शनिवार, 4 मई 2013

निकाय चुनाव परिणामों ने हिलाई बहुगुणा की कुर्सी की चूलें!

निकाय चुनाव परिणामों ने हिलाई बहुगुणा की कुर्सी की चूलें!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। स्थानीय निकाय चुनाव के परिणामों के नतीजों ने मुख्यमंत्री बहुगुणा की कुर्सी की चूलें तक हिला दी हैं। भले ही मुख्यमंत्री बहुगुणा इन परिणामों को हल्के में ले रहे हों, लेकिन यह बात सरे आम है कि चुनाव परिणामों की गूंज दिल्ली दरबार तक पहुंच गई है। इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनाव की घोषणा से कुछ ही दिन पहले राजधानी देहरादून आए कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नसीहत भी उत्तराखण्ड कांग्रेसियों को रास नहीं आई। इसका यह परिणाम रहा कि कांग्रेस ने तराई क्षेत्र में स्वंय बनाए नगर निगमों तक में अपना खाता नहीं खोला।
    प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखण्ड के इन चुनाव परिणामों से राहुल गांधी काफी मायूस हैं और उनकी इस मायूसी की गाज़ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर गिर सकती है, क्योंकि देशभर में आने वाले वर्ष में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में उत्तराखण्ड में कांग्रेस को मिली हार की प्रतिछाया वह लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ने देना चाहेंगे। उत्तराखण्ड के चुनावों की हलचल दिल्ली में भी दिखाई दे रही है। राज्य में चुनाव परिणामों को लेकर कांग्रेस फिलहाल कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव के सम्पन्न होने तक नहीं करेगी। कर्नाटक में पांच मई को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा, इसके बाद ही उत्तराखण्ड के चुनाव नतीजों पर कांग्रेस के भीतर विचार-विमर्श होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। सबसे खास बात यह है कि उत्तराखण्ड में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के तमाम झण्डावरदार नेता अपने ही क्षेत्रों में अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को नहीं जीता पाए हैं। इस स्थानीय निकाय चुनाव में जहां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनके परिवार ने जहां देहरादून नगर निगम के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर लड़ा था, वहीं हल्द्वानी क्षेत्र से कैबिनेट मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश पाठक ने अपने पुत्र की जगह हेमंत बगड़वाल को पहली बार नगर निगम बने हल्द्वानी में मेयर का चुनाव लड़ाया, वहीं रूड़की और हरिद्वार में भी कांग्रेस की रणनीति फेल साबित हुई है, हालांकि कांग्रेस सरकार में केंद्रीय नेता हरीश रावत यह कह रहे हैं कि चुनाव में उतारे गए प्रत्याशियों का नाम उनकी इच्छा से नहीं फाईनल किया गया, लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में हरिद्वार और रूड़की में मिली हार को उन्हें न चाहते हुए भी स्वीकार करना होगा। इतना ही नहीं पर्वतीय क्षेत्र की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में कांग्रेस द्वारा प्रचारित किए जा रहे गैरसैंण को लेकर भी कांग्रेस को निराशा मिली है, वहां की जनता ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को नकार कर निर्दलीय प्रत्याशी को नगर पंचायत की बागडोर सौंपी है। वहीं पौड़ी में भी सतपाल महाराज का प्रभाव नहीं चल पाया, वहां भी निर्दलीय प्रत्याशी व पूर्व विधायक यशपाल बेनाम एक बार फिर नगर पालिका में पहुंचे हैं।
    कुल मिलाकर उत्तराखण्ड में स्थानीय निकाय चुनावों को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दल लोकसभा चुनाव के रिहर्सल बता रहे थे और चुनाव परिणामों ने काफी हद तक तस्वीर भी साफ कर दी है कि वह राजनैतिक दलों के छलावे में आने वाले नहीं है और प्रदेश सरकार को इस बात का भी जनता ने संदेश दिया है कि विकास के हवाई वादों से जनता को कोई सरोकार नहीं है।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

पुलिस अधिकारी दुराचार मामले में पुलिस गहरी नींद में

पुलिस अधिकारी दुराचार मामले में पुलिस गहरी नींद में
ऐसे तो मित्र पुलिस से उठ जाएगा महिलाओं का विश्वास!
देहरादून। उत्तराखण्ड में महिलाएं कितनी महफूज हैं, यह बात प्रदेश पुलिस बड़े-बड़े बैनर और नारे देकर तो कर सकती है, लेकिन यथार्थ में ऐसा कुछ नहीं है। जहां दिल्ली में बीती दिसंबर व इस माह एक युवती व बालिका से बलात्कार के बाद समूचा जनमानस इस अपराध के खिलाफ सड़कों पर उतर गया था, वहीं राज्य में एक पुलिस अधिकारी द्वारा महिला के साथ दुराचार के बाद राज्य के समाजिक संगठन व पुलिस गहरी नींद में दिखाई दे रही है। दिल्ली में जहां एसपी स्तर के एक अधिकारी द्वारा एक महिला को थप्पड़ मारने पर बर्खास्त किया गया, वहीं उत्तराखण्ड में दुराचार के बाद भी प्रदेश सरकार ऐसे अधिकारी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाई। ऐसे में राज्य में कानून व्यवस्था के रखवाले ही जब भक्षक के रूप में सामने आएंगे तो प्रदेश की जनता का विश्वास प्रदेश की मित्र पुलिस से उठना लाजमी है।
उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिला कि एक युवती ने आवाम की रक्षा के लिए तैनात किए गए एक एसपी सिटी पर चीख-चीखकर खुला आरोप लगाया है कि उसने उसे शादी का झांसा देकर कई बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। 25 दिन से युवती डीजीपी सहित कई पुलिस अधिकारियों से न्याय की भीख मांग रही है कि उसके साथ बलात्कार करने वाले एसपी प्रमेन्द्र डोभाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे इंसाफ दिलाया जाए। हालांकि प्रदेश के अंदर एसपी की ताकत से राज्य के अंदर महिला सुरक्षा के बड़े बड़े दावे तार-तार होते नजर आ रहे है। दिल्ली में एक युवती के साथ हुए गैंगरेप के बाद सरकार के मुखिया व प्रदेश के डीजीपी ने ऐलान किया था कि प्रदेश के अंदर महिलाओं की सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। इतना ही नहीं डीजीपी ने तो यहां तक दावा कर डाला था कि अगर कोई पीड़ित युवती या महिला गैंगरेप या किसी अन्य तरह से पीड़ित हुई है तो उसे थाने तक में जाने की जरूरत नहीं है और वह एक डाक द्वारा शिकायती पत्र थाने में भेजेगी तो तत्काल मुकदमा दर्ज कर
आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। लेकिन लगता है कि प्रदेश में अगर रेप या छेड़खानी का दाग किसी बड़े अफसर पर लगता है तो सारे नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाकर दागी को बचाने का खेल शुरू हो जाता है। सवाल उठ रहा है कि क्या एसपी के लिए प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर कोई अलग कानून बनाया गया है। जिसके चलते बलात्कार का दंश झेल रही युवती को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश में अब तक के सबसे बड़े ईमानदार डीजीपी खामोश होकर क्यों बैठे हुए है, इसको लेकर राज्य के अंदर पुलिस मुखिया की खामोशी पर भी लगातार सवाल उठने शुरू हो गए है। वहीं राज्य में तथाकथित महिला हिमायती संगठनों की भी इस घटना ने पोल खोलकर रख दी है। महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर हो-हल्ला मचाने वाले ये सामाजिक संगठन इस घटना पर क्यों मौन है, यह समझ से परे है।
    गौरतलब हो कि महिलाओं व युवतियों से देश के अंदर हो रहे बलात्कार व छेड़खानी की घटनाओं के चलते सभी एक जुट होकर हवस के दरिंदों को सबक सिखाने के लिए आगे आए हुए है। उनका साफ तौर पर कहना है कि ऐसा कानून बनना चाहिए कि जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। प्रदेश सरकार के मुखिया ने भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस मुख्यालय में एक अलग सेल का गठन कर वहां महिला आईपीएस को तैनात किया था तथा प्रदेश के डीजीपी सत्यव्रत ने पूरे राज्य के पुलिस कप्तानों को फरमान जारी किया था कि वह अपने इलाकों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ठोस से ठोस कदम उठाएं, इतना ही नहीं डीजीपी ने यहां तक दावा कर दिया था कि अगर कोई महिला या युवती ऐसी घटनाओं का शिकार हुई हो तो उसे थाने व चौकी में जाने की कोई जरूरत नहीं है। वह सीध सरकारी डाक से अपनी शिकायत थाने व चौकी में भेज दे, जिसके तुरंत बाद उसकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। राजधानी में महिलाओं की सुरक्षाओं को लेकर बड़े होर्डिंगस सड़कों पर इस कदर लगाए हुए है कि मानो पुलिस ने संकल्प ले लिया हो कि अगर किसी भी महिला या युवती के साथ अश्लीलता होगी तो उसके आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जब हल्द्वानी की एक युवती ने डीजीपी के सामने चीख चीखकर आरोप लगाया कि हल्द्वानी के एसपी सिटी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार यौन शोषण किया है तो खाकी पर लगे अब तक के इतिहास में सबसे बड़े दाग पर पूरा पुलिस महकमा एसपी सिटी को बचाने की गुप्त मुहिम में लगा हुआ है। सवाल उठ रहे है कि डीजीपी साहब, राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस महकमा दोहरा चरित्र क्यों अपना रहा है। क्योंकि अगर यही दाग किसी दरोगा पर लगा होता तो उसके खिलाफ मुकदमा कायम कर उसे जेल तक भेज दिया गया होता। लेकिन जब एक एसपी सिटी पर एक युवती ने 25 दिन पूर्व डीजीपी के सामने लिखित मेें आरोप लगाया कि एसपी प्रमेंद्र डोभाल ने उसे शादी को झांसा देकर उसके साथ यौन शोषण किया और अब वह उसे धमकाकर जान से मारने तक की धमकी दे रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे है कि आखिरकार एक एसपी राज्य में इतना बड़ा हो गया है कि उसके लिए नियम कानून को पुलिस मुख्यालय ने भी ताक पर रख दिया है। युवती को इंसाफ मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन कहीं उसका हाल मधुमिता शुक्ला, भंवरी देवी, गीतिका जैसा न हो जाए, इसकी गारंटी कौन लेगा?
    उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह हल्द्वानी की एक युवती ने वहीं के एसपी सिटी पर शादी का झांसा देकर उससे दुराचार करने की शिकायत डीजीपी के दरबार में पेश होकर इस उम्मीद से दी थी कि उसे न्याय मिलेगा, लेकिन डीजीपी ने इस मामले में मुकदमा न कायम कराकर डीआईजी नैनीताल से जांच कराने की बात कही लेकिन डीजीपी के आदेश से डीआईजी संजय गुंज्याल भी गाफिल है और उनका कहना है कि उनके पास ऐसी कोई जांच नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सीआरपीसी 154 में साफ अंकित है कि किसी शिकायत पर तत्काल मुकदमा कायम कर फिर उसकी की जायेगी, तो जब एक एसपी पर यौन शोषण का खुला आरोप एक युवती द्वारा लगाया गया तो इस मामले में जांच कराने की नौटंकी क्यों की जा रही है। उत्तराखण्ड का पुलिस मुख्यालय वैसे तो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े ढोल पीटता आ रहा है। मुख्यालय में महिला सेल का गठन कर वहां का एक फोन नंबर प्रकाशित किया जिसपर महिलाएं व युवतियां अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। लेकिन यह सेल भी मात्र एक दिखावा बनकर रह गया है। पांच अप्रैल को एक युवती ने डीजीपी के सामने चीख चीखकर कहा कि हल्द्वानी के एसपी प्रमेंन्द्र डोभाल ने उसे शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार दुराचार किया। डीजीपी ने इस मामले की जांच नैनीताल के डीआईजी को सौंपने व 26 अप्रैल को प्रगति का रिमाइंडर भेजने की बात कही थी। लेकिन जब 27 अप्रैल को इस जांच के बारे में डीआईजी संजय गुंज्याल से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि कौन सी जांच की बात कह रहे हो। जब उन्हें हल्द्वानी के एसपी सिटी के खिलाफ मिली जांच के बारे में पूछा गया तो उनका साफ कहना था कि उन्हें इस तरह की कोई जांच नहीं मिली है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यह जांच डीआईजी नैनीताल के पास नहीं है तो फिर यह जांच आखिरकार कहां करा रहा है। 154 सीआरपीसी में साफ तौर पर अंकित है कि संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक इतिला, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक दी गई है तो उसके द्वारा या निदेशाधीन लेखबद कर ली जाएगी और इतिला देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसे इतिला पर चाहे वह लिखित रूप से दी गई हो या पूर्वोत्तफ रूप में लेखबद की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। जो उसे दे, और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो  उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जायेगी जिसे राज्य सरकार इस नियमित चिन्हित करें, प्रविष्ट किया जायेगा। इस धारा की उपधारा 1 के अधीन अभिलिखित इतिला की प्रतिलिपि इतिला देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी।
    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड सरकार एक ओर तो कुमाऊ के एक बड़े आईएएस अधिकारी को भ्रष्टाचार के मामले में निलंबित कर रही है। वहीं प्रदेश के एक एसपी पर यौन शोषण करने का खुला दाग लगने पर सरकार की खामोशी से कई सवाल उठने शुरू हो गए है। कितनी हैरानी वाली बात है कि दिल्ली में एक एएसपी ने जब एक युवती थप्पड़ मारा तो उसे तत्काल निलंबित कर दिया गया था। लेकिन उत्तराखण्ड में 25 दिन पूर्व हल्द्वानी के एसपी सिटी प्रमेन्द्र डोभाल पर वहीं की एक युवती ने आरोप लगाया कि अधिकारी ने उसकेे साथ यौन शोषण किया है, तो भी पूरा पुलिस महकमा इस एसपी को बचाने की जुगत में कहीं न कहीं लगा हुआ है।

दूसरी बार मेयर बने विनोद चमोली, कांग्रेस को 22912 मतों से हराया , कांग्रेस प्रत्याशी धस्माना को जनता ने नकारा

दूसरी बार मेयर बने विनोद चमोली, कांग्रेस को 22912 मतों से हराया
कांग्रेस प्रत्याशी धस्माना को जनता ने नकारा
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 30 अप्रैल। न्यायालय ने कांग्रेस के मेयर प्रत्याशी सूर्यकांत धस्माना को भले ही बरी कर दिया हो, लेकिन जनता की अदालत में वे आज भी राज्य आंदोलनकारियों के मुजरिम हैं। यह बात राजधानी में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में मेयर पद के लिए हुई जंग से साफ हो गई है। राज्य आंदोलनकारी व भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी विनोद चमोली ने कांग्रेस प्रत्याशी सूर्यकांत धस्माना को 22912 के रिकार्ड मतों से हरा दिया, जबकि बहुजन समाज पार्टी को 46889 मत मिल पाए। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 80530 मत मिले, जबकि कांग्रेस को 57618 मत ही मिल पाए। राजधानी देहरादून के 60 वार्डाें के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने 33, कांग्रेस ने 23 जबकि बसपा और निर्दलीयों ने दो-दो वार्डाें पर कब्जा जमाया।
    इस चुनाव में वार्ड 1- राजपुर से भाजपा की रोशन बाला, वार्ड 2- सहस्त्रधारा से भाजपा की नीतू, वार्ड 3- जाखन से दया जोशी भाजपा, र्वाउ 4- हाथी बड़कला भूपेन्द्र कठैत भाजपा, वार्ड 5- आर्यनगर से सरोज भाजपा, वार्ड 6- डोभालवाला से रमेश बुटोला कांग्रेस, वार्ड 7- विजय कालोनी से निखिल कुमार कांग्रेस, वार्ड 8-किशन नगर से नंदनी शर्मा भाजपा, वार्ड 9 डीएल रोड से उषा भाजपा, वार्ड 10-रिस्पना से रानी कौर भाजपा, वार्ड 11-करनपुर से विनय कोहली कांग्रेस, वार्ड 12- बकराल वाडा से डा. बिजेन्द्र पाल कांग्रेस, वार्ड 13- चक्खुवाला अजय सोनकर कां्रगेस, वार्ड 15 घंटाघर से प्रकाश नेगी कांग्रेस, वार्ड 16 रेसकोर्स उत्तर से देवेंद्र पाल सिहं मांेटी कांग्रेस, वार्ड 16 कालिका माता मंदिर मार्ग से चरणजीत कौर भाजपा ने जीत दर्ज की अन्य वाडों की बात की जाए तो वार्ड 19 तिलक रोड़ से सविता ओबराय भाजपा, 20 खुडबुड़ा से अशोक कोहली पप्पू कांग्रेस, 21 शिवाजी मार्ग से विपिन चंचल भाजपा, 22 इंद्रेश नगर से तृप्ता देवी भाजपा, 23 धामावाला से नीनू सहगल कांग्रेस, 24 झंडा बाजार से अजय सिंघल भाजपा, 25 डालनवाला उत्तर से सीमा भाजपा, 26 डालनवाला पूर्वी राजेश चौधरी कांग्रेस, 27 डालनवाला दक्षिणी से राजेश जखमोला भाजपा, 28 अधोईवाला से राजीव कुमार मल्होत्रा कांग्रेस, 29 अधोईवाला दक्षिणी आनंद त्यागी कांग्रेस, 30 भगत सिंह कालोनी से कमली भट्ट भाजपा, 31 राजीव नगर वर्षा बडोनी भाजपा, 32 डिफेंस कालोनी सुशील कुमार कांग्रेस, 33 नेहरू कालोनी से बीना उनियाल भाजपा, 34 धर्मपुर से नीरू भट्ट, 35 दीपनगर से ललित भद्री कांग्रेस, 36 अजबपुर से मनमोहन सिंह कांग्रेस, 37 माता मंदिर मार्ग से सोनू उनियाल कांग्रेस, 38 रेसकोर्स दक्षिणी से राखी बड़थ्वाल भाजपा, 39 रेस्टकैंप से राजकुमार कक्कड़ भाजपा, 40 रीठा मंडी से निर्दलीय प्रत्याशी जाहिदा परवीन, 41 सुशील गुप्ता भाजपा, वार्ड 42 कारगी से अनीता सिहं भाजपा, वार्ड 43 पटेल नगर पूर्व महीपाल धीमान भाजपा, 44 ब्रहमपुरी से सतीश कश्यप भाजपा, वार्ड 45 निरंजनपुर से नीरज सेठी भाजपा, 46 माजरा से गुलिस्ता अंसारी कांग्रेस, 47 टर्नर रोड़ सुनील कुमार कांग्रेस, 48 इंद्रा नगर मीरा भाजपा, 49 द्रोणपुरी से बाबू राम भाजपा, वार्ड 50 कांवली से राजेश पुंडीर कांग्रेस, 51 इंद्र नगर से मीरा कैठत भाजपा, 52 बसंत विहार से अंजू बिष्ट भाजपा, 53 गांधी ग्राम से जगदीश धीमान कांग्रेस, 56 यमुना कालोनी से नेहा गुप्ता भाजपा, 57 गोविंद गढ़ से चरणजीत कौशल कांग्रेस, 58 श्रीदेव सुमन नगर से बीना बिष्ट कांग्रेस, वार्ड 59 बल्लुपुर से शारदा भाजपा और वार्ड 60 कौलागढ़ से गंगा क्षेत्री कांग्रेस ने जीत दर्ज की है।
    गौरतलब हो कि वर्ष 2008 में हुए मेयर के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी विनोद चमोली को 60867, निर्दलीय प्रत्याशी मैडम रजनी रावत को 44294 व कांग्रेस प्रत्याशी सूरत सिंह रावत को 40662 मत मिले थे। चुनाव नतीजों पर यदि नजर डाली जाए तो भाजपा ने इस बार 20 हजार से अधिक मतों पर अपनी पैठ दर्ज की है, जबकि कांग्रेस ने लगभग मात्र छहः हजार मत संख्या की बढ़ोत्तरी की है। जबकि रजनी रावत के मतों में 12 हजार मतों का इजाफा हुआ है।


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

18 सीट की मिनी बस को बना डाला टैक्सी

परिवहन विभाग का कारनामा
लाखों रूपये के राजस्व का लगा रहे हैं प्रदेश को चूना
18 सीट की मिनी बस को बना डाला टैक्सी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखंड के परिवहन विभाग के अधिकारी वाहन मालिकों से मिलकर प्रदेश को यात्री कर के रूप में मिलने वाले लाखों रूपये के राजस्व का चूना लगा रहे हैं। यह घोटाला पिछले तीन साल से चल रहा है, जिस में सरकार को अब तक लगभग करोड़ों रूपये का चूना लगाया जा चुका है। मामले के सज्ञान में आने के बाद अधिकारी वाहन स्वामियों को नोटिस देने की बात तो करते है, लेकिन इस घोटाले के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं, उनका नाम लेने से बच रहे हैं। मामले में परिवहन मंत्री सुरेन्द्र राकेश का कहना है कि इसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। एआरटीओ का कहना है कि तीन साल से चल रहा यह मामला अब पकड़ में आया है। लिहाजा वाहन स्वामियों से इसकी वसूली की जाएगी। लेकिन इस घोटाले के कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं इस पर एआरटीओ चुप्पी साध लेते हैं।
    प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश तथा हल्द्वानी परिवहन कार्यालयों द्वारा टैम्पो ट्रेवलर वाहन, जिनका व्हील बेस 3700 मिलीमीटर होता है और इन वाहनों में यात्री क्षमता 18 लोगों की वाहन निर्माता कंपनी ने बनाई है। राज्य के परिवहन कार्यालयों द्वारा इन 18 सीटर वाहन को सात और 10 सीटों में पर्वतीय मार्गो में चलने के लिए स्वास्थता प्रमाण पत्र के साथ ही परमिट जारी किए गए हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्य सरकार को ऐसे वाहनों से 800 रूपया प्रतियात्री प्रतिमाह प्रतिवाहन का नुकसान हो रहा है। ऐसे में बीते तीन सालों से राज्य को लाखों रूपया का चूना परिवहन विभाग के अधिकारियों द्वारा राज्य को लगाया जा चुका है। एक जानकारी के अनुसार देहरादून और ऋषिकेश परिवहन कार्यालयों द्वारा लगभग 200 ऐसे वाहनों को परमिट जारी किए गए हैं जो सरकार को प्रतिदिन लाखों रूपये का चूना लगा रहे हैं। यह भी जानकारी मिली है इन वाहनों को मध्यम दर्जे के यात्री वाहनों की जगह टैक्सी और मैक्सी कैब में पास किया गया है।
 मामले के सामने आने के बाद उप सम्भागीय परिवहन अधिकारी संदीप सैनी ने बताया कि यह मामला उनके संज्ञान में आया है और इस प्रकरण पर वाहन स्वामियों को नोटिस जारी किये गये हैं लेकिन उन्होंने इस मामले में लिप्त अधिकारियों की जांच पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया कि सरकार को चूना लगाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा। वहीं सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीते पाच मार्च को शासन द्वारा कई परिवहन अधिकारियों की प्रोन्नोती हुई है लेकिन मलाईदार पदो पर बैठे होने के कारण और ऊंची पहुंच के चलते ऐसे अधिकारियों को नई तैनाती नहीं दी गई है।

स्थायी निवास पर राजनीति

स्थायी निवास पर राजनीति
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। कांग्रेस सरकार ने बीते दिन स्थायी निवास की कट ऑफ डेट को लेकर जो शासनादेश जारी किया, उसका कोई औचित्य ही नहीं बनता है, क्योंकि मामला अभी भी हाईकोर्ट की डबल बैंच में विराचाधीन है। नैनीताल हाईकोर्ट के 17 अगस्त 2012 के फैसले के आधार पर बीते दिन सरकार द्वारा स्थायी निवास की जो कट ऑफ डेट पर शासनादेश जारी किया है, वह सिर्फ वर्तमान समय में हो रहे निकाय और पंचायत चुनावों में जनता को रिझाने का एक प्रयास है। नैनीताल हाईकोर्ट की डबल बैंच का निर्णय आने के बाद ही इस मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। सरकार ने भी यह बात अपने शासनादेश में स्वीकार की है।
बीते दिन सरकार द्वारा स्थायी निवास की कट ऑफ डेट को लेकर जारी शासनादेश के खिलाफ अब विरोध साफ देखने को मिल रहा है। वहीं इस मामले में राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि कट ऑफ डेट के मामले में उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देर्शों का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें उसने राज्यों में रहने वाले लोगों की स्थाई और मूल निवास के मामले पर कट ऑफ डेट 1950 तय की थी। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार का यह शासनादेश लोगों को भ्रमित करने वाला है इस शासनादेश में सिर्फ अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को कट ऑफ डेट में छूट देते हुए राज्य गठन की तिथि 9 नवम्बर 2000 की गयी है। जबकि सामान्य वर्ग के लिए यह कट ऑफ डेट राज्य गठन के 15 साल पहले यानि की 1985 ही रखी गयी है। जिसका मतलब है कि जो लोग पिछले 27 से अधिक समय से राज्य में रह रहे है वही राज्य के स्थायी निवासी होंगे। लेकिन सामान्य तौर पर इस शासनादेश के बारे में प्रचारित यहीं किया जा रहा है कि राज्य गठन के समय से राज्य में रह रहे लोगों को राज्य का स्थायी निवासी माना जायेगा। वहीं दूसरी ओर राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि पीढ़ीदर-पीढ़ी जो लोग उत्तराखण्ड में रह रहे हैं और जिन्होंने राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ी, उनके साथ राज्य सरकार छलावा कर रही है, सरकार के इस फैसले से मूल उत्तराखण्ड के निवासियों को कोई लाभ नहीं होने वाला, बल्कि इसका लाभ उन लोगों को मिलेगा, जिन्होंने राज्य आंदोलन की मुखालफत की थी। राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि ऐसी स्थिति में जब अभी हाईकोर्ट द्वारा इस फैसले में किसी भी तरह का परिवर्तन किया जा सकता हैं सरकार द्वारा लाये गये इस शासनादेश का क्या औचित्य है। हालांकि यह यह संपूर्ण प्रकरण नैनीताल उच्च न्यायालय के एकल बैंच द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद अब डबल बैंच में निर्णय के लिए सुरक्षित है। ऐसे में यह कहना गलत होगा कि नैनीताल उच्च न्यायालय के निर्णय को ही अंगिगृत कर लिया जाएगा। क्यांेकि राज्य आंदोलनकारी संगठन और राज्य के दूर-दराज इलाकों में कार्य कर रहे स्वयं सेवी संगठनों द्वारा इस मामले पर डबल बैंच के निर्णय आने के बाद भी राज्यवासियों के हितों के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
वहीं राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रदेश में होने वाले निकाय चुनावों के लिए अधिसूचना जारी होने वाली है, जिससे ठीक पूर्व सरकार द्वारा यह शिगूफा छोड़ा गया है, ताकि उसे निकाय चुनाव में इसका लाभ मिल सके। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के पास जनता के बीच जाने के लिए कोई ऐसा मुद्दा अभी तक उसके पास नहीं था, जिससे की वह जनता से वोट मंाग सके। क्योंकि महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लेकर कंेद्र से लेकर राज्य की कांग्रेस सरकार कटघरे में है।

परिवहन विभाग का कारनामा

परिवहन विभाग का कारनामा
लाखों रूपये के राजस्व का लगा रहे हैं प्रदेश को चूना
18 सीट की मिनी बस को बना डाला टैक्सी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखंड के परिवहन विभाग के अधिकारी वाहन मालिकों से मिलकर प्रदेश को यात्री कर के रूप में मिलने वाले लाखों रूपये के राजस्व का चूना लगा रहे हैं। यह घोटाला पिछले तीन साल से चल रहा है, जिस में सरकार को अब तक लगभग करोड़ों रूपये का चूना लगाया जा चुका है। मामले के सज्ञान में आने के बाद अधिकारी वाहन स्वामियों को नोटिस देने की बात तो करते है, लेकिन इस घोटाले के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं, उनका नाम लेने से बच रहे हैं। मामले में परिवहन मंत्री सुरेन्द्र राकेश का कहना है कि इसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। एआरटीओ का कहना है कि तीन साल से चल रहा यह मामला अब पकड़ में आया है। लिहाजा वाहन स्वामियों से इसकी वसूली की जाएगी। लेकिन इस घोटाले के कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं इस पर एआरटीओ चुप्पी साध लेते हैं। 
    प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश तथा हल्द्वानी परिवहन कार्यालयों द्वारा टैम्पो ट्रेवलर वाहन, जिनका व्हील बेस 3700 मिलीमीटर होता है और इन वाहनों में यात्री क्षमता 18 लोगों की वाहन निर्माता कंपनी ने बनाई है। राज्य के परिवहन कार्यालयों द्वारा इन 18 सीटर वाहन को सात और 10 सीटों में पर्वतीय मार्गो में चलने के लिए स्वास्थता प्रमाण पत्र के साथ ही परमिट जारी किए गए हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्य सरकार को ऐसे वाहनों से 800 रूपया प्रतियात्री प्रतिमाह प्रतिवाहन का नुकसान हो रहा है। ऐसे में बीते तीन सालों से राज्य को लाखों रूपया का चूना परिवहन विभाग के अधिकारियों द्वारा राज्य को लगाया जा चुका है। एक जानकारी के अनुसार देहरादून और ऋषिकेश परिवहन कार्यालयों द्वारा लगभग 200 ऐसे वाहनों को परमिट जारी किए गए हैं जो सरकार को प्रतिदिन लाखों रूपये का चूना लगा रहे हैं। यह भी जानकारी मिली है इन वाहनों को मध्यम दर्जे के यात्री वाहनों की जगह टैक्सी और मैक्सी कैब में पास किया गया है। 
 मामले के सामने आने के बाद उप सम्भागीय परिवहन अधिकारी संदीप सैनी ने बताया कि यह मामला उनके संज्ञान में आया है और इस प्रकरण पर वाहन स्वामियों को नोटिस जारी किये गये हैं लेकिन उन्होंने इस मामले में लिप्त अधिकारियों की जांच पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया कि सरकार को चूना लगाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा। वहीं सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीते पाच मार्च को शासन द्वारा कई परिवहन अधिकारियों की प्रोन्नोती हुई है लेकिन मलाईदार पदो पर बैठे होने के कारण और ऊंची पहुंच के चलते ऐसे अधिकारियों को नई तैनाती नहीं दी गई है।

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

सरकार ने लगाई हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर

सरकार ने लगाई हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर
15 साल से रहने वाले स्थायी निवासी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 2 अप्रैल। स्थाई निवास और जाति प्रमाण पत्र को जारी करने के लिए प्रदेश सरकार ने मंगलवार को अपनी स्थिति साफ करते हुए नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार किया। राज्य गठन नौ नवम्बर 2000 से पहले रहने वाले (जो 15 वर्षों से उत्तराखण्ड में रह रहा है) को स्थायी निवासी माना जएगा तथा 1985 से पहले से रहने वालों को जाति प्रमाण पत्र जारी किए जाएंगे, जिसके लिए मंगलवार को सरकार ने शासनादेश जारी कर दिया है।
    पहले प्रदेश में स्थाई निवास और जाति प्रमाण पत्रों को जारी करने में 1950 की व्यवस्था थी। पूर्व भाजपा सरकार ने स्थाई व जाति प्रमाण पत्रों को जारी करने के लिए 1950 के भूमि से संबंधित दस्तावेजों को शामिल करना अनिवार्य किया हुआ था। जिसको लेकर राज्य में मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने आपत्ति जताई थी और आंदोलन कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश भी की थी। अजय कुमार ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ नैनीताल उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें सरकार के स्थाई और जाति प्रमाण पत्रों को निर्गत करने वाले आदेशों को अदालत में चुनौती दी गई थी। 17 अगस्त 2012 को नैनीताल हाईकोर्ट की एकल बैंच ने याचिकाकर्ता के तथ्यों से सहमति जताते हुए सरकार को आदेश किए थे कि वह नौ नवम्बर 2000 को कट ऑफ डेट मानते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग को जाति प्रमाण पत्र जारी करें और उन्हें स्थाई निवासी माना जाए। राज्य आंदोलनकारियों के साथ ही कई राजनैतिक दलों ने भी अदालत के इस आदेश के बाद आपत्ति जताते हुए एक दिन का बंद किया था और कहा था कि इसका लाभ उन लोगों को मिलेगा जो राज्य निर्माण से पहले यहां आकर रहने लगे हैं इसके खिलाफ जमकर हंगामा व प्रदर्शन भी हुआ था।
मंगलवार को यहां मुख्य सचिव आलोक कुमार जैन ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि नौ नवम्बर 2000 को कट ऑफ डेट मानते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को जाति प्रमाण पत्र जारी करें और उन्हें स्थाई निवासी माना जाए तथा अन्य लोगों को जो 1985 से उत्तराखण्ड में रह रहे हैं को जाति प्रमाण पत्र जारी करें। उन्होंने कहा कि ऐेसे लेागों को भूमि से संबंधित या यहां रहने वाले प्रमाण पत्रों के आधार पर ही जाति प्रमाण पत्रों को जारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई किरायेदार है और उसके पास किराये की रसदी है तो उसको भी दस्तावेजों में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा जिनका यहां आवास है और वह रोजगार के लिए बाहर चला गया है को भी जाति और स्थाई निवास प्रमाण पत्रों को जाारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नैनीताल हाईकोर्ट की एकल बैंच का यह निर्णय है, जिसे सरकार ने माना है और इस मामले में दो और याचिकाएं रविन्द्र जुगरान व त्रिवेन्द्र सिंह पंवार की पर अभी कोई निर्णय नहीं हो पाया है यदि इस मामले में हाईकोर्ट अपना फैसला देती है तो उसे अंतिम माना जाएगा।


शुक्रवार, 29 मार्च 2013

उत्तराखंड में अफसरशाही सरकारों पर भारी!

अफसरशाही सरकारों पर भारी!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य गठन से लोगों को उम्मीद थी कि उनके अपने पहाड़ी राज्य में भ्रष्टाचार जैसी बीमारी नहीं फैलेगी और प्रदेश के अफसर भी अपने काम में ईमानदारी के साथ प्रदेश की जनता की परेशानियों का निस्तारण करेंगे, लेकिन प्रदेश के प्रदेश की जनता की सोच गलत साबि हुई। उत्तराखण्ड राज्य के 12 साल के इतिहास में अफसरशाही हमेशा से ही यहां की सरकारों पर हावी रही और राज्य में आज भी कई अफसर अपनी मनमानी करते हैं और मंत्रियों व विधायकों के आदेशों को ठंेगा दिखा रहे हैं, इतना ही प्रदेश के मुखिया के सामने कई बार यह मामला उठाया जा चुका है, लेकिन फिर भी अफसरशाही पर सरकार लगाम लगाने में नाकामयाब साबित हो रही है। इतना ही नहीं स्टर्डिया मामले में अधिकारियांे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को गुमराह किया यह तक न्यायालय तक टिप्पणी कर चुका है, लेकिन यह राज्य का दुर्भाग्य ही होना कि जिनके दामन में दाग हैं ऐसे दागदार एक भी अधिकारी के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं हो पाई है।
राज्य के 12 साल के इस सफर में अधिकांश सरकारी महकमों के बड़े अधिकारियों की सोच व आचरण में कोई बदलाव नहीं आया। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पहाड़ी राज्य की जरूरतों को समझते हुए मजबूत इच्छाशक्ति के साथ ही विकास करने की बात हो या सर्विस मैनुअल्स के मुताबिक
अपने आचरण में सुधार की बात, आमजनता का काम न करने के लिए अफसरों ने हर मामलों में अपनी टांग उपर रखी है।
यह अपने आप में एक बड़ा दुर्भाग्य है कि स्वयं पार्क अधिकारियों द्वारा राजाजी नेशनल पार्क के कोर जोन कासरो में परिवार समेत होली मिलन समारोह मनाने के सनसनीखेज खुलासे ने अधिकारियों की हिटलरशाही की पद्रेश की जनता के सामने पोल खोल दी है, जबकि इस जोन में वन एवं वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने नियम कानून बना रखे हैं। प्रदेश के इतिहास में कई मंत्री और विधायक ने अपनी ही सरकार में बेलगाम होती अफसरशाही से खासे नाराज पाए गए और उन्होंने अपने दुख को लगातार प्रदेश के मुख्यमंत्री के सामने रखा। कांग्रेस व भाजपा सरकारों के शासनकाल में कई बड़े ऐसे अधिकारियों पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते आए हैं, लेकिन किसी भी सरकार के मुखिया ने इन अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने का दम नहीं दिखाया और नही वह इन भ्रष्ट अधिकारी को जेल की सलाखों के पीछे डाल सके। मौजूदा समय में भाटी आयोग की जांच में टीडीसी में तैनात रहे दो बड़े अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। लेकिन सरकार ने इन अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर करने तक का दम नहीं दिखाया और केवल नाटक कर अधिकारियों पर लगे आरोपों की जांच मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव करेंगे।

गुरुवार, 28 मार्च 2013

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी में सरकार !! !

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 23 मार्च। सिडकुल की रूद्रपुर और हरिद्वार की जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचने के बाद अब राज्य सरकार देहरादून स्थित आईटी पार्क की वह जमीन बेचने जा रही है जिस पर कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का सपना देखा था।
पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी जिन्हें भविष्यदृष्टा के रूप में जाना जाता है का सपना था कि रूद्रपुर,सितारगंज,भगवानपुर,हरि
द्वार, रोशनाबाद, सेलाकुई,कोटद्वार तथा काशीपुर में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कर राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार उपलब्ध कराने में इन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका हो ताकि राज्य से पलायन को रोकने के साथ ही स्थानीय लोगों को उनके पास ही रोजगार उपलब्ध हो सके। तिवारी शासनकाल में इन औद्योगिक क्षेत्रों की ओर औद्योगिक घरानों ने रूख भी किया। लेकिन सरकार की थकाऊ कार्यप्रणाली से आजीज आ चुके कई उद्योग समूह यहां के अधिकारियों व नेताओं का गैर सहयोगी व्यवहार देखते हुए वापस चले गए। परिणामस्वरूप किसानों को उजाड़ कर औद्योगिक क्षेत्रों में सरकार द्वारा खरीदी गई सैकड़ों एकड़ भूमि बंजर हो गई। बहुगुणा सरकार के आने के बाद राज्य के कुछ नौकरशाहों और बड़े नेताओं की नजरे इन जमीनों पर जा टिकी और उन्होंने इन जमीनों पर कंक्रीट के बहुमंजिले भवनों का सपना देखना शुरू कर दिया और इन जमीनों को बेचने के लिए मुफीद भूूमाफियों की तलाश शुरू कर दी। इसी तलाशी के दौरान उन्हें वह बिल्डर मिल गया जो उनकी हर ख्वाहिश पूरी कर सकता था और राज्य सरकार ने उसे औने -पौने दामों पर बेच भी डाला।
ठीक इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने राजधानी के सहस्त्रधारा रोड़ पर आईटी पार्क की स्थापना कर राज्य के बेरोजगारों को रोजगाार का सपना देखा था। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों और बड़े नेताओं की गिद्ध दृष्टि इस जमीन पर भी पड़ गई है। सूत्रों ने बताया कि राज्य सरकार के कुछ बडे़ अधिकारी इस जमीन को किसी बिल्डर को बेचने जा रहे हैं। जिसके लिए अखबारों में दिखावे के लिए विज्ञापन भी प्रकाशित किए जा चुके हैं। जिस भूमि को आईटी पार्क के लिए खरीदा गया था और जिस पर अंर्तराष्ट्रीय स्तर की आईटी कम्पनियों को अपने संस्थान खोलने से वह भूमि भी सिडकुल की भूमि की तरह बिकने को तैयार है ऐसे में अब यह सवाल उठता है कि राज्य की बेशकीमती जमीनों को यदि इसी तरह खुर्द -बुर्द किया जाता रहा तो भविष्य में राज्य में सिडकुल और आईटी पार्क जैसे आस्थानों के लिए भूमि ही नहीं बचेगी।

अपने पर छींटे पड़ते देख पीछे हटे भाटी!

अपने पर छींटे पड़ते देख पीछे हटे भाटी!
अपने एससी त्रिपाठी को दी गई कमान
सत्य के सामने इस सरकार को झुकना पड़ा: रावत
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। भाजपा शासनकाल में हुई गड़बड़ियों को लेकर कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए भाटी आयोग के अध्यख केवल राम भाटी ने स्वंय पर पड़ रहे छींटों के बाद आखिरकार सोमवार देर शाम अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री को सौंप दिया। पूर्व आईएएस अधिकारी केवल राम भाटी की जगह पूर्व आईएएस अधिकारी एससी त्रिपाठी की अध्यक्षता में नया आयोग गठित किया गया है। यह आयोग 2007 से लेकर 2012 के बीच भाजपा शासनकाल के दौरान की अनियमितताओं की जांच करेगा। भाटी आयोग द्वारा प्रदेश सरकार को जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद भाटी पर आरोप लगे थे कि उन्होंने कांग्रेस से मिली भगत कर आयोग की रिपोर्ट को जहां मनगडण्त रूप से तैयार की, वहीं उनके और सरकार के द्वारा इस रिपोर्ट को विधानसभा में रखे जाने से पहले लीक कर दिया गया। इतना ही नहीं भाजपा के पूर्व मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने केवल राम भाटी पर आरोप लगाया था कि उनके और कांग्रेस के बीच सांठ-गांठ है, इसी के चलते केवल राम भाटी ने डिफेंस कॉलोनी स्थित अपना आवास वर्ष 2008 में मुख्यमंत्री के करीबी विधायक सुबोध उनियाल को दिया था, जिस पर विधायक और प्रदेश के महाधिवक्ता रहते हैं। इतना ही नहीं बीज एवं तराई विकास निगम (पीडीसी) के पूर्व अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने भाटी आयोग की रिपोर्ट को नैनीताल उच्च न्यायालय में चुनौति देते हुए भाटी को ही पक्षकार बना डाला था, जिससे भाटी के सामने और समस्या खड़ी हो गई थी। इतना ही नहीं राजनैतिक दलों के बीच में फंसे भाटी को यह डर भी सताने लगा था कि यदि भविष्य में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो वह उनसे गिन-गिन कर बदला लेगी। यही कारण है कि इन झमेलों में फंसने के बजाए भाटी ने बीती दिन देर शाम मुख्यमंत्री को अपना इस्तीफा सौंप दिया। 13 अप्रैल 2012 को भाटी आयोग के गठन को नोटिफिकेशन जारी हुआ था, वहीं 10 मई 2012 को आयोग को सौंप सौंपने का नोटिफिकेशन किया गया, पांच मार्च 2013 को भाटी आयोग द्वारा पीडीसी पर पहली जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी गई और 19 मार्च 2013 को सरकार ने यह रिपोर्ट विधानसभा में रखी।
    भाटी आयोग पर पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का कहना है कि भाटी जांच आयोग पर दबाव बनाकर प्रदेश में काबिज कांग्रेस सरकार ने बंद कमरे में रिपोर्ट तैयार कराई, इतना ही नहीं जांच आयोग ने अधिनियम के सेक्शन आठ-बी का भी उल्लंघन किया। उनके अनुसार आरोपियों का पक्ष भी जांच रिपोर्ट में आना चाहिए था, जो कि नहीं आया। भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट और सिडकुल घोटाले को लेकर बीती 14 मार्च से आहुल विधानसभा सत्र मात्र पांच दिन ही चल पाया, जिसमें जहंा भाजपा ने सिडकुल घोटाले को हथियार बनाकर विधानसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी, वहीं कांग्रेस ने भाटी आयोग का डर दिखाकर भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश की। अंततः चार दिन पूर्व भाटी आयोग की रिपोर्ट को एफआईआर मानते हुए कृषि अनुभाग के महावीर सिंह नेगी द्वारा कोतवाली में बेनामी रिपोर्ट दर्ज करा दी गई, जिसके बाद से भाजपा का पारा सातवें आसमान पर था।
    राजनैतिक हलकों में अभी यह मामला चल ही रहा था कि बीती शाम के.आर. भाटी ने मुख्यमंत्री को इस्तीफा सौंप दिया और प्रदेश सरकार ने यू.पी. कॉडर के रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर सुशील चंद त्रिपाठी की अध्यक्षता में एक सदस्यी जांच आयोग का गठन कर डाला। अब भाटी आयोग द्वारा उत्तराखण्ड बीज एवं तराई विकास निगम की रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने के बाद त्रिपाठी आयोग के पास स्टर्जिया बायो कैमिकल, सूक्ष्म एवं लद्यु जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में धांधली, महाकुंभ घोटाला, आपदा राहत घोटाला और वर्ष 2007 से 2012 के बीच केंद्र पोषित योजनाओं में अनियमितताओं की जांच के साथ ही 2010 में ढेंचा बीज घोटाला और कार्बेट नेशनल पार्क में भूमि के विक्रय हस्तांतरण की जांच की जिम्मेदारी अब त्रिपाठी आयोग पर है। त्रिपाठी आयोग के गठन पर भाजपा नेता व पूर्व कृषि मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि सरकार द्वारा भाजपा पर दबाव बनाने की नियत से रिटायर्ड आईएएस अधिकारियों के नेतृत्व में आयोग का गठन किया जा रहा है, जो कि सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस सरकार में थोड़ी भी ईमानदारी बची है तो उसे वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के नेतृत्व में आयोग गठित करने की जगह किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच करानी चाहिए।
वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने कहा कि भाटी आयोग के चेयरमैन के0आर0 भाटी के त्यागपत्र पर कांग्रेस का यह कहना कि राजनीति में सुचिता के लिए यह त्यागपत्र हुआ है। कांगेस्र का यह कहना कि यह त्यागपत्र लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और आयोग की सुचिता बनाये रखने के लिए किया गया है, पूर्णतः असत्य है क्यों कि यह सर्वविदित है कि जिस प्रकार से भाटी आयोग ने अनान-फानन में अपनी रिपोर्ट दी और बिना किसी ठोस सबूत पर लोगांे पर दोष मढे, ऐसा आज तक भारत के इतिहास में कहीं नही हुआ। तीरथ सिंह रावत ने अपने सभी विधायक, नेता प्रतिपक्ष को बधाई देते हुए कहा कि जिस प्रकार से सदन के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया गया वह प्रदेश की जनता के लिए और जन लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक था और सत्य के सामने इस सरकार को झुकना पड़ा। उन्होंने कहा कि सिड़कलु घोटाला जो कि हजारों, करोड़ों रूपये का है, पर भारतीय जनता पार्टी का संर्घष सदन के अन्दर और बाहर जारी रहेगा। त

कांग्रेस में किसी बड़े परिवर्तन की संभावना!

कांग्रेस में किसी बड़े परिवर्तन की संभावना!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून  । राहुल गांधी के दौरे के बाद प्रदेश की राजनीति में परिवर्तन की उम्मीदें जगने लगी थी। क्योंकि कार्यकर्ताओं से फीडबैक के बाद राहुल गांधी को यह कहना पड़ा था कि राज्य में कोई बड़ा परिवर्तन हो सकता है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बहुत जल्द प्रदेश में कांग्रेस संगठन का नेतृत्व जहंा सतपाल महाराज के हाथ आने की उम्मीद बतायी जा रही है वहीं प्रदेश में सत्ता नेतृत्व में भी परिवर्तन के आसार नजर आने लगे हैं। इतना ही नहीं जानकारी के अनुसार कांग्रेस में सत्ता, संगठन और सरकार में आमूल चूल परिवर्तन की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
     राज्य के अस्तित्व में आने के दिन से लेकर आज तक प्रदेश में राजनैतिक अस्थिरता व्याप्त रही है, प्रदेश में चाहे भाजपा की सरकार सत्तासीन रही हो अथवा कांग्रेस की दोनों ही दल प्रदेश को स्थायी नेतृत्व देने में नाकामयाब ही रहे हैं। कहने को तिवारी सरकार ने ही पूरे पांच साल तक सत्ता तो चलाई लेकिन उनकी भी पूरे पांच साल तक टांग ख्ंिाचाई रही अन्तः उन्होने चुनाव की घोषणा के बाद अपने के मुख्यमंत्री आवास के भीतर ही रखा और चुनाव प्रचार में भाग नहीं लिया। राजनैतिक दिग्गज बताते हैं कि यदि तिवारी बाहर निकल चुनाव में थोड़ा भी समय देते तो 2007 में प्रदेश में भाजपा की जगह एक बार फिर कांग्रेस की सरकार होगी। कमोवेश इस बार भी ऐसा ही हो रहा है कांग्रेस के नेता हरीश रावत के काफी मेहनत-मशक्कत के बाद प्रदेश में कांग्रेय की सरकार बन तो गयी लेकिन कांग्रेस ने सत्ता विजय बहुगुणा के हाथों सौंप दी। बस तब से ही सत्ता संघर्ष जारी है।
होली के माहौल के बीच कांग्रेस संगठन और सत्ता में फेरबदल की खबरें सोमवार को चर्चाओं के केन्द्र में रही। जहां एक ओर दिल्ली कांग्रेस आलाकमान द्वारा नये प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा को लेकर कांग्रेसी नेताओं को आपस में चर्चा करते हुए देखा गया वहीं निगम चुनावों को लेकर होने वाले आरक्षण का मुद्दा भी चर्चाओं के केन्द्र में है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य को बदले जाने की कवायद लंबे समय से जारी है लेकिन बीते दिनों उनके विरोधी खेमे द्वारा कांग्रेस संगठन का कामकाज ठीक न चलने और एक व्यक्ति एक पद को आधार बनाकर उन्हें इस पद से हटाये जाने की मांग की जा रही है। यह मुद्दा अब तक टिहरी लोकसभा उपचुनाव के कारण लटका रहा था और अब वर्तमान समय में होने वाले निकाय और पंचायत चुनावों के मद्देनजर इससे टाले जाने की खबरें थी लेकिन दिल्ली के सूत्रों के अनुसार अब इससे और अधिक समय तक नहीं टाला जायेगा और संभावत जल्द ही नये प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा की जा सकती है। हालांकि अभी कुछ कांग्रेसी नेताओं का यह भी कहना है कि अब जो कुछ होगा वह होली के बाद ही होगा। प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य वर्तमान में राज्य कैबिनेट में मंत्री भी है उन्हें मंत्री बनाए जाने के बाद से ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की बागडोर युवा हाथों में सौंपने की मांग की जा रही थी साथ ही कैबिनेट मंत्री होने की वजह से संगठन का कामकाज ठीक से न चला पाने का आरोप लगाया जा रहा था। कांग्रेस में एक व्यक्ति एक पद की पंरपरा का भी तर्क कुछ कांग्रेसियों द्वारा दिया जा रहा है राहुल गांधी के दून दौरे में भी नये अध्यक्ष की घोषणा का मुद्दा चर्चाओं में था।
   यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नये प्रदेश अध्यक्ष के लिए अब तक कई नाम सामने आ चुके है जिनमें संासद प्रदीप टम्टा से लेकर सांसद सतपाल महाराज के नाम शामिल है। वर्तमान समय में यह भी चर्चा आम है कि इस दौड़ में सतपाल महाराज सबसे आगे है और हरीश रावत भी उनके नाम पर सहमति जता चुके है। उधर निगम के मेयर पद को लेकर भी दिग्गज नेताओं की लंबी कतार है। हालांकि निर्वाचन आयोग द्वारा परिसीमन और आरक्षण के बारे में अभी निर्णय लिया जाना है लेकिन चर्चा है कि देहरादून निगम में मेयर का पद दलित महिला अथवा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित किया जा रहा है। इस खबर के बाद कई कांग्रेसी दिग्गज नेताओं के सपने तार-तार हो सकते हैं। कई स्तर पर कांग्रेस में फेरबदल की तैयारियां जारी है और इस फेरबदल के बीच कांग्रेसियों के बीच चर्चाएं जोरों पर है। सत्ता से लेकर संगठन तक में होने वाले इस फेरबदल को लेकर कांग्रेस में खासी हलचल दिखाई दे रही है।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

29 साल पहले मरे व्यक्ति से खरीदी आईपीएस सिद्धू ने जमीन

29 साल पहले मरे व्यक्ति से खरीदी आईपीएस सिद्धू ने जमीन
वन भूमि पर बढ़ रहे हैं बेतहाशा कब्जे, वन विभाग की चुप्पी पर सवालिया निशान!
राजेन्द्र जोशी

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे जंगलों में राजधानी में तैनात कई अधिकारी वन भूमि को कब्जाने पर लगे हैं। इसका ताजा उदाहरण राजपुर क्षेत्र में एक आईपीएस अधिकारी द्वारा खरीदी गई उस विवादास्पद जमीन का है जिसका मालिक 1983 में स्वर्ग सिधार गया था और बीते महीने इस आईपीएस अधिकारी ने उससे जमीन का सौदा कर जमीन अपने नाम करा दी। ठीक इसी तरह राजधानी क्षेत्र के कई और स्थानों पर भी वन भूमि पर कब्जा करने की नियत से जंगलो का सफाया आज भी जारी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पुलिस के इस अधिकारी के मातहत पुलिस कर्मी अब वन अधिकारियों को धमकानें पर जुट गये हैं कि वे इस मामले में चुप्पी साध लें।  

पुलिस मुख्यालय में तैनात इस आईपीएस अधिकारी ने राजपुर क्षेत्र के वीरगिर वाली गांव के जगंल की जमीन पर बीते दिन 25 हरे साल के पेड़ कटवा डाले। इस जमीन पर यह अधिकारी फार्म हाऊस बनाना चाहता है ऐसा सूत्रों ने बताया है। इतना ही नहीं 7450 वर्ग मीटर इस जमीन पर लगभग तीन 100 से ज्यादा साल के हरे वृक्ष खड़े हैं। जिनमें से लगभग 25 पेड़ों को बीते दिन काट दिया गया है। एक जानकारी के अनुसार आईपीएस सिद्धू ने जिस जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करवाई है उस जमीन पर 55 साल पुराना मकान दिखाया गया है जबकि मौके पर वहां मकान का एक खंडर ही मौजूद है। इतना ही नहीं आईपीएस अधिकारी द्वारा जमीन की रजिस्ट्री को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों ने बताया है कि जिस नत्थूराम पुत्र मटकूमल्ल से आईपीएस ने जमीन खरीदी है उसकी मौत 1983 में हो चुकी है। 29 साल पहले मर चुके नत्थूराम से आईपीएस अधिकारी ने राजस्व अभिलेखों के अनुसार खसरा नम्बर एक (क) पुराना नम्बर 1/1 खतौनी संख्या 6 की 1.490 हेक्टेयर जमीन खरीदी है। जिसके एवज में नत्थूराम को एक करोड़ 20 लाख रूपये दिये गये जिस पर 35 लाख की स्टांप डियूटी भी चुकायी गई जबकि इस जमीन का दाम सरकारी दरों के हिसाब से लगभग साढ़े छह करोड़ बताया गया है। एक जानकारी के अनुसार नत्थूराम के पोते शरदसूद ने वन विभाग के अधिकारियों के बताया कि उसके दादा के नाम से किसी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भूमि बेच डाली है। जबकि उनका कहना है कि उसके दादा नत्थू राम के मृत्यु आज से 29 साल पहले हो चुकी है और यह जमीन हमारे परिजनों यशपाल,सत्यपाल, राजपाल, विजयपाल तथा मेरे दादा नत्थू राम के नाम दर्ज है, 
    राजधानी से लगे तमाम इलाको में वन भूमि पर कब्जे को लेकर कमोवेश यही स्थिति है। जोहड़ी गांव के जंगल से लगी वन भूमि में भी बीते दिन 20 पेड़ों को काट वन भूमि को हड़पने की कोशिश का मामला सामने आया है। वहीं भगवंतपुर, पुरकुल, सहस्त्रधारा, नवादा, दुधली, सहसपुर, ऋषिकेश, विकासनगर आदि क्षेत्रांे में भी वन भूमि कब्जाने का मामला लगातार सुर्खियों में रहा है, लेकिन कभी पुलिस के बड़े अधिकारियों, कभी राजस्व के बड़े अधिकारियों और कभी आला प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं द्वारा वन भूमि पर कब्जे को लेकर मामले तो दर्ज हुए लेकिन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। परिणामस्वरूप वन भूमि पर कब्जे करने वालों के हौसले बुलंद हैं और वन विभाग की चुप्पी पर सवालिया निशान।

सोमवार, 25 मार्च 2013

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी!

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 23 मार्च। सिडकुल की रूद्रपुर और हरिद्वार की जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचने के बाद अब राज्य सरकार देहरादून स्थित आईटी पार्क की वह जमीन बेचने जा रही है जिस पर कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का सपना देखा था।
पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी जिन्हें भविष्यदृष्टा के रूप में जाना जाता है का सपना था कि रूद्रपुर,सितारगंज,भगवानपुर,हरि
द्वार, रोशनाबाद, सेलाकुई,कोटद्वार तथा काशीपुर में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कर राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार उपलब्ध कराने में इन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका हो ताकि राज्य से पलायन को रोकने के साथ ही स्थानीय लोगों को उनके पास ही रोजगार उपलब्ध हो सके। तिवारी शासनकाल में इन औद्योगिक क्षेत्रों की ओर औद्योगिक घरानों ने रूख भी किया। लेकिन सरकार की थकाऊ कार्यप्रणाली से आजीज आ चुके कई उद्योग समूह यहां के अधिकारियों व नेताओं का गैर सहयोगी व्यवहार देखते हुए वापस चले गए। परिणामस्वरूप किसानों को उजाड़ कर औद्योगिक क्षेत्रों में सरकार द्वारा खरीदी गई सैकड़ों एकड़ भूमि बंजर हो गई। बहुगुणा सरकार के आने के बाद राज्य के कुछ नौकरशाहों और बड़े नेताओं की नजरे इन जमीनों पर जा टिकी और उन्होंने इन जमीनों पर कंक्रीट के बहुमंजिले भवनों का सपना देखना शुरू कर दिया और इन जमीनों को बेचने के लिए मुफीद भूूमाफियों की तलाश शुरू कर दी। इसी तलाशी के दौरान उन्हें वह बिल्डर मिल गया जो उनकी हर ख्वाहिश पूरी कर सकता था और राज्य सरकार ने उसे औने -पौने दामों पर बेच भी डाला।
ठीक इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने राजधानी के सहस्त्रधारा रोड़ पर आईटी पार्क की स्थापना कर राज्य के बेरोजगारों को रोजगाार का सपना देखा था। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों और बड़े नेताओं की गिद्ध दृष्टि इस जमीन पर भी पड़ गई है। सूत्रों ने बताया कि राज्य सरकार के कुछ बडे़ अधिकारी इस जमीन को किसी बिल्डर को बेचने जा रहे हैं। जिसके लिए अखबारों में दिखावे के लिए विज्ञापन भी प्रकाशित किए जा चुके हैं। जिस भूमि को आईटी पार्क के लिए खरीदा गया था और जिस पर अंर्तराष्ट्रीय स्तर की आईटी कम्पनियों को अपने संस्थान खोलने से वह भूमि भी सिडकुल की भूमि की तरह बिकने को तैयार है ऐसे में अब यह सवाल उठता है कि राज्य की बेशकीमती जमीनों को यदि इसी तरह खुर्द -बुर्द किया जाता रहा तो भविष्य में राज्य में सिडकुल और आईटी पार्क जैसे आस्थानों के लिए भूमि ही नहीं बचेगी।