बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बहुगुणा सरकार का कारनामा : डोबरा -चांटी पुल तो बना नहीं कर डाला पूरा भुगतान

राजेन्द्र जोशी

देहरादून : उत्तराखंड में टिहरी बांध की झील के ऊपर बनने  वाले डोबरा चांटी पुल के निर्माण में सौ करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले का मामला सामने आया है।  खास बात यह है कि देश के इस सबसे बड़े सस्‍पेंशन पुल का निर्माण बीते चार सालों  से अभी तक पूरा नहीं हुआ है, जबकि पुल बनाने वाली ठेकेदार कंपनी को 120 करोड़ रुपये की लगभग पूरी लागत का भुगतान कर दिया गया है, और इस इलाके के लोग इस पुल के निर्माण को लेकर आन्दोलनरत हैं।  
गौरतलब है कि टिहरी से प्रतापनगर की 4-5 किलोमीटर की दूरी पुल के डूब क्षेत्र में आ जाने के बाद बढकर करीब 70 किलोमीटर हो गई थी. जिसके बाद टिहरी बांध परियोजना पुर्नवास निदेशालय ने 440 मीटर लंबे डोबराचांटी पुल की परियोजना तैयार की. पुल की लागत 129.43 करोड़ रुपये प्रस्तावित थी. जिसका ठेका चंडीगढ़ की मै.वीके गुप्ता एंड एसोसिएट्स को दिया गया. लेकिन 2006 में निविदाएं आमंत्रित किए जाने के बाद से अब तक पुल के दोनों छोर पर केवल पिलर ही बन पाये हैं. जबकि ठेकेदार कंपनी को 124 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है.
उत्तराखंड सरकार के इस गड़बड़झाले का खुलासा राजेश्वर पैन्यूली नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर आरटीआई के जरिए हुआ है. इस पुल के न होने से टिहरी से प्रतापनगर और आसपास के दर्जनों गांवों को भारी परेशानी का सामना करना करना पड़ रहा है. आरटीआई में मिली जानकारी के अनुसार इस पुल के लिए कुल लागत का 50 फीसदी केन्द्र सरकार द्वारा दिया जाना था, जबकि बाकी 50 फीसदी राज्य सरकार द्वारा खर्च होना था. योजना के लिए कुल 128.53 करोड़ की राशि टिहरी बांध परियोजना पुर्नवास निदेशालय को दी गई थी. वहीं, 2006 में निविदा स्‍वीकृत होने के बाद से इस साल अप्रैल तक निर्माता ठेकेदार ने 124.44 करोड़ रुपये खर्च कर दिये, इस पुल पर अब तक लगभग 130 करोड़ रुपये खर्च किये जा चके हैं .
  पुल भले ही नहीं बना हो, लेकिन इस पुल के लिए तकनीकी सहायता के नाम पर अधिकारियों ने 10 से ज्‍यादा बार विदेश यात्राएं की हैं. यही नहीं, इस पुल की तकनीक के लिए आईआईटी खड़गपुर से अनुबंध भी किया गया था. जानकार बताते हैं कि यह पुल आम झूला पुल से काफी अलग है, लेकिन सरकार इसे केवल एक इंजीनियर के भरोसे बना रही है, जबकि इसके लिए अंतरराष्‍ट्रीय निविदाएं मंगाई जानी चाहिए थी.
पुल के निर्माण में भ्रष्‍टाचार का आलम यह है कि यहां रेत बजरी तैयार करने के लिए कंपनी द्वारा अवैध ढंग से स्‍टोन क्रेशर भी लगा लिया गया. इस क्रेशर से पुल के निर्माण के लिए नाममात्र मैटेरियल तैयार किया जाता और बाकी अवैध रूप से खुले बाजार में बेचा जा रहा था. जानकारी मांगने पर अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि अवैध संचालन के कारण क्रेशर सीज कर लिया गया.
राष्‍ट्रमंडल खेल से लेकर कोयला घोटाले का दंश झेल रही कांग्रेस सरकार इस नए घोटाले से सकते में हैं. राज्‍य की कांग्रेस सरकार जो अब तक इस पूरे मामले में आंखे मूंदी बैठी थी, आरटीआई से खुलासे के बाद हरकत में आई है. उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मिनिस्‍टर मंत्री प्रसाद नैथानी ने मामले में सरकार द्वारा जांच करवाने की बात कही है
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004  में जब टेहरी बांध परियोजना की सुरंग संख्या चार को पूर्णरूप से बंद कर दिया गया तो एक एक कर के भागीरथी और भिलंगना नदी पर बने पुल एक एक कर के डूबने लगे। नदी पर बने यह पुल ही उस पार बसे सम्पूर्ण प्रतापनगर क्षेत्र की जीवन रेखा हुआ करते थे , आवागमन के लिए दो हल्का मोटर वाहन पुल बनाये गए जो कर्मश: पीपल डाली और स्यांसू नामक स्थानों में बनाये गये। इन पुलों से मात्र हल्के वाहन ही गुजर पाते है और भारी वाहनों को उत्तरकाशी या घनसाली होते हुए यहाँ पहुचना पड़ता है जिसके लिए उन्हें लगभग सौ किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है, अतिरिक्त दूरी तय करने के कारण माल भाड़े में वृद्धि हुई और यहाँ पहुचने वाले सामान की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हो गयी है जहाँ एक और देश की जनता महगाई से त्रस्त है वही दूसरी और इस क्षेत्र की जनता पर दोगुनी महगाई का बोझ पड़ रहा है , कोई भारी मोटर मार्ग न होने की वजह से जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है प्रत्यक्ष रूप से लगभग दो लाख लोग सीधे रूप से प्रभावित हो रहे है और लाखो लोग परोक्ष रूप से। वर्ष 2006  में जनता के आक्रोश को देखते हुए डोबरा चांठी नामक पुल को स्वीकृति दी गयी थी जो अब तक तैयार नहीं हो पाया है।

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

उत्तराखंड के बाज़ीगर अधिकारी बने, सिडकुल के सौदागर

शिव प्रसाद सती
देहरादून : उत्तराखंड में जमीन की खरीद-फ रोख्त ने सबसे बड़े धंधे का रूप ले लिया है। गांवों से लेकर शहरों तक जमीन के धंधेबाजों का एक पूरा नेटवर्क उत्तराखंड बनने के बाद तैयार हो गया। यूं तो जमीन खरीदने और बेचने में बिचौलिया बनने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब से प्रभावशाली लोग इसमें घुसे हैं तब से इस धंधे का रूप भी बदल गया है और चरित्र भी। इन प्रभावशाली लोगों में सत्ता के गलियारों में खासा असर रखने वाले नेताओं से लेकर सरकार के आला अफसर तक शामिल हैं। प्रभावशाली लोगों के इस धंधे पर हावी हो जाने से इस धंधे ने जमीन की लूटमार का रूप ले लिया है। किसानों की भूमि पर डाकाजनी करने वाले इस वर्ग के पास चूंकि सत्ता की ताकत है, इसलिए जबरन जमीन की खरीद से लेकर जमीनों को विवाद में उलझाकर फि र उसे नीलाम के भाव खरीदने तक सारे हथकंडे अपनाए जाते हैं। बड़े-बड़े अफसरों के इस खेल में होने के कारण कई बार नाजायज रूप से पुलिस और प्रशासन की ताकत के इस्तेमाल से भी किसानों को जमीन बेचने के लिए बाध्य किया जाता है। कई बार तो घूस में एक-दो प्लाट देने का लालच देकर प्रभावशाली अफ सरों को जमीन की जबरिया खरीद में शामिल किया जाता है। इस धंधे की जड़ें इतनी गहरी और फैली हुई हैं कि सत्ता की शायद ही कोई शक्तिपीठ हो जहां ये जड़ें न पहुंची हों। अस्सी के दशक के बाद देहरादून, धनोल्टी, नैनीताल, मसूरी, हल्द्वानी समेत कई स्थानों पर महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अफ सरों ने अपने प्रभाव से जमीन हथियाना शुरू कर दिया था। राजधानी में ही सैकड़ों बीघा जमीन रखने वालों की अच्छी खासी तादाद है। नेताओं और अफ सरों के खुद भूमि की लूटमार में शामिल होने की घटना ने भू-माफि या को निद्र्वंद्व और निर्भीक बना दिया है। राज्य बनने के बाद यह लूट न केवल तेज हुई बल्कि भू-दस्यु बेलगाम हो गए। सरकारी स्तर पर ऐसा कोई प्रयास हाल के वर्षों में नजर नहीं आया जो बिचौलियों और बिल्डरों से किसानों व उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता हो या इस पूरे कारोबार को पारदर्शी बनाने की इच्छा को बताता हो। उल्टे सरकार के कुछ पैसों ने किसानों को अपनी जमीनें औने-पौने दामों में भू-माफि या को बेचने के लिए बाध्य किया।
   देहरादून-मसूरी रोड पर सरकार ने किसानों की 18000 नाली जमीन पर कब्जा कर लिया। यह तथ्य भी इसी कड़वे सच को उजागर करता है कि जमीन की लूट में प्रभावशाली लोग शामिल हैं। भूमि की खरीद-फ रोख्त के लिए बनाया गया ढीला-ढाला कानून भी इसे पुष्ट करता है। यह तब है जब जमीन के इस अरबों के कारोबार मेंसबसे ज्यादा नंबर दो का पैसा लगा हुआ है। सत्ता में बैठा शायद ही कोई सफेदपोश या नौकरशाह होगा जिसका उत्तराखंड में कहीं न कहीं प्लाट नहीं होगा। कई नौकरशाहों ने तो उत्तरकाशी, चंबा, मसूरी, चकराता में बगीचे तक बना लिए हैं। देहरादून में हर नौकरशाह की जमीन है। सामाजिक सेवा के नाम पर कौडिय़ों के भाव सरकारी जमीनों की जमकर लूट खसोट हुई। आज हालात यह हैं कि सरकार को अपने महकमों के भवन बनाने के लिए जमीन नहीं मिल रही। जो जमीनें प्राइम लोकेशन में थीं, उन्हें रसूखदारों और भू माफि या की सांठगांठ से पहले ही ठिकाने लगा दिया गया। ऐसे में यह पड़ताल का विषय तो है कि आखिर इस कारोबार की जड़ें कहां और किस हद तक फैली हैं। आखिर वे कौन लोग हैं जो पैसे के लिए राज्य की हरियाली पर कंक्रीट का साम्राज्य खड़ा कर देना चाहते हैं। आखिर प्रदेश की जनता को यह जानने का हक है कि अरबों रुपये के इस कारोबार में कौन-कौन शामिल है और इसके लिए अकूत धन कहां से आ रहा है। आखिर पिछले 14 साल से सूबे की सरकारों को यह बात क्यों नहीं समझ आ रही है कि उत्तराखंड हिमालयी और सीमांत राज्य है, यहां उत्तर-पूर्वी राज्यों सरीखे संकट पैदा न हों, इसके लिए जरूरी है उन लोगों के लिए पैरों के नीचे जमीन बची रहे, जिन्होंने सदियों प्रकृति से जूझते हुए इन बीहड़ पहाड़ों और मैदानों को सरसब्ज और दर्शनीय बनाया है। इसके लिए सरकार को सर्वोच्च प्राथमिकता से सोचना होगा।
   राज्य में जमीनों की लूटमार इन 14 सालों में राजनेता ब्यूरोक्रेट व भू-माफियाओं के लिए सोने पर सुहागा धंधा जैसा काम उत्तराखण्ड में हो रहा है जबकि सिडकुल का काम राज्य में सवालिया निशान खड़ा हो चला है जबकि बताया जा रहा है कि दून स्क्वायर के नाम से सहस्त्रधारा रोड पर प्रोजेक्ट होने की बात की पुष्टि विभाग द्वारा की गई है क्या यह सिडकुल के काले कारनामों से बाहरी भूमाफिया उत्तराखण्ड में सरकारी जमीनों पर नजर गडाए बैठे है देहरादून की सड़कों पर भी दून स्क्वायर के नाम से बड़े बड़े होल्डिंग सजे है जबकि सिडकुल इस बात को नकार रहा है कि यह कॉमर्शियल हब के लिए ही है शंखनाद संवाददाता द्वारा जब दून स्थित आईटी पार्क का जायजा लिया गया तो एक गाड़ी में ही दून स्क्वायर के नाम से ही फ्लेट की बुकिंग जारी है जब संवाददाता ने सुपरटैक के उत्तराखण्ड प्रभारी अनिल शर्मा से बातचीत की तो उनका साफ कहना था कि हम काई भी आवासीय फ्लेट सिडकुल में नहीं बना रहे है
   सूत्रों को पता है कि इस पर राज्य के एक प्रमुख सचिव का दबाव है देखना यह है कि राज्य के मुखिया इस राजनीतिक माहौल में सिडकुल के इस भ्रष्ट ब्यूरोके्रट पर कार्यवाही करते है कि नहीं जबकि राज्य के एक आद्योगिक क्षेत्र को बढ़ावा देना और स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया कराना सिडकुल की जिम्मेदारी भी है लेकिन जिस तरह सिडकुल में जमीनों के नाम पर मोटा खेल खेला जा रहा है इसको लेकर राज्य सरकार और प्रदेश के मुखिया क्यों मौन है यह सवाल अभी सवालों के घेरे में है शंखनाद टीम द्वारा आरटीआई से पता चला है कि देहरादून के आईटी पार्क स्थित 16692.05 वर्ग भूमि कॉमर्शियल हब के लिए सुपर टैक लि. को दी गई है जबकि सुपर टैक ने 13/02/2014 को एक दैनिक समाचार पत्र में विज्ञापन देकर दून स्क्वायर में स्टूडियो अपार्टमेंट कें नाम पर 25 लाख में बुक कराए जाने हेतु प्रकाशित किया गया था लेकिन सिडकुल द्वारा सुपर टैक को दिए गए पत्र के जबाव में कहा गया है कि आप द्वारा विकसित किए जाने वाले कॉमर्शियल हब में किसी प्रकार की स्टूडियों अपार्टमेंट का कोई प्रावधान नहीं है जबकि सिडकुल द्वारा 17 फरवरी 2014 को दिए गए पत्र के जबाव में यह साफ लिखा गया था कि आप ने ऐसा विज्ञापन क्यों प्रकाशित करवाया था जबकि सिडकुल ने यह भी कहा था कि लीज डीड व डाक्यूमेंट के उल्लंघन के क्रम में सिडकुल द्वारा सुपर टैक पर कार्यवाही करने की बात कही गई थी। लेकिन डेढ माह बीत जाने के बाद भी सिडकुल द्वारा कोई कानूनी कार्रवाही न करना इस बात की पुष्ठि करता है कि सिड$कुल और सुपर टैक के मिली भगत से प्रदेश सरकार की जमीनों को सस्ते दामों पर कॉमर्शियल हब के रूप में आवासीय फ्लेट बनाकर बेचने की योजना सुपर टैक द्वारा अपने द्वारा दिए गए विज्ञापन अपनी मंशा साफ कर दी है लेकिन सिडकुल और राज्य सरकार के अधिकारी और ब्यूरोक्रेटों की मिलीभगत से सुपर टैक प्रदेश में कई प्रोजेक्ट उधमसिंह नगर हरिद्वार और देहरादून में चला रहे हैं राज्य की सरकारी जमीनों को जिस तरह से बंदरबाट किया जा रहा है उस पर सुपर टैक द्वारा उनकी मंशा और नीयत साफ हो गई है कि राज्य में सरकारी भूमि को कॉमर्शियल हब के रूप में लेकर आवासीय फ्लेटों को बनाकर बेचा जाना मोटा कमाई का धंधा हो सकता है लेकिन सिडकुल और सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है यह तब है जब जमीन के इस अरबों के कारोबार में सबसे ज्यादा नंबर दो का पैसा लगा हुआ है। सत्ता में बैठा शायद ही कोई सफेदपोश या नौकरशाह होगा जिसका उत्तराखंड में कहीं न कहीं प्लाट नहीं होगा। कई नौकरशाहों ने तो उत्तरकाशी, चंबा, मसूरी, चकराता में बगीचे तक बना लिए हैं। देहरादून में हर नौकरशाह की जमीन है।           
    सामाजिक सेवा के नाम पर कौडिय़ों के भाव सरकारी जमीनों की जमकर लूट खसोट हुई। आज हालात यह हैं कि सरकार को अपने महकमों के भवन बनाने के लिए जमीन नहीं मिल रही। जो जमीनें प्राइम लोकेशन में थीं, उन्हें रसूखदारों और भू माफि या की सांठगांठ से पहले ही ठिकाने लगा दिया गया। ऐसे में यह पड़ताल का विषय तो है कि आखिर इस कारोबार की जड़ें कहां और किस हद तक फैली हैं। आखिर वे कौन लोग हैं जो पैसे के लिए राज्य की हरियाली पर कंक्रीट का साम्राज्य खड़ा कर देना चाहते हैं। आखिर प्रदेश की जनता को यह जानने का हक है कि अरबों रुपये के इस कारोबार में कौन-कौन शामिल है और इसके लिए अकूत धन कहां से आ रहा है। आखिर पिछले 14 साल से सूबे की सरकारों को यह बात क्यों नहीं समझ आ रही है कि उत्तराखंड हिमालयी और सीमांत राज्य है, यहां उत्तर-पूर्वी राज्यों सरीखे संकट पैदा न हों, इसके लिए जरूरी है उन लोगों के लिए पैरों के नीचे जमीन बची रहे, जिन्होंने सदियों प्रकृति से जूझते हुए इन बीहड़ पहाड़ों और मैदानों को सरसब्ज और दर्शनीय बनाया है। इसके लिए सरकार को सर्वोच्च प्राथमिकता से सोचना होगा।
(लेखक उत्तराखंड शंखनाद के संपादक है)

राज्य सरकार ने समाधान एनजीओ को जांच के बाद सेवा प्रदाता सूची से हटाया

बिना पंजीकरण के किया जा रहा था एनजीओ का संचालन
राजेन्द्र जोशी
ngo logoदेहरादून । उत्तराखण्ड में एनजीओ की आ़ड़ लेकर तमाम गैर कानूनी गतिविधियों को अंजाम देने वाले एक एनजीओ पर राज्य सरकार ने बिना पंजीकरण के सेवा प्रदाता बनाए जाने के मामले में उसे बाहर का रास्ता दिखाकर कानूनी कार्यवाही करने की तैयारी शुरू कर दी है। बहुगुणा सरकार के शासनकाल में इस एनजीओ पर कई शिकायतें होने के बाद भी किसी प्रकार की कार्यवाही केा अंजाम नहीं दिया गया था और महज जांच के नाम पर काफी समय तक शासन से लेकर प्रशासन तक के अधिकारी एनजीओ को बचाने का खेल खेलते रहे लेकिन प्रदेश में नए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कुर्सी पर बैठने के बाद से ही कई लम्बित मामलों में लोगांे को न्याय देकर और लोगों की समस्याआंे को जिस तरह से समझा और उनके निराकरण का प्रयास किया उससे लोगों में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है।  
  गौरतलब हो कि उत्तराखण्ड के देहरादून स्थित जाखन में समाधान नाम की एनजीओ चलाकर महिला हितांे के संरक्षण करने का दावा करने वाले एक एनजीओ पर पिछले काफी समय से कई तरह के गोरख धंधो को अंजाम देने का आरोप लगता रहा है। इस गोरखधंधो में फर्जी एसिड अटैक के मामले से लेकर बलात्कार जैसे झूठे मुकदमें में फंसाने जैसे कई उदाहरण हंै। हालांकि इन मामलों में पुलिस की जांच के बाद हकीकत सामने आने के साथ ही इन फर्जी मामलों में सच सामने आ चुका है और पुलिस दोनों ही मामलों में अपनी अंतिम रिपोर्ट लगाकर मामलोें को झूठा साबित कर चुकी है। लेकिन सरकार से इस एनजीओ के विरूद्ध कार्यवाही होने के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि यह दोनों मामले गलत थे तो आज तक पुलिस ने झूठे मुकदमे कायम करने पर उन लोगांे के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की जिनके द्वारा इस साजिश को अंजाम दिया गया था। इस मामले में पहला मामला दिल्ली निवासी विजय आनंद शर्मा का सामने आया था और शर्मा पर फर्जी एसिड अटैक को मुकदमा कायम कराने में रेनूडी सिंह नाम की एक महिला जो उक्त एनजीओ का संचालन करती है की मुख्य भूमिका सामने आई थी वहीं गढ़ी कैन्ट निवासी कृष्ण कुमार कश्यप के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा कायम करवा दिया गया था जो बाद में पुलिस की जांच के बाद पीडि़ता द्वारा सच बताने पर मामले को गलत साबित किया गया था। दोनांे ही मामलांे में समाधान की संचालिका रेनूडी सिंह की भूमिका सामने आई थी और इसके अलावा भी प्रदेश के देहरादून में कई अन्य लोगो को भी गैंगरेप जैसे मामलों में फंसाने का काम किया जा चुका है। अगर पुलिस समाधान एनजीओ की संचालिका रेनूडी सिंह की गतिविधियांे एवं कार्यों की गोपनीय जांच करे तो कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर इतने समय तक एक एनजीओ बिना यहां पंजीकरण नही था तो आखिर इस एनजीओ को सेवा प्रदाता (सर्विस प्रोवाइडर) के रूप में किसके इशारे पर महिला एवं बालविकास विभाग में पंजीकृत किया गया।
   इस मामले में विजय आनन्द शर्मा ने राज्य सरकार से मांग की है कि सरकार इस मामले में जांच कर उन अधिकारियो के खिलाफ भी कार्यवाही करे जो इस एनजीओ को लाभ देने में उतने ही सहभागी हैं जिनके इशारे पर इतने समय तक एनजीओ को सर्विस प्रावाइडर के रूप में राज्य के भीतर लाभ दिया गया। हालाकि जांच के बाद अब राज्य सरकार ने समाधान एनजीओ को सर्विस प्रोवाइडर के रूप में गलत तरीके से काम करने एवं बिना पंजीकरण के एनजीओ के संचालन पर इसको अपनी सूची से बाहर कर उसका निरस्तीकरण कर दिया है। इस बारे में सचिव एस राजू के यहां से बकायदा इसका आदेश भी जारी किया जा चुका है और अब विभाग एनजीओ समाधान पर कानूनी कार्यवाही करने की तैयारी कर रहा है। वहीं समाधान एनजीओ के खिलाफ कार्यवाही होने पर दिल्ली निवासी विजय आनंद शर्मा का कहना है कि वह पिछले काफी समय से इस एनजीओ की गैरकानूनी गतिविधियो को उजागर करने के साथ इसकी शिकायत कर रहे थे और अब राज्य सरकार ने कार्यवाही की है। उन्होने मांग की है कि समाधान एनजीओ के यहां गैरकानूनी तरीके से रह रही महिलाएं एवं बच्चों को वहां से रिहा कराकर एनजीओ के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए और एनजीओ द्वारा अब तक जितने भी मामले उजागर किए गए हैं उनकी न्यायिक जांच की जानी चाहिए।

तिवारी के मैदान में कूदने की सुगबुगाहट से कांग्रेस-भाजपा की उड़ी नींद

nd-tiwari-rohit-shekharराजेन्द्र जोशी
देहरादून : देश के वित्तमंत्री व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके पंडित नारायण दत्त तिवारी के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय सीट से चुनावी मैदान में कूदने से इस बार चुनाव रोचक हो सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी के निर्दलीय चुनाव लड़ने की रायशुमारी के बाद इस सीट पर चुनावी समीकरण बदलने के कयास तेज हो गए हैं।
  जानकारों के अनुसार एनडी तिवारी के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने के कयासों से कई दमदार नेताओं की नींद हराम हो गयी है। वहीं वोटों का ध्रुवीकरण होने से कांग्रेस व भाजपा की मुश्किलें भी बढ़नी तय है। कांग्रेस आलाकमान तिवारी की दावेदारी को लेकर चिंतित है, यही वजह है कि प्रत्याशियों की घोषणा करने में देरी हो रही है। अन्यथा कांग्रेस ने यहाँ से केसी सिंह बाबा का नाम लगभग फाइनल कर दिया है लेकिन तिवारी के मैदान मे कूदने की घोषणा के चलते कांग्रेस पशोपेश में फंसती नज़र आ रही है.
 उल्लेखनीय है कि नैनीताल सीट से एनडी तिवारी बतौर कांग्रेसी प्रत्याशी के रूप में 1980, 1996 और 1999 में सांसद निर्वाचित हो चुके हैं। नैनीताल जिले के पदमपुरी में उनका पैतृक घर है। तराई उनका राजनैतिक गढ़ रहा है।  जबकि नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट से केसी सिंह बाबा भी लगातार दूसरी बार जीते हैं। तीसरी बार भी उनको ही टिकट मिलना लगभग अंतिम चरण मे है  
इस सीट पर अधिकांश चुनावों में सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच रहा है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ने से इस बार मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
  यहाँ यह भी गौरतलब हो कि सिडकुल भी एनडी तिवारी की देन है। इस सीट पर तिवारी के प्रशंसकों और समर्थकों के रूप में वोटरों की एक बड़ी संख्या है, जो वर्तमान में कांग्रेस से जुड़े हैं। तिवारी चुनाव लड़े तो वोटों का ध्रुवीकरण होना तय है। अपने रायशुमारी अभियान के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने कहा कि इस देश की रीढ़ युवा हैं और भारत को आगे बढ़ाने के लिए नौजवान उठना होगा ।
 उन्होंने कहा कि कल तक हमारा देश इंग्लैंड और अमेरिका को देखता था, लेकिन अब इन देशों की नजर हमारे भारत पर टिकी है। युवाओं के बलबूते ही भारत विकास की ऊंचाई को छुएगा।
 वहीँ पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के सितारगंज पहुंचने पर क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेसी और बुजुर्गों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान पूर्व सीएम तिवारी वरिष्ठ व बुजुर्ग नेता और कांग्रेसियों से मिलकर अपनी पुरानी यादों में खो गए। तिवारी ने उनसे क्षेत्र का हाल जाना और काफी देर तक होटल में गुफ्तगू करते रहे। तिवारी के सीधे संवाद से कार्यकर्ता गदगद नजर आए।

सतपाल महाराज के बाद कंडारी होंगे भाजपा में शामिल

matwarsinghkandariदेहरादून (डीबीएमएस) : मोदी की आंधी मुझे भी उड़ा ले गई। कार्यकर्ताओं का भारी दबाव था इसलिए राजनाथ सिंह के बुलावे पर दिल्ली आया। भाजपा के छोड़ने का पश्चातताप भी किया। कांग्रेस में गृह युद्ध के हालात है। वहां रहकर मरने से अच्छा है कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सहयोग दिया जाए। यह कहना है कांग्रेसी नेता रहे मातबर सिंह कंडारी का जो जल्द ही विधिवत रूप से भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं.तीन साल पहले वो भाजपा छोड़ कांग्रेस मे शामिल हो गए थे जहाँ उनकी दाल नहीं गल पाई थी और न ही उनको वहां कोई तवज्जो ही मिली थी .सतपाल महाराज के बाद कांग्रेस के लिए यह दूसरा बड़ा झटका होगा।
  वह टिहरी उप-चुनाव से पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बुलावे पर सोमवार को दिल्ली गए कंडारी ने उनसे मुलाकात की। राजनाथ ने प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत को जल्द ही कंडारी की ज्वाइनिंग की तिथि तय करने को कहा है। कांग्रेस के दिग्गज मातबर सिंह कंडारी आज दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिले। कंडारी ने बताया कि बीती रात लगभग पौने बारह बजे उन्हें दिल्ली आने का संदेश मिला। कंडारी सोमवार को दिल्ली पहुंचे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात की। काफी देर चली मुलाकात के बाद राजनाथ सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत को फोन कर कंडारी की ज्वाइनिंग तिथि तय करने को कहा। कंडारी के साथ इस दौरान भाजपा के दो विधायक स्वामी यतीश्वरानंद व संजय गुप्ता भी मौजूद रहे।
 कंडारी की ज्वाइनिंग के बाद कांग्रेस को राजनीतिक तौर पर पौड़ी व टिहरी संसदीय सीट पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। सूत्रों की माने तो जल्द ही कंडारी की ज्वाइनिंग की तिथि तय हो जाएगी और इसके बाद कई दूसरों का रास्ता भी खुलेगा। दिल्ली में राजनाथ सिंह से मातबर सिंह कंडारी की मुलाकात के घटनाक्रम से प्रदेश नेतृत्व अभी अनजान बना हुआ है। यह अनजानापन किसी रणनीति का हिस्सा है या फिर कोई और बात यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत कहा कि देखते है क्या होता है। पहले पार्टी नेताओं से बात कर थाह ली जाएगी। इसके बाद आगे की योजना बनेगी।