शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

मुख्यमंत्री का काउंट डाउन शुरू : सामान पैक करने में कितना समय लगेगा : साहब आधा घंटा

राजेन्द्र जोशी
बीते दिन प्रदेश प्रभारी अम्बिका सोनी से प्रदेश के मुख्यमंत्री की  सिर्फ पांच मिनट की मुलाकात ने यह साफ़ कर दिया ही की अब विजय बहुगुणा प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ज्यादा दिन नहीं बैठ पायेंगे क्योंकि हवा का रुख भी कुछ इसी तरह का है और ये बात मुख्यमंत्री भी खुद समझ चुके है कि  अब वो ज्यादा दिन उस कुर्सी पर नहीं बैठ पाएंगे शायद तभी उन्होंने अपने आवास पर कर्मचारियों को भले ही मजाक के लहजे में कहा कि  यदि मेरा सामान पैक करना हो तो कितना समय लगेगा तो कर्मचारियों ने कहा साहब कुल आधा घंटा , कर्मचारियों के जवाब पर वो सकपकाते हुए बोले कि  बस इतना कम समय तो कर्मचारी बोले साहब आपके तो केवल कपडे ही तो यहाँ हैं बाकि तो सारा सामान सरकारी है। यह बात प्रमाणित करती है कि  ये वो भी मान चुके हैं कि  वे अब ज्यादा दिन मुख्यमंत्री नहीं रह पायेगे।
   उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद गुजरिश्ता 13  सालों में उत्तराखंड राज्य में सात  मुख्यमंत्री बन चुके हैं और एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सत्ता के गलियारों से ताजा हवा निकल रही है। लगातार मीडिया में सुर्खियां बन रहे इस मुददे पर मुख्यमंत्री कैंप का मौन, यह बताने के लिए काफी है कि नेतृत्व परिवर्तन का यह धुंआ बिना आग के हवा में यों ही नहीं तैर रहा है। दरअसल मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की ताजपोशी के बाद से ही विरोध के सुर तेज हो गये थे, किसी तरह एक साल पूरा हो पाया था कि जून मध्य में आये जल प्रलय ने सरकार को हिलाकर  दिया। हालांकि शुरूआती हीलहवाली के बाद राहत व बचाव कार्य तो कर दिया गया लेकिन इस दौरान सरकार की जो भूमिका रही, वो आपदा के पहले दिन से ही सवालों के घेरे में घिरी रही।
स्थानीय लोगों के पुर्नवास का मामला अधर में लटकना भी मुख्यमंत्री की नाकामी में गिना जा रहा है। यह मुददा आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पर भारी पड सकता है। सरकार व संगठन के बीच के फासले व राज्य के बडे काग्रेसी नेताओं के बीच अपसी खींच तान ने मुखिया की परेशानी बढा दी है। शायद इस बात को समझते हुए ही नये निजाम को कुर्सी पर बैठाने की कवायद की जा रही है। लेकिन पांच राज्यों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो जाने के बाद फिल्हाल मुख्यमंत्री बहुगुणा को इस आफत से राहत मिलती दिखाई दे रही है।
विजय बहुगुणा उस राजनेता के राजनीतिक वारिश हैं जिसने हमेशा सिद्वातों की राजनीति की। हेमवतीनंदन बहुगुणा को कभी भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता था। अपने दम पर वो भारतीय राजनीति का केन्द्र रहे। लेकिन उनके पुत्र व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री के अब तक के कार्यकाल में कभी भी ऐसा नहीं दिखा कि वो एचएन बहुगुणा की विरासत से जुडे हैं। सरकार की कमान संभालने के बाद से शायद ही कभी बहुगुणा सरकार पटरी पर दौडती नजर आई हो। अफरसरशाही के हावी होने की बात की जाती रही है। कभी भाजपा सरकार में सर्वेसर्वा रहा एक अधिकारी इन दिनों कांग्रेस सरकार का थिंकटैंक बना हुआ है। देहरादून हो या दिल्ली यह ब्यूरोक्रेट मुख्यमंत्री बहुगुणा से चिपका दिखाई देता है। असल में मुख्यमंत्री बहुगुणा में राजनीतिक अनुभव की कमी के चलते सरकार न तो जनआकांक्षाओं पर खरी उतर पा रही है और नहीं पार्टी संगठन संतुष्ट हो पा रहा है। पार्टी संगठन से जुडे कुछ नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर गुस्सा शांत करने की कोशिश भी सरकार की छवि सुधारने में मददगार नहीं हो सकती है। इसके अलावा मुख्यमंत्री के सामने सबसे बडी चुनौति पार्टी के कददावर नेताओं को मनाने की है। जो शायद ही मनाये जा सकें।
अब सूबे में नये निजाम के आने की चर्चाएं जोर पकड रही हैं। हालांकि कांग्रेस हाईकमान की ओर से इस संदर्भ में ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है लेकिन कांग्रेस के पार्टी प्रभारी के इस मुददे पर चुप्पी साधने के चलते राजनीतिक समीक्षक अपनी अपनी ओर से अर्थ निकालने में लगे हैं। अब चूंकि पांच राज्यों का चुनाव कार्यक्रम चुनाव आयोग की ओर से घोषित कर दिया गया है ऐसे में अब उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन की गुंजाइश वेहद कम नजर आ रही है। आठ  दिसम्बर को इन राज्यों में मतगणना होगी । इस बीच दिसम्बर माह में पंचायत चुनाव होने हैं। पंचायत चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री बदला जायेगा, इसमें संशय है। हां यह जरूर है कि त्रि स्तरीय पंचायत चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस यदि उम्मीदों के मुताबिक प्रर्दशन करने में नाकाम रही तो, एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की आवाज गुंजने लगेगी। दूसरी ओर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा खेमा भी यही उम्मीद पाले हुआ था कि किसी तरह पांच राज्यों का चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाय और सरकार इस दौरान आपदा प्रभावितों के पुर्नवास के साथ ही कुछ लोककल्याणकारी योजनाओं की घोषणा कर दी जाय, जिससे पार्टी को पंचायत चुनाव में लाभ मिल सके। यह बहुगुणा कैंप की अपनी रणनीति है।
पीडीएफ की भूमिका होगी महत्वपूर्ण: 
राज्य विधान सभा में सत्ताधारी कांग्रेस के 33 सदस्य हैं, जबकि 3  वहुजन समाज पार्टी व 4  निर्दलीय विधायकों का भी सरकार को समर्थन है। इस सबको मिलाकर वर्तमान समय में सरकार को 40  विधायकों का समर्थन है। विपक्षी भाजपा के राज्य विधानसभा में 30  सदस्य हैं। अंकों के खेल के लिहाज से सरकार को समर्थन दे रहे सात विधायकों की नेतृत्य परिवर्तन में अहम भूमिका रहेगी। भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक पीडीएफ नहीं चाहता है कि इतनी जल्दी नेतृत्त में बदलाव हो। बहुगुणा कैंप को यूनाईटेड डेमोकेटिक फं्रट के सात विधायकों का भी सर्मथन है। फं्रट के नेता व सूबे के माध्यमिक शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी का कहना है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन से पहले फं्रट से उनकी राय भी पूछी जानी चाहिए। उनका यह कहना कहीं न कहीं मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए राहत अवश्य है।
तो क्या पंचायत चुनाव तक मिला है अभयदान:
लोगों की उम्मीदों पर खरा न उतरने के आरोप में घिरे मुख्यमंत्री बहुगुणा को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तक अभयदान मिल गया है। हालांकि विरोधी गुट की ओर से हर हाल में नेतृत्व परिवर्तन की बात को सही ठहराया जाता रहा। यहां तक की श्राद्घ पक्ष के तुरंत बाद मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चाएं खूब चली। वकायदा तिथि तक गिनाई जाने लगी, लेकिन चर्चाओं से आगे मामला नहीं बढा। अब कयास लगाये जा रहे हैं कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बदलना तय है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस को जोर का झटका लगेगा। सरकार की हर मोर्चे पर विफलता व पार्टी के अंदर शीर्षस्थ नेताओं के अंर्तविरोध के चलते विपक्षियों का काम आसान हो जायेगा। लेकिन सवाल फिर वही कि क्या त्रिसस्तरीय चुनाव में हार के बाद कांग्रेस हाई कमान सूबे में नेतृत्व परिवर्तन करेगा।