बुधवार, 19 जून 2013

राज्य के 1,144 जर्जर स्कूल भवनों का नहीं हो पाया पुनर्निर्माण

राज्य के 1,144 जर्जर स्कूल भवनों का नहीं हो पाया पुनर्निर्माण  

-जर्जर पाठशाला भवन कभी भी ढहा सकते हैं कहर


-अल्मोड़ा में सर्वाधिक 212 व चमोली में 207 जर्जर स्कूल


-शिक्षा विभाग स्कूलो के रखरखाव के प्रति बना है उदासीन
राजेन्द्र जोशी
देहरादून  । शिक्षा विभाग जर्जर विद्यालय भवनों के पुनर्निर्माण और रखरखाव के प्रति उदासीन बना हुआ है। जर्जर हो चुके विद्यालय भवन कभी भी कहर ढहा सकते हैं। उत्तराखंड में विभिन्न जनपदों में 1,144 स्कूल भवन जर्जर हालत में हैं। कुमांऊ मंडल के अल्मोड़ा जिले में सर्वाधिक 212 व गढ़वाल मंडल के चमोली जनपद में 207 जर्जर स्कूल भवन हैं। शिक्षा विभाग द्वारा यह जर्जर विद्यालय भवन चिन्हित तो किए गए लेकिन इनका पुनर्निर्माण कार्य नहीं हो पाया। कई जगह विद्यार्थी खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं तो कहीं कक्षाएं पंचायत भवनों में चल रही हैं, कुछ जगह विद्यार्थी जर्जर भवनों में ही बैठ रहे हैं।   
  राज्य में चमोली जिले में 207, अल्मोड़ा में 212, पिथौरागढ़ में 137, रुद्रप्रयाग में 97, टिहरी में 131, नैनीताल में 75, देहरादून मे 113, चंपावत में 69, पौड़ी में 37, हरिद्वार में 24, उत्तरकाशी में 15, उधमसिंहनगर में 14 और बागेश्वर जिले में 13 विद्यालय जर्जर हालत में है। देहरादून जनपद अंतर्गत चकराता और कालसी विकासखंडों में सर्वाधिक जर्जर विद्यालय भवन हैं। इसके अलावा सहसपुर ब्लॉक, विकासनगर ब्लॉक, रायपुर ब्लॉक व डोईवाला ब्लॉक और देहरादून नगर क्षेत्र में भी कई विद्यालय भवन जर्जर हालत में हैं। चकराता विकासखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय सिलामू, प्रावि सेंज, प्रावि चातरा, प्रावि मैंद्रथ, प्रावि जगराड़, प्रावि त्यूणी-प्रथम जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं। कालसी ब्लॉक अंतर्गत प्रावि आरा, प्रावि देऊ, प्रावि कोप्टी, प्रावि रानीगांव, प्रावि जुगाया, प्रावि बिसोई, प्रावि तांगड़ी-हजरा के विद्यालय भवन जर्जर हालत में हैं। विकासनगर और सहसपुर ब्लॉक के अलावा नगर क्षेत्र देहरादून में भी कई विद्यालय भवन बैठने योग्य स्थि िमें नहीं हैं। विद्यालय भवन जब से बने इनके रखरखाव की ओर विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया जिस कारण इनकी हालत अत्यंत दयनीय बनी हुई है। यह जर्जर विद्यालय भवन कभी भी धराशायी हो सकते हैं जिससे कि कोई बड़ा हादसा भी घट सकता है। इन जर्जर हो चुके विद्यालय भवनों की छतें जगह-जगह पर क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं और दीवारों पर दरारें पड़ी हुई हैं। फर्श उखड़ चुकी है और दरवाजे व खिड़कियों को दीमक चाट चुका है। बारीश में छत टपकने लगती हैं, जिस कारण विद्यालय प्रशासन के पास छात्रों की छुट्टी करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। इन विद्यालय भवनों में बैठना छात्रों के लिए खतरे से खाली नहीं है। कुछ विद्यालय भवनों की हालत तो इतनी जर्जर हो चुकी है कि छात्र-छात्राओं को पढ़ाई करने के लिए खुले आसमान के नीचे बैठना पड़ता है। विभाग इन विद्यालयों भवनों के प्रति लापरवाह बना हुआ है। क्षेत्र के जनप्रतिनिधि शिक्षा विभाग से कई बार इन जर्जर विद्यालय भवनों का पुनर्निर्माण की मांग कर चुके हैं लेकिन विभागीय अधिकारियों की कानों में जूं तक नहीं रेंगी। एक ओर शिक्षा विभाग विद्यालय भवनों के रखरखाव पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये की धनराशि खर्च कर रहा है वहीं, इन जर्जर विद्यालय भवनों की विभागीय अधिकारी सुध नहीं ले रहे हैं। विभाग की अनदेखी से लोगों में रोष व्याप्त है। कई विद्यालय भवनों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि वहां छात्र-छात्राओं को खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। 

सोमवार, 27 मई 2013

स्थाई राजधानी का मुद्दा एक बार फिर उछला

स्थाई राजधानी का मुद्दा एक बार फिर उछला
स्थाई राजधानी : सूबे में तीन विधानसभा भवन और दो सचिवालय किस लिए!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। एक बार फिर सूबे की स्थाई राजधानी का मुद्दा ठीक लोकसभा चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों द्वारा जमकर उछाला जा रहा है। उत्तराखण्ड की कांग्रेस सरकार ने जहां बीते दिनों गैरसैंण में विधानसभा भवन का शिलान्यास किया, वहीं अब रायपुर में भी नये विधानसभा भवन के निर्माण की कवायद ने स्थाई राजधानी के मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है। वहीं रायपुर में नए विधानसभा भवन के बारे में विपक्षी भाजपा का कहना है कि पहले सरकार राज्य की स्थायी राजध्रानी पर तो फैसला लें। राज्य में एक विधानसभा भवन और सचिवालय पहले ही बन चुका है। अब दून में ही दूसरा विधानसभा भवन तथा गैरसैंण में तीसरा विधानसभा तथा सचिवालय बनाने का क्या औचित्य। भाजपा ने कहा कि कांग्रेस सरकार का यह कदम को जनता में भ्रम फैलाने वाला है।
पूर्ववर्ती सरकारों की तरह सूबे की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने राज्य की स्थायी राजधानी के मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है, तो वहीं दूसरी ओर वह नये विधानसभा भवनों के निर्माण की कवायद में भी जुटी हुई है। वहीं इस मुद्दे पर राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि 13 जनपदों वाले इस छोटे राज्य के लिए एक ही राजधानी काफी है, बस सरकार को यह निर्णय लेना होगा कि स्थाई राजधानी पहाड़ में होगी या मैदान में। राजनैतिक सूत्रों का कहना है कि यदि सूबे के नेताओं का विचार यह है कि राज्य की राजधानी हिमाचल और पंजाब की तर्ज पर दो हो तो सरकार को अपनी इस राय पर आम सहमति बनाने पर विचार करना चाहिए। इतना ही नहीं स्वंय अल्मोड़ा से कांग्रेस सांसद प्रदीप टम्टा ने भी इस मुद्दे पर कहा कि क्या हर एक जिले में सरकार एक विधानसभा भवन बनाना चाहती है, किसी न किसी नेता द्वारा हर रोज एक ही मुद्दे पर अलग-अलग बयान जारी कर दिये जाते है। राज्य की स्थायी राजधानी कहां बनेगी पहले कैबिनेट में इस बात का फैसला तो कर लो, । स्थायी राजधानी पर तो कोई फैसला आज तक हो नहीं सका है विधानसभा भवनों की लाइन लगायी जा रही है।
गैरसैंण और रायपुर में सरकार द्वारा राज्य की अस्थायी राजधानी की घोषणा से पूर्व विधानसभा भवन बनाने का विरोध भाजपा और यूकेड़ी दोनों ही दलों ने कराना शुरू कर दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि सरकार पहले राज्य की स्थाई राजधानी घोषित कर, जिसके बाद विधानसभा भवन बनाये। वहीं अब माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में एक बार फिर राज्य की स्थायी राजधानी का मुद्दा अहम होगा।

स्थाई राजधानी के मुद्दे पर कांग्रेसी दिग्गजों ने अपनी ही सरकार को घेरा!

स्थाई राजधानी के मुद्दे पर कांग्रेसी दिग्गजों ने अपनी ही सरकार को घेरा!

राजेन्द्र जोशी
देहरादून । सरकार के नेताओं द्वारा ही जिस तरह से स्थायी राजधानी के मुद्दे अपनी सरकार की घेराबंदी की जा रही है, उससे यह साफ हो गया है कि कांग्रेस के नेताओं में न तो एकजुटता है और स्थाई राजधानी के मुद्दे पर एकमतता, तभी तो सभी नेता अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।
वहीं विपक्ष को भी सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा दिए जा रहे इस तरह के बयानों से सरकार को घेरने का मौका मिल गया है।
राज्य को अस्तित्व में आए 12 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है, लेकिल आज तक राज्य में बनी सरकारों ने स्थाई राजधानी के मुद्दे का नहीं सुलझाया, यह अपने आप में एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है, वहीं सूबे के नेता स्थाई राजधानी के मुद्दे को सुलझाने के बजाए अब उस पर अपनी राजनीति चमका रहे हैं। सत्ता संभालने के कुछ समय बाद ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में एक विधानसभा सत्र चलाकर और विधानसभा भवन बनाने और यहां हर वर्ष एक सत्र चलाने की घोषणा करके इस मुद्दे को और उछाल दिया, जिसका सभी दलों ने स्वागत किया। वहीं वर्तमान में गैरसैंण मे विधानसभा निर्माण का कार्य प्रगति पर है, जिसके बाद अचानक से ही इस मुद्दे पर वहीं बहुगुणा सरकार ने दूसरा राजनीतिक दांव चलते हुए रायपुर में भी विधानसभा और सचिवालय निर्माण के लिए भूमि का चिन्हित कर डाली, जिसके बाद खुद कांग्रेस के ही नेताओं द्वारा सरकार के इस कदम पर सवाल खड़े कर दिए गए हैं, एक ओर संासद प्रदीप टम्टा का कहना है कि सरकार पहले स्थायी राजधनी पर फैसला तो कर ले, क्या सरकार सूबे की दो राजधानी बनायेंगी और हर जनपद में एक विधानसभा भवन, वहीं केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत का कहना है कि राजधानी कहीं भी बने लेकिन जनता में भ्रम की जो स्थिति बनी है वह समाप्त की जाएग। इधर विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल का कहना है कि सरकार को गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करना चाहिए। संसदीय कार्यमंत्री डा. इंदिरा हृदयेश पाठक का कहना है कि रायपुर में विधानसभा भवन का कार्य एक दो महीनें में शुरू हो जायेगा, जिस पर टिप्पणी करते हुए सांसद सतपाल महाराज का कहना है कि राजधानी कहीं भी बने सरकार गैरसैंण में विधानसभा का एक सत्र चलाने की घोषणा कर चुकी है इसका मतलब है कि सूबे की दो राजधानियां
बनायी जाए एक गैरसैंण और दूसरी देहरादून।
कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के यह अलग-अलग बयानों से सब हैरान हैं, जिसके बाद स्थाई राजधानी का मुद्दा और भी गरमा गया है। जब सत्तापक्ष के नेता इस मुद्दे पर अलग-अलग बयानबाजी कर रहे है तो, ऐसे में विपक्षी भाजपा ने भी सरकार पर हमला बोल दिया है। नेता विपक्ष का कहना है कि सरकार कहीं भी विधानसभा भवन बनवाये लेकिन वह पहले यह बताए कि सूबे की स्थायी राजधानी कहां होगी।

बहुगुणा को आई जनता की याद!

बहुगुणा को आई जनता की याद!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को देर से ही सही प्रदेश के विकास और जनता की समस्याओं की याद आ ही गई, स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को अगर धूल नहीं
चटाई होती या लोकसभा चुनाव सर पर न होते तो शायद मुख्यमंत्री को अभी भी विकास और जन समस्याओं की
याद नहीं आती।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आज रविवार से प्रदेश के चार दिवसीय दौरे पर है। इस दौरे का उद्देश्य विकास कार्यों की समीक्षा और जनता से रूबरू होकर उनकी समस्याओं को जानना हैं। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को अपने इस दौरे के
दौरान विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा भी करेंगे और जनता दरबार लगाकर लोगों से यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि उनकी क्या-क्या समस्याएं है और उन्हें हल करने के लिए सरकार क्या कर सकती है। अपने इस दौरे के बाद उन्होंने प्रदेश भर के कांग्रेसियों को 31 मई को सीएम आवास बुलाया है। सीएम आवास पर होने वाले
इस कांग्रेस सम्मेलन में लोकसभा चुनाव की रणनीति बनायी जायेंगी। हाईकमान की  निकाय चुनाव में मिली हार पर फटकार के बाद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा नींद टूटी है, अब उन्हें यह लगने लगा है कि आम चुनावों में यदि परिणाम बेहतर नहीं हुए है तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती है और बेहतर चुनाव परिणामों के लिए सूबे की विकास योजनाओं को गति देना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी जनता के साथ नजदीकी भी हैं। यहीं कारण है कि अब मुख्यमंत्री जनता
के साथ नजदीकी और विकास के साथ कार्यकर्ताओं में नये जोश के संचार करने में जुटे हुए है। भ्रमण के दौरान मुख्यमंत्री ने आज 26 मई को पुरोला एवं बड़कोट में जनसंपर्क किया, वहीं  27 को टिहरी, 28 को पौड़ी एवं भगवानपुर, 29 को चम्पावत टनकपुर व 30 को किच्छा, खटीमा व सितागंज में जनसंपर्क करेंगे।

सोमवार, 6 मई 2013

विनोद चमोली और डा. जोगेन्द्र रौतेला ने ली मेयर की शपथ

    विनोद चमोली और डा. जोगेन्द्र रौतेला ने ली मेयर की शपथ



















 जनता के दोबारा विश्वास ने बढ़ा दी है  मेरी जिम्मेदारी: चमोली

राजेन्द्र जोशी
देहरादून। नगर पालिका परिसर में तय कार्यक्रम क अनुसार  शनिवार को  आयोजित एक 
भव्य समारोह में विनोद चमोली ने मेयर पद की शपथ ली। कमिश्नर गढ़वाल सुबर्द्धन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। भारी मतों से जीतकर अपनी दूसरी मेयर पद की पारी के लिए आए मेयर विनोद चमोली का इस अवसर पर उनके समर्थकों ने फूल मालाओं से स्वागत किया। वहीं विनोद चमोली ने कहा कि दोबारा जनता न उनके उपर जो विश्वास व्यक्त किया है उससे उनकी जिम्मेवारी और भी अधिक बढ़ गयी है और वह पहले से अधिक बेहतर तरीके से जनता की सेवा के लिए कार्य करेंगे। विनोद चमोली के शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने जीतकर आए सभी 60 पार्षदों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
उल्लेखनीय हो कि भाजपा इस बार दून के नगर निगम में पूर्णबहुमत के साथ सत्ता में आयी है और उसके 33 पार्षद है जिनमें 21 महिलाएं है। शपथ  ग्रहण के दौरान यह सभी पार्षद अपने-अपने समर्थकों और परिजनों के साथ शपथ ग्रहण समारोह में पंहुचे थे। शपथ ग्रहण के साथ ही उनके समर्थकों ने उनका फूल मालाओं से स्वागत किया। शपथ ग्रहण के साथ ही बोर्ड की पहली बैठक से नगर निगम का नया बोर्ड अस्तित्व मंे आ गया है शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के साथ भाजपा के कई विधायक और पूर्व विधायक भी उपस्थित थे वहीं कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहे।
             हल्द्वानी के नगर निगम के बनने के बाद प्रथम नवनिर्वाचित मेयर डा. जोगेन्द्र रौतेला के साथ 25 निर्वाचित सभासदों ने शनिवार को रामलील मैदान में शपथ ग्रहण समारोह में शपथ ग्रहण की। जिलाधिकारी निधिमणी त्रिपाठी ने नवनिर्वाचित मेयर डा. जोगेन्द्र रौतेला को शपथ दिलाई तत्पश्चात मेयर रौतेला ने सभी निर्वाचित सभासदों को शपथ ग्रहण कराई। इस मौके पर डा. रौतेला ने कहा कि नगर की सभी समस्याओं का सभी के साथ मिलकर समाधान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नजूल नीति का सरलीकरण करने के लिए शासन पर दबाव बनाया जाएगा और नगर सौंदर्यीकरण के लिए पार्कों की दशा में सुधार लाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कूड़ा निस्तारण की व्यवस्था, सीवर लाईन का विस्तार और स्वच्छ प्रशासन व वित्तीय अनुशासन के लिए वह सदैव प्रयासरत रहेंगे। उन्होंने सभी सभासदों को सम्बोधित करते हुए कहा कि अपने क्षेत्र की समस्याएं समझकर उन्हें निगम के माध्यम से दूर कराने का मिलजुलकर प्रयार करें, तभी निगम आदर्श नगर निगम बनेगा। इस मौके पर विधायक बंशीधर भगत व पूर्व पालिकाध्यक्ष रेनू अधिकारी ने पुष्प गुच्छ देकर मेयर का स्वागत किया व शुभकामनाएं दी।
शपथ ग्रहण समारोह में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डा. सदानंद दाते, भाजपा जिलाध्यक्ष दीपक मेहरा, व्यापार प्रकोष्ठ प्रदेश संयोजक विजय प्रकाश, सहायक नगर अधिकारी नीरज जोशी समेत सैकंड़ों कार्यकर्ता व नगर निगम के कर्मचारी मौजूद थे।

शनिवार, 4 मई 2013

नैतिकता के आधार पर सरकार को इस्तीफा देना चाहिए: एनडी तिवारी

नैतिकता के आधार पर सरकार को इस्तीफा देना चाहिए: एनडी तिवारी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम इस ओर साफ इशारा कर रहे हैं कि कांग्रेसी दिग्गजों की कोई भी रणनीति पार्टी को जिताने में कामयाब नहीं हो पायी और सत्ता में रहते हुए भी कांग्रेस का सूपड़ा लोकसभा उपचुनाव की तरह निकाय चुनाव में भी साफ हो गया। कांग्रेस को सूबे की सभी छह नगर निगम मेयर की सीटें पर करारी हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने जीत की बड़ी उम्मीदों के साथ राज्य में पांच नगर निगमों और कई नगर पंचायतों का गठन किया था, लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में कहीं भी उसे सफलता नहीं मिली। इतना ही नहीं गैरसैंण को नगर पंचायत बनाने और यहंा विधानसभा भवन का निर्माण कराने की राजनीतिक चाल भी कांग्रेस की फेल हो गई।
अब कांग्रेसी नेताओं को गैरसैंण में मिली शिकस्त ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या हुआ है, जिसकी वजह से जनता ने उन्हें इतनी
बुरी तरह हार का स्वाद चखाया। नगर निगम मेयर पदों पर ही कांग्रेस को करारी शिकस्त नहीं मिली है, बल्कि नगर पंचायतों में भी उसका प्रदर्शन अत्यंत खराब रहा है, मगर कुछ नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में मिली जीत ने जरूर कांग्रेस का दर्द थोड़ा सा कम किया है। कांग्रेस की यह हार इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि वह सूबे में सत्ता में है अब इस हार को लेकर कांग्रेस में घमासान मचना तय है। हार का ठीकरा एक दूसरे के सर फोड़ने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है सांसद सतपाल महाराज ने इस मुद्दे पर संगठन और सरकार दोनों को आड़े हाथ लिया और कहा कि इस हार के पीछे सरकार का कामकाज और संगठन का जनता तक कांग्रेस की उपलब्धियों तक न पंहुचा पाना अहम कारण है, वहीं उन्होंने कार्यकर्ताओं के सम्मान की बात भी अपने पत्र में उठाई है।
    यह हास्यास्पद बात है कि इस करारी हार के बावजूद भी कांग्रेस नेताओं ने अपनी खीझ मिटाने के लिए कांग्रेस भवन में न सिर्फ अतिशबाजी की बल्कि मिठाईयां भी बांटी। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने तो सभी मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए कांग्रेस की हार के बाद भी चुनावों के परिणामों को निराशाजनक न होने की बात तक कह डाली है। उनका कहना है कि यह चुनाव लोकसभा और विधानसभा की तरह गंभीरता से नहीं लिये जा सकते। वहीं मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि लोकसभा उपचुनाव मंे कांग्रेस को मिली हार को उन्होंने कितनी गंभीरता से लिया था। अब यह मानने को कांग्रेस का कोई भी नेता तैयार नहीं है कि जनता ने उन्हें नकार दिया है और इस हार का कारण प्रमुखता से सरकार के 14 महीनों के कार्यों से नाखुश होना है, वहीं पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी भी इसका एक कारण हो सकती है। चुनाव परिणाम के आने के बाद जो कांग्रेस नेता कल तक बड़े-बड़े दावे कर रहे थे और इन निकायों चुनावों को लोकसभा चुनाव का रिहर्सल बता रहे थे अब वहीं नेता इन चुनावों में अपनी हार को स्वीकारने से भी कन्नी काटने लगे हैं। इस हार पर कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता एनडी तिवारी ने तो सरकार से इस्तीफा देने तक की बात कह डाली है। इन चुनावों से यह साबित हो गया है कि कांग्रेस की निचले स्तर पर स्थिति कितनी ज्यादा खराब है। कांग्रेस नेता भले ही इन चुनाव परिणामों को लेकर किसी को भी जिम्मेदार ठहराये लेकिन यह वास्तव में कांग्रेस के
लिए अत्यंत गंभीर और चिंतनीय बात तो है साथ ही यह लोकसभा चुनाव के लिए भी खतरे की घंटी है।

एक करोड़ रूपया और आउट ऑफ टर्न पदोन्नति तक का लालच भी नहीं डिगा पाया अधिकारी का ईमान!

एक करोड़ रूपया और आउट ऑफ टर्न पदोन्नति तक का लालच भी नहीं डिगा पाया अधिकारी का ईमान!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। राजधानी देहरादून की मेयर सीट कांग्रेस के लिए जी का जंजाल बनकर रह गई है। तमाम दांव पेंचों के बाद भी कांग्रेस भाजपा से इस प्रतिष्ठित सीट को हथियाने में कामयाब नहीं हो पाई। चर्चा तो यहां तक है कि मतदान के एक दिन पूर्व, जिले के एक अधिकारी को एक करोड़ रूपया और आउट ऑफ टर्न पदोन्नति तक का लालच दिया गया, लेकिन पर्वतीय क्षेत्र के इस अधिकारी ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। यदि कांग्रेस की यह चाल कामयाब हो जाती तो, भाजपा प्रत्याशी विनोद चमोली को जीतने के बावजूद हारने को मजबूर होना पड़ता।
    राजधानी में स्थानी निकाय चुनाव के परिणाम आने के बाद यह चर्चा खासो आम है कि कांग्रेस ने अधिकारियों तक को खरीदने की पूरी कोशिश की। इतना ही नहीं पर्वतीय समाज बाहुल्य मौहल्लों व क्षेत्रों के वोटरों के नाम इसलिए वोटर लिस्ट से हटा दिए गए कि उन्हें पता था कि ये वोट कांग्रेस को नहीं पड़ने वाले। देहरादून क्षेत्र में लगभग 30 हजार से अधिक पर्वतीय प्रवासियों को जानबूझकर उनके मताधिकार से वंचित रखा गया, अन्यथा कांग्रेस को भाजपा से मिलने वाली टक्कर का मतांतर 22912 से बढ़कर लगभग 40 हजार का होता। इस बात की तस्दीक दूसरी बार मेयर बने विनोद चमोली भी करते हैं। उनका कहना है कि राज्य आंदोलनकारी होने के नाते पर्वतीय जनमानस का उनके साथ भावनात्मक लगाव रहा है। यही कारण है कि पर्वतीय लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब किए गए। उनका यह भी कहना है कि अधिकारी आज भले ही यह कहें कि लोगों ने अपने वोटों को सुरक्षित रखने के लिए निर्वाचन कार्यालय से संपर्क नहीं किया या उन्होंने अपने वोट अंकित कराने के लिए प्रयास नहीं किए। इस पर मेयर विनोद चमोली का कहना है कि यह सब लफ्बाजी है, उनके अनुसार यह जानबूझकर कांग्रेस की चाल रही है।
    राजधानी देहरादून में आज यह चर्चा रही है कि कांग्रेस ने मतगणना से पूर्व की रात ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ की पूरी तैयार कर ली थी, इसके लिए उसे हरी झंडी भी मिल चुकी थी, लेकिन एक अधिकारी के इस मामले में अपनी संलिप्तता से साफ मना करने पर कांग्रेस की यह योजना परवान नहीं चढ़ पाई, वहीं यह भी चर्चा है कि इस अधिकारी को एक करोड़ रूपया और आउट ऑफ टर्न पदोन्नति तक का लालच दिया गया, लेकिन इस अधिकारी ने साफ मना कर दिया। इतना ही नहीं ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ की भनक के बाद भाजपा खेमें के सक्रिय हो जाने के बाद और भाजपा द्वारा स्ट्रांग रूम की चौकसी बढ़ाए जाने के बाद मशीनों से छेड़छाड़ नहीं हो पाई। इस पर मेयर विनोद चमोली का कहना है कि जब उन्हें इस बात की भनक लगी तो वे अपने चार-पांच साथियों के साथ रेसकोर्स स्थित बन्नू स्कूल में बने स्ट्रांग रूम की ओर गए, तो उन्हें वहां मात्र चार सुरक्षाधिकारी ड्यूटी बजाते मिले। उन्होंने कहा कि अमूमन स्ट्रांग रूम की सुरक्षा में एक टुकड़ी पीएसी के साथ कई जवान तैनात किए जाते हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन ने मिलकर ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ की योजना के तहत स्ट्रांग रूम की सुरक्षा बहुत हल्की की गई थी, ताकि वे ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़ कर सके, लेकिन प्रशासन के एक अधिकारी की ईमानदारी के चलते ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने देहरादून की मेयर सीट पर कब्जा करने के लिए जहां मुख्यमंत्री तक को मैदान में उतारा वहीं मुख्यमंत्री पुत्र व उनकी पत्नी ने भी कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में जमकर अनर्गल बयानबाजी की, जिसका जवाब राजधानी की जनता ने उन्हें दे दिया है।

निकाय चुनाव परिणामों ने हिलाई बहुगुणा की कुर्सी की चूलें!

निकाय चुनाव परिणामों ने हिलाई बहुगुणा की कुर्सी की चूलें!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। स्थानीय निकाय चुनाव के परिणामों के नतीजों ने मुख्यमंत्री बहुगुणा की कुर्सी की चूलें तक हिला दी हैं। भले ही मुख्यमंत्री बहुगुणा इन परिणामों को हल्के में ले रहे हों, लेकिन यह बात सरे आम है कि चुनाव परिणामों की गूंज दिल्ली दरबार तक पहुंच गई है। इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनाव की घोषणा से कुछ ही दिन पहले राजधानी देहरादून आए कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नसीहत भी उत्तराखण्ड कांग्रेसियों को रास नहीं आई। इसका यह परिणाम रहा कि कांग्रेस ने तराई क्षेत्र में स्वंय बनाए नगर निगमों तक में अपना खाता नहीं खोला।
    प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखण्ड के इन चुनाव परिणामों से राहुल गांधी काफी मायूस हैं और उनकी इस मायूसी की गाज़ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर गिर सकती है, क्योंकि देशभर में आने वाले वर्ष में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में उत्तराखण्ड में कांग्रेस को मिली हार की प्रतिछाया वह लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ने देना चाहेंगे। उत्तराखण्ड के चुनावों की हलचल दिल्ली में भी दिखाई दे रही है। राज्य में चुनाव परिणामों को लेकर कांग्रेस फिलहाल कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव के सम्पन्न होने तक नहीं करेगी। कर्नाटक में पांच मई को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा, इसके बाद ही उत्तराखण्ड के चुनाव नतीजों पर कांग्रेस के भीतर विचार-विमर्श होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। सबसे खास बात यह है कि उत्तराखण्ड में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के तमाम झण्डावरदार नेता अपने ही क्षेत्रों में अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को नहीं जीता पाए हैं। इस स्थानीय निकाय चुनाव में जहां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व उनके परिवार ने जहां देहरादून नगर निगम के चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर लड़ा था, वहीं हल्द्वानी क्षेत्र से कैबिनेट मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश पाठक ने अपने पुत्र की जगह हेमंत बगड़वाल को पहली बार नगर निगम बने हल्द्वानी में मेयर का चुनाव लड़ाया, वहीं रूड़की और हरिद्वार में भी कांग्रेस की रणनीति फेल साबित हुई है, हालांकि कांग्रेस सरकार में केंद्रीय नेता हरीश रावत यह कह रहे हैं कि चुनाव में उतारे गए प्रत्याशियों का नाम उनकी इच्छा से नहीं फाईनल किया गया, लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में हरिद्वार और रूड़की में मिली हार को उन्हें न चाहते हुए भी स्वीकार करना होगा। इतना ही नहीं पर्वतीय क्षेत्र की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में कांग्रेस द्वारा प्रचारित किए जा रहे गैरसैंण को लेकर भी कांग्रेस को निराशा मिली है, वहां की जनता ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को नकार कर निर्दलीय प्रत्याशी को नगर पंचायत की बागडोर सौंपी है। वहीं पौड़ी में भी सतपाल महाराज का प्रभाव नहीं चल पाया, वहां भी निर्दलीय प्रत्याशी व पूर्व विधायक यशपाल बेनाम एक बार फिर नगर पालिका में पहुंचे हैं।
    कुल मिलाकर उत्तराखण्ड में स्थानीय निकाय चुनावों को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दल लोकसभा चुनाव के रिहर्सल बता रहे थे और चुनाव परिणामों ने काफी हद तक तस्वीर भी साफ कर दी है कि वह राजनैतिक दलों के छलावे में आने वाले नहीं है और प्रदेश सरकार को इस बात का भी जनता ने संदेश दिया है कि विकास के हवाई वादों से जनता को कोई सरोकार नहीं है।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

पुलिस अधिकारी दुराचार मामले में पुलिस गहरी नींद में

पुलिस अधिकारी दुराचार मामले में पुलिस गहरी नींद में
ऐसे तो मित्र पुलिस से उठ जाएगा महिलाओं का विश्वास!
देहरादून। उत्तराखण्ड में महिलाएं कितनी महफूज हैं, यह बात प्रदेश पुलिस बड़े-बड़े बैनर और नारे देकर तो कर सकती है, लेकिन यथार्थ में ऐसा कुछ नहीं है। जहां दिल्ली में बीती दिसंबर व इस माह एक युवती व बालिका से बलात्कार के बाद समूचा जनमानस इस अपराध के खिलाफ सड़कों पर उतर गया था, वहीं राज्य में एक पुलिस अधिकारी द्वारा महिला के साथ दुराचार के बाद राज्य के समाजिक संगठन व पुलिस गहरी नींद में दिखाई दे रही है। दिल्ली में जहां एसपी स्तर के एक अधिकारी द्वारा एक महिला को थप्पड़ मारने पर बर्खास्त किया गया, वहीं उत्तराखण्ड में दुराचार के बाद भी प्रदेश सरकार ऐसे अधिकारी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाई। ऐसे में राज्य में कानून व्यवस्था के रखवाले ही जब भक्षक के रूप में सामने आएंगे तो प्रदेश की जनता का विश्वास प्रदेश की मित्र पुलिस से उठना लाजमी है।
उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिला कि एक युवती ने आवाम की रक्षा के लिए तैनात किए गए एक एसपी सिटी पर चीख-चीखकर खुला आरोप लगाया है कि उसने उसे शादी का झांसा देकर कई बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। 25 दिन से युवती डीजीपी सहित कई पुलिस अधिकारियों से न्याय की भीख मांग रही है कि उसके साथ बलात्कार करने वाले एसपी प्रमेन्द्र डोभाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे इंसाफ दिलाया जाए। हालांकि प्रदेश के अंदर एसपी की ताकत से राज्य के अंदर महिला सुरक्षा के बड़े बड़े दावे तार-तार होते नजर आ रहे है। दिल्ली में एक युवती के साथ हुए गैंगरेप के बाद सरकार के मुखिया व प्रदेश के डीजीपी ने ऐलान किया था कि प्रदेश के अंदर महिलाओं की सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। इतना ही नहीं डीजीपी ने तो यहां तक दावा कर डाला था कि अगर कोई पीड़ित युवती या महिला गैंगरेप या किसी अन्य तरह से पीड़ित हुई है तो उसे थाने तक में जाने की जरूरत नहीं है और वह एक डाक द्वारा शिकायती पत्र थाने में भेजेगी तो तत्काल मुकदमा दर्ज कर
आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। लेकिन लगता है कि प्रदेश में अगर रेप या छेड़खानी का दाग किसी बड़े अफसर पर लगता है तो सारे नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाकर दागी को बचाने का खेल शुरू हो जाता है। सवाल उठ रहा है कि क्या एसपी के लिए प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर कोई अलग कानून बनाया गया है। जिसके चलते बलात्कार का दंश झेल रही युवती को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश में अब तक के सबसे बड़े ईमानदार डीजीपी खामोश होकर क्यों बैठे हुए है, इसको लेकर राज्य के अंदर पुलिस मुखिया की खामोशी पर भी लगातार सवाल उठने शुरू हो गए है। वहीं राज्य में तथाकथित महिला हिमायती संगठनों की भी इस घटना ने पोल खोलकर रख दी है। महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर हो-हल्ला मचाने वाले ये सामाजिक संगठन इस घटना पर क्यों मौन है, यह समझ से परे है।
    गौरतलब हो कि महिलाओं व युवतियों से देश के अंदर हो रहे बलात्कार व छेड़खानी की घटनाओं के चलते सभी एक जुट होकर हवस के दरिंदों को सबक सिखाने के लिए आगे आए हुए है। उनका साफ तौर पर कहना है कि ऐसा कानून बनना चाहिए कि जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। प्रदेश सरकार के मुखिया ने भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस मुख्यालय में एक अलग सेल का गठन कर वहां महिला आईपीएस को तैनात किया था तथा प्रदेश के डीजीपी सत्यव्रत ने पूरे राज्य के पुलिस कप्तानों को फरमान जारी किया था कि वह अपने इलाकों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ठोस से ठोस कदम उठाएं, इतना ही नहीं डीजीपी ने यहां तक दावा कर दिया था कि अगर कोई महिला या युवती ऐसी घटनाओं का शिकार हुई हो तो उसे थाने व चौकी में जाने की कोई जरूरत नहीं है। वह सीध सरकारी डाक से अपनी शिकायत थाने व चौकी में भेज दे, जिसके तुरंत बाद उसकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। राजधानी में महिलाओं की सुरक्षाओं को लेकर बड़े होर्डिंगस सड़कों पर इस कदर लगाए हुए है कि मानो पुलिस ने संकल्प ले लिया हो कि अगर किसी भी महिला या युवती के साथ अश्लीलता होगी तो उसके आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जब हल्द्वानी की एक युवती ने डीजीपी के सामने चीख चीखकर आरोप लगाया कि हल्द्वानी के एसपी सिटी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार यौन शोषण किया है तो खाकी पर लगे अब तक के इतिहास में सबसे बड़े दाग पर पूरा पुलिस महकमा एसपी सिटी को बचाने की गुप्त मुहिम में लगा हुआ है। सवाल उठ रहे है कि डीजीपी साहब, राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस महकमा दोहरा चरित्र क्यों अपना रहा है। क्योंकि अगर यही दाग किसी दरोगा पर लगा होता तो उसके खिलाफ मुकदमा कायम कर उसे जेल तक भेज दिया गया होता। लेकिन जब एक एसपी सिटी पर एक युवती ने 25 दिन पूर्व डीजीपी के सामने लिखित मेें आरोप लगाया कि एसपी प्रमेंद्र डोभाल ने उसे शादी को झांसा देकर उसके साथ यौन शोषण किया और अब वह उसे धमकाकर जान से मारने तक की धमकी दे रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे है कि आखिरकार एक एसपी राज्य में इतना बड़ा हो गया है कि उसके लिए नियम कानून को पुलिस मुख्यालय ने भी ताक पर रख दिया है। युवती को इंसाफ मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन कहीं उसका हाल मधुमिता शुक्ला, भंवरी देवी, गीतिका जैसा न हो जाए, इसकी गारंटी कौन लेगा?
    उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह हल्द्वानी की एक युवती ने वहीं के एसपी सिटी पर शादी का झांसा देकर उससे दुराचार करने की शिकायत डीजीपी के दरबार में पेश होकर इस उम्मीद से दी थी कि उसे न्याय मिलेगा, लेकिन डीजीपी ने इस मामले में मुकदमा न कायम कराकर डीआईजी नैनीताल से जांच कराने की बात कही लेकिन डीजीपी के आदेश से डीआईजी संजय गुंज्याल भी गाफिल है और उनका कहना है कि उनके पास ऐसी कोई जांच नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सीआरपीसी 154 में साफ अंकित है कि किसी शिकायत पर तत्काल मुकदमा कायम कर फिर उसकी की जायेगी, तो जब एक एसपी पर यौन शोषण का खुला आरोप एक युवती द्वारा लगाया गया तो इस मामले में जांच कराने की नौटंकी क्यों की जा रही है। उत्तराखण्ड का पुलिस मुख्यालय वैसे तो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े ढोल पीटता आ रहा है। मुख्यालय में महिला सेल का गठन कर वहां का एक फोन नंबर प्रकाशित किया जिसपर महिलाएं व युवतियां अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। लेकिन यह सेल भी मात्र एक दिखावा बनकर रह गया है। पांच अप्रैल को एक युवती ने डीजीपी के सामने चीख चीखकर कहा कि हल्द्वानी के एसपी प्रमेंन्द्र डोभाल ने उसे शादी का झांसा देकर उसके साथ कई बार दुराचार किया। डीजीपी ने इस मामले की जांच नैनीताल के डीआईजी को सौंपने व 26 अप्रैल को प्रगति का रिमाइंडर भेजने की बात कही थी। लेकिन जब 27 अप्रैल को इस जांच के बारे में डीआईजी संजय गुंज्याल से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि कौन सी जांच की बात कह रहे हो। जब उन्हें हल्द्वानी के एसपी सिटी के खिलाफ मिली जांच के बारे में पूछा गया तो उनका साफ कहना था कि उन्हें इस तरह की कोई जांच नहीं मिली है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यह जांच डीआईजी नैनीताल के पास नहीं है तो फिर यह जांच आखिरकार कहां करा रहा है। 154 सीआरपीसी में साफ तौर पर अंकित है कि संज्ञेय अपराध के किए जाने से संबंधित प्रत्येक इतिला, यदि पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक दी गई है तो उसके द्वारा या निदेशाधीन लेखबद कर ली जाएगी और इतिला देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और प्रत्येक ऐसे इतिला पर चाहे वह लिखित रूप से दी गई हो या पूर्वोत्तफ रूप में लेखबद की गई हो, उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। जो उसे दे, और उसका सार ऐसी पुस्तक में, जो  उस अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में रखी जायेगी जिसे राज्य सरकार इस नियमित चिन्हित करें, प्रविष्ट किया जायेगा। इस धारा की उपधारा 1 के अधीन अभिलिखित इतिला की प्रतिलिपि इतिला देने वाले को तत्काल निःशुल्क दी जाएगी।
    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड सरकार एक ओर तो कुमाऊ के एक बड़े आईएएस अधिकारी को भ्रष्टाचार के मामले में निलंबित कर रही है। वहीं प्रदेश के एक एसपी पर यौन शोषण करने का खुला दाग लगने पर सरकार की खामोशी से कई सवाल उठने शुरू हो गए है। कितनी हैरानी वाली बात है कि दिल्ली में एक एएसपी ने जब एक युवती थप्पड़ मारा तो उसे तत्काल निलंबित कर दिया गया था। लेकिन उत्तराखण्ड में 25 दिन पूर्व हल्द्वानी के एसपी सिटी प्रमेन्द्र डोभाल पर वहीं की एक युवती ने आरोप लगाया कि अधिकारी ने उसकेे साथ यौन शोषण किया है, तो भी पूरा पुलिस महकमा इस एसपी को बचाने की जुगत में कहीं न कहीं लगा हुआ है।

दूसरी बार मेयर बने विनोद चमोली, कांग्रेस को 22912 मतों से हराया , कांग्रेस प्रत्याशी धस्माना को जनता ने नकारा

दूसरी बार मेयर बने विनोद चमोली, कांग्रेस को 22912 मतों से हराया
कांग्रेस प्रत्याशी धस्माना को जनता ने नकारा
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 30 अप्रैल। न्यायालय ने कांग्रेस के मेयर प्रत्याशी सूर्यकांत धस्माना को भले ही बरी कर दिया हो, लेकिन जनता की अदालत में वे आज भी राज्य आंदोलनकारियों के मुजरिम हैं। यह बात राजधानी में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में मेयर पद के लिए हुई जंग से साफ हो गई है। राज्य आंदोलनकारी व भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी विनोद चमोली ने कांग्रेस प्रत्याशी सूर्यकांत धस्माना को 22912 के रिकार्ड मतों से हरा दिया, जबकि बहुजन समाज पार्टी को 46889 मत मिल पाए। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 80530 मत मिले, जबकि कांग्रेस को 57618 मत ही मिल पाए। राजधानी देहरादून के 60 वार्डाें के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने 33, कांग्रेस ने 23 जबकि बसपा और निर्दलीयों ने दो-दो वार्डाें पर कब्जा जमाया।
    इस चुनाव में वार्ड 1- राजपुर से भाजपा की रोशन बाला, वार्ड 2- सहस्त्रधारा से भाजपा की नीतू, वार्ड 3- जाखन से दया जोशी भाजपा, र्वाउ 4- हाथी बड़कला भूपेन्द्र कठैत भाजपा, वार्ड 5- आर्यनगर से सरोज भाजपा, वार्ड 6- डोभालवाला से रमेश बुटोला कांग्रेस, वार्ड 7- विजय कालोनी से निखिल कुमार कांग्रेस, वार्ड 8-किशन नगर से नंदनी शर्मा भाजपा, वार्ड 9 डीएल रोड से उषा भाजपा, वार्ड 10-रिस्पना से रानी कौर भाजपा, वार्ड 11-करनपुर से विनय कोहली कांग्रेस, वार्ड 12- बकराल वाडा से डा. बिजेन्द्र पाल कांग्रेस, वार्ड 13- चक्खुवाला अजय सोनकर कां्रगेस, वार्ड 15 घंटाघर से प्रकाश नेगी कांग्रेस, वार्ड 16 रेसकोर्स उत्तर से देवेंद्र पाल सिहं मांेटी कांग्रेस, वार्ड 16 कालिका माता मंदिर मार्ग से चरणजीत कौर भाजपा ने जीत दर्ज की अन्य वाडों की बात की जाए तो वार्ड 19 तिलक रोड़ से सविता ओबराय भाजपा, 20 खुडबुड़ा से अशोक कोहली पप्पू कांग्रेस, 21 शिवाजी मार्ग से विपिन चंचल भाजपा, 22 इंद्रेश नगर से तृप्ता देवी भाजपा, 23 धामावाला से नीनू सहगल कांग्रेस, 24 झंडा बाजार से अजय सिंघल भाजपा, 25 डालनवाला उत्तर से सीमा भाजपा, 26 डालनवाला पूर्वी राजेश चौधरी कांग्रेस, 27 डालनवाला दक्षिणी से राजेश जखमोला भाजपा, 28 अधोईवाला से राजीव कुमार मल्होत्रा कांग्रेस, 29 अधोईवाला दक्षिणी आनंद त्यागी कांग्रेस, 30 भगत सिंह कालोनी से कमली भट्ट भाजपा, 31 राजीव नगर वर्षा बडोनी भाजपा, 32 डिफेंस कालोनी सुशील कुमार कांग्रेस, 33 नेहरू कालोनी से बीना उनियाल भाजपा, 34 धर्मपुर से नीरू भट्ट, 35 दीपनगर से ललित भद्री कांग्रेस, 36 अजबपुर से मनमोहन सिंह कांग्रेस, 37 माता मंदिर मार्ग से सोनू उनियाल कांग्रेस, 38 रेसकोर्स दक्षिणी से राखी बड़थ्वाल भाजपा, 39 रेस्टकैंप से राजकुमार कक्कड़ भाजपा, 40 रीठा मंडी से निर्दलीय प्रत्याशी जाहिदा परवीन, 41 सुशील गुप्ता भाजपा, वार्ड 42 कारगी से अनीता सिहं भाजपा, वार्ड 43 पटेल नगर पूर्व महीपाल धीमान भाजपा, 44 ब्रहमपुरी से सतीश कश्यप भाजपा, वार्ड 45 निरंजनपुर से नीरज सेठी भाजपा, 46 माजरा से गुलिस्ता अंसारी कांग्रेस, 47 टर्नर रोड़ सुनील कुमार कांग्रेस, 48 इंद्रा नगर मीरा भाजपा, 49 द्रोणपुरी से बाबू राम भाजपा, वार्ड 50 कांवली से राजेश पुंडीर कांग्रेस, 51 इंद्र नगर से मीरा कैठत भाजपा, 52 बसंत विहार से अंजू बिष्ट भाजपा, 53 गांधी ग्राम से जगदीश धीमान कांग्रेस, 56 यमुना कालोनी से नेहा गुप्ता भाजपा, 57 गोविंद गढ़ से चरणजीत कौशल कांग्रेस, 58 श्रीदेव सुमन नगर से बीना बिष्ट कांग्रेस, वार्ड 59 बल्लुपुर से शारदा भाजपा और वार्ड 60 कौलागढ़ से गंगा क्षेत्री कांग्रेस ने जीत दर्ज की है।
    गौरतलब हो कि वर्ष 2008 में हुए मेयर के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी विनोद चमोली को 60867, निर्दलीय प्रत्याशी मैडम रजनी रावत को 44294 व कांग्रेस प्रत्याशी सूरत सिंह रावत को 40662 मत मिले थे। चुनाव नतीजों पर यदि नजर डाली जाए तो भाजपा ने इस बार 20 हजार से अधिक मतों पर अपनी पैठ दर्ज की है, जबकि कांग्रेस ने लगभग मात्र छहः हजार मत संख्या की बढ़ोत्तरी की है। जबकि रजनी रावत के मतों में 12 हजार मतों का इजाफा हुआ है।


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

18 सीट की मिनी बस को बना डाला टैक्सी

परिवहन विभाग का कारनामा
लाखों रूपये के राजस्व का लगा रहे हैं प्रदेश को चूना
18 सीट की मिनी बस को बना डाला टैक्सी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखंड के परिवहन विभाग के अधिकारी वाहन मालिकों से मिलकर प्रदेश को यात्री कर के रूप में मिलने वाले लाखों रूपये के राजस्व का चूना लगा रहे हैं। यह घोटाला पिछले तीन साल से चल रहा है, जिस में सरकार को अब तक लगभग करोड़ों रूपये का चूना लगाया जा चुका है। मामले के सज्ञान में आने के बाद अधिकारी वाहन स्वामियों को नोटिस देने की बात तो करते है, लेकिन इस घोटाले के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं, उनका नाम लेने से बच रहे हैं। मामले में परिवहन मंत्री सुरेन्द्र राकेश का कहना है कि इसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। एआरटीओ का कहना है कि तीन साल से चल रहा यह मामला अब पकड़ में आया है। लिहाजा वाहन स्वामियों से इसकी वसूली की जाएगी। लेकिन इस घोटाले के कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं इस पर एआरटीओ चुप्पी साध लेते हैं।
    प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश तथा हल्द्वानी परिवहन कार्यालयों द्वारा टैम्पो ट्रेवलर वाहन, जिनका व्हील बेस 3700 मिलीमीटर होता है और इन वाहनों में यात्री क्षमता 18 लोगों की वाहन निर्माता कंपनी ने बनाई है। राज्य के परिवहन कार्यालयों द्वारा इन 18 सीटर वाहन को सात और 10 सीटों में पर्वतीय मार्गो में चलने के लिए स्वास्थता प्रमाण पत्र के साथ ही परमिट जारी किए गए हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्य सरकार को ऐसे वाहनों से 800 रूपया प्रतियात्री प्रतिमाह प्रतिवाहन का नुकसान हो रहा है। ऐसे में बीते तीन सालों से राज्य को लाखों रूपया का चूना परिवहन विभाग के अधिकारियों द्वारा राज्य को लगाया जा चुका है। एक जानकारी के अनुसार देहरादून और ऋषिकेश परिवहन कार्यालयों द्वारा लगभग 200 ऐसे वाहनों को परमिट जारी किए गए हैं जो सरकार को प्रतिदिन लाखों रूपये का चूना लगा रहे हैं। यह भी जानकारी मिली है इन वाहनों को मध्यम दर्जे के यात्री वाहनों की जगह टैक्सी और मैक्सी कैब में पास किया गया है।
 मामले के सामने आने के बाद उप सम्भागीय परिवहन अधिकारी संदीप सैनी ने बताया कि यह मामला उनके संज्ञान में आया है और इस प्रकरण पर वाहन स्वामियों को नोटिस जारी किये गये हैं लेकिन उन्होंने इस मामले में लिप्त अधिकारियों की जांच पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया कि सरकार को चूना लगाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा। वहीं सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीते पाच मार्च को शासन द्वारा कई परिवहन अधिकारियों की प्रोन्नोती हुई है लेकिन मलाईदार पदो पर बैठे होने के कारण और ऊंची पहुंच के चलते ऐसे अधिकारियों को नई तैनाती नहीं दी गई है।

स्थायी निवास पर राजनीति

स्थायी निवास पर राजनीति
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। कांग्रेस सरकार ने बीते दिन स्थायी निवास की कट ऑफ डेट को लेकर जो शासनादेश जारी किया, उसका कोई औचित्य ही नहीं बनता है, क्योंकि मामला अभी भी हाईकोर्ट की डबल बैंच में विराचाधीन है। नैनीताल हाईकोर्ट के 17 अगस्त 2012 के फैसले के आधार पर बीते दिन सरकार द्वारा स्थायी निवास की जो कट ऑफ डेट पर शासनादेश जारी किया है, वह सिर्फ वर्तमान समय में हो रहे निकाय और पंचायत चुनावों में जनता को रिझाने का एक प्रयास है। नैनीताल हाईकोर्ट की डबल बैंच का निर्णय आने के बाद ही इस मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। सरकार ने भी यह बात अपने शासनादेश में स्वीकार की है।
बीते दिन सरकार द्वारा स्थायी निवास की कट ऑफ डेट को लेकर जारी शासनादेश के खिलाफ अब विरोध साफ देखने को मिल रहा है। वहीं इस मामले में राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि कट ऑफ डेट के मामले में उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देर्शों का पालन किया जाना चाहिए, जिसमें उसने राज्यों में रहने वाले लोगों की स्थाई और मूल निवास के मामले पर कट ऑफ डेट 1950 तय की थी। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार का यह शासनादेश लोगों को भ्रमित करने वाला है इस शासनादेश में सिर्फ अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को कट ऑफ डेट में छूट देते हुए राज्य गठन की तिथि 9 नवम्बर 2000 की गयी है। जबकि सामान्य वर्ग के लिए यह कट ऑफ डेट राज्य गठन के 15 साल पहले यानि की 1985 ही रखी गयी है। जिसका मतलब है कि जो लोग पिछले 27 से अधिक समय से राज्य में रह रहे है वही राज्य के स्थायी निवासी होंगे। लेकिन सामान्य तौर पर इस शासनादेश के बारे में प्रचारित यहीं किया जा रहा है कि राज्य गठन के समय से राज्य में रह रहे लोगों को राज्य का स्थायी निवासी माना जायेगा। वहीं दूसरी ओर राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि पीढ़ीदर-पीढ़ी जो लोग उत्तराखण्ड में रह रहे हैं और जिन्होंने राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ी, उनके साथ राज्य सरकार छलावा कर रही है, सरकार के इस फैसले से मूल उत्तराखण्ड के निवासियों को कोई लाभ नहीं होने वाला, बल्कि इसका लाभ उन लोगों को मिलेगा, जिन्होंने राज्य आंदोलन की मुखालफत की थी। राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि ऐसी स्थिति में जब अभी हाईकोर्ट द्वारा इस फैसले में किसी भी तरह का परिवर्तन किया जा सकता हैं सरकार द्वारा लाये गये इस शासनादेश का क्या औचित्य है। हालांकि यह यह संपूर्ण प्रकरण नैनीताल उच्च न्यायालय के एकल बैंच द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद अब डबल बैंच में निर्णय के लिए सुरक्षित है। ऐसे में यह कहना गलत होगा कि नैनीताल उच्च न्यायालय के निर्णय को ही अंगिगृत कर लिया जाएगा। क्यांेकि राज्य आंदोलनकारी संगठन और राज्य के दूर-दराज इलाकों में कार्य कर रहे स्वयं सेवी संगठनों द्वारा इस मामले पर डबल बैंच के निर्णय आने के बाद भी राज्यवासियों के हितों के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
वहीं राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रदेश में होने वाले निकाय चुनावों के लिए अधिसूचना जारी होने वाली है, जिससे ठीक पूर्व सरकार द्वारा यह शिगूफा छोड़ा गया है, ताकि उसे निकाय चुनाव में इसका लाभ मिल सके। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के पास जनता के बीच जाने के लिए कोई ऐसा मुद्दा अभी तक उसके पास नहीं था, जिससे की वह जनता से वोट मंाग सके। क्योंकि महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लेकर कंेद्र से लेकर राज्य की कांग्रेस सरकार कटघरे में है।

परिवहन विभाग का कारनामा

परिवहन विभाग का कारनामा
लाखों रूपये के राजस्व का लगा रहे हैं प्रदेश को चूना
18 सीट की मिनी बस को बना डाला टैक्सी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखंड के परिवहन विभाग के अधिकारी वाहन मालिकों से मिलकर प्रदेश को यात्री कर के रूप में मिलने वाले लाखों रूपये के राजस्व का चूना लगा रहे हैं। यह घोटाला पिछले तीन साल से चल रहा है, जिस में सरकार को अब तक लगभग करोड़ों रूपये का चूना लगाया जा चुका है। मामले के सज्ञान में आने के बाद अधिकारी वाहन स्वामियों को नोटिस देने की बात तो करते है, लेकिन इस घोटाले के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं, उनका नाम लेने से बच रहे हैं। मामले में परिवहन मंत्री सुरेन्द्र राकेश का कहना है कि इसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। एआरटीओ का कहना है कि तीन साल से चल रहा यह मामला अब पकड़ में आया है। लिहाजा वाहन स्वामियों से इसकी वसूली की जाएगी। लेकिन इस घोटाले के कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं इस पर एआरटीओ चुप्पी साध लेते हैं। 
    प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य के देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश तथा हल्द्वानी परिवहन कार्यालयों द्वारा टैम्पो ट्रेवलर वाहन, जिनका व्हील बेस 3700 मिलीमीटर होता है और इन वाहनों में यात्री क्षमता 18 लोगों की वाहन निर्माता कंपनी ने बनाई है। राज्य के परिवहन कार्यालयों द्वारा इन 18 सीटर वाहन को सात और 10 सीटों में पर्वतीय मार्गो में चलने के लिए स्वास्थता प्रमाण पत्र के साथ ही परमिट जारी किए गए हैं। एक जानकारी के अनुसार राज्य सरकार को ऐसे वाहनों से 800 रूपया प्रतियात्री प्रतिमाह प्रतिवाहन का नुकसान हो रहा है। ऐसे में बीते तीन सालों से राज्य को लाखों रूपया का चूना परिवहन विभाग के अधिकारियों द्वारा राज्य को लगाया जा चुका है। एक जानकारी के अनुसार देहरादून और ऋषिकेश परिवहन कार्यालयों द्वारा लगभग 200 ऐसे वाहनों को परमिट जारी किए गए हैं जो सरकार को प्रतिदिन लाखों रूपये का चूना लगा रहे हैं। यह भी जानकारी मिली है इन वाहनों को मध्यम दर्जे के यात्री वाहनों की जगह टैक्सी और मैक्सी कैब में पास किया गया है। 
 मामले के सामने आने के बाद उप सम्भागीय परिवहन अधिकारी संदीप सैनी ने बताया कि यह मामला उनके संज्ञान में आया है और इस प्रकरण पर वाहन स्वामियों को नोटिस जारी किये गये हैं लेकिन उन्होंने इस मामले में लिप्त अधिकारियों की जांच पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया कि सरकार को चूना लगाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा। वहीं सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीते पाच मार्च को शासन द्वारा कई परिवहन अधिकारियों की प्रोन्नोती हुई है लेकिन मलाईदार पदो पर बैठे होने के कारण और ऊंची पहुंच के चलते ऐसे अधिकारियों को नई तैनाती नहीं दी गई है।