शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

राहत सामग्री के ढेर के बीच पीड़ित बेहाल


यूनाईटेड युवा फोर्स - मिशन उत्तराखंड आपदा राहतराहत सामग्री के ढेर के बीच पीड़ित बेहाल


डॉ. सुशील उपाध्याय

पूरा देश राहत-सामग्री भेज रहा है, लेकिन उत्तराखंड का सरकारी तंत्र इसे स्वीकार करने में ही आनाकानी कर रहा है। आपदा के दो सप्ताह बाद भी सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो राहत सामग्री को पहाड़ के उन
                                                         फोटो:-  यूनाईटेड युवा फोर्स - मिशन उत्तराखंड आपदा राहत के सदस्य
लोगों तक पहुंचा सके जो अब भी जिंदगी-मौत के बीच झूल रहे हैं। एक ओर, उत्तराखंड में राहत-सागग्री से भरे ट्रकों की जहां-तहां भरमार हो गई जबकि, दूसरी तरफ आपदा का शिकार हुए लोग अब भी जिंदगी के जरूरी संरजामों के लिए बाट जोह रहे हैं।
उत्तराखंड त्रासदी में जिंदा बचे उन सभी लोगों को अब सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया है जो दूसरे प्रदेशों से यहां आए थे। अब, स्थानीय लोग और उनकी मुसीबतों के पहाड़ यहां मौजूद हैं। पूरा देश मदद भेज रहा है, लेकिन उन लोगों तक पहुंच ही नहीं पा रही है, जिन्हें इसकी तत्काल जरूरत है। उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों में खाद्य वितरण प्रणाली भी ठप हो गई है। इस आपदा में सार्वजनिक खाद्य वितरण की 600 से अधिक दुकानें बंद हो गई हैं क्योंकि उन तक राशन नहीं पहुंच रहा है। 
सरकारी आंकड़े को सही मान लें तो 200 गांवों के लोगों को तत्काल मदद की जरूरत है। वैसे, गंभीर रूप से प्रभावित होने वाले गांवों की संख्या 200 से कहीं अधिक है। इनमें से 16 गांव ऐसे हैं जहां कई दिन से खाना उपलब्ध नहीं है। मदद के मामले में दो बड़ी बातें सामने आ रही हैं। एक, लोगों द्वारा जो मदद भेजी जा रही है, वह उपयोगी नहीं है। मसलन, गर्मी के दिनों में मैदानी क्षेत्रों में पहने वाले कपड़े, खाने का पैकेट, ब्रेड-बिस्किट का कोई उपयोग नहीं है। वजह यह है कि आपदा वाले इलाकों में इस वक्त ठंड है। वहां पुराने कपड़ों की बजाय यदि कंबल भेजे जाएं तो वे ज्यादा उपयोगी होंगे। कुछ भावुक और संवेदनशील लोग फल भी भेज रहे हैं, लेकिन वे रास्ते में ही सड़ जा रहे हैं। इनके स्थान पर फूड सप्लीमेंट के पैकेट भेजें तो वे लंबे समय तक काम आ सकेंगे और ज्यादा उपयोगी भी रहेंगे।
सरकार बता रही है कि 20 हजार मकान ध्वस्त हुए हैं। इसका दूसरा अर्थ यह है कि 20 हजार से ज्यादा परिवारों के पास दैनिक जिंदगी चलाने के न्यूनतम साधन भी नहीं हैं। इन्हें सामान्य घरों में रसोई में काम आने लायक बर्तनों के सेट की जरूरत है। इसके अलावा यदि हजार-दो हजार टेंट तंबू का इंतजाम भी हो जाए तो लोगों को तात्कालिक तौर पर ही सही, लेकिन बड़ी मदद मिल जाएगी। पीड़ितों को पैक्ड या तैयार खाने की बजाय राशन के ऐसे पैकेटों की जरूरत है जिसमें आटा, चावल, मिली-जुली दालें, घी या तेल का पैकेट, सूखा दूध, नमक-हल्दी, मोमबत्ती, माचिस, टॉर्च और चाय की पत्ती का पैकेट शामिल हो। राशन इतना जरूर हो जिसे चार लोगों का परिवार न्यूनतम दो सप्ताह उपयोग कर सके। यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि अब जो पीड़ित हैं वे स्थानीय लोग हैं, उन्हें अपनी जिंदगी को यहीं पर आगे बढ़ाना है। ऐसे हालात में ऐसी सामान-सामग्री की जरूरत है जिसका उपयोग दो-चार सप्ताह हो सके। 
अब, राहत सामग्री से जुड़े दूसरे पहलू को देखें जो ज्यादा चिंताजनक है। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंची राहत सामग्री देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और कोटद्वार आदि में अटकी हुई है। वजह यह है कि उक्त सामग्री ट्रकों में भेजी गई है और पहाड़ में सड़के बर्बाद हो चुकी हैं इसलिए वहां ट्रक पहुंच नहीं पा रहे हैं। देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी जिलों में निचले स्थानों पर राहत-सामग्री के ढेर लगे हुए हैं। प्रभावित इलाकों में पीड़ित प्रतीक्षा कर रहे हैं और नीचे सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो इस सामग्री को जरूरतमंदों तक पहुंचा सके। सरकार ने इसका जिम्मा जिलाधिकारियों पर डाल दिया है। जिलाधिकारियों ने उपजिलाधिकारियों और तहसीलदारों को यह काम सौंप दिया और इन अधिकारियों ने राजस्व कर्मियों को ड्यूटी सौंप दी है। यानि, सारे काम पटवारी या लेखपाल को करने है जो कि संभव ही नहीं है।
कुल मिलाकर परिणाम यह है कि कई सौ ट्रक प्रदेश में जहां-तहां लदे खड़े हुए हैं। बाहर से सामग्री लेकर आए लोगों की यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे इसे किसको सौंपकर जाएं। दिल्ली में उत्तराखंड भवन राहत सामग्री लेने से इनकार कर चुका है। दून, हरिद्वार और पौड़ी जिले के डीएम भी सामग्री को रिसीव करने से हाथ खड़े कर चुके हैं। सरकार के पास इस काम के लिए न तो कर्मचारी हैं और न ही पर्याप्त संख्या में छोटे वाहन ताकि ट्रकों से उतारकर इस सामग्री को प्रभावित इलाकों में लोगों तक पहुंचाया जा सके। स्थिति की विद्र्रुपता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि राहत सामग्री लेकर आए लोग अब इसे हरिद्वार-ऋषिकेश में भिखारियों, झुग्गी-बस्तियों और राह चलते लोगों को बांट रहे हैं। 
घटना के एक पखवाड़े बाद भी प्रदेश में ऐसी कोई एजेंसी काम नहीं कर रही है जो राहत सामग्री को रिसीव करती और फिर आपदा पीड़ितों की जरूरत के अनुरूप इसके पैकेट बनवाकर प्रभावित इलाकों में भिजवाती। फिलहाल, राहत सामग्री के ट्रकों से जहां-तहां जाम लगा हुआ है और पहाड़ में कई लाख लोगों की जिंदगी दांव पर लगी हुई है। यदि, जल्द यह सामग्री उन तक न पहुंची तो मरने वालों की सूची और लंबी हो जाएगी। ऐसे हालात में यह भी जरूरी हो गया है कि कोई भी सामग्री भेजने से पहले उत्तराखंड के अफसरों से जरूर पूछ लें कि वे इसे स्वीकार करेंगे या नहीं।