शनिवार, 8 दिसंबर 2012

मूल निवास पर मचा बवाल


मूल निवास पर मचा बवाल
वास्तविक मूल निवासियों के हक पर डाका है सरकार का यह निर्णय: नरेन्द्र सिंह नेगी
आखिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश क्यों नहीं मानती सरकार

राजेन्द जोशी
देहरादून, 08 दिसम्बर। मूल निवासी और स्थाई निवासी पर संसदीय कार्य मंत्री के विधानसभा सदन में दिए गए बयान कि राज्य स्थापना के वक्त उत्तराखण्ड में निवास करने वालों को मूल निवासी माना जाएगा पर बवाल मचना शुरू हो गया है। संसदीय कार्य मंत्री के इस ताजा बयान से राज्य के पर्वतीय लोगों में जहां घोर निराशा हुई है, वहीं राज्य आंदोलनकारी और राज्यवासी मूल निवास को लेकर एक और आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं।
 
गौरतलब हो कि बीते दिन विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश पाठक ने सदन को यह जानकारी दी कि राज्य गठन के वक्त अर्थात नौ नवम्बर 2000 तक उत्तराखण्ड में निवास करने वाले राज्य के मूल निवासी माने जाएंगे। वहीं यह भी उल्लेखनीय है कि मूल निवास और स्थाई निवास प्रमाण पत्र को लेकर उपजे विवाद के बाद हाईकोर्ट में स्थाई और मूल निवास प्रमाण पत्र पर यह ओदश दिए कि, स्थाई निवासी को ही मूल निवासी माना जाएगा। हाईकोर्ट के इस फैसले पर भी राज्यवासी खुश नहीं थे और राज्य आंदोलनकारी संगठनों से सरकार को कहा कि वह इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में विरोध दर्ज करें। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया है कि 1952 में जो जहां रह रहा है, उसे वहां का मूल निवासी माना जाएगा। जबकि इसके बाद वे देश के विभिन्न हिस्सों में हुए पलायन के बाद जो जहां रह रहा है, उसे वहां का स्थाई निवासी तो माना जा सकता है, लेकिन मूल निवासी नहीं। ताजे प्रकरण पर पर्यावरण विद् सुंदरलाल बहुगुणा का कहना है कि सरकार जन भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है, उनका साफ कहना है कि किसी राज्य का मूल निवासी वही व्यक्ति हो सकता है, जिसकी पीढ़ियां वहां निवास करती आई हैं। उन्होंने तल्ख लहेजे में कहा कि राज्य गठन के बाद यहां धंधे बाज और ठेकेदारों ने रूख किया है और सरकार की परिभाषा के अनुसार वे स्थाई निवासी के साथ मूल निवासी भी हो गए, जो कतई उचित नहीं है। उन्होंने असम में भड़की हिंसा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की हिंसा के मूल में भी स्थाई निवासियों को मूल निवासी बनाया जाना रहा है। उन्होंने कहा जब किसी क्षेत्र विशेष में बाहरी लोग आते हैं और उन्हें वहां के संसाधनों का हक दे दिया जाता है, यहीं असंतुलन का कारण है, इससे जहां जन भावनाएं भड़कती हैं, वहीं आपसी सौहार्द भी समाप्त हो जाता है। उत्तराखण्ड क्रांति दल ‘‘पी‘‘ के केंद्रीय अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार का कहना है कि राज्य गठन के वक्त यहां रहने वाले लोगों को मूल निवासी मानने वाली राज्य सरकार जन हितों की अनदेखी कर रही है, उन्होंने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए राज्यवासियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने राज्य स्थापना के वक्त से यहां रह रहे लोगों को मूल निवासी मानने का फैसला दिया था, लेकिन सरकार को उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए थी, मगर उसने ऐसा नहीं किया बल्कि इस फैसले की आड़ में अपने हित साधने की कोशिश की। उन्होंने मूल निवासी पर तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा 16 अगस्त 1950 में तय निती की जानकारी देते हुए बताया कि उस वक्त यह तय किया गया था कि 16 अगस्त 1950 से भारत के जिन प्रदेशों में जो रह रहा है, वह वहां का मूल निवासी होगा। उन्होंने कहा कि हम भी इस बात को मानने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार जान बूझकर जन भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड क्रांति दल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जन भवनाओं की रक्षा के लिए अपील दायर करेगा।
   
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद की पूर्व अध्यक्ष उषा रावत का इस प्रकरण पर कहना है कि राज्य आंदोलन 1953 में शुरू हुआ था और इसकी निर्णायक लड़ाई 1994 में शुरू हुई जो नौ नवम्बर 2000 को राज्य गठन के साथ समाप्त हुई। उन्होंने सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि राज्य गठन के वक्त यहां रहने वालों को वह मूल निवासी मान रही है, जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह फैसला उन लोगों के लिए कुठाराघात है, जिन्होंने राज्य के लिए कुर्बानी दी और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। राज्य आंदोलनकारी इंद्र दत्त शर्मा का कहना है कि राज्य गठन के वक्त से यहां रहने वालों को यहां मूल निवासी मानने संबंधी सरकार का यह फैसला उन लोगों के लिए कुठाराघात है, जिन्होंने राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा हकीकत में आजादी के बाद केंद्र सरकार ने जो कट ऑफ डेट तय की थी, उसी के आधार पर मूल निवासी की परिभाषा तय होनी चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी मंच के ओमी उनियाल का कहना है कि यह राज्य की अवधारणा के साथ-साथ शहीदों का अपना अपमान भी है। राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय की गाईड लाईन का भी अनादर कर रही है। राज्य आंदोलनकारी सरकार के इस निर्णय को बर्दाश नहीं करेंगे। यूकेडी (डेमोक्रेटिक) के केंद्रीय अध्यक्ष डा. शक्ति शैल कपर्वाण का कहना है कि परपरांत वासी को मूल निवासी का दर्जा देने का प्रदेश सरकार का निर्णय राज्य की संस्कृति और मूल निवासियों की पहचान को मिटाने की एक साजिश है, उन्होंने सरकार के इस निर्णय का विरोध करने की भी घोषणा की है। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी का कहना है मूल निवास का शब्द हमें जमीन से जोड़ता है और मूल से ही संस्कृति का जन्म हुआ और सरकार संस्कृति को ही मटियामेट करने पर तुली है, उनकी पार्टी इसका विरोध करेगी। उत्तराखण्ड महिला मंच की संयोजक कमला पंत ने कहा कि संविधान लागू होने के बाद जो उत्तराखण्ड में रह रहा है, वह यहां का निवासी है, बाद में यहां रहने वाला स्थाई निवासी तो हो सकता है मूल नहीं, हम सरकार के निर्णय का विरोध करेंगे। राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष गीता ठाकुर का कहना है कि सरकार यहां के निवासियों के हक पर डाका डालने का जा रही है, जिसका जमकर विरोध किया जाएगा। वहीं उत्तराखण्ड के लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का कहना है कि मूल निवास आज रोजगार और सरकारी योजनाओ का लाभ देने का जरिया बन गया है, प्रदेश सरकार का यह निर्णय राज्य के वास्तविक मूल निवासियों पर डाका है, उन्होंने भी उच्चतम न्यायालय के उस निर्देश का अनुपालन करने का सुझाव सरकार को दिया, जिसमें 50 वर्ष तक राज्य में निवास करने वालों को मूल निवासी का दर्जा दिया गया है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकरी मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष जे.पी. पाण्डे का कहना है कि राज्य सरकार मूल निवासियों का मूल ही मिटाना चाहती है, उन्होंने कहा 1952 से जो लोग यहां रह रहे हैं, उन्हें ही कानून संवत मूल निवासी माना जाना चाहिए। वहीं राज्य आंदोलनकारी निर्मला बिष्ट, अमर सिंह, मीरा रतूड़ी, ऋषि बल्लभ, द्वारिका बिष्ट सहित दर्जनों आंदोलनकारियों ने कहा कि राज्य सरकार के गैर जरूरी बयान राज्य को नुकसान ही करेंगे, वोट बैंक राजनीति में मूल निवासियों के हित प्रभावित नहीं होने चाहिए, सरकार के ऐसे निर्णयों से मूल निवासियों के अस्तित्व को समाप्त करने की साजिश सरकार की लगती है।
   
मूल निवास के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सभी पक्षों की व्यवहारिकता को जानने के लिए 16 मई 2012 को हुए कैबिनेट मीटिंग में उपसमिति का गठन किया गया था, जिसमें डा. इंदिरा हृदयेश पाठक, दिनेश अग्रवाल, सुरेन्द्र राकेश और सुरेन्द्र सिंह नेगी सदस्य मनोनित किए गए थे। इस समिति को व्यवहारिक और कानूनी बिंदुओं पर विस्तार से जानकारी लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपनी थी, लेकिन यह उपसमिति आज तक अपनी रिपोर्ट सरकार को नहीं सौंप पाई है, लेकिन इसके बीच बीते दिन संसदीय कार्य मंत्री ने राज्य गठन से पूर्व राज्य में रहने वालों को मूल निवासी संबंधी बयान देकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

एमपी, एमएलए और ब्यूरोक्रेट्स से आम आदमी का उठ रहा विश्वास: राज्यपाल



एमपी, एमएलए और ब्यूरोक्रेट्स से आम आदमी का उठ रहा विश्वास: राज्यपाल
राजेन्द जोशी
देहरादून, 08 दिसम्बर । राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था व ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम से खुश नहीं है। उनका कहना है कि सांसदों, विधायकों तथा ब्यूरोक्रेट्स से आज आम आदमी का विश्वास उठता जा रहा है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्य का जो विकास होना चाहिए थावह नहीं हुआ।
    सक्रिय राजनीति के लगभग 60 बसंत देख चुके वयोवृद्ध राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी के मन की पीड़ा यूं ही बाहर नहीं आई राजनीति के सफर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुकामों को जहां हासिल किया है, वहीं कांग्रेस के पुराने नेता होते हुए भी वे तटस्थ राजनीति में अपवाद के रूप में जाने जाते रहे हैं। 1959 से कांग्रेस की सदस्यता लेने के बाद वे तमाम महत्वपूर्ण संगठनों के महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, स्वभाव से बेहद शांत और मृदुभाषी डा. अजीज कुरैशी वकालत के चलते 1972 में मध्य प्रदेश विधान परिषद के सदस्य चुने गए थे, इस दौरान वे मध्य प्रदेश के सिंचाई और उर्जा मंत्री भी रहे। इतना ही नहीं वे भोपाल के अरविंद कला एवं न्याय विद्यालय में विभागाध्यक्ष भी रहे। 15 मई 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने डा. कुरैशी को उत्तराखण्ड का राज्यपाल मनोनित किया। राजनैतिक जीवन में समाज के कमजोर वर्ग, ग्रामीण युवाओं, छात्रों, विकलांग आदि के जीवन स्तर के सुधार के लिए वे कार्य करते रहे। लोगों के आंखों के आंसू पोंछने और मानव सेवा का उद्देश्य लेकर वे राजनीतिक क्षेत्र में एक मील के पत्थर साबित हुए हैं। राज्य की भौगोलिक परिस्थिति और राज्यवासियों के जीवन यापन की कठोर व्यवस्था को देखते हुए वे कई बार विचलित हुए हैं, लेकिन उनका उद्देश्य राज्य के आम जन तक विकास की किरण का अहसास कराना रहा है। राज्य के सांसदों, विधायकों और अफसरशाही पर उनकी यह टिप्पणी राज्य के इन लोगों के लिए प्रेरणा का सबब बनेगी। वहीं उनकी पीड़ा कि इन 12 सालों में जो विकास इस राज्य का होना चाहिए था, वह नहीं हुआ इससे साफ लगता है कि उन्होंने यहां की समस्याओं को आत्मसात किया है।
    गाहे-बगाहे केंद्रीय मंत्री हरीश रावत सहित सांसद सतपाल महाराज भी राज्य की अफसरशाही पर नाखुशी जाहिर करते रहे हैं, अब राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी के ताजा बयान से यह साबित हो गया है कि राज्य के सांसद, विधायक और ब्यूरोक्रेट्स राज्यवासियों के विश्वास को अर्जित करने में असफल रहे हैं, राजनैतिक व्यक्तियों से लगातार वार्तालाप और विचार विमर्श करने के साथ ही राज्य की अफसरशाही से भी वे रूबरू होते रहे हैं। राज्यपाल के इस बयान से राज्य की सेवा से जुड़े लोगों को सतर्क होना चाहिए कि उन पर भी किसी की नजर है।

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

कहीं जांच की आंच में हाथ झुलसने से तो नहीं डर रही सरकार!

कहीं जांच की आंच में हाथ झुलसने  से तो नहीं डर रही सरकार! 

मंत्री ने कहा, नामधारी के रिश्तों की हो सीबीआई 
जांच
रहस्य बना, जांच से पहले ही दे दी क्लीन चिट देना
राजेन्द्र जोशी।
देहरादून, 06 दिसम्बर। पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड में उत्तराखण्ड के दो आईएएस अधिकारियों और तीन नेताओं के नाम आने के बाद कैबिनेट मंत्री द्वारा अपनी ही सरकार से नामधारी के रिश्तों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर पत्र लिखे जाने के बाद सरकार की चुप्पी पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं। वहीं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस मामले में सीबीआई जांच करने की बात कही है। जानकारों का कहना है कि सरकार को खतरा है कि कहीं जांच की आंच में खुद उसके हाथ ही न झुलस जाएं, इसलिए सरकार इस मामले में जांच कराने से परहेज कर रही है।
    गौरतलब हो कि दिल्ली के छतरपुर में चढ्ढा बंधुओं की हत्या के मामले में हत्यारोपी सुखदेव सिंह नामधारी के राज्य के नौकरशाहों और नेताओं से संबंध उजागर करने को लेकर दिन-ब-दिन सरकार पर जांच का दबाव बढ़ता जा रहा है। अभी तक जहां नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट इस मामले पर सरकार से जांच की मांग करते हुए बार-बार तीन नेताओं और दो अफसरशाहों के नामधारी से रिश्तों को लेकर उठ रही बातों पर सरकार से वकतव्य देने की मांग कर रहे थे, वहीं अब बहुगुणा सरकार में शामिल एक कैबिनेट मंत्री ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को पत्र लिखकर अधिकारियों और नेताओं के नामधारी से रिश्तों की सीबीआई जांच कराने की मांग ने सरकार की परेशानी को और बढ़ा दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीते दिन बहुगुणा कैबिनेट में शामिल दो कैबिनेट मंत्रियों ने लगभग दो घण्टे तक चली मैराथन बैठक के बाद सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि नामधारी से नौकरशाह और नेताओं का खुलास करने के लिए सरकार को मामले की सीबीआई जांच करा दी जाए।
    जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार घटना के दिन से लेकर आज तक पूरे प्रकरण पर पर्दा डालती रही है, जबकि इस मामले में आए दिन खुलासे किए जा रहे हैं कि तीन नेताओं सहित दो अधिकारियों से नामधारी ने घटना वाले दिन घटना के बाद से पोंटी को अस्पताल पहुंचाए जाने तक टेलीफोन से वार्ता की है। जानकारों का कहना है कि सरकार की चुप्पी इस प्रकरण पर और भी संदेहजनक है कि वह इस मामले पर कुछ भी कहने से बच रही है। जानकारों का कहना है कि कहीं ऐसा तो नहीं सरकार इस प्रकरण में जांच की आंच आने से डर रही है।
    वहीं गुरूवार को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अधिकारियों को क्लीन चिट देते हुए कहा कि पॉन्टी हत्याकंाड में राज्य का कोई भी अधिकारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संलिप्त नहीं है और इस मामले की सीबीआई जांच की कोई जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा राज्य के अधिकारियों को क्लीन चिट दिये जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि जब इस मामले की जांच दिल्ली की क्राइम ब्रांच द्वारा की जा रही है तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जांच से पहले ही इस मामले में अधिकारियों को क्लीन चिट कैसे दे दी है। कहीं जांच की आंच में मुख्यमंत्री के यह खतरा तो नहीं कि कहीं उनके हाथ भी इस जांच में झुलस सकते हैं। दिल्ली पुलिस द्वारा जांच में किये गये खुलासे के अनुसार नामधारी ने वारदात के बाद घटनास्थल से राज्य के कुछ नेताओं और अधिकारियों से टेलीफोन पर वार्ता की थी। तभी से इस मामले में राज्य के कुछ अधिकारियों और नेताओं की संलिप्तता चर्चाओं में है। तीन नेताओं और दो अधिकारियों के नामों की चर्चाओं पर भाजपा की चुप्पी भी कम रहस्यमयी नजर नहीं आती। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व बसपा सुप्रीमों मायावती के बाद बीते दिन कांग्रेस के मंत्री प्रीतम सिंह ने इस मामले की सीबीआई जांच की मांग सदन में उठाई थी जिसे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने खारिज कर दिया है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा है कि इस मामलें में उन्होंने अपने स्तर पर जांच कर ली है। डीजीपी व अन्य अधिकारी भी इस मामले में छानबीन कर चुके है और राज्य के किसी भी अधिकारी की इस मामले में कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संलिप्तता नहीं है। इससे पूर्व भी मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर कहा था कि घटनास्थल दिल्ली है तथा दिल्ली पुलिस मामले की तहकीकत कर रही है इसलिए राज्य सरकार का इसमें
हस्तक्षेप का कोई सवाल नहीं उठता है। मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले में अधिकारियों को क्लीन चिट दिये जाने पर अब कई सवाल खड़े हो रहे है कांग्रेस के नेताओं द्वारा इस मामलें की सीबीआई जांच की मांग उठायी जा रही है। मुख्यमंत्री ने उसे तो नकार ही दिया है मुख्यमंत्री द्वारा दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही जांच के मध्य में अधिकारियों को क्लीन चिट दिया जाना दिल्ली की क्राइम ब्रांच की तहकीकत में लगी है कितना उचित है। जानकारों का कहना है कि यदि दिल्ली क्राईम ब्रांच अब नामधारी से संपर्क रखने वाले तीन नेताओं और दो अधिकारियों को भी जांच के दायरे में लेती है तो ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा दी गई क्लीन चिट का क्या होगा।

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

नामधारी से घनिष्ठ संबंध रखने वालों की हो रही जांच

नामधारी से घनिष्ठ संबंध रखने वालों की हो रही जांच
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 03 दिसम्बर। पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड में जहां दिल्ली पुलिस ने राज्य के कुछ नेताओं और कुछ अधिकारियों सहित सुखदेव सिंह नामधारी के साथ गठजोड़ का चिट्ठा तैयार कर दिया है, वहीं बीते दिन से दिल्ली पुलिस की टीम देहरादून में नामधारी और उनके साथ व्यवसायिक रिश्तों में घनिष्ठ रहे ऐसे लोगों से पूछताछ के लिए दून में डेरा डाले हुई है। पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड में दिल्ली क्राईम ब्रांच की छानबीन सुराग की तलाश में सोमवार को भी जारी रही। पुलिस टीम ने राजधानी दून में कई होटलों में आज भी छानबीन व पूछताछ की, जो कि नामधारी और उनके बेटे से व्यवसायिक रिश्तों में करीबी बताये जा रहे हैं। वहीं सूत्रों से यह भी जानकारी मिली है कि पोंटी चढ्ढा की हत्या के तीन दिन बाद ही पोंटी के पुत्र मोंटी चढ्ढा ने प्राईवेट गुप्तचर एजेंसी का भी सहयोग लेना शुरू कर दिया है ताकि मामले की गहराई तक पहुंचा जा सके।
    सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार छतरपुर के फार्म हाउस में हत्याकाण्ड के बाद से लेकर पोंटी को अस्तपाल ले जाए जाने तक सुखदेव सिंह नामधारी ने पांच लोगों से बात की थी, जिनमें तीन सफेदपोश नेता और दो अधिकारी शामिल बताए गए हैं। सूत्रों ने तो यह भी बताया है कि उत्तराखण्ड में तैनात आईएएस पर भी धीरे-धीरे पुलिस का शिकंजा कसा जा सकता है, क्योंकि दिल्ली पुलिस के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार घटना के समय यह आईएएस अधिकारी पांेटी चढ्ढा व सुखदेव सिंह नामधारी के साथ उसी लैंड क्रूजर गाड़ी में मौजूद था, जिसमें पोंटी चढ्ढा उस फार्म हाउस तक पहुंचा था जहां  उसकी हत्या हुई थी। इतना ही नहीं दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि कार में मिले पांच लोगों के उंगलियों के निशानों में से चार लोगों के उंगलियों के निशानों की क्राईम ब्रंाच ने तस्दीक कर दी है, जिसमें एक पोंटी चढ्ढा का दूसरा सुखदेव सिंह नामधारी का तीसरा पोंटी के गनर का व चौथा लैंड क्रूजर गाड़ी के ड्राईवर का बताया गया है। गौरतलब हो कि दिल्ली क्राईम बं्राच ने घटना के दिन से लेकर सुखदेव सिंह नामधारी कि गिरफ्तारी तक के उनकी कॉल डिटेल निकाल ली है और इसके लिए दिल्ली क्राईम ब्रांच ने उत्तराखण्ड में दो टीमें भी लगा दी हैं, जिसमें एक टीम राजधानी देहरादून में पोंटी चढ्ढा के संबंधों की जानकारी सहित पोंटी चढ्ढा के व्यवसाय में भागीदार रहे लोगों की जानकारी तथा पोंटी चढ्ढा द्वारा देहरादून, मसूरी आदि क्षेत्रों में खरीदी गई संपत्ति की जानकारी और उन संपत्तियों को किसके नाम पर खरीदा गया है उसकी जानकारी जुटाने पर लगी है, जबकि दूसरी टीम उधमसिंह नगर में सुखदेव सिंह नामधारी पुत्र सहित उन लोगों के संबंधों को खंगालने में लगी है। सूत्रों ने तो यह भी बताया है कि देहरादून में कुछ होटल व्यवसायी और पोंटी चढ्ढा का व्यवसायिक रिश्ता रहा है और राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में पोंटी चढ्ढा के शराब व्यवसाय में इन लोगों का बड़े पैमाने पर साथ भी मिला है। सूत्रों ने बताया  है कि हत्या के तीन दिन बाद ही पोंटी चढ्ढा के पुत्र मोंटी चढ्ढा ने दिल्ली क्राईम ब्रांच से इतर एक प्राईवेट डिटेक्टिव एजेंसी को भी इस मामले को खंगालने की जिम्मेदारी दी है, लगभग सवा करोड़ रूपये में हुए इस सौदे में प्राईवेट डिटेक्टिव कंपनी ने मोंटी को 40 दिन के भीतर मामले की जांच रिपोर्ट सौंपने का वादा किया है।
    उल्लेखनीय है कि पोंटी चढ्ढा मामले में उत्तराखण्ड के दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के नाम सामने आने के बाद से ही ये अधिकारी अपने को बचाने की जुगत में लगे हैं, इतना ही नहीं इनके मुंह लगे कुछ लोग भी इनकों बचाने के प्रयास में दिन-रात एक किए हुए हैं। यहां यह भी गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस इस बात की तहः में जाने की कोशिश में है कि हत्या के दिन आखिर नामधारी को तीन राजनेताओं और दो अधिकारियों से बात करने की जरूरत क्यों पड़ी, सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि उत्तराखण्ड के चर्चित आईएएस का पैसा पोंटी चढ्ढा के शराब और खनन के कामों में लगा हुआ है, इतना ही नहीं सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि बीते दिनों इस चर्चित आईएएस द्वारा राज्य में पर्यटन व्यवसाय में लगी एक दिल्ली की कंपनी को अपने पांच करोड़ रूपये निवेश करने की बात भी की थी, लेकिन कंपनी के अधिकारियों ने उसके प्रस्ताव को एक सिरे से नकार दिया। राजधानी में चर्चित आईएएस को लेकर तरह-तरह की बातें उठनी शुरू हो गई हैं।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

पोंटी के साथ डूब गयी कई राजनेताओं और अधिकारियों की काली कमाई

पोंटी के साथ डूब गयी कई राजनेताओं और अधिकारियों की काली कमाई
छिपाना भी हुआ मुश्किल और बताना भी हुआ मुश्किल
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 26 नवम्बर। पोंटी चढ्ढा की मौत के साथ कई राज भी दफन हो गए। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शराब और चीनी कारोबार सहित खनन और रियल स्टेट में दोनों राज्य के कई राजनेताओं और  ब्यूरोक्रेटस का काला धन लगा था जो पोंटी चढ्ढा के मरने के बाद डूब गया है।
पोंटी चढ्ढा की वेव कम्पनी में मात्र व्यवसायिक घरानों का ही नहीं बल्कि राजनेताओं और अधिकारियों का काला धन भी लगा था। यह बात केवल या तो पोंटी चढ्ढा ही जनता था या फिर काला धन लगाने वाले अधिकारी और राजनेताओं को ही पता था, कि उन्हांेने कितना पैसा लगाया है। हालंाकि, अब इस बात के कोई सबूत नहीं है कि पोंटी की कम्पनियांे में किसका कितना धन लगा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ पोंटी के मरने के बाद आर्थिक नुकसान उसके परिवार को भी हुआ है। एक जानकारी के अनुसार पोंटी  की काली कमाई का करोडों रूपया कई व्यवसाय में लगा हुआ था। पोंटी की हत्या के बाद यह धन भी डूब गया है जानकारों का कहना है कि काली कमाई से अर्जित किया गया धन या तो मरने वाले के साथ डूब जाता है और इस तरह के धन को लगाने वाले भी खुल कर सामने नहीं आ पाते हैं। इनका कहना है कि जिन नेताओं और अधिकारियों ने पोंटी की कम्पनी में काला धन लगाया था उन्होने अपने कार्यकाल में पोंटी से शराब और चीनी मिल की खरीद में अरबों कमाए। सूत्रों का यह तक कहना है, कि उत्तराखंड की सरकारी क्षेत्र की चार चीनी मिलों को घाटे वाली बताकर पोंटी को पीपीपी मोड़ में देने की तैयारी हो चुकी थी लेकिन मामला खुल जाने के बाद सरकार की यह योजना धरी की धरी रह गई।
  जानकारों का कहना है कि जिन नेताओं और अधिकारियों का काला धन डूबा है उनके घरों में पोंटी के मरने के बाद से मातम का माहौल है। उनकी बिडम्बना है कि वे अपना दुःख न किसी को बता सकते हैं और न यह कह सकते हैं कि पोंटी के साथ उनका पैसा भी डूब गया।


पोंटी की कार से मिला पांचवा फिंगर प्रिंट कहीं आईएएस का तो नहीं!


पोंटी की कार से मिला पांचवा फिंगर प्रिंट  कहीं आईएएस का तो नहीं!
सरकार करे आईएएस की जांच: हरीश रावत
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 25 नवम्बर। उत्तराखण्ड के आईएएस का पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड से संबंध हो न हो, लेकिन केंद्रीय मंत्री हरीश रावत का  कहना है कि सरकार को इस मामले की जांच करनी चाहिए कि आखिर आईएएस का नाम क्यों आ रहा है, वहीं दूसरी ओर सूत्रों ने जानकारी दी है कि दिल्ली क्राईम ब्रंाच द्वारा इस बात की तस्दीक हो चुकी है कि पोंटी चढ्ढा के साथ सुखदेव सिंह नामधारी व उनका गनर और ड्राईवर साथ थे। वहीं सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार क्राईम ब्रांच को पोंटी चढ्ढा की गाड़ी से चार लोगों के फिंगर प्रिंट के निशानों का मिलान तो किया जा चुका है और क्राईम ब्रांच इस खोज में लगी है कि आखिर पोंटी चढ्ढा के साथ वह पांचवा व्यक्ति कौन था, जिसकी उंगलियों के निशाने पोंटी चढ्ढा की गाड़ी से क्राईम ब्रांच को मिले हैं। इतना ही नहीं जानकारी तो यहां तक मिली है कि राज्य का चर्चित आईएएस उस दिन दिल्ली में था और दोपहर में उसके ओपन यूनिवर्सिटि के वीसी के चयन को लेकर बैठक बुलाई थी, लेकिन सभी अधिकारियों के बैठक में आने के बावजूद राज्य का यह चर्चित आईएएस उस बैठक में नहीं पहुंचा था। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि जिस समय पोंटी चढ्ढा और उसके भाई हरदीप चढ्ढा की हत्या हुई ठीक इसी समय अंतराल पर बैठक का समय निर्धारित किया गया था और चर्चित आईएएस ने बैठक में उपस्थित अधिकारियों को यह निर्देश भी दिए कि वह बैठक कर लें और बैठक के मिनट्स पर वह हस्ताक्षर कर देगा। सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हो रहा है कि चर्चित आईएएस बैठक बुलाने के बावजूद बैठक में क्यों नहीं गया और जिस समय पर अधिकारियों द्वारा बैठक की जा रही थी, उस समय वह अधिकारी कहां था। सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि उक्त घटना के समय यह चर्चित आईएएस पोंटी चढ्ढा और सुखदेव सिंह नामधारी के साथ उनकी कार में मौजूद था। इतना ही नहीं सूत्रों ने तो यहां तक जानकारी दी है कि घटना के बाद यह चर्चित आईएएस हवाई जहाज से सीधा देहरादून आ गया और देहरादून में आईएएस बनाम आईपीएस के क्रिकेट मैच में शामिल हो गया।
    वहीं इस मामले पर आज जब केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने यह पूछा गया कि पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड में प्रदेश के एक चर्चित आईएएस का नाम सामने आ रहा है, तो उन्होंने साफ कहा कि सरकार को जांच करनी चाहिए कि उस दिन कौन आईएएस दिल्ली में था और आखिर वह कौन आईएएस के जिसकी तरफ उंगलियां उठ रही है।

मेरा नाम आया सबकी पोल खोल दूंगा: आईएएस!

मेरा नाम आया सबकी पोल खोल दूंगा: आईएएस!
पोंटी चढ्ढा मर्डर केस की अब दिल्ली क्राइम ब्रांच करेगी जांच
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 24 नवम्बर । दिल्ली पुलिस द्वारा उत्तराखंड के अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी की गिरफ्तारी के बाद पोंटी चढ्ढा हत्याकांड में एक नया मोड़ आ गया है। शनिवार को इस हाईप्रोफाईल मामले की जांच दिल्ली पुलिस से हटाकर दिल्ली क्राइम ब्रांच को सौंप दी गयी है। नामधारी की गिरफ्तारी के तुंरत बाद इस मामलें की जाचं क्राइम ब्रांच को दिये जाने से कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार नामधारी के इस मामले में संलिप्ता को लेकर पूछताछ के दौरान पुलिस को कई अहम जानकारियां हाथ लगे है। सूत्रों ने बताया कि हरदीप चडढा के फार्महाउस में जबरन घुसकर कब्जा करने के दौरान तीन दर्जन लोगों का लीडर सुखदेव सिंह नामधारी का मामा हरदयाल सिंह बताया
जा रहा है। नामधारी की गिरफ्तारी से पहले उसकी तलाश की जा रही थी, लेकिन वह फरार हो गया। सीनियर पुलिस अफसरों ने बताया कि साउथ डिस्ट्रिक्ट पुलिस की टीम उत्तराखंड के बाजपुर से पहले वहां रामपुर में दबिश डालने पहुंची थी।
हरदयाल सिंह रामपुर में रह रहा था पार्टी लेकिन पुलिस टीम के वहां पहुंचने से पहले ही वह लापता हो गया। पुलिस अनुसार फार्महाउस में पहुंचते ही वहां मौजूद हरदीप सिंह के मैनेजर और कर्मचारियों को आतंकित करने के लिए हरदयाल ने हवाई फायरिंग की थी। उसी ने अपने साथियों को आदेश देकर इन कर्मचारियों को पिटवा कर बंधक बनवाया था। इस हंगामे के बाद वहां पहले लैंड क्रूजर कार में पोंटी और नामधारी आए और बाद में मर्सिडीज में हरदीप पहुंचा था। उस वक्त हरदयाल भी मौके पर मौजूद था। इसी दौरान फायरिंग हो गई। पुलिस ने बताया कि फार्महाउस के गेट पर पोंटी, नामधारी और हरदीप चढ्ढा की मौजूदगी के दौरान हरदयाल सिंह ने फायरिंग नहीं की थी। पुलिस की तहकीकात और चश्मदीदों के बयानों के अनुसार, गेट पर फायरिंग की शुरूआत हरदीप ने की थी। उसने अपनी पिस्टल से पोंटी को सात गोलियां मारीं और जवाब में नामधारी के पीएसओ सचिन त्यागी ने हरदीप को काबाईन से दो गोलियां मारीं। पोंटी की मौत ज्यादा खून बह जाने से और हरदीप की मौत दिल में गोली लगने की वजह से हुई थी। सचिन इस वक्त महरौली थाने में हिरासत में है। नामधारी को दिल्ली लाने के बाद दोनों के बयानों का मिलान किया जाएगा।
    पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड मामले को लेकर पुलिस आयुक्त दिल्ली द्वारा जांच पुलिस ने हटाकर क्राइम ब्रांच को दिए जाने के बाद, उत्तराखण्ड के चर्चित आईएएस अधिकारी और उसके गुर्गों के हाथ-पांव फूल गए हैं। सूत्रों ने बताया है कि बीते दिन इस चर्चित आईएएस ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को यह धमकी दी डाली थी कि इस मामले में यदि उसका नाम आया तो, वह राजनेताओं की पोल खोल देगा कि उसको पोंटी चढ्ढा किसने भेजा था। यहां यह भी जानकारी सामने आई है कि पुलिस प्रशासन और उत्तराखण्ड शासन के अधिकारी एक बड़े राजनेता के इशारे पर चर्चित आईएएस को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। इतना ही नहीं सूत्रों ने तो यहां तक जानकारी दी है कि इस चर्चित आईएएस अधिकारी ने उत्तराखण्ड में तैनाती के दौरान दिल्ली में अरबों रूपयों की संपत्ति अर्जित की है। इतना ही नहीं दिल्ली, उत्तराखण्ड और हिमाचल में इस चर्चित अधिकारी की अरबों रूपये की कई नामी और बेनामी संपत्तियां भी हैं। मामले में यह भी जानकारी मिली है कि बीते तीन दिन से यह अधिकारी देहरादून में अपने कार्यालय को छोड़कर कहीं अन्य स्थान पे इस मामले पर बारीकी से नजर रखे हुए है।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

चर्चित आइएएस सिडकुल-2 के लिए निवेश मांगने गया था पोंटी के पास!

चर्चित आइएएस सिडकुल-2 के लिए निवेश मांगने गया था पोंटी के पास!
नामधारी की गिरफ्तारी के बाद खुल सकता है आईएएस का चिट्ठा!

राजेन्द्र जोशी
देहरादून। पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड के बाद उत्तराखण्ड सरकार में बैठे एक आईएएस का नाम आने के बाद यह आईएएस बचाव की मुद्रा में आ गया है, इतना ही नहीं सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि नाम आने के बाद उसने मुख्यमंत्री को धमकी भी दे डाली है कि वह इस्तीफा दे सकता है। मामले में पोंटी चढ्ढा के साथ करीबी रिश्तों की बात की तस्दीक इस बात से हो जाती है कि खबरनबीशों को मुंह न लगाने वाला यह आईएएस मीडिया मैनेजमेंट में जुट गया है।
    उल्लेखनीय है कि पोंटी चढ्ढा व उसके भाई हरदीप चढ्ढा की उनके फार्म हाउस में हुई गोलीबारी में मौत के बाद राज्य के इस वरिष्ठ नौकरशाह पर भी पोंटी चढ्ढा के करीबी होने की चर्चाएं तैरने लगी थी। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि पोंटी चढ्ढा से नजदीकी संबंध रखने वाले इस आईएएस की दिल्ली में मौजूदगी दिल्ली पुलिस द्वारा पोंटी चढ्ढा से घटना से तीन दिन पहले हुई वार्तालाप की कॉल डिटेल से निकल चुकी है। राजधानी देहरादून में हो रही चर्चाओं के अनुसार यह आईएएस मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की महत्वकांक्षी योजना सिडकुल-2 के लिए पोंटी चढ्ढा से निवेश की बात करने गया था और इनकी मुलाकात दिल्ली के एक पंच सितारा होटल में हुई थी, चर्चा तो यहां तक है यह आईएएस राज्य में खनन व्यवसाय में पोंटी चढ्ढा को तगड़े मुनाफे का सब्जबाग भी दिखा चुका था। यही कारण है कि वर्तमान में पोंटी चढ्ढा के साथ सुखदेव सिहं नामधारी व तराई क्षेत्र के कुछ विधायक चढ्ढा के खनन कार्याें में हमराह बन गए थे। चर्चाओं के अनुसार इस पार्टी के फोटो दिल्ली पुलिस के हाथ लग चुके हैं लेकिन पांेटी के साथ जहां इस फोटो में सुखदेव सिंह नामधारी दिखायी दिया है वहीं यह चर्चित आइएएस उनसे दूरी पर खड़ा है।
    जहां तक पोंटी चढ्ढा के साथ घटना के दौरान मौजूद रहे और पोंटी चढ्ढा की ओर से दिल्ली के छतरपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने वाले सुखदेव सिंह नामधारी का सवाल है, नामधारी ने शुक्रवार को बाजपुर में एक पत्रकार वार्ता में साफ कर दिया है कि उनको राजनैतिक विद्वेश के चलते फंसाया जा रहा है और वे कहीं भागे नहीं है और न ही वे भूमिगत हुए हैं और उन्होंने साफ कहा है कि वे कहीं छिपे भी नहीं हैं, वहीं नामधारी के इस ताजे बयान के सामने आने के बाद अब यदि दिल्ली पुलिस नामधारी को पूछताछ के लिए हिरासत में लेती है तो ऐसे में नामधारी से पूछताछ के दौरान पोंटी चढ्ढा और प्रदेश के इस चर्चित आईएएस के संबंधों का खुलासा हो सकता है। जहां तक सूत्रों ने जानकारी दी है, यह चर्चित आईएएस ऊंचे पदों पर बैठे राजनेताओं के निर्देशों के पालन करने के तहत पोंटी चढ्ढा से मिलने दिल्ली गया था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सैफ विंटर गेम्स 2010 सहित महाराणा प्राताप स्टेडियन के अंतर्गत नवनिर्मित आईस रिंग के निर्माण में घोटाले सहित कई अन्य घोटालों में चर्चित रहा यह आईएएस अब उत्तराखण्ड में मुख्य सचिव बनने की जुगत में लगा है। क्योंकि प्रमुख सचिव विनीता कुमार के बाद यह आईएएस प्रोन्नति सूची में सबसे उपर के ग्रेड पर है। इनका मुख्य सचिव बनने में विनीता कुमार ही सबसे बड़ा रोड़ा हैं और वे एक-दो महीने के भीतर सेवानिवृत्त होने वाली हैं, जहां तक मुख्य सचिव आलोक कुमार जैन की बात की जाए तो वें वर्तमान में केंद्र पर प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए आवेदन कर चुके हैं और उनका आवेदन स्वीकार भी हो चुका है, ऐसे में यह चर्चित आईएएस प्रदेश का मुख्य सचिव भी बन जाए इसमें कोई हैरत की बात नहीं। वहीं सूत्रों ने बताया है कि राजधानी में तैनाम ब्यूरोक्रट्स का एक वर्ग यह नहीं चाहता है कि भ्रष्टाचार में लिप्त रहा यह अधिकारी राज्य का मुख्य सचिव बने, लेकिन दबी जुबान से कुछ आईएएस अधिकारी यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि प्रदेश में सत्तारूढ़ दलों के लिए इनसे बढ़ा फण्ड मैनेजर किसी भी सरकार को नहीं मिल सकता।
    पोंटी चढ्ढा मामले में निशाने पर आने के बाद खबरनबीशों से सीधे मुंह बात न करने वाला यह आईएएस बुला-बुलाकर चाय की दावतें ही नहीं दे रहा है, बल्कि उन्हें बड़े-बड़े विज्ञापनों को देने का भी सपने दिखा रहा है, लेकिन मीडिया एक वर्ग राज्य में पनपते भ्रष्टाचार से आजिज़ है और वह यह नहीं चाहता कि किसी भी कीमत पर यह आईएएस प्रदेश का मुख्य सचिव बने।