मंगलवार, 9 जुलाई 2013

ब्यूरोक्रेट और भूमाफियाओं का गठजोड़ राज्य के नदी नालों की जमीन खुर्दबुर्द करने पर जुटा

cocacola plant jameenब्यूरोक्रेट और भूमाफियाओं का गठजोड़ राज्य के नदी नालों की जमीन खुर्दबुर्द करने पर जुटा
राजेन्द्र जोशी
देहरादून,23 अप्रैल। ब्यूरोक्रेट और भूमाफियाओं का गठजोड़ अब राज्य के नदी नालों की जमीन खुर्दबुर्द करने पर जुट गयी है। यह प्रक्रिया राज्य के पर्वतीय जनपदों की अपेक्षा मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर तथा नैनीताल जनपद में तेजी से जारी है।
       लगभग 65 फीसदी वनाच्छादित उत्तराखंड राज्य में मात्र 13 फीसदी कृषि भूमि सरकारी आंकड़ों के अनुसार है। वननीति 1988 के अनुसार राज्य में वनों का घनत्व 67 फीसदी होना चाहिए। इसके अनुसार मैदानी क्षेत्र में एक तिहाई व पहाड़ी क्षेत्र में दो तिहाई वन क्षेत्र है, जो सकल वन क्षेत्र का मात्र 45 फीसदी ही बैठता है। यदि इन आंकड़ों पर भरोसा किया जाए तो राज्य में 15 फीसदी से अधिक सघन वन क्षेत्र नहीं है, जिस वन क्षेत्र का आकलन किया गया है वह छितरा वन क्षेत्र है। राज्य में सरकारी आंकड़ांे के अनुसार नदी नालों और खालों में 10 से 15 फीसदी से अधिक भूमि है जिस भूमि पर राज्य में तैनात ब्यूरोक्रेट और भूमाफियाआंे की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है।
             एक जानकारी के अनुसार राज्य में अधिकारियों और भूमाफियाओं के गठजोड़ ने सरकारी जमीन को खुर्दबुर्द कर पैसा बनाने का एक नया तरीका ईजाद कर दिया है। जानकारों के अनुसार भूमाफियाओं को इस कार्य में लेखपाल से लेकर उच्च अधिकारियों तक का पूरा साथ मिलता है। इनके अनुसार गठजोड़ सबसे पहले नदी नालों की जमीन को किसी परिचित अनुसूचित जाति के व्यक्ति के नाम पटटे पर दे देता है और कुछ समय बाद यह गठजोड़ इस जमीन की एवज में अनुसूचित जाति के व्यक्ति को कुछ पैसा दे कर यह भूमि अपने नाम पंजीकृत करवा लेता है। इसका ज्वलंत उदाहरण राजधानी क्षेत्र के डिफेंस कालोनी स्थित गौरादेवी पार्क के नाम से आरक्षित उस तालाब का मामला है जिसका शिलान्यास भाजपा शासनकाल में लाखों रूपये के सब्जबाग दिखा कर एक अत्याधुनिक पार्क के रूप में विकसित करने का था, लेकिन भूमाफियाओं और अधिकारियों के गठजोड़ ने इस तालाब को मिटटी से भर कर व बेच कर  उस पर भवन बनाना शुरू कर दिया है। यह तो एक उदाहरण मात्र है राजधानी सहित तराई क्षेत्र में सरकारी नदी व नालों के जमीनों को इसी तरह खुर्दबुर्द किया जाना बदस्तूर जारी है।
          जानकारों का कहना है कि भूमाफियाओं और अधिकारियों का गठजोड़ यदि उत्तराखंड राज्य की जमीनों सहित नदी नालों को दीमक की तरह चाटता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब राज्य के पास किसी उद्योग को लगाने के लिए एक इंच की जमीन नही बचेगी।