मंगलवार, 4 नवंबर 2014

नहीं थम पा रही पहाड़ी गांवों से पलायन की गति

पलायन को रोकने के लिए ठोस नीति नहीं बना पाई सरकार 

राजेन्द्र जोशी
देहरादून । राज्य गठन के बाद भी पहाड़ के गांवों से पलायन की गति कम नहीं हो पाई है। पलायन कम होने के बजाए पिछले चैदह वर्षों में और तेजी से बढ़ा है। पहाड़ के गांवों से लोग सुख-सुविधाओं और रोजगार के अभाव में तेजी से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं जिस कारण गांव खाली होते जा रहे हैं। गांव खाली होने से घर खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। सरकार को पहाड़ के उजड़ते गांवों और बंजर होते खेतों की कोई चिंता नहीं है। गांवों से पलायन को रोकने की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है। 
    राज्य गठन को चैदह वर्ष होने को हैं, उसके बावजूद उत्तराखंड के गांवों के विकास के लिए कोई ईमानदार पहल नहीं हुईं। गांवों में पानी, स्वास्थ्य, ईंधन, बिजली, सड़क, संचार, शिक्षा, रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। पेयजल किल्लत के चलते कई गांवों में लोगों को आज भी आधा से दो किमी दूर से पानी ढोना पड़ता है। पेयजल समस्या के कारण लोग पशुओं को बेच रहे हैं, जिस कारण पहाड़ के गांवों में दुग्ध उत्पादन सिमटता जा रहा है। अधिकांश गांवों में अभी भी ईंधन का जरिया लकड़ी है, लोग लकड़ी जलाकर भोजन बनाते हैं। वन विभाग की सख्ती के चलते ग्रामीणजनों को वनों से लकड़ी भी नहीं मिल पा रही है, जिस कारण लोगों के लिए खाना बनाना मुश्किल होता जा रहा है। पहाड़ों में सिंचाई का कोई साधन नहीं है, सिंचाई पूर्ण रूप से इंद्र देव की कृपा पर निर्भर है। सिंचाई साधनों के अभाव में लोग खेती-बाड़ी छोड़ने को मजबूर हैं, जिस कारण खेत बंजर होते जा रहे हैं। पहाड़ के कई गांवों का अभी विद्युतीकरण नहीं हो पाया है, जिस कारण लोगों को जिंदगी अंधेरे में काटनी पड़ती है। पहाड़ के 70 प्रतिशत गांव सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाए हैं, जिस कारण लोगों को कई किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। जिन गांवों के लिए सड़कें स्वीकृत हुई भी हैं उनमें से कई गांवों में वन भूमि आड़े आने से सड़कों का निर्माण कार्य अधर में लटका हुआ है। 
   ज्यादातर गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। मरीज को इलाज के लिए कुर्सी या चारपाई पर कई किमी की पैदल दूरी तय कर अस्पताल ले जाना पड़ता है। समय पर स्वास्थ्य सुविधा न मिलने से कई बार मरीज की रास्ते में ही मौत हो जाती है। ग्रामीण इलाकों में जो अस्पताल हैं भी उनमें चिकित्सकों का टोटा बना हुआ है। स्कूल हैं तो उनमें शिक्षकों की कमी बनी हुई है, जिस कारण बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं मिल पा रही है। सुख सुविधाओं के अभाव में पहाड़ के गांवों से लोग तेजी से पलायन कर रहे हैं, जिस कारण गांव खाली हो रहे हैं। गांवों में रोजगार के साधनों का अभाव बना हुआ है, पहाड़ के युवा रोजगार की तलाश में तेजी से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। युवाओं के पलायन के कारण पहाड़ के अधिकांश घरों में बजुर्ग लोग ही रह गए हैं। जिन खेतों में कभी फसल लहलाती थी वह बंजर हो गए हैं। पलायन के कारण ज्यादातर घर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। सरकार गांवों के विकास की न कोई नीति बना पाई है और नहीं पलायन को रोकने के प्रति गंभीर है। उद्योग मैदानी जिलों तक ही सीमित रह गए हैं। गांवों में रोजगार के साधन सृजित करने में निति निर्माता दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। यदि सरकार का गांवों के विकास के प्रति यही उदासीन रवैया रहा तो गांवों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। 
   मुख्य मार्र्गों की हालत खतरनाक बनी होने के कारण यहां से निकलने वाले यात्रियों को जोखिम भरा सफर तय करना पड़ता है। लोनिवि बदहाल मार्ग के रखरखाव के प्रति उदासीन बना हुआ है। जौनसार क्षेत्र के साहिया-क्वानू-मीनस, साहिया-समाल्टा-पानुवा, साहिया-हइया, अलसी-ककाड़ी, नराया-लोरली, कोरूवा-क्वाराना आदि मार्गांे की हालत लंबे समय से रखरखाव के अभाव में खस्ताहाल बनी हुई है। कमोवेष यही हालत राज्य के चार धामों की ओर जाने वाले मोटर मार्गों की भी है जो आपदा की त्रासदी के डेढ़ वर्ष से ज्यादा का समय गुजर जाने के बाद आज भी अच्छी हालत में नहीं आ पाये हैं, ज्यादातर मार्गांे के किनारे न सुरक्षा दीवारें हैं और न ही पैराफिट, ऐसे में इन मार्गांे पर सफर करते हुए डर लगता है। मार्गों पर पड़े पत्थरों के ऊपर आए दिनों दुपहिया वाहन सवार चोटिल हो रहे हैं। जगह-जगह पर मलबा पड़ा हुआ है। सड़क पर पड़ा मलबा दुर्घटनाओं को न्योता दे रहा है .