बुधवार, 4 सितंबर 2013

हजारों बच्चों को राहत सामग्री नहीं स्कूल चाहिए

हजारों बच्चों को राहत सामग्री नहीं स्कूल चाहिए

देहरादून। हमें राहत सामग्री की नहीं बल्कि पढ़ने के लिए एक स्कूल चाहिए ताकि हम अपनी पढ़ाई जारी रख सकें....ये उदगार सिर्फ एक बच्चे के नहीं बल्कि जनपद के उन हजारों बच्चों के हैं जो 16-17 जून की आपदा के कारण अपना स्कूल खो चुके हैं। आपदा से प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में हुई भारी तबाही में जहां आम जनमानस ने अपना घरबार सब कुछ खो दिया है वहीं देश का भविष्य कहे जाने वाले नौनिहालों ने अपना घर तो खोया ही है साथ ही खो दिये है अपने स्कूल। जो कि उनके सुनहरे भविष्य की नींव थे। आपदा के कारण जनपद के 176 विद्यालय पूर्ण तथा आशिंक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके है इन विद्यालयों में पढ़ने वाले ढ़ाई हजार से अधिक बच्चे अपनी पढ़ाई से वंचित हो गये है। इन बच्चों का भविष्य अंधकारमय बना हुआ है। हालांकि प्रशासन द्वारा इन बच्चों को पढ़ने के लिए स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था तो की गई है लेकिन शिक्षकों और विद्यालय के अभाव में इन बच्चों का क्या होगा कहा नहीं जा सकता है। कतिपय स्थानों पर तो बच्चों के स्कूलों में आपदा राहत शिविर बनाए गये है ऐसे में यहां पर पठन-पाठन की व्यवस्था होना संभव नहीं है। बच्चों के भविष्य के साथ कुदरत ने यहीं एक खिलवाड़ नहीं किया है बल्कि विद्यालयों के क्षतिग्रस्त हो जाने से बच्चों के स्कूली डक्यूमेंटस भी खो चुके है अब ये कागजात कैसे बनेगें यह भी एक बड़ा सवाल बच्चों और उनके अभिभावकों के सामने मुंह बाये खड़ा है।
जनपद चमोली में आई आपदा को दो माह से अधिक का समय गुजर गया है लेकिन अभी भी लोगों की परेशानी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। जहां प्रभावित लोग फिर से जन-जीवन को पटरी पर लाने के लिए मसकत कर रहे तो वहीं उनके नौनिहालों जो पढ़ाई से भी वंचित हो रहे है, उनके भविष्य को लेकर भी चिंतित है। आपदा ग्रस्त क्षेत्र भ्यूंडार के बच्चों का कहना है कि उनके परिवारों को राहत सामग्री तो भरपूर मिल है और मिल रही है, लेकिन अब उनके सामने पढ़ाई का संकट पैदा हो गया है प्रशासन से उनकी गुहार है कि वह उनके लिए एक स्कूल की व्यवस्था कर दे साथ ही उनकी फीस माफ तथा प्रशिक्षण संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करने की सुविधा मुहैया करवा दे। इन बच्चों का दर्द तो देखिये ये पढ़ने के लिए इतने लालायत है गांव की स्कूल क्षतिग्रस्त होने के बावजूद भी अपने गांव से कई-कई किमी दूर पैदल चल कर अपनी जान जोखिम में डाल स्कूलों तक पहुंच रहे है। जंगलों के विहड़ रास्तों से होकर ये बच्चे स्कूल तक तो पहुंच रहे हे लेकिन स्कूल की हालत ऐसी नहीं है कि वह वहां पठन-पाठन कर सकें बच्चों का यहां तक कहना है कि उन्हें जंगलों के रास्ते मुश्किल से स्कूल पहंुच तो रहे है लेकिन डर लगा रहता है कि कहीं रास्तें में जंगली जानवर हमला न कर दें। इन विहड़ रास्तों पर बारिश के साथ चटानों से पत्थर भी बरस रहे हैं ऐसे में स्कूल तक पहुंचना इन बच्चों के लिए एवरेस्ट की चोटी फतेह करने से कम मुश्किल भरा नहीं है।
ऐसा नहीं है कि अभिभावक अपने बाल्कों के भविष्य को लेकर तथा उनके द्वारा तय किये जा रहे विहड़ रास्तों से स्कूल पहुंचने तक के सफर से अनजान है और वे इसके प्रति सजग नहीं है लेकिन बच्चों की पढ़ाई के प्रति रूचि और लगन के सामने उनकी एक नहीं चल रही है हालांकि विद्यालय प्रशासन बारिश के दिनों में बच्चों को स्कूल न आने की हिदायत दे चुके है वे भी बच्चों के लिए चिंतित है कहते है कि जान है तो जहान है पढ़ाई के लिए जीवन होना आवश्यक है। अभिभावक भी प्रशासन की लापरवाही को लेकर चिंतित है । उनका कहना है कि यदि बच्चों को किसी सुरक्षित स्थानों पर पढ़ाई की व्यवस्था हो जाती तो उन्हें भी राहत मिल जाती।  
आपदा ग्रस्त क्षेत्र में कुल 176 विद्यालय पूर्ण रूप से क्षतिग्ररूस्त हो चुके है इन विद्यालयों के छात्रों के पठन-पाठन की व्यवस्था जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक का कहना है कि उनके द्वारा संबंधित क्षेत्र के खंड विकास अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे बारीश में स्कूल चलाने की कदापि भी इजाजत न दें साथ स्कूलों के प्रधानाचार्यों को भी इस हेतु दिशा निर्देश दिये गये है। साथ प्रभावित विद्यालयों के बच्चों को पढ़ने समुचित व्यवस्था के लिए पूरी तरह से कार्य किया जा चुका है।