मंगलवार, 23 जुलाई 2013

पोल खुलने की डर से हादसे की जांच कराने से मुकरी सरकार !

पोल खुलने की डर से हादसे की जांच कराने से मुकरी सरकार !
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 11 जुलाई। उत्तराखण्ड में 16-17 जून को आई भीषण तबाही का सच आखिर क्यों छिपाना चाह रही है सरकार यह सवाल प्रदेशवासियों जेहन में बार-बार कौंध रहा है। मुख्यमंत्री द्वारा केदारनाथ हादसे पर जांच न बैठाए जाने की घोषणा के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि प्रदेश सरकार कुछ तो छिपा रही है। लोगों का तो यहां तक कहना है कि इस तबाही की जिम्मेदार प्रदेश सरकार है और वह क्यों जांच कराएगी।
    मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के ताजा बयान कि ‘‘केदारनाथ हादसे की जांच नहीं होगी‘‘ पर जहां एक ओर राजनैतिक माहौल गरमा गया है, वहीं प्रदेशवासी भी मुख्यमंत्री की इस घोषणा से खासे नाराज हैं। प्रदेशवासी जानना चाहते हैं कि यह दैवीय आपदा थी या प्राकृति प्रकोप। वहीं देश यह भी जानना चाहता है कि हादसे में मरने वालों की संख्या सरकार द्वारा बताए गए मरने वालों की संख्या से कहीं ज्यादा है। वहीं सरकार यह भी बहाना बनाकर अपनी नाकामी को छिपाना चाह रही है, जो उसने आपदा से चार दिन तक हाथ पर हाथ धरे बैठे किया। वहीं कई सवाल अब भी खड़े हैं, जिनका जवाब सरकार को देना होगा कि जब 17 जून को हैलीकाप्टर पाईलेट ने प्रदेश के प्रमुख सचिव राकेश शर्मा को सूचना दे दी थी कि केदारनाथ में भारी तबाही हुई है, तो सरकार 19 तारीख तक क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठे रही, वहीं यह सवाल भी उठ खड़ा हो रहा है कि चार धाम यात्रा शुरू होने के दौरान ही सरकार ने रूद्रप्रयाग जिले से युवा जिलाधिकारी को क्यों बदला। उल्लेखनीय है कि डा. नीरज खैरवाल के स्थान पर प्रदेश सरकार ने विजय ढ़ौंडीयाल को आपदा से कुछ ही दिन पूर्व रूद्रप्रयाग जिले का जिलाधिकारी बनाया था। वहीं यह सवाल भी उठ खड़ा हो रहा है कि 16-17 जून हादसे के बाद जब जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग विजय ढ़ौंडीयाल की तबीयत खराब हुई तो पांच दिनों तक रूद्रप्रयाग जिले को बिना जिलाधिकारी के क्यों रखा गया। वहीं यह भी एक सवाल उठ खड़ा हो रहा है कि हादसे से दो दिन पूर्व केदारनाथ में खच्चरों की हड़ताल के चलते जब भारी संख्या में वहां यात्री एकत्रित होने शुरू हो गए तो प्रशासन ने यात्रियों को वहां से निकालने के प्रयास क्यों नहीं किए। यदि जिला प्रशासन द्वारा अथवा प्रदेश सरकार द्वारा यात्रियों को वहां से निकाल लिया जाता तो हादसे में कम मौते होती। वहीं यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि जब केदारनाथ में खच्चर और घोड़े वालों की हड़ताल जारी थी, ऐसे में फाटा और अगस्तमुनी से हैलीकाप्टरों के उड़ान पर किस अधिकारी द्वारा रोक लगाई गई। वहीं यह सवाल भी सामने आ रहा है कि किस मंत्री के निर्देश पर ऋषिकेश से चार धाम यात्रा के लिए बनी संयुक्त रोटेशन यातायात समिति को भंग किया गया। यहां यह भी जानकारी सामने आई है कि समिति के भंग हो जाने के बाद चार धाम, दो धाम और एक धाम यात्रा पर गए वाहनों में यात्रियों की सूची नहीं थी, जिससे यह पता चल पाए कि कौन सा वाहन रूद्रप्रयाग से केदारनाथ मार्ग पर गया और उसमें कितने यात्री और कहां के यात्री सवार थे। यह सवाल भी निकलकर आया है कि सरकार के पास चार धाम यात्रा पर गए यात्रियों का कोई लेखा जोखा नहीं है। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. रमेश पोखरियाल निशंक सहित नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट सहित समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद बड़थ्वाल व जनता दल यूनाईटेड के नेताओं ने सरकार से केदारनाथ हादसे पर श्वेत पत्र की मांग की है। भाजपा सहित तमाम राजनैतिक दलों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह जान बूझकर अपनी कमियांे को छिपाने को लेकर केदारनाथ हादसे की जांच करने से पीछे हट रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार को पता है कि उसने हादसे के दौरान आपदा एवं राहत कार्याें को लेकर लापरवाही बरती है। वहीं प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाठकर ने उत्तराखण्ड में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि आपदा के वक्त राहत एंव बचाव कार्य में सरकार पूरी तरह नाकाम रही है, सरकार के अधिकारी गलत बयानबाजी कर गलत आंकड़े पेश कर रहे हैं, इतना ही नहीं सरकारी तंत्र राहत सामग्री लेकर पहुंच रहे लोंगों और संस्थाओं के बीच समन्वय बनाने तक में नाकाम साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि आपदा के बाद पहाड़ के लोगों का सब कुछ बर्बाद हो गया है, लेकिन सरकार अभी भी हाथ पर हाथ धरे बैठी है। उन्होंने कहा कि पहाड़ के दुर्गम इलाकों में लोग भूखे हैं, जिन क्षेत्रों में राहत सामग्री बांटी जा रही है, वह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने आपदा की विस्तृत जांच किए जाने की मांग भी की। उन्होंने सरकार के अधिकारियों पर आरोप भी लगाया कि वे राहत लेकर आ रहे लोगों को अब मदद न किए जाने की बात कहकर वापस लौटा रहे हैं। वहीं बुद्धिजीवीयों का कहना है कि सरकार को केदारनाथ त्रासदी पर एक जांच आयोग का गठन कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हों।