बुधवार, 17 जुलाई 2013

बिगडती छवि के बाद सरकार ने छेड़ा ऑपरेशन ‘मीडिया मैनेजमेंट’

बिगडती  छवि  के  बाद सरकार ने छेड़ा ऑपरेशन ‘मीडिया मैनेजमेंट’
सूचना निदेशालय ने संभाली कमान
बंटने लगी मोटे पैकेजों की सौगात
जोर पकड़ रहा बंदरबांट का खेल
देहरादून। उत्तराखंड में आपदा की दर्दनाक दास्तान में अब एक और अध्याय जुड़ेगा। इसका वास्ता न तो आपदा से होगा और न ही पीड़ितों से। हो भी क्यों, आखिरकार सवाल सरकार की छवि को बचाने का जो है। बात होगी तो सिर्फ गुणगान की। इसलिए, सरकार ने ऑपरेशन ‘मीडिया मैनेजमेंट’ भी छेड़ दिया है। संकट की इस घड़ी में लाखों-करोड़ों  फूंक कर मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया को मैनेज किया जा रहा है। राहत व बचाव के मोरचे पर सरकार भले नाकाम साबित हुई है, लेकिन इस ऑपरेशन का असर बड़ी तेजी से हो रहा है। न्यूज चैनलों के सुर बदलने लगे हैं। सरकार को खरी-खोटी सुनाने वाले कई चैनल अब सरकार की स्तुतिगान का पहाड़ा पढ़ रहे हैं। इसके बदले मोटे पैकेजों की सौगात बांटी जा रही है। इस ऑपरेशन की कमान राज्य सूचना निदेशालय ने संभाली है।
राज्य में आसमान से बरसी भीषण तबाही के भयावह सच से शायद ही कोई अछूता है। तबाही से पहले और इसके बाद राज्य सरकार की संजीदगी और सतर्कता की पोल खुल चुकी है। सरकार प्रदेश ही नहीं देशभर में निशाने पर है। उसे जगह-जगह का जन विरोध झेलना पड़ा है। कांग्रेस हाईकमान खुद इस मुद्दे पर खफा है। आपदा की कवरेज के लिए मची होड़ में न्यूज चैनल भी तीखे तेवरों के साथ सरकार को खूब खरी-खोटी सुना चुके हैं। तबाही के इस दौर में राज्य सरकार की छवि को खासा बट्टा लग चुका है। खराब होती छवि व कामकाज पर लगातार उठते सवालों को थामने के लिए कांग्रेस ने एक साथ कई मोरचे खोल दिए हैं। केंद्र से प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी व वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा जैसे दिग्गज कांग्रेसी दून पहुंचकर दिखावे के लिए ही सही सरकार की पीठ थपथपा रहे हैं। कांग्रेसी राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के कई केंद्रीय नेता भी इस मोरचे में पीछे नहीं है। लेकिन, इससे एक कदम और आगे बढ़ते हुए अब राज्य सरकार ने ऑपरेशन ‘मीडिया मैनेजमेंट’ भी छेड़ दिया है। इस ऑपरेशन के जरिये सरकार मीडिया खासकर न्यूज चैनलों को मैनेज करने की कोशिश में है और इसमें उसे शुरूआती कामयाबी भी मिलती दिख रही है। पहले आपदा और फिर राहत व बचाव ऑपरेशन का हवाला देकर सरकार की धज्जियां उड़ाते आ रहे न्यूज चैनलों में से कई के तेवर नरम पड़ते दिख रहे हैं। उनके सुर बदल गए हैं। सरकार की सुस्ती पर निशाना साधने वाले कई चैनल अब उसकी इमेज बिल्डअप करते दिख रहे हैं। संकट की इस घड़ी में मुख्यमंत्री के साक्षात्कार भी मैनेज किए जा रहे हैं। हैरानी की बात है कि इन साक्षात्कारों में हकीकत बयां कर सरकार पर आग उगलते आ रहे न्यूज चौनल अब खुद ही मुख्यमंत्री का गुणगान करने में पीछे नहीं है। एक भी दिन आपदा प्रभावित क्षेत्र में कैम्प न करने वाले मुख्यमंत्री को बहादुर व जुझारू बताकर आपदा से डटकर मुकाबला करने वाला सुलझा हुआ राजनेता बताया जा रहा है। उत्तराखंड में खुद को अग्रणी बताने वाले एक न्यूज चैनल ने इसकी शुरूआत कर दी है और अब जल्द ही अन्य चैनल भी यही गुणगान करते दिखेंगे। सूत्रों के अनुसार मीडिया मैनेजमेंट के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया गया है। न्यूज चैनलों को मोटे पैकेज देकर सरकार की नकरात्मक नहीं सकारात्मक छवि पेश करने के लिए मैनेज किया जा रहा है। यह पैकेज तीन-पांच लाख से शुरू होकर पंद्रह-बीस और पच्चीस-तीस लाख तक पहुंच सकते हैं। ऑपरेशन की कमान संभालने वाले सूचना निदेशालय की भूमिका इसमें अहम है। निदेशालय में जिसकी जितनी पैठ, उतना बड़े पैकेज की सौगात उसके नाम। इस बहती गंगा में हाथ धोने और चहेतों का फायदा पहुंचाने में कई प्रभावशाली नौकरशाह भी पीछे नहीं है। बताया जा रहा है कि इस ऑपरेशन के तहत निदेशालय न्यूज चैनलों के खबरनवीसों की खातिरदारी में कोर कसर नहीं छोड़ रहा। ये मीडियाकर्मी ड्यूटी अपने चैनल की बजा रहे हैं और पगार भी वहीं से ले रहे, लेकिन इनकी सुख-सुविधाओं का ख्याल निदेशालय रख रहा है। कवरेज में सहयोग के नाम पर मीडियाकर्मियों पर निदेशालय पूरी तरह मेहरबान है। सरकार के मंत्री भी मीडिया में वाहवाही लूटने के लिए हवाई सर्वेक्षण के नाम पर मीडियाकर्मियों को अपने साथ उड़नखटोलों में फर्राटा भरने में पीछे नहीं है।जबकि प्रभावित क्षेत्रों में लोग हैलीकाप्टर की कमी से नीचे नहीं उतारे जा रहे हैं। एक तीर से दो निशाने साधे जा रहे हैं। मोटे पैकेज के जरिये प्रबंधन को तो सुख-सुविधाएं मुहैया करा उनके कारिंदो को संतुष्ट करने का प्रयास है। ऑपरेशन ‘मीडिया मैनेजमेंट’ के दायरे में हालांकि, प्रिंट मीडिया को भी लाया गया है। लेकिन, धन खच करनेे की यदि बात करंे तो न्यूज चैनलों के मुकाबले अखबारों पर खर्च हो रहा बजट कहीं भी नहीं ठहरता। इसलिए, विवाद से बचने के लिए प्रिंट मीडिया को सिर्फ दिखावे भर के लिए शामिल किया गया है, ऑपरेशन पर खर्च होने वाली बड़ी राशि न्यूज चैनलों पर ही लुटाने की तैयारी है। इस पूरी कवायद के पीछे मकसद संकट के इस दौर में मीडिया की तीखी आलोचनाओं पर लगाम लगाकर सरकार की गिरती साख को पटरी पर लाना है। अब देखना यह है कि सरकार का यह ऑपरेशन अपना असर किस तरह दिखाता है। इस ऑपरेशनों के जरिये सरकार कितनों को मैनेज कर पाती है, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है।