बुधवार, 21 नवंबर 2012

पोंटी की पार्टी में कौन मौजूद था उत्तराखण्ड का आईएएस!



पोंटी की पार्टी में कौन मौजूद था उत्तराखण्ड का आईएएस!

भाजपा ने किया नामधारी का बचाव, कहा मुख्यमंत्री करें चर्चित अधिकारी को पदमुक्त
राजेन्द्र जोशी
देहरादून । पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड के समय मौजूद उत्तराखण्ड का कौन वरिष्ठ आईएएस उनके साथ था, यह पहेली उत्तराखण्ड के सचिवालय में बैठे आलाधिकारियों के माथे पर बल ला रही है। अधिकारियों में सुगबुगाहट है कि मुख्यमंत्री दरबार से जुडे़ दो चर्चित आईएएस अधिकारियों के अलावा और कोई नहीं हो सकता। इस पहेली को सुलझाने के लिए कई आईएएस तो आपस में सिर जोड़कर अटकलें लगाने पर जुटे पड़े हैं।
                राजनैतिक दलों और शराब माफिया व पूंजीपतियों का गठजोड़ काफी पुराना रहा है, किशोर अवस्था में पहुंच चुके इस राज्य पर अब शराब माफियाओं और पूंजीपतियों के साथ गठजोड़ का आरोप भी लगना शुरू हो गया है। राजधानी देहरादून सहित हरिद्वार, काशीपुर, रूद्रपुर तथा हल्द्वानी तक में पोंटी चढ्ढा से संबंध रखने वाले लोगों की शुमारी हो रही है। सूत्रों का दावा है कि उत्तराखण्ड में पोंटी चढ्ढा व उसके भाई हरदीप चढ्ढा सहित सुखदेव सिंह नामधारी के व्यवसाय में कई पूंजीपतियों सहित राजनैतिक दलों व ब्यूरोक्रेट्स का पैसा लगा हुआ है। राज्य में सरकारें किसकी बनें और कौन मुख्यमंत्री बने सूत्रों का दावा है इसका निर्णय भी अब इस तरह के लोग करने लगे हैं। राज्य में शराब सिंडिकेट से मित्रता निभाने वाला राजनैतिक दल जब सत्ता में होता है, तो उनकी पौ बारह हो जाती है। वैसे यह बात भी यहां दीगर है कि इनके लिए किसी भी दल की सरकार हो वह कोई मायने नहीं रखती, ये किसी भी दल में अपनी पैठ बनाकर उस दल को अपनी उंगलियों पर नचाने का माद्दा रखते हैं। इसका उदाहरण सुखदेव सिंह नामधारी की अल्पसंख्यक आयोग में ताजपोशी का होना है। इतना ही नहीं राज्य सरकार में औद्योगिक विभाग, आबकारी विभाग में कौन अधिकारी तैनात हो, इसका खाका भी ये लोग ही तय करते हैं। सूत्रों का दावा है कि राजनेता-माफिया का यह गठजोड़ मलाईदार विभागों में अपने अधिकारी गुर्गों को फिट करता रहा है। राज्य में चाहे किसी की भी सरकार है, इससे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। सूत्रों का कहना है कि राज्य में खनन नीति, आबकारी नीति और भूमि कानून तक अब इनके इशारों पर बनाए गए हैं ताकि इस गठजोड़ को इसका पूरा-पूरा लाभ मिल सके।
                पोंटी चढ्ढा व उसके भाई हरदीप चढ्ढा के साथ नामधारी व प्रदेश के आईएएस का गठजोड़ कोई नया नहीं है, राज्य में अधिकतम शराब की दुकानें और खनन का कार्य इन्हीं के गिरोह के हाथों चलाया जा रहा है। ऐसे में एक आईएएस का वहां होना कोई हैरानी की बात नहीं है। सूत्रों का दावा है प्रदेश के कई आलाधिकारियों के संपर्क इस माफिया गुट से रहे हैं, जिससे इन्होंने काफी माल भी कमाया है। जहां तक पोंटी चढ्ढा की पार्टी में उत्तराखण्ड के आईएएस की मौजूदगी की बात उठ रही है, इसको मामले पर प्रदेश के ब्यूरोक्रेट्स को यह सब पता है कि उस दिन दिल्ली के पंच सितारा होटल में आयोजित पार्टी में राज्य का कौन आईएएस था, लेकिन पता होने के बावजूद भी सरकार जहां इस मामले में चुप्पी साधे हुए है, वहीं आईएएस लॉबी इस मामले को दबाने के प्रयास में है। सूत्रों का यह भी दावा है कि मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात दो चर्चित आईएएस अधिकारियों में से एक अधिकारी की वहां मौजूदगी रही है।
                वहीं इस पूरे मामले पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने आज यहां पत्रकार वार्ता में कहा कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को उस आईएएस अधिकारी को तुरंत हटा देना चाहिए, उन्होंने साथ ही सुखदेव सिंह नामधारी का बचाव करते हुए कहा कि उसके खिलाफ जब कोई मामला नहीं है, तो कांग्रेस ने नामधारी को कैसे पदमुक्त कर दिया। उन्होंने कहा केवल नाम आने से जब सुखदेव सिंह नामधारी को हटाया जा सकता है, तो चर्चित आईएएस अधिकारी पर क्यों नहीं कार्यवाही की गई।

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

नाकामी का ठीकरा मेरे सिर फोड़ना चाहते हैं असफल कलाकार: नेगी

नाकामी का ठीकरा मेरे सिर फोड़ना चाहते हैं असफल कलाकार: नेगी
लोक गायकों में विवाद दुर्भाग्यपूर्ण: भरतवाण
राजेन्द्र जोशी
देहरादून । उत्तराखण्ड में आज कल लोक गायकों के बीच जंग छिड़ी हुई है। यह जंग उभरते हुए गायक गजेन्द्र राणा के हीरा समधिणी ऑडियो एलबम के बाजार में आने के बाद छिड़ गई है। इस मामले में अभी तक लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का कहना कि कुछ कलाकार अपनी नाकामी का ठीकरा मेरे सिर फोड़ना चाहते है, उनका साफ कहना था कि किसी भी प्रतिभा को कोई भी नहीं रोक सकता और प्रतिभा किसी के परिचय की मोहताज भी नहीं होती, उन्होंने कहा कि जब मैं 40 वर्ष पहले इस क्षेत्र में आया तो लोगों ने मुझे भी रोकना चाहा, लेकिन मैं विपरित परिस्थितियों में भी खड़ा हुआ हूं, उन्होंने नए गायकों को सीख देते हुए कहा कि वे ईमानदारी के साथ आगे बढ़ें उन्हें कोई रोक नहीं सकता। वहीं सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक और ट्वििटर पर भी लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के समर्थक गजेन्द्र राणा की इस करतूत से खासे नाराज हैं।
    गजेन्द्र राणा द्वारा हीरा समधिणी एलबम में गाए गए गाने नरूमा नारेणा को यह विवाद छिड़ा है, हालांकि इस गाने के पहले तीन मिनट के गीत को जागर शैली में नरेन्द्र सिंह नेगी के नौ छमि नारेणा की धुन पर गाया गया है, वहीं तीन मिनट के बाद छहः मिनट का यह गना है, एलबम के निर्देशक अरविंद नेगी और संगीत संजय कुमोला का है, छहः मिनट का यह विवादित गीत भी नरेन्द्र सिंह नेगी की एलबम सल्याणा श्याली के गीतों की धुन पर गाया गया है। लोक कला क्षेत्र में कार्य करने वाले अमित रावत का कहना है कि लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी की गीतों की धुनो को चुराकर और उन्हीं पर तंज कसते गानों को जनता के बीच लाना लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी की छवि को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता, उनका कहना है कि उभरते गायक को राज्य की संस्कृति और लोक गीतों से इस तरह का भद्दा मजाक नहीं करना चाहिए। उनका कहना है कि गजेन्द्र राणा को इस एलबम के लोकार्पण से पूर्व यह सोचना चाहिए था कि वह उत्तराखण्ड के उस महान कलाकार पर आक्षेप लगाने के बजाए उनसे कुछ सीख लेते, क्यांेकि लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का जीवन पहाड़ के दुख-दर्द और वहां की संस्कृति व समाज के सरोकारों के लिए समर्पित रहा है। वहीं गजेन्द्र राणा के क्षेत्र के संस्कृति कला प्रेमी दिनेश रतूड़ी का कहना है कि लोक गायक व लोक कवि नरेन्द्र सिंह नेगी को उत्तराखण्ड का भूपेन हजारिका कहा जाता है, क्यांेकि जिस तरह असम के लोक गायक स्व. भूपेन हजारिका ने असम की भाषा, संस्कृति और लोक गीतों को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर पहुंचाकर उसको लोगों की जुबान पर लाने का प्रयास किया था, ठीक उसी तरह लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने भी गढ़वाल की हमारी प्राचीन संस्कृति व लोक गीतों को संगीत में पिरोकर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहुंचाने का काम किया है।
    समूचे प्रकरण लोक गायक नरेन्द्र सिहं नेगी का कहना है कि आज जितने लोक गायक आगे आए हैं, वे उन्होंने उनके 20-25 साल बाद गाना शुरू किया, उन्होंने प्रतिभाओं को आगे बढ़ने से रोके जाने के सवाल पर कहा कि अनर्गल बयानबाजी करके सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की यह एक साजिश है, उन्होंने कहा कि कोई किसी को कैसे रोक सकता है, क्यांेकि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती, हां राजनीति में तो आगे बढ़ने से कार्यकर्ता व नेताओं में टांग खिंचाई मानी जा सकती है, लेकिन लोक संगीत और लोककलाओं को आगे बढ़ाने वालों को कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने कहा कि जो लोग उन पर आरोप लगा रहे है, वें अपनी नाकामी का ठीकरा मेरे सिर फोड़ना चाहते हैं।
    वहीं इस मामले में निर्देशक व गायक अनिल बिष्ट का कहना है कि कलाकारों को इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए, हम अपनी आने वाले पीढ़ी को क्या संस्कृति और संस्कार देना चाहते हैं इस पर हमें ध्यान देना चाहिए। उन्होंने इस समूचे प्रकरण पर दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा, इससे जनता में अच्छा मैसेज नहीं गया, उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति और लोकगायन को आगे बढ़ाने के लिए कुछ करना चाहिए अन्यथा हमें आने वाली पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी। वहीं गढ़वाली गीतकार व कवि गणेश खुगसाल ‘‘गणी‘‘ ने कहा कि इस कलाकारों को इस तरह प्रतिस्पर्धा से बचना चाहिए, उन्होंने कहा कि हमें स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए, ताकि हम अपनी विलुप्त हो चुके संगीत और वाद्य यंत्रों के संरक्षण और संवर्धन में अपना समय लगाएं। इस प्रकरण पर जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण ने कहा कि लोक गायक नेरन्द्र सिंह नेगी उत्तराखण्ड की धरोहर हैं और उनके खिलाफ इस तरह के षडयंत्र को दुर्भाग्यपूर्ण ही कह जाएगा।
    वहीं सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर सोबन सिंह गुंसाई ने इसे भारी बात कहते हुए कहा कि राजनेताओं की तरह गजेन्द्र राणा ने नेगी जी के खिलाफ जो शब्दावली का प्रयोग किया है, वह शर्मनाक है। इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि मीना राणा ने नेगी जी के बारे में नहीं सोचा, जिनकी बदोलत मीना राणा आज इस मुकाम तक पहुंची है। वहीं रविश पोखरियाल ने कहा कि हमारी राणा से कोई जातीय दुश्मनी नहीं जो हम उनके खिलाफ हैं, उन्होंने नरेन्द्र सिंह नेगी को पहाड़ की शान और पहाड़ की आवाज बताते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा भ्रष्ट लोगों और नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई है, गजेन्द्र राणा को उनके सम्मान के लिए गीत गाना चाहिए था, पर यहां तो उलटी गंगा बह रही है हम राणा का विरोध क्यों न करें।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

हमारी है एक पहचान हैं हम उत्तराखण्डी: बहुगुणा

राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन तीन से पांच हजार हुई
गुमशुदा आंदोलनकारियों को मिला आंदोलनकारियों का सम्मान

हमारी है एक पहचान हैं हम उत्तराखण्डी: बहुगुणा
राजेन्द्र जोशी।
देहरादून, 9 नवम्बर। राज्य आंदोलन के दौरान गुमशुदा हुए आंदोलनकारियों को मृत मानते हुए आंदोलनकारियों की श्रेणी में रखने के साथ ही अन्य राज्य आंदोलनकारियों को मिलने वाली पेंशन राशि 3000 रूपसे से बढ़ाकर 5000 रूपये की जाएगी, वहीं राज्यवासियों को एकता की नसीहत देते हुए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि हम सबकी एक पहचान है और हम उत्तराखण्डी हैं, यह बात सबको समझनी चाहिए। वे आज यहां सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा प्रकाशित विकास पुस्तिका उत्तराखण्ड उत्कृष्टता के पथ पर के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे। राज्य के इतिहास में यह पहला अवसर था जब प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मुजफ्फरनगर काण्ड के दौरान राज्य आंदोलनकारियों की मदद करने वाले चार गांवों रामपुर, मेधपुर, सिसोना तथा बड़ोवाली के दो-दो लोगों को सम्मानित किया।
    इसे ऐतिहासिक क्षण ही कहा जाएगा कि राज्य बने बारह साल बाद आज किसी मुख्यमंत्री ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को राज्य बनाने के लिए उनको कृतज्ञता ज्ञापित की। राजनीति से उपर उठकर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने केंद्र में शासन करने वाली तत्कालीन भाजपा सरकार को राज्य बनाने के लिए जहां धन्यवाद किया, वहीं वे तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य बनाने के लिए धन्यवाद करना भी नहीं भूले। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा मुजफ्फरनगर काण्ड के दौरान दो अक्टूबर को राज्य के आंदोलनकारियों की मदद करने वाले चारों गांवों को 10-10 लाख रूपये की सहायता देने की घोषणा पहले की थी, जो गांवों को मिल चुकी है, इस राशि से गांवों में मिलन केंद्र बनाए जा रहे हैं जो राज्य आंदोलनकारी शहीदों के नाम पर स्थापित होंगे।
    मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि राज्य के निर्माण के आज बारह वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और उत्तराखण्ड राज्य के साथ बने दो अन्य राज्यों से उत्तराखण्ड आज कहीं आगे विकास के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि यहां अन्य राज्यों की उपेक्षा जल, जंगल और जमीन की कोई कमी नहीं है और वहीं यहां का जनमानस प्रदूषित मानसिकता का भी नहीं है। इतना ही नहीं उन्होंने कहा देश का यह एकमात्र ऐसा राज्य हैं, जहां सर्वधर्म समाभाव की भावना है। उन्होंने राज्यवासियों का आहवान किया कि वे क्षेत्रवाद और जातिवाद के चक्कर में न पड़ते हुए अपनी एक पहचान की हम उत्तराखण्डी हैं के लिए प्रयासरत रहें। उन्होंने कहा कि राज्य आंदोलन गैरसैंण के नाम पर चला था और राज्य आंदोलन का केंद्र बिंदु गैरसैंण ही रहा था। गैरसैंण को लेकर अपनी सरकार की प्राथमिकता बताते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने राज्य के इतिहास में पहली बार गैरसैंण में कैबिनेट बैठक कर राज्य आंदोलन में शरीक रहे लोगों की भावनाओं को आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा आगामी मकर संक्रांति को जहां गैरसैंण में विधानभवन के निर्माण की आधारशीला रखी जाएगी, वहीं विधायकों के आवास को भी गैरसैंण में बनाने की सरकार की योजना है। उन्होंने कहा राज्य आंदोलनकारियों को अभी तक मिल रही तीन हजार रूपये की पेंशन को बढ़ाकर पांच हजार रूपये प्रतिमाह कर दिया गया है, जबकि राज्य आंदोलन के दौरान गुमशुदा आंदोलनकारियों को मृत मानते हुए उनके परिजनांे अन्य राज्य आंदोलनकारियों की भांति सुविधाएं दी जाएंगी।
    मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा राज्य आंदोलन के दौरान के इतिहास को लिपिबद्ध कर इसे दस्तावेज के रूप में संजोने की सरकार की योजना है। इसके लिए उत्कृष्ट लेख पर राज्य सरकार द्वारा पांच, तीन और दो लाख रूपये के की धनराशि पारितोषी के रूप में दी जाएगी। वहीं राज्य के उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए भी राज्य सरकार द्वारा तीन ईनाम की घोषणा की गई है, जिनकी धनराशि तीन, दो और एक लाख रूपये होगी। वहीं लोक संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले तीन व्यक्तियों को राज्य सरकार द्वारा तीन, दो और एक लाख रूपये का पुरस्कार दिया जाएगा। वहीं राज्य के परंपरागत वाद्य यंत्रों के इतिहास, उनकी पौराणिकता तथा उसके रख रखाव को लेकर राज्य सरकार द्वारा पुरस्कार की घोषणा की गई है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने घोषणा की कि जिला मुख्यालय पौड़ी के पुराना कारागार परिसर को राज्य निर्माण आंदोलनकारियों को समर्पित करते हुए राज्य अभिलेखागार एवं सग्रहालय के रूप में स्थापित करने की सरकार की योजना है। मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के इतिहास के सभी प्रशासनिक विधायी एवं संवैधानिक घटनाक्रमों को लिपिबद्ध कर विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाएगा और राज्य के विकास की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए जिला प्लान के अतिरिक्त विकास के लिए धन उपलब्ध कराया गया है और प्रदेश में पंपिग पेयजल योजनाओं में धन की कमी नहीं होने दी जाएगी। और पर्वतीय क्षेत्रों में पिछड़ते विकास कार्यों को आगे बढ़ाकर विकास अंतिम छोर तक पहुंचाया जाएगा, जिससे वहां पलायन के साथ-साथ रोजगार के अवसर बढ़ सकें। इस दौरान कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य, दिनेश अग्रवाल, हरीश दुर्गापाल, विधायक अनुसूया प्रसाद मैखुरी, शूरवीर सिंह सजवाण, हरीश धामी, ललित फर्सवाण, गणेश जोशी, राजकुमार, ब्रहमस्वरूप ब्रहमचारी, राज्य आंदोलनकारी परिषद की अध्यक्ष सुशीला बड़ोनी, सेवा दल के अध्यक्ष रामविलास रावत, कांग्रेस अधिवक्ता परिषद की अध्यक्ष पूनम उनियाल, सूर्यकांत धस्माना, सचिव सूचना एम.एच. खान, अपर सचिव दिलीप जावलकर, संयुक्त निदेशक राजेश कुमार, सहायक निदेशक योगेश मिश्रा, सहायक निदेशक कलम सिंह चौहान, जिलाधिकारी देहरादून वी.वी.आर. पुरूषोत्तम, एसएसपी देहरादून केवल खुराना सहित कई अन्य अधिकारी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन सूचना विभाग के अपर निदेशक डॉ. अनिल चंदोला द्वारा किया गया।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

गैरसैंण बना बिल्ली के गले की घण्टी

गैरसैंण बना बिल्ली के गले की घण्टी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 6 नवम्बर। गैरसैंण में विधानभवन के शिलान्यास की घोषणा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा भले ही 14 जनवरी 2013 को किए जाने की की गई है, राजनैतिक हलकों में उनकी इस घोषणा के कई निहितात लगाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री बहुगुणा की इस घोषणा से उत्तराखण्ड में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को जहां ऑक्सीजन मिली है, वहीं अन्य राजनैतिक दल मुख्यमंत्री की इस घोषणा से हतप्रभ हैं। राजनैतिक विश्लेषक इसे बिल्ली के गले में घण्टी बांधने जैसा करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य बने अब तक 12 साल पूरे होने में कुछ ही दिन शेष हैं, ऐसे में गैरसैंण में विधानभवन के शिलान्यास की घोषणा महज 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर की गई घोषणा की प्रतीत होती है। इनका कहना है कि राज्य बने इन 12 सालों में छहः मुख्यमंत्रियों ने इस राज्य में राज किया और इनकी अब तक डेढ़ हजार से ज्यादा घोषणाएं महज कागजी घोषणाएं बनकर रह गई है, ऐसे में गैरसैंण में मुख्यमंत्री बहुगुणा द्वारा की गई 23 घोषणाओं सहित गैरसैंण में विधानभवन के शिलान्यास की घोषणा कितनी साकार हो पाती है, यह तो आना वाला वक्त ही बताएगा।
राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने आने वाली सरकारों सहित मुख्यमंत्रियों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौति खड़ी कर दी है कि वे गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में समर्थन दें। इतना ही नहीं राजनैतिक विश्लेषक गैरसैंण घोषणा को कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रहे अंतरद्वंद व अंर्तविरोध के रूप में भी देख रहा है। जहां मुख्यमंत्री की इस घोषणा के विरोध में काशीपुर के विधायक हरभजन सिंह चीमा ने जिस तरह से गैरसैंण में राजधानी के मुद्दे पर सड़कों उतरने की घोषणा की है, इससे तो कम से कम यह साफ है कि भले ही चीमा इसके विरोध में हों, लेकिन भारतीय जनता पार्टी इसके विरोध में नहीं है। यहां भाजपा मंे भी गैरसैंण मुद्दे को लेकर अंर्तविरोध साफ झलक रहा है क्यांेकि तीन नवम्बर से आज तक इस मुद्दे पर भाजपा के किसी भी नेता का बयान गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी अथवा गैरसैंण में विधानसभा सत्र चलाने को लेकर टिप्पणी के रूप में सामने नहीं आया। वहीं पर्वतीय क्षेत्र के आंदोलनकारी नेताओं सहित विधायकों ने जहां इस मुद्दे पर सरकार की पीठ थपथपाई है, इससे यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो गया है।
राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार गैरसैंण चाहे ग्रीष्मकालीन राजधानी बने या न बने और गैरसैंण में चाहे विधानभवन बने या न बने, लेकिन गैरसैंण मुद्दे ने राज्य की राजनीति को जरूर गरमा दिया है और उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों में गैरसैंण को लेकर जो उत्साह लोगों में दिखाई दे रहा है, उसने भी राजनैतिक दलों को गैरसैंण की ओर देखने के लिए विवश कर दिया है कि गैरसैंण अब गैर नहीं है।

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

गैरसैंण अब गैर नहीं, तीन को होगी गैरसैंण में कैबिनेट बैठक

गैरसैंण अब गैर नहीं, तीन को होगी गैरसैंण में कैबिनेट बैठक
बैठक से राजनैतिक दूरगामी परिणामों की भी उम्मीद
पहाड़ी जिलों को कांग्रेस सरकार क्या सौगात देती है?
युवओं के साथ नेताओं ने भी किया पहाड़ से पलायन
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 1 नवम्बर । आगामी तीन नवम्बर को गढ़वाल और कुमाउं के केंद्र बिंदु गैरसैंण में होने जा रही बहचर्चित कैबिनेट बैठक पर समूचे पहाड़वासियों की निगाहें टिक गई है, उम्मीद की जा रही है कि इस अवसर पर बहुगुणा सरकार पहाड़ के मूलभूत विकास से संबंधित सहित पहाड़ में पलायन जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने और पहाड़वासियों के कष्ट दूर करने संबंधी कुछ महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है। जहां इस बैठक पर पक्ष और विपक्ष में वॉक युद्ध भी छिड़ गया है, वहीं इस बैठक के राजनैतिक दूरगामी परिणामों की भी उम्मीद की जा रही है।
राज्य के असतित्व में आए 12 साल होने को हैं, इन 12 सालों में राज्य में राज कर रही सरकारों के लिए पर्वतीय राज्य का प्रतीक गैरसैंण भले ही गैर रहा हो, लेकिन छहः माह पूर्व राज्य में सत्तारूढ़ बहुगुणा सरकार के लिए गैरसैंण गैर नजर नहीं आ रहा। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के दिन से ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की गैरसैंण में कैबिनेट मीटिंग करने की बहुप्रतिक्षित योजना तीन नवम्बर साकार होने जा रही है। वहीं सरकार द्वारा गैरसैंण में कैबिनेट बैठक को लेकर तैयारियां जोरों पर है और उत्तराखण्ड के पहाड़ियों की नजर गैरसैंण में होने वाली कैबिनेट बैठक के निर्णयों पर लगी हैं कि आखिर राज्य आदांेलन के प्रतीक रहे गैरसैंण सहित पहाड़ी जिलों को कांग्रेस सरकार क्या सौगात देती है।
राजनैतिक हलकों में गैरसैंण में कैबिनेट बैठक को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा प्रदेश सरकार द्वारा अपने संसाधन बढ़ाने की दिशा में उठाए जा रहे कदम बताए जा रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्य सरकार द्वारा गैरसैंण में होने वाली कैबिनेट बैठक से ऐन पहले पेट्रोल के दामों में वैट को हटाना शामिल बताया जा रहा है, इससे राज्य सरकार को 80 करोड़ रूपया सालाना टैक्स के रूप में मिलेगा। वहीं राज्य सरकार जहां पानी पर टैक्स लगाकर अपना खजाना बढ़ाना चाहती है, वहीं राज्य सरकार ने अन्य प्रदेशों से राज्य में प्रवेश करने वाले वाहनों पर प्रवेश शुल्क लगाने की योजना को भी अमलीजामा पहना दिया है, इससे राज्य सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये की आय होने की उम्मीद है।
गैरसैंण में कैबिनेट बैठक पर उत्तराखण्ड के पहाड़ियों की नजर इसलिए भी लगी है कि अभी तक राज्य में सत्तारूढ़ दलों ने पर्वतीय क्षेत्रों की जो उपेक्षा की है, उसका सबसे ज्यादा खामियाजा पहाड़ के लोगों को ही भुगतना पड़ा है। पहाड़ों से रोजगार के तलाश में पलायन सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है। युवाओं ने रोजगार की तलाश में सबसे ज्यादा पलायन किया तो वहीं प्रदेश में राजनीति करने वाले नेताओं ने भी राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन कर डाला। केंद्रीय मंत्री हरीश रावत अब जहां हरिद्वार की बात करते हैं तो वहीं यशपाल आर्य, कुमाउं के तराई की बात, ठीक इसी तरह विजय बहुगुणा भी सितारगंज और निशंक पर्वतीय क्षेत्रों से उतरकर डोईवाला जैसे मैदानी क्षेत्रों में ही राजनीति करने लगे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सतपाल महाराज पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद होने के नाते गैरसैंण के हिमायती रहे हैं, वहीं प्रदीप टम्टा आदि पर्वतीय क्षेत्रों से चुनाव लड़ने वाले नेता पर्वतीय क्षेत्रों की आवाज उठाते रहे हैं। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी पकड़ कमजोर होते देख मुख्यमंत्री ने गैरसैंण में कैबिनेट बैठक करने की घोषणा की, ताकि कांग्रेस एक बार फिर से पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी पैठ बना सके, वहीं विपक्ष ने इसे सरकार की गैरसैंण पिकनिक बताया है, विपक्षी दलों सहित उत्तराखण्ड क्रांति दल ‘‘पी‘‘ का कहना है कि क्या ही अच्छा होता कि बहुगुणा कैबिनेट के मंत्री और अधिकारी सड़क मार्ग से गैरसैंण पहुंचते और उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों की दुर्दशा और पर्वतीय लोगों के पहाड़ से जीवन से रूबरू होने का मौका मिलता। लेकिन वे जौलीग्रांट से गौचर स्टेट प्लेन से जाएंगे और वहां से गैरसैंण हैलीकाप्टर से। विपक्ष ने राज्य सरकार पर गैरसैंण में पिकनिक मनाए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे कर्ज के बोझ तले दबे उत्तराखण्ड पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ेगा। वहीं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता विनोद बड़थ्वाल ने कहा कि गैरसैंण में कैबिनेट बैठक कुछ घण्टे करने के बजाए सरकार को तीन दिन तक गैरसैंण में ही रहना चाहिए, ताकि पर्वतीय राज्य के प्रतीक रहे गैरसैंण से उनका जुड़ाव हो सके। उन्होंने तो यहां तक कहा कि मुख्यमंत्री को कैबिनेट बैठक के दूसरे दिन राज्य के सभी प्रमुख सचिव और सचिव के साथ बैठक और तीसरे दिन राज्य के जिलाधिकारियों के साथ बैठक करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस कैबिनेट बैठक की सार्थकता तब ही है जब राज्य के अधिकारी और मंत्री पहाड़ को समझे और पर्वतीय राज्य के अनुरूप फैसले लें।