनाव से पहले उतराखंड में भारी बदलाव देखने को मिलेगा कुछ नेता जोड़तोड़ भी करते मिलेंगे तो कुछ के सपने उनके द्वारा किये जा रहे गलत कामों की वजह से टूटेंगे। कांग्रेस नेतृत्व किस पर भरोसा दिखाती है साथ ही किसका भाग्य बाकी नेताओं पर भर पड़ता है ये उतराखंड की राजनीति में मची उथल पुथल के शांत होने के बाद ही सामने आयेगा। लेकन ये तो तय है कि विजय बहुगुणा के सर से ताज उतरने वाला है।
http://devbhoomimedia.blogspot.in/2013/08/15.html

सियासी तूफान में CM की कुर्सी

देहरादून  :   बीते कई दिनों से प्रदेश में मुख्यमंत्री बदलने की चर्चाएं जोरों पर हैं। इन चर्चाओं से सियासी तूफान भी उठ खड़ा हुआ है।
बिना आग के धुआं नहीं उठता, इस बात को ध्यान में रखा जाए तो प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के पीछे कहीं न कहीं कोई बात जरूर है। मुख्यमंत्री विगत दिवस भी अचानक दिल्ली गए। बहाना इंटरनेशनल स्टेडियम की गवर्निंग बाडी की बैठक का था।
मगर दूसरी तरफ प्रदेश के खेल मंत्री दिनेश अग्रवाल देहरादून में ही नगर निगम की बैठक में व्यस्त है। जिन्हें असल में बैठक के लिए दिल्ली जाना चाहिए था।

हाईकमान की नाराजगी

इन दिनों चर्चाएं हैं कि प्रदेश में सीएम बदलने की कवायद चल रही है। हाईकमान की नाराजगी को इसके पीछे वजह बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, ये नाराजगी प्रदेश में आई आपदा राहत कार्यों को लेकर भी है।
शायद यही वजह भी रही कि बीते दिनों मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा विधानसभा सत्र के बीच में ही अचानक दिल्ली रवाना हो गए। बताया गया कि दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को दैवी आपदा और राहत कार्यों की रिपोर्ट दी।

स्टेडियम की गवर्निंग बाडी की बैठक

संशय इस बात को लेकर भी है कि जब ये रिपोर्ट दो दिन बाद भी दी जा सकती थी, तो फिर अचानक ये कदम क्यों उठाया गया।
चर्चाओं को तब फिर हवा मिली जब एक पखवाड़े के दौरान बीते शुक्रवार भी सीएम का दिल्ली जाने का अचानक कार्यक्रम बना। हालांकि, रविवार को वहां पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में स्टेडियम की गवर्निंग बाडी की बैठक की भी बात सामने आई।
हजम नहीं हुआ, आपदा संबंधी बैठक में न जाना
पिछले दिनों प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली आपदा संबंधित बैठक में मुख्यमंत्री का न जाना भी किसी को हजम नहीं हुआ। दिल्ली से जुड़े सूत्रों की माने तो ऐन वक्त पर सीएम को दिल्ली आने से मना कर दिया गया।
समर्थक विधायकों ने भी लगाई थी दिल्ली दौड़
कुछ ही दिन पहले मुख्यमंत्री समर्थक आधा दर्जन विधायकों का दिल्ली में सरकार की पैरवी के लिए तीन दिन तक डेरा डाले रहना भी चर्चाओं में रहा। हद तो तब हुई जब इन्हें किसी बड़े नेता ने मिलने का समय तक नहीं दिया। वहीं, पिछले दिनों विधानसभा सत्र समाप्त होते ही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री और हरिद्वार सांसद हरीश रावत के समर्थक विधायक भी दिल्ली कूच कर गए थे।
...करना पड़ा सीएम के पक्ष में खड़े होने का ऐलान
सरकार को समर्थन दे रहे पीडीएफ (प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट) के विधायकों की बैठकों ने भी इस सियासी तूफान को हवा दी। इन विधायकों के बहुगुणा के पक्ष में खड़े होने के ऐलान ने तो साफ कर दिया कि कहीं कुछ ना कुछ बात तो है।