मंगलवार, 4 नवंबर 2014

इंदिरा की हत्या की आंखों देखी!

नई दिल्ली। उड़ीसा में जबरदस्त चुनाव प्रचार के बाद इंदिरा गांधी 30 अक्टूबर 1984 की शाम दिल्ली पहुंची थीं। आमतौर पर जब वो दिल्ली में रहती थीं तो उनके घर 1 सफदरजंग रोड पर जनता दरबार लगाया जाता था। लेकिन ये भी एक अघोषित नियम था कि अगर इंदिरा दूसरे शहर के दौरे से देर शाम घर पहुंचेंगी तो अगले दिन जनता दरबार नहीं होगा। 30 तारीख की शाम को भी इंदिरा से कहा गया कि वो अगले दिन सुबह के कार्यक्रम रद्द कर दें। लेकिन इंदिरा ने मना कर दिया। वो आइरिश फिल्म डायरेक्टर पीटर उस्तीनोव को मुलाकात का वक्त दे चुकी थीं।

इंटरव्यू के लिए निकल रही थीं इंदिरा
   एसीपी दिनेश चंद्र भट्ट बताते हैं कि जैसे एक नॉर्मल तरीका होता है। सुबह उठकर आप जनता से मिलते हैं तो उस दिन एक बिजी शिड्यूल था। उनके इंटरव्यू के लिए बाहर से एक टीम आई हुई थी। पीटर उस्तीनोव आए। उन लोगों ने अपना सर्वे किया। ये देखा कि खुली जगह पर इंटरव्यू करना चाहिए। वहां दीवाली के पटाखे पड़े हुए थे। उसको साफ-वाफ करवा कर वैसा इंतजाम करवाया गया तो उसमें कुछ वक्त लग रहा था।
दरअसल पीटर इंदिरा गांधी पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे थे। इस बीच सुबह के आठ बजे इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर के धवन 1 सफदरजंग रोड पहुंच चुके थे। धवन जब इंदिरा गांधी के कमरे में गए तो वो अपना मेकअप करा रही थीं। इंदिरा ने पलटकर उन्हें देखा। दीवाली के पटाखों को लेकर थोड़ी नाराजगी भी दिखाई और फिर अपना मेकअप पूरा कराने में लग गईं।
   अब तक घड़ी ने 9 बजा दिए थे। लॉन भी साफ हो चुका था और इंटरव्यू के लिए सारी तैयारियां भी पूरी थीं। चंद मिनटों में ही इंदिरा एक अकबर रोड की तरफ चल पड़ीं। यहीं पर पेंट्री के पास मौजूद था हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह। नारायण सिंह की ड्यूटी आइसोलेशन कैडर में होती थी। साढ़े सात से लेकर 8.45 तक पोर्च में ड्यूटी करने के बाद वो कुछ देर पहले ही पेंट्री के पास आकर खड़ा हुआ था। इंदिरा को सामने से आते देख उसने अपनी घड़ी देखी। वक्त हुआ था 9 बजकर 05 मिनट।

आर के धवन भी उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
दूरी करीब तीन से चार फीट रही होगी। तभी वहां से एक वेटर गुजरा। उसके हाथ में एक कप और प्लेट थी। वेटर को देखकर इंदिरा थोड़ा ठिठकीं। पूछा कि ये कहां लेकर जा रहे हो। उसने जवाब दिया इंटरव्यू के दौरान आइरिश डायरेक्टर एक-टी सेट टेबल पर रखना चाहते हैं। इंदिरा ने उस वेटर को तुरंत कोई दूसरा और अच्छा टी-सेट लेकर आने को कहा। ये कहते हुए ही इंदिरा आगे की ओर बढ़ चलीं। ड्यूटी पर तैनात हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह छाता लेकर उनके साथ हो लिया।

हत्यारों से इंदिरा ने कहा था-नमस्ते
तेज कदमों से चलते हुए इंदिरा उस गेट से करीब 11 फीट दूर पहुंच गई थीं जो एक सफदरजंग रोड को एक अकबर रोड से जोड़ता है। नारायण सिंह ने देखा कि गेट के पास सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह तैनात था। ठीक बगल में बने संतरी बूथ में कॉन्सटेबल सतवंत सिंह अपनी स्टेनगन के साथ मुस्तैद खड़ा था।
आगे बढ़ते हुए इंदिरा गांधी संतरी बूथ के पास पहुंचीं। बेअंत और सतवंत को हाथ जोड़ते हुए इंदिरा ने खुद कहा-नमस्ते। उन्होंने क्या जवाब दिया ये शायद किसी को नहीं पता लेकिन बेअंत सिंह ने अचानक अपनी दाईं तरफ से .38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर निकाली और इंदिरा गांधी पर एक गोली दाग दी। आसपास के लोग भौचक्के रह गए। सेकेंड के अंतर में बेअंत सिंह ने दो और गोलियां इंदिरा के पेट में उतार दीं। तीन गोलियों ने इंदिरा गांधी को जमीन पर झुका दिया। उनके मुंह से एक ही बात निकली-ये क्या कर रहे हो। इस बात का भी बेअंत ने क्या जवाब दिया ये शायद किसी को नहीं पता।
लेकिन तभी संतरी बूथ पर खड़े सतवंत की स्टेनगन भी इंदिरा गांधी की तरफ घूम गई। जमीन पर नीचे गिरती हुईं इंदिरा गांधी पर कॉन्सटेबल सतवंत सिंह ने एक के बाद एक गोलियां दागनी शुरु कीं। लगभग हर सेकेंड के साथ एक गोली। एक मिनट से कम वक्त में सतवंत ने अपनी स्टेन गन की पूरी मैगजीन इंदिरा गांधी पर खाली कर दी। स्टेनगन की तीस गोलियों ने इंदिरा के शरीर को भूनकर रख दिया।
आर के धवन बताते हैं कि उस वक्त भी मैं उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था। इंदिरा जी भी नीचे देख रही थीं। मैं भी नीचे देखकर चल रहा था। बात कर रहे थे। जैसे ही सिर उठाया तो देखा बेअंत सिंह जो गेट पर था उसने अपनी रिवॉल्वर से गोलियां चलानी शुरू कर दीं। गोलियां चलनी शुरू हुईं तो इंदिरा जी उसी वक्त जमीन पर गिर गईं। तभी सतवंत सिंह ने गोलियों की बौझार शुरू कर दी। जब वो दृश्य मेरे सामने आता है तो दिमाग पागल हो जाता है।

जब पीएम के लिए ऐंबुलेंस तक नहीं मिली
 हेड कान्सटेबल नारायण सिंह हो या आर के धवन। सब हक्के-बक्के थे। वक्त जैसे थम गया था। दिमाग में खून जमने जैसी हालत थी। तभी बेअंत सिंह ने आर के धवन की ओर देखकर कहा- हमें जो करना था वो हमने कर लिया। अब तुम जो करना चाहो, वो करो। वहां मौजूद सभी लोग एक झटके के साथ होश में आए। आर के धवन के मन में एक ही बात आई। इंदिरा को जल्द से जल्द हॉस्पिटल पहुंचाया जाए। वो जोर से चीखे-एंबुलेंस।
उनकी बात का किसी ने जवाब नहीं दिया। पास में खड़े एसीपी दिनेश चंद्र भट्ट ने तुरंत बेअंत और सतवंत को काबू में ले लिया। उनके हथियार जमीन पर गिर गए। उन्हें तुरंत पास के कमरे में ले जाया गया। एसीपी दिनेश चंद्र भट्ट कहते हैं कि उस वक्त जो हो सकता था किया गया लेकिन चूंकि वो इतना अचानक और अनपेक्षित था कि उसको याद करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।
 अब तक छाता लेकर भौचक्क खड़ा रहा हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह भी हरकत में आया। उसने छाता फेंका और डॉक्टर को बुलाने के लिए दौड़ पड़ा। एक अकबर रोड के लॉन में इंदिरा का इंतजार करते हुए आइरिश डेलिगेशन को फायरिंग की आवाज अजीब सी लगी। फिर उन्हें लगा कि शायद एक बार फिर दीवाली के पटाखे फोड़े गए हैं। डायरेक्टर पीटर उस्तीनोव वहीं पर इंदिरा का इंतजार करते रहे।
इधर आर के धवन ने इंदिरा को उठाने की कोशिश की। तभी बुरी तरह घबराई हुईं सोनिया गांधी भी वहां पहुंच गईं। तब तक कई दूसरे सुरक्षाकर्मी भी उस गेट के पास पहुंच चुके थे। धवन और सोनिया ने मिलकर इंदिरा को उठाया। आर के धवन बताते हैं कि उस वक्त तो यही दिमाग काम किया कि उनको एकदम से हॉस्पिटल ले जाया जाए। मैंने उस वक्त एक एंबुलेंस जो वहां रहती थी उसे बुलाया लेकिन एंबुलेंस नहीं आई। पता चला उसका ड्राइवर चाय पीने गया हुआ था।
एंबुलेंस के पहुंचने की कोई संभावना नहीं थी इसलिए सोनिया-आर के धवन और बाकी सुरक्षाकर्मी इंदिरा गांधी को लेकर एक सफेद एंबेसेडर कार तक पहुंच गए। तय हुआ कि कार से ही इंदिरा को एम्स लेकर जाया जाए। इंदिरा गांधी का सिर सोनिया ने अपनी गोद में रखा। उनके शरीर से लगातार खून बह रहा था।
  इस बीच उस कमरे से एक बार फिर फायरिंग की आवाज आई जिसमें सुरक्षाकर्मी बेअंत और सतवंत को लेकर गए थे। यहां बेअंत ने एक बार फिर हमला करने की कोशिश की थी। उसने अपनी पगड़ी में छिपाए चाकू को बाहर निकाल लिया। बेअंत और सतवंत दोनों ने इस कमरे से भागने की कोशिश की लेकिन जवाबी कार्रवाई में सुरक्षाकर्मियों ने बेअंत को वहीं ढेर कर दिया। सतवंत को भी 12 गोलियां लगीं लेकिन उसकी सांसें चल रही थीं।
गोलियों का शोर थमा तो एक और शोर शुरू हुआ। उस सफेद एंबेसेडर के स्टार्ट होने की आवाज जिसमें इंदिरा गांधी को लिटाया गया था। सोनिया एक टक इंदिरा की तरफ देख रही थीं। दूर खड़े आयरिश फिल्म मेकर पीटर उस्तीनोव को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। सुरक्षाकर्मी तेजी के साथ एक तरफ से दूसरी तरफ भाग रहे थे। लॉन में हड़कंप मचा हुआ था। पीटर उस्तीनोव ने एक इंटरव्यू में कहा है-उस वक्त एक अकबर रोड की चिड़ियां और गिलहरियां भी अजीब बर्ताव कर रही थीं। सात मिनट के अंतर पर दो बार फायरिंग की जोरदार आवाज के बावजूद उन पर कोई असर नहीं था। उन परिंदों को जैसे पता था कि गोलियां उन्हें निशाना बनाकर नहीं मारी गईं।

बीबीसी ने सबसे पहले ब्रेक की खबर
   एंबेसेडर तेजी के साथ एक अकबर रोड से निकली। आगे बैठे आर के धवन, दिनेश भट्ट और पीछे सोनिया ने इंदिरा का सिर अपनी गोद में रखा हुआ था। ये वो वक्त था जब गांधी परिवार ही नहीं एक और शख्स की जिंदगी बदलने जा रही थी। बीबीसी के संवाददाता सतीश जैकब के एक दोस्त की नजर सोनिया गांधी पर पड़ गई। उस दोस्त ने तुरंत जैकब को फोन मिलाया। सतीश जैकब कहते हैं-उसने कहा कि एक सफदरजंग रोड के सामने से निकला तो इंदिरा गांधी के घर में से एक कार बाहर आई और मैं पक्का तो नहीं हूं लेकिन उसमें सोनिया गांधी बैठी हुई थीं और पता करो...क्या हुआ।
    एक मंझे हुए पत्रकार को इशारा ही काफी था। कुछ तो गड़बड़ हुई है। जैकब ने तुरंत राजीव गांधी के निजी सचिव विन्सेट जॉर्ज को फोन मिलाया। लेकिन मुश्किल ये कि आखिर जॉर्ज से खबर कैसे पता करें। सतीश जैकब कहते हैं कि जॉर्ज को मैंने फोन किया तो सोचा कि ऐसे सवाल करूं कि वो कुछ छुपा न सके। तो मैंने जॉर्ज से इतना कहा कि ज्यादा सीरियस तो नहीं है मामला। तो उसने कहा कि सीरियस तो नहीं है लेकिन एम्स ले गए हैं। मैंने कहा चलो एम्स चलकर देखते हैं।
इस बीच इंदिरा गांधी को लेकर एंबेसेडर कार तेजी से एम्स की तरफ भागती जा रही थी। वैसे तो एम्स में इंदिरा का पूरा रिकॉर्ड, उनके ब्लड ग्रुप का ब्योरा, सभी कुछ मौजूद था लेकिन अस्पताल पहुंचाने की हड़बड़ी में किसी को याद ही नहीं रहा कि एम्स फोन करके ये बता दिया जाए कि इंदिरा को गोली मारी गई है। घड़ी वक्त दिखा रही थी 9 बजकर 32 मिनट। एम्स पहुंचते ही इंदिरा गांधी को वीआईपी सेक्शन लेकर जाया गया लेकिन वो उस दिन बंद था। धवन उन्हें इमरजेंसी की तरफ लेकर भागे वहां कुछ नौजवान डॉक्टर मौजूद थे। वो मरीज को देखते ही हड़बड़ा गए। तभी किसी का दिमाग काम किया। उसने तुरंत अपने सीनियर कार्डियोलॉडिस्ट को खबर दी। वो सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट कोई और नहीं डॉक्टर वेणुगोपाल थे।
डॉक्टर वेणुगोपाल बताते हैं कि हमारे सहयोगी डॉक्टर ने बताया कि आप नीचे आ जाइए इंदिरा गांधी को लेकर आए हैं। उनको देखना है। हम उसी ड्रेस में नीचे गए थे कैजुएलिटी में। जब गए थे तो हमने देखा वो एक ट्रॉली पर लेटी हुई हैं और काफी खून बह रहा।
    इस वक्त तक बीसीसी संवाददाता सतीश जैकब भी एम्स पहुंच गए थे। एम्स में तूफान से पहले वाला सन्नाटा था। इंदिरा के शरीर से लगातार खून बह रहा था। इमरजेंसी में तब तक दर्जन भर सीनियर डॉक्टर जुट चुके थे। पहली कोशिश ये कि लगातार बहते खून को रोका जाए। इंदिरा के शरीर का तापमान भी तेजी से नीचे गिर रहा था। डॉक्टरों ने तुरंत उनके फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाने वाली मशीन लगाई। ईसीजी मशीन दिखा रही थी उनका दिल मंद गति से धड़क रहा था। इसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें हार्ट मशीन भी लगा दी हालांकि उन्हें इंदिरा की पल्स नहीं मिल रही थी। धीरे-धीरे इंदिरा की पुतलियां फैलती जा रही थीं। साफ था कि दिमाग में खून पहुंचना लगभग रुक गया है।
डॉक्टरों की टीम ने उन्हें आठवें फ्लोर के ऑपरेशन थिएटर में ले जाने का फैसला किया। हालांकि जिंदगी का कोई निशान उनके शरीर में नजर नहीं आ रहा था लेकिन फिर भी 12 डॉक्टरों की टीम चमत्कार की आस में उन्हें बचाने की कोशिश में जुट गई। इधर बीबीसी संवाददाता सतीश जैकब भी तेजी के साथ एम्स पहुंचे। उन्हें ये तो मालूम था कि एक अकबर रोड पर कुछ अनहोनी हुई है लेकिन वो अनहोनी क्या है ये पता करना उनके लिए बड़ी चुनौती थी।
सतीश जैकब बताते हैं कि मैं गाड़ी पार्क करके लिफ्ट से उधर गया। जैसे ही लिफ्ट से बाहर निकला तो देखा एक बुजुर्ग से डॉक्टर मुंह से कपड़ा हटा रहे थे। ऐसा लगता था कि मानो ओटी से आए हों तो मैंने फिर वही किया। मैंने ये नहीं पूछा कि आप किसका क्या कर रहे हो। मैंने पूछा-सब ठीक तो है ना। जान तो खतरे में नहीं है ना। उन्होंने मुझे बड़े गुस्से में देखा। कहा कैसी बात करते हो। अरे सारा जिस्म छलनी हो चुका है तो मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। वहीं आईसीयू के बाहर आर के धवन खड़े थे। चेहरे से ऐसा लग रहा था कि चिंता में हैं। वहां आर के धवन से मैंने इतना कहा कि धवन साहब, ये तो बहुत बुरा हुआ। कैसे हुआ ये तो उन्होंने कहा कि वो अपने घर से निकल पैदल आ रही थीं। वो पीछे-पीछे चल रहे थे अचानक गोलियों की आवाज आई। बीबीसी संवाददाता सतीश जैकब के हाथ में अब पुख्ता खबर थी- देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को गोली मारी गई है। इस खबर के साथ वो तुरंत एम्स से बाहर निकल गए।

दिल के अलावा पूरा जिस्म छलनी था इंदिरा का
इधर आठवीं मंजिल के ऑपरेशन थिएटर में वेणुगोपाल और बाकी डॉक्टरों ने देखा कि गोलियों ने इंदिरा के लीवर को फाड़ दिया है। छोटी आंत, बड़ी आंत और एक फेफड़े को भी गोलियों ने बुरी तरह नुकसान पहुंचाया था। उनकी रीढ़ की हड्डी में भी गोलियां धंसी हुई थीं। जो एक चीज पूरी तरह सुरक्षित थी वो था इंदिरा का दिल।
डॉक्टर वेणुगोपाल कहते हैं कि पहले तो एक ही मकसद था। उनको बचाने के लिए जहां से खून बाहर आ रहा है उनको सारे को कंट्रोल करना था। वो 4-5 घंटे लगे उनको कंट्रोल करने में। इसी टाइम पर उनका हार्ट फंक्शन, ब्रेन फंक्शन ठीक करने के लिए मशीन पर लगाया। तापमान भी कम कर दिया उनको बचाने के लिए।
लेकिन इंदिरा का शरीर उनका साथ छोड़ रहा था। डॉक्टर बड़ी बारीकी के साथ उनके शरीर से सात गोलियां निकाल चुके थे वक्त निकलता जा रहा था। डॉक्टरों के सामने एक मुश्किल इंदिरा का 0-नेगेटिव ब्लड ग्रुप भी था। भारत में सौ लोगों में से सिर्फ एक का 0-नेगेटिव ब्लड ग्रुप होता है। इंदिरा को बचाने के संघर्ष में डॉक्टरों ने उन्हें 88 बोतल ओ-नेगेटिव खून चढ़ाया।
डॉक्टर वेणुगोपाल कहते हैं कि जितना कुछ हो सकता है किया। ब्लड बैंक ऑफीसर ने काफी कोशिश की। 80 से ज्यादा बोतल लाए वो। ओ नेगेटिव और ए नेगेटिव मिलाकर दिए गए। बहुत कोशिश की ताकि जितनी ब्लीडिंग हुई उसको रिप्लेस किया जा सके।लेकिन ये 88 यूनिट खून भी बहुत काम ना आया। एक तरह से इंदिरा सिर्फ मशीन के भरोसे जिंदा थीं। ये वो वक्त था जब भगवान का दर्जा पाने वाले डॉक्टरों ने भी हथियार डाल दिए। डॉक्टर वेणुगोपाल कहते हैं कि ये सब करने के बाद जब ब्लीडिंग बंद कर दी गई। तो फिर उनका हार्ट फंक्शन चालू करने की कोशिश की। जब वो बहुत देर के बाद भी नहीं हुआ तो फिर उसी वक्त हमने थोड़ी देर मशीन पर रखकर फिर फैसला करना पड़ा।

सोनिया नहीं चाहती थीं, राजीव बनें पीएम
  फैसला बहुत मुश्किल था लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। ऑपरेशन थिएटर के बाहर कांग्रेस के दिग्गजों की भीड़ लगी हुई थी। वो मान चुके थे कि अब उनका बचना मुमकिन नहीं। उधर ऑपरेशन थिएटर के बगल वाले कमरे में एक और जद्दोजेहद चल रही थी। इंदिरा की मौत के बाद कौन बनेगा देश का प्रधानमंत्री। राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में अपना दौरा रद्द कर दिल्ली पहुंच चुके थे।
सभी की राय थी कि राजीव गांधी को ही देश की सत्ता सौंपी जाए लेकिन सोनिया गांधी अड़ी हुई थीं कि राजीव ये बात कतई मंजूर ना करें। आखिरकार राजीव ने सोनिया को कहा कि मैं प्रधानमंत्री बनूं या ना बनूं दोनों ही सूरत में मार दिया जाऊंगा। राजीव के इस जवाब के बाद सोनिया ने कुछ नहीं कहा। आखिरकार दोपहर 2 बजकर 23 मिनट पर आधिकारिक तौर ये ऐलान कर दिया गया कि इंदिरा गांधी की मौत हो चुकी है। ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर इंदिरा का पोस्टमॉर्टम करने के लिए फोरेंसिक विभाग से टी डी डोगरा को भी बुला चुके थे।
डॉक्टर टी डी डोगरा कहते हैं कि उस वक्त दोपहर के 2.10 हुए थे। मुझे बुलाकर बताया गया कि इंदिरा गांधी की मौत हो चुकी है। वहां इतनी ज्यादा भीड़ थी कि मुझे लगा लोग ऑपरेशन थिएटर का शीशा तोड़कर भीतर घुस आएंगे। हड़बड़ी में मैं अपने दस्ताने पहनने भी भूल गया था। मेरे सामने चुनौती थी कि उनका बुरी तरह जख्मी शरीर पोस्टमॉर्टम के बाद और ना बिगड़े। उनके शरीर पर गोलियों के 30 निशान थे और कुल 31 गोलियां इंदिरा के शरीर से निकाली गईं।

राष्ट्रपति की कार पर भी हुआ पथराव
  इस वक्त तक एम्स के बाहर भी हजारों लोगों की भीड़ उमड़ आई थी। पुलिस वालों के लिए उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था। हर तरफ इंदिरा गांधी के नारे गूंज रहे थे। हालत ये हो गई कि इंदिरा समर्थकों को संभालने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा। लोग इंदिरा की मौत की खबर से बुरी तरह सन्न थे और उतना ही ज्यादा फूट रहा था उनका गुस्सा। हालत ये थी कि विएना के दौरे से लौटकर सीधे एम्स पहुंचे राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की कार पर भी पथराव कर दिया गया। ये बहुत बड़े तूफान की आहट थी। लोग रो रहे थे। बिलख रहे थे। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि इंदिरा को भी कोई ताकत हरा सकती है। यही वो भीड़ थी जो रोते-रोते जब थक गई तो उसकी जगह गुस्से ने ली। ये गुस्सा आगे क्या करने वाला। इस बात का किसी को कोई एहसास नहीं था।
  बीबीसी संवाददाता सतीश जैकब तेजी के साथ अपने दफ्तर वापस लौट रहे थे। दिल में तूफान कि इतनी बड़ी खबर है। उनका मन कर रहा था कि जितनी जल्दी हो सके ऑफिस पहुंचें। जैकब ने बताया कि हमें जो कोई भी खबर देनी होती थी वो हम टेलिफोन पर देते थे। वो हमारा रिकॉर्ड होता था तो खबर हमारी आवाज में जाती थी। एक प्रोब्लम ये थी कि उस वक्त एसटीडी वगैरह नहीं थी। इंटरनेशनल कॉल बुक करानी पड़ती थीं। उस दिन मुझे जल्दी कनेक्ट करा दिया गया। मेरे पास वक्त नहीं था टाइप करने का तो मैंने कहा कि छोटी सी खबर है। मैंने कहा-अभी थोड़ी देर पहले भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर घातक हमला हुआ है।

दूरदर्शन-आकाशवाणी पर नहीं चली खबर
ये खबर बीबीसी रेडियो पर कुछ देर बाद चली। लेकिन जब चलनी शुरू हुई तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। उस वक्त अमेरिका में आधी रात हो रही थी। जानकारी के मुताबिक राष्ट्रपति रीगन को आधी रात में इंदिरा की हत्या की खबर दी गई। अमेरिका से लेकर रूस तक में हड़कंप मच गया। इधर देश के तमाम शहरों में बड़े-बड़े अखबार हरकत में आ चुके थे। ज्यादातर पत्रकारों को उनके घर से बुला लिया गया।
अखबार की मशीनें धड़ाधड़ चलने लगीं। दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, आज, टाइम्स ऑफ इंडिया, स्टेट्समैन भारत का हर अखबार इंदिरा की हत्या की खबर से पट गया। शाम को छपने वाले तमाम अखबार उस दिन कई घंटा पहले छपे। हालत ये थी कि अखबार की कॉपी बाजार में पहुंचते की हाथों-हाथ बिक रही थी लेकिन शाम चार बजे तक दूरदर्शन और आकाशवाणी पर इंदिरा की हत्या की कोई खबर नहीं थी। दुनिया भर में इस खबर का डंका पीटने वाले सतीश जैकब ने खुद ये बात आकाशवाणी के एक अधिकारी से पूछी।
   सतीश जैकब ने बताया- वो कहने लगे भाई मैं क्या करूं। इतनी बड़ी खबर है और जब तक कि कोई सीनियर मिनिस्टर या अधिकारी इसको अप्रूव नहीं कर देता मैं इसको ब्रॉडकास्ट नहीं कर सकता। तो मैंने कहा कि क्यों नहीं कराया अप्रूव तो उन्होंने कहा कि प्रेसिडेंट यमन में हैं। होम मिनिस्टर प्रणब मुखर्जी राजीव के साथ पश्चिम बंगाल में हैं। उनका कहना था यहां कोई भी मिनिस्टर दिल्ली में नहीं है, तो मैं क्या करूं। बीबीसी के लिए ये भारत में बहुत अहम दिन था। पूरा देश इंदिरा की हत्या की खबर बार-बार सुनने के लिए जैसे बीबीसी रेडियो से चिपक गया था। खुद पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक के रास्ते में राजीव गांधी भी बीच-बीच में बीबीसी पर ही खबरें सुनते आ रहे थे।

सिखों पर उतरने लगा इंदिरा की हत्या का गुस्सा
सुबह से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल चुका था। मैंने देखा कि एम्स में एक अजीब सा तनाव बढ़ता जा रहा था। सैकड़ों की तादाद में वहां सिख भी आए थे। पहले इंदिरा गांधी अमर रहे के नारे भी लगा रहे थे लेकिन धीरे-धीरे वो एम्स से हटने लगे। जैसे-जैसे लोगों को ये पता चला कि इंदिरा की हत्या उनके ही दो सिख गार्डों ने की है। नारों का अंदाज भी बदलने लगा। राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की कार पर पथराव के बाद इन नारों की गूंज एम्स के आसपास के इलाकों में भी फैलती जा रही थी।
   दोपहर ढलते-ढलते एम्स से वापस लौटते लोगों ने कुछ इलाकों में तोड़फोड़ भी शुरू कर दी थी। हॉस्पिटल के पास से गुजरती हुई बसों में से सिखों को खींच-खींच कर बाहर निकाला जाने लगा। दिल्ली में बरसों से रह रहे इन लोगों को अंदाजा भी नहीं था कि कभी उनके खिलाफ गुस्सा इस कदर फूटेगा। धीरे-धीरे बसों से सिखों को खींचकर निकालने का सिलसिला पूरी दिल्ली में फैल गया लेकिन लोगों का गुस्सा यहीं नहीं थमा। पहला हमला 5 बजकर 55 मिनट पर हुआ विनय नगर इलाके में। यहां एक सिख लड़के को बुरी तरह पीटने के बाद उसकी मोटरसाइकिल में आग लगा दी गई। इस आग में पूरी दिल्ली धधकने जा रही थी।
    उस वक्त के हालात का अंदाजा लगना मुश्किल है। एक के बाद एक दुकानों के शटर गिर रहे थे। इंदिरा की मौत की घोषणा के बाद पूरे के पूरे बाजारों में सन्नाटा पसर गया। सड़कों पर चल रही गाड़ियां ना जाने कहां गायब हो गईं। ऐसा लगा जैसे कर्फ्यू लगा दिया गया हो लेकिन इस सन्नाटे के बीच सिख विरोधी नारे लगातार बढ़ते जा रहे थे। 31 अक्टूबर के सूरज ने दिन भर में बहुत कुछ देख लिया था। डूबते सूरज की लाल रोशनी भी धीरे-धीरे खत्म हो रही थी लेकिन सूरज के डूबने के बाद भी लाल रोशनी खत्म नहीं हुई। जलते हुए घरों से उठती हुई रोशनी...वो भी तो लाल ही थी।


रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदे की पूरी कहानी

नई दिल्ली: चेहरे पर रोबीली मूँछें, आंखों पर चश्मा और तनी हुई मांसपेशियों वाला गठीला बदन. ये चेहरा कभी कभार ही मीडिया के कैमरों पर चमकता है लेकिन इसका शुमार देश की मशहूर और रसूखदार शख्सियतों के बीच होता है क्योकि ये हैं देश के सबसे ताक़तवर राजनीतिक घराने गांधी परिवार के दामाद हैं रॉबर्ट वाड्रा. सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी के बाद गांधी परिवार के चौथे स्तंभ माने जाते हैं रॉबर्ट वाड्रा. इसीलिए रॉबर्ट वाड्रा पर भी इल्जामों के तीर बरसते रहे हैं. रॉबर्ट वाड्रा हरियाणा में जमीन के सौदों को लेकर विवादों में रहे हैं उन पर हेराफेरी और चार सौ बीसी के भी संगीन इल्जाम लगते रहे हैं. और इन्हीं इल्जामों को लेकर जब शनिवार रात उनसे सवाल पूछा गया तो कुछ इस तरह गुस्से से उबल पड़े कि उन्होंने रिपोर्टर के माइक पर को झटक दिया.
   व्यक्ति विशेष में आज हम आपको बताएंगे आखिर क्यों और किस बात पर आ रहा है रॉबर्ट वाड्रा को इतना गुस्सा. साथ ही पड़ताल इस बात की भी करेंगे कि दिल्ली और हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनने के बाद क्या अब जेल जाएंगे सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा.
   शनिवार रात को दिल्ली के अशोक होटल में जैसे ही सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से रिपोर्टर ने सवाल पूछा तो उन्होंने गुस्से से भर कर रिपोर्टर के माइक को झटक दिया. रॉबर्ट वाड्रा यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने रिपोर्टर पर जी भर कर भड़ास निकाली और उसे अपशब्द भी कहे. वीडियो में साफ नजर आ रहा है कि पहले तो रॉबर्ट वाड्रा रिपोर्टर के सवालों का जवाब बडे ही इत्मिनान से देते रहे लेकिन जब रिपोर्टर ने उनके हरियाणा में जमीन सौदे से जुड़ा सवाल पूछा तो रॉबर्ट वाड्रा को जैसे करंट मार गया और उन्होंने तैश में आकर रिपोर्टर का माइक झटक दिया, फुटेज डिलीट कराने को कहा और रिपोर्टर की जमकर लानत मलामत कर डाली.
दरअसल हरियाणा में जमीन के सौदे को लेकर प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा विवादों में रहे हैं. इसको लेकर बीजेपी लगातार चुनावों में गांधी परिवार को घेरती रही हैं. लेकिन शनिवार रात वाड्रा ने मीडिया के साथ जो सलूक किया उससे वो एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं.

नई सरकार आने के बाद मुश्किल

सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक बार फिर राजनीति गर्म है. दरअसल जमीन सौदों को लेकर रॉबर्ट वाड्रा इसलिए भी परेशान चल रहे हैं क्योंकि हरियाणा में नई बीजेपी सरकार ने वाड्रा के जमीन सौदों की जांच कराने की बात कही है. जमीन सौदों पर सीएजी की वो ड्राफ्ट रिपोर्ट भी रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किल बढ़ा सकती है जिस रिपोर्ट पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर छापी है. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सीएजी ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा है कि वाड्रा की स्काईलाइड हॉस्पिटिलिटी प्राइवेट लिमिटेड को कमर्शियल कॉलोनी डेवलप करने की इजाजत तब दी गई जब उसके पास सिर्फ एक लाख रुपये थे. हरियाणा के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने कंपनी की वित्तीय क्षमताओं की अनदेखी की. वाड्रा की कंपनी गुड़गांव के शिकोहपुर में कॉलोनी बनाने वाली थी.

खेमका का खेल
  वाड्रा की कंपनी ने डीएलएफ को 58 करोड़ में जमीन बेचकर खुद 43 करोड़ 66 लाख का मुनाफा कमाया. हरियाणा सरकार औऱ वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक क़ॉलोनी बनाने के बाद कंपनी को सिर्फ 2 करोड़ 15 लाख रुपये रखने थे. बाकी रकम सरकारी खजाने में जानी चाहिए थी. वाड्रा की कंपनी ने शिकोहपुर में जमीन खरीदने में साढ़े सात लाख रुपये और लाइसेंस फीस जैसे मद में 6 करोड़ 84 लाख रुपये खर्च किए. सीएजी का मानना है कि हरियाणा सरकार को वाड्रा की कंपनी से 41 करोड़ 50 लाख रुपये वसूल करने चाहिए थे.
सीएजी ने उसी जमीन सौदे की जांच की है जिसके म्युटेशन हरियाणा के आईएएस अफसर अशोक खेमका ने रद्द कर दिया था.
सीएजी ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट 22 सितंबर को हरियाणा की कांग्रेस सरकार को भेज दी थी तब मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा थे लेकिन अब बीजेपी सरकार को सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट पर अपनी राय देनी है. हरियाणा के सीएम अब सीएम मनोहर लाल खट्टर हैं जो वाड्रा जमीन सौदे की जांच की बात पहले ही कह चुके हैं.



सीएजी रिपोर्ट के बाद मुश्किल
रॉबर्ट वाड्रा के जमीन सौदे पर सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट की इस नई कहानी के बाद अब बात उन आरोपों की जो चुनावी सभाओं में रॉबर्ट वाड्रा के बहाने विरोधी दल नेहरु - गांधी परिवार पर लगाते रहे है.
दरअसल रॉबर्ट वाड्रा पर हरियाणा में जमीन सौदों को लेकर दस्तावेजों में हेराफेरी के आरोप लगते रहे हैं. मशहूर रियलटी कंपनी डीएलएफ के साथ जमीन विवाद को लेकर भी वाड्रा पर आरोप लगे हैं और इन्हीं इल्जामों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चुनावी रैलियों में रॉबर्ट वाड्रा पर निशाना साधते रहे हैं लेकिन वाड्रा पर इल्जामों की बौछार सबसे पहले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने की थी.
केजरीवाल का कहना है, पहले तो 65 करोड़ दे दिए. औऱ फिर कहा कि इन 65 करोड़ से तुम हमारी प्रापर्टी खरीद लो. औऱ वो अपनी प्रापर्टी उन्होंने इतने सस्ते में दे दी कि पांच करोड में 35 करोड़ की प्रापर्टी दे दी. तो इसमें डीएलएफ को क्या फायदा हुआ डीएलएफ ने ऐसा क्या किया रॉबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ को क्या फायदा पहुंचाया ये कई सारे प्रश्न हैं.



वाड्रा का बिजनेस

राजनीति से दूर और बिजनेस में मशगूल रहने वाले रॉबर्ट वाड्रा ने साल 2007 और 2008 में पचास लाख की पूंजी से पांच कंपनियां शुरु की. और रीयल एस्टेट के धंधे में उतर गए थे लेकिन अरविंद केजरीवाल ने स्काई लाइट हास्पिटालिटी प्राइवेट लिमिटेड समेत रॉबर्ट वाड्रा की पांच कंपनियों के बही खातों पर सवाल खडे किए थे और जमीनों से जुड़े यही इल्जाम आज भी रॉबर्ट वाड्रा का पीछा कर रहे हैं.
रियल स्टेट कंपनी डीएलएफ के साथ जिस जमीन सौदे को लेकर रॉबर्ट वाड्रा फिर सुर्खियों में हैं उस जमीन सौदे को आईएएस ऑफिसर अशोक खेमका ने रद्द कर दिया था. हरियाणा सरकार को उन्होंने अपनी जो रिपोर्ट सौंपी थी उसमें भी कहा गया था कि रॉबर्ट वाड्रा ने जमीन सौदे के लिए दस्तावेज में हेराफेरी की थी.
अशोक खेमका का कहना है कि देखिए एक दिन में सात करोड़ अगर 58 करोड़ बन जाए तो मुझे बताइए कि किस नैतिकता से किस कानून नीति के आधार पर कि सिर्फ सरकार के एक लाइसेंस से साढ़े साल 58 करोड़ बन जाए वो कैसे सही हो सकता है. फरवरी में जमीन खरीदी गई साढ़े सात करोड़ की सौदा तुरंत कट गया 58 करोड़ का तो साढ़े सात का 58 होना आपको नहीं लगता कि इसमें कुछ गलती है कुछ प्रॉबलम है.
रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच जमीन सौदे की जांच के आदेश देने वाले आईएएस अफसर अशोक खेमका का तबादला 11 अक्टूबर 2012 को सीड विकास निगम में कर दिया गया था. लेकिन उन्होंने जाते-जाते रॉबर्ट वाड्रा औऱ डीएलएफ के बीच हुई डील में ही पेंच डाल दिया था. खेमका ने खुलासा किया था कि 12 फरवरी 2008 को रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ने गुडगांव जिले के शिखोहपुर में 3.5 एकड़ जमीन 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी जिसे इसी साल 18 सितंबर को डीएलएफ को 58 करोड़ में दोबारा बेच दिया गया.
आरोप है कि म्यूटेशन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई और म्यूटेशन ऐसे अधिकारी ने किया जिसके पास इसका अधिकार ही नहीं था. लेकिन वाड्रा- डीएलएफ के बीच जमीन के इस सौदे के पीछे का खेल कुछ और भी है.


कैसे साढे सात करोड महज दो महीने में 58 करोड़ बन गए समझिए खुद खेमका की ज़ुबानी जमीन सौदे के इस खेल की ये कहानी.
अशोक खेमका का कहना है कि कृषि भूमि का जो भूमि परिवर्तन दिया जाता है या लाइसेंस दिया जाता है कालोनाइजेशन के लिए उसमें भी सस्ते घर नहीं बनते. क्योंकि भूमि अधिग्रहण होते हैं. लोगों को सस्ते घर नहीं मिलते और ना ही सरकार को अपना पूरा राजस्व मिलता है. तो ऐसी नीति होनी चाहिए कि जिसमें की लाइसेंसिंग ऐसी होनी चाहिए कि उसका जो प्रीमियम है वो कम से कम हो और उसका जो पूरा फायदा है जो कृषि योग्य भूमि से नान एग्रीकल्चर यूज में जो कनवर्ट होती है उसका जो पूरा प्रीमियम है या पूरा फायदा जो है वो या तो उपभोक्ता को मिले या फिर सरकार के राजस्व में जाए बिचौलियों को जो मुनाफा मिलता है वो कम से कम होना चाहिए. हमें इस सारी डील से बस एक ही सीख यही मिलती है.
अशोक खेमका जो बात कही वो सीधे रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच हुई डील की गहराई तक पहुंचती है. दरअसल खेमका ने अपनी रिपोर्ट में भी कहा था कि रॉबर्ट वाड्रा ने शिखोहपुर की जमीन पर हाउसिंग कालोनी बनाने का जो लाइसेंस टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से लिया था वो बिक नहीं सकता था लेकिन वो लाइसेंस जमीन के साथ ही डीएलएफ को बेच दिया गया.
अशोक खेमका का कहना है कि लाइसेंस लेना या फिर उसे रिनिव्यू कराना या फिर उसे आगे बेचना एक दूसरे एक्ट से गवर्न है जो टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट का है. लेकिन अगर कोई लाइसेंस लेता है तो वो एक एप्लीकेशन देता है कि मैं एक कालोनी बनाउंगा और इसके लिए मेरे पास वित्तीय संसाधन हैं. तो अगर वो अपने वादे के मुताबिक आचरण ना करे तो कार्रवाई होनी चाहिए. और अगर विभाग ने बगैर ऐसे किसी वादे के लाइसेंस दिया है तो विभाग के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के जीडी टी सी गुप्ता का कहना है कि उन्होंने जो अपने आर्डर के अंदर जो टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेटं के बारे में टिप्पणी की है. वो तथ्यों से परे है उसके अंदर बिल्कुल तथ्य गलत लिखे हुए हैं. उसके अंदर कानूनी रुप से बहुत खामियां है तथा ये एडमिनस्ट्रेटिव प्रोप्राइटी का उलंघन है. इसीलिए मैंने मुख्य सचिव महोदय को जो सारी चीजें है जो फैक्ट हैं जो लीगल पोजीशन है वो सारी चीज लिखकर ये अनुरोध किया है कि उनहोंने जो आरोप लगाए है उसके जांच के लिए जो समिति बनाई है उसी समिति के पास में हमारा ये लेटर भेज दिया जाए हमारे सारे रिकार्ड देख लिए जाएं.
दरअसल वाड्रा को शिखोहपुर की जमीन पर हाउसिंग कालोनी बनाने के लिए मार्च 2008 में ही हरियाणा के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से लाइसेंस मिल गया था. लेकिन लाइसेंस मिलने के 65 दिन बाद ही उन्होंने डीएलएफ को 58 करोड में ये जमीन बेच दी जिसका जून 2008 में ही उन्हें पांच करोड बयाना भी मिला. और जब जुलाई 2012 में वाड्रा को डीएलएफ ने पूरी रकम चुका दी तो सितंबर 2012 में उन्होनें जमीन डीएलएफ के नाम ट्रांसफर करा दी.
अशोक खेमका का कहना है कि सरकार के पास लाइसेंस देने का एक राइट है तो आप जमीन खरीदिए. या जमीन सरकार से ट्रांसफर कराइए, लाइसेंस लीजिए औऱ उसको पैकेज के रुप में बिजनेस माडल बनाकर आगे बेचें तो मुनाफा किसने खाया. उपभोक्ता को तो नहीं मिला मुनाफा सस्ते घर के रुप में. कितने लोग हैं जो झुग्गी झोपडी में रहते हैं. कोई ऐसा लाइसेंस पचास करोड़ के पैंट हाउस के लिए भी नहीं होता, कोई हाउसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर थोडे ना है. हाउसिंग इनफ्रास्ट्रेक्चर होता है इडब्ल्यूएस हाउजिंग. गरीब लोगों के लिए हासिंग होती है अगर सरकार जमीन दे लाइसेंस दे तो आप गरीबों के लिए हाउसिंग बनाइए.
पंद्रह अक्टूबर 2012 को अशोक खेमका ने रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच 3.53 एकड़ जमीन का सौदा रद्द कर दिया था. आईएएस अफसर अशोक खेमका ने वाड्रा की कंपनी के उस साढ़े सात करोड़ की रकम पर भी सवाल उठाए थे जिससे साढ़े तीन एकड़ जमीन खरीदी गई थी. खेमका का सवाल था कि कंपनी के पास जमीन खरीदने के लिए साढ़े सात करोड़ कहां से आए थे. खेमका को शक था कि कंपनी ने अपने पैसे से जमीन नहीं खरीदी थी. खेमका की आपत्तियों पर अब सीएजी ड्राफ्ट रिपोर्ट की मुहर लगती है. और इसीलिए रॉबर्ट वाड्रा का हरियाणा जमीन सौदे को लेकर पूछे गए सवाल पर ऐसा रिएक्शन उनकी बढती परेशानी को बयान कर रहा है.

राज्यसभा को लेकर बहुगुणा खेमें की बढ़ी दुश्वारियां


राजेन्द्र जोशी
राज्यसभा की उम्मीदवारी का नामांकन दस नवंबर तक होना है इसलिए पार्टी जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहती वहीँ मुख्यमंत्री हरीश रावत भले ही राज्य सभा के लिए कौन उपयुक्त है पर न बोलें लेकिन कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति में दखल रखने वाले प्रदेश अद्यक्ष किशोर उपाध्याय को राज्यसभा में भेजने के पक्षधर हैं,इसके पीछे उनका तर्क भी वाजिब है कि प्रदेश अद्यक्ष किशोर को यदि राज्यसभा में भेजा जाता है तो इससे पार्टी को ही फायदा होगा क्योंकि राज्यसभा में पहुँचने पर उनको जहाँ एक तरफ सरकारी सुविधाएँ मिलेंगी जिनका प्रयोग संगठन के हित में किया जा सकता हैवहीँ उनका कहना है कि विजय बहुगुणा वैसे भी राज्य विधानमंडल के सदस्य हैं ऐसे में उनको राज्यसभा भेजने से राज्य में जहाँ सितारगंज विधानसभा की सीट रिक्त होगी वही मोदी लहर के चलते यह तय नहीं है कि उपचुनाव में यह सीट एक बार फिर कांग्रेस की ही झोली में जाये. वही ऐसे में राज्य विधानमंडल में कांग्रेस की पीडीएफ पर निर्भरता बढ़ जाएगी ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के होते हुए पीडीएफ सरकार को जैसे चाहे ब्लैक मेल करेगी.
   वहीं बहुगुणा कैंप ने विजय बहुगुणा की उम्मीदवारी कटने पर लखनऊ कैंट से विधायक और उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी का नाम उछाला है यह सब हरीश रावत कैंप को राजनीतिक पटखनी देने के उद्देश्य से किया जा रहा है जबकि रीता बहुगुणा जोशी का उत्तराखंड की राजनीति में कोई महत्वपूर्ण स्थान नही हैसूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बहुगुणा कैंप यह केवल इसलिए करना चाहता है कि उनकी कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गाँधी से नजदीकियां है और यही ऐसे में उत्तराखंड से राज्यसभा के लिए यदि उनका नाम आया तो वे मना नही कर पाएंगी.लेकिन उनके नाम पर राज्यवासी सहित कांग्रेस के अधिकांश विधायक तैयार नहीं हैंकई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का खाना है जब पैराशूट प्रत्याशी ही राज्यसभा के लिए मैदान में उतरना है तो कांग्रेस के वरिष्ठ  नेताओं में गुलाम नवी आजाद अथवा अम्बिका सोनी जैसे लोगों को उतारा जा सकता है. वहीँ राज्यसभा की इस लडाई में अब एक और नाम सामने आया है वह है राहुल गाँधी के नजदीकी प्रकाश जोशी का. प्रकाश जोशी वर्तमान में  कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं। ऐसे समय में प्रकाश जोशी का नाम सामने आने से बहुगुणा खेमे की पुख्ता दावेदारी को करारा झटका लगा है वहीँ राज्यसभा उम्मीदवारी को लेकर केंद्रीय नेतृत्व भी पशोपेश में है।
  कांग्रेस को अपना उम्मीदवार जिताने के लिए 36 विधायकों की आवश्यकता है। कांग्रेस को सात अन्य सहयोगी विधायकों का भी समर्थन है। उस हिसाब से कांग्रेस के पास 43 विधायकों  की पर्याप्त संख्या हैलेकिन कुल तीन या चार विधायक जिनमें सुबोध उनियाल,विजय पाल सजवाणविक्रम सिंह नेगी व शेलेन्द्र मोहन सिंघल ही बहुगुणा के खासे करीब हैजबकि लगभग आठ विधायक ढुलमुल की स्थिति में हैं जो न तो हरीश रावत के साथ हैं और ना ही विजय बहुगुणा के साथ हैं जो कांग्रेस आलाकमान द्वारा प्रत्याशी घोषित होने पर संगठन के साथ मतदान करेंगे. वहीँ मंत्रियों में हरक सिंह रावतप्रीतम सिंह और यशपाल आर्य की किन्हीं कारणों से मुख्यमंत्री से नाराज बताये जा रहे हैं है। जबकि  विधायकों में राजेंद्र भंडारीअमृता रावतअनुसुइया प्रसाद मैखुरी सतपाल महाराज खेमे के होने के कारण न तक बहुगुणा खेमे के साथ ही खुलकर आ रहे हैं और न ही मुख्यमंत्री खेमे के सामने.
  वहीँ कुछ विधायकों के सामने आगामी दिनों में जहाँ स्वयं को मंत्री पद व अपने समर्थकों को सरकार में एडजस्ट करने का भी दबाव है ऐसे में वे जहाँ खुलकर मुख्यमंत्री खेमे का विरोध नहीं कर सकते वहीँ दुसरे खेमे में भी जाने की नहीं सोच सकते वे केवल दिखावे के लिए दोनों तरफ नज़र आ रहे हैं ताकि पासा पलटने पर उनकी हर खेमे में पेशबंदी रहे. वहीँ बहुगुणा की कुर्सी छिनने के गम से ग़मज़दा बहुना कैंप से जुड़े विधायक इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं कि राज्यसभा की उम्मीदवारी किसी भी कीमत पर सीएम कैंप के पास न जा पाए।
   

गढ़वाल मण्डल विकास निगम में पर्यावरण अध्ययन के नाम पर करोड़ों का वित्तीय घोटाला

एक ही प्रकृति के दो कार्यों के लिए अलग -अलग दरें वह भी करोड़ों में 

राजेन्द्र जोशी
  उत्तराखंड ही शायद देश का एक मात्र ऐसा राज्य होगा जहाँ राज्य सरकारों के विभागों में तालमेल की भारी कमी है वह भी एक जैसे प्रकृति के कार्यों पर जहाँ एक विभाग करोड़ों खर्च करता है तो उसकी काम के लिए दूसरा विभाग भी उस पर करोड़ों उड़ा डालता है जबकि यदि इनमे आपसी तालमेल होता तो एक ही विभाग के पैसे से दोनों का काम चल सकता था लेकिन मितव्यता ही और किसी का ध्यान नहीं गया.
उल्लेखनीय है कि विभिन्न सरकारी एजेंसियो द्वारा नदी तल उपखनिज लाटों के पर्यावरणीय स्वीकृतिया प्राप्त होने के उपरांत  खनन शुरू कराया गया है । नियमों के अनुसार प्रत्येक छः माह की कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार कर पर्यावरण के संबन्धित कार्यालयों को भेजनी पड़ती है।
  एक जानकारी के अनुसार विगत वर्ष 2013  वन विकास निगम ने अपने स्वीकृत 18 खनन लाटों के लिए कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार करने हेतु कंसल्टेंट का चयन करने हेतु टेंडर प्रक्रिया अपनाते हुए मैसर्स ज़ी आर सी (रि एंड क्री) प्रा॰ लि॰ नोएडा का चयन किया था जिसे  विभिन्न जिलों  में  स्थित 18 खनन लाटों  के  कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार करने के लिए डेढ़ लाख रुपये प्रति लाट प्रति वर्ष  की दर से  तीन वर्षों के लिए लगभग 81 लाख में ठेका दे दिया गया।
 वहीँ वर्ष 2014 में सरकार की ही दूसरी एजेंसी गढ़वाल मण्डल विकास निगम द्वारा भी समान कार्य के लिए अपने स्वीकृत 102 लाटों के लिए कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार करने हेतु कंसल्टेंट का चयन करने हेतु  शॉर्ट टर्म टेंडर प्रक्रिया अपनायी  जिसमे तीन कंपनियो ने भाग लिया. इस टेंडर प्रक्रिया में दो कंपनियो के निविदाओं में न तो टेंडर फीस थी और न ही धरोहर राशि जमा की गयी थी अतः दोनों कंपनियों के टेंडर प्रथम चरण में ही निरस्त हो गए थे मात्र एक टेंडर  से ही सारी प्रक्रिया सम्पन्न कर ली गयी और  मै॰ ज़ी आर सी (रि एव क्री) प्रा॰ लि॰ नोएडा का चयन किया गया  जिसे  पाँच हेक्टेयर  से कम के लाटों के लिए 2.40 लाख रुपये प्रति वर्ष व पाँच हेक्टेयर से पचास हेक्टयर तक के लाटों के लिए 3.04 लाख रुपये वर्ष एवं पचास हेक्टेयर से अधिक  के लाटों के लिए 3.40 लाख रुपये प्रति वर्ष  की दर से पाँच वर्षों के लिए लगभग 15.0 करोड़ रुपये  में कांट्रैक्ट किया गया।
 इन निविदाओं के बाद यह बात आमने आई कि एक ही प्रकृति के कार्यों के लिए आमंत्रित निविदाओ में आखिर निविदा दरों में इतना बड़ा अन्तर कैसे हो गया जबकि यह कार्य गढ़वाल मण्डल विकास निगम यदि वन विकास निगम  की दरों के हिसाब से मात्र रु 1.53 करोड़ रुपये वर्ष की दर से  पाँच वर्ष के लिए मात्र 7.65 करोड़ रूपए में करा सकता था। इससे यह साफ़ है कि  इस कार्य में लगभग 7.35 करोड़ का घोटाला किया गया है।
 वहीँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब सामान प्रकृति के कार्य जब वन विकास निगम व गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा करवाए जा रहे थे तो गढ़वाल मंडल विकास निगम ने वन निगम की दरों का संज्ञान क्यों नही लिया जबकि यदि संज्ञान लिया जाता तो करोड़ों रुपये बचाए जा सकते थे. यहाँ सबसे चौकांने वाली बात तो यह है कि वन विकास निगम के लाटों का क्षेत्रफल गढ़वाल मण्डल विकास निगम के लाटों के क्षेत्रफल से बहुत अधिक है फिर भी वन विकास निगम  कि दरें कम है जबकि गढ़वाल मण्डल विकास निगम दरें अविश्वसनीय रूप से दुगनी या उससे भी अधिक है इससे यह साफ़ है कि इस प्रक्रिया में बड़ा घोटाला किया गया है वह भी जानबूझकर. इतना ही नहीं यह बात भी समझ से परे है जब एक ही प्रकृति के कार्य एक की निविदादाता से करवाया गया तो फिर भी समान कार्य के लिए दरों में इतना भारी अंतर क्यों ? इसका गढ़वाल मण्डल विकास निगम के पास कोई जवाब नही है.
 मामले में घोटाले की बू तब साफ़ आती है जब गढ़वाल मण्डल विकास निगम द्वारा अपनायी गयी टेंडर प्रक्रिया में जब दो कंपनियों के टेंडर प्रथम चरण में ही निरस्त हो गए थे तो केवल एक टेंडर को खोलने के बजाय टेंडर प्रक्रिया निरस्त क्यों नहीं कि गयी. इसमी यह शंका भी साफ़ है कि कहीं ऐसा तो नहीं था कि निविदा में शामिल अन्य दो कंपनीयों को केवल दिखावे के लिए अथवा कागजी खानापूर्ति के लिए तो नहीं रखा गया था क्योंकि यह कैसे संभव है कि कोई कंपनी टेंडर प्रक्रिया में भाग ले और  धरोहर राशि  और यहाँ तक कि टेंडर फीस  तक जमा करना भूल जाए। इस निविदा प्रक्रिया में भाग लेने वाले संस्थान की निविदा दरें एक विभगा के लिए कुछ और, और दूसरे विभाग के लिए कुछ और यानि गढ़वाल मण्डल विकास निगम में निविदा के बाद स्वीकृत दरें ही सारी कहानी खुद बयान कर रही है कि मामले में कोई बड़ा घोटाला हुआ है। इस सारी प्रक्रिया के बाद अब मांग उठने लगी है कि सरकार इस सम्पूर्ण निविदा प्रक्रिया को निरस्त कर घोटाले की उच्च स्तरीय जांच करे तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करे।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

पलायन रोकने में कारगर साबित होगी झील : हरीश रावत

टिहरी झील से होंगे पेरिस,पोखरा गोवा और डल झील के दर्शन

राजेन्द्र जोशी

टिहरी बाँध ने जिस तरह से गंगा का पानी रोक दिया है ठीक वैसे ही प्रदेश सरकार इस बाँध के अथाह जल को रोज़गार से जोड़कर पलायन को भी रोकना चाहती है, यदि सरकार की योजना परवान चढ़ी तो वह दिन दूर नहीं जब टिहरी बाँध जिसे प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने श्रीदेव सुमन सागर का नाम दिया है, उसमें पेरिस ही नहीं बल्कि गोवा व कश्मीर की डल झील में चलते हुए शिकारे व हाउस बोट के दीदार होंगे जिसमे सैर करने को दुनिया तरसती है. पेरिस  की तर्ज पर यहाँ सैलानियों को जलक्रीडा के लिए वाटर स्कूटर तो चलेंगे ही साथ ही पॉवर बोट के पीछे रस्सी के सहारे वाटर सर्फिंग के नज़ारे भी देखने को मिलेंगे, गोवा व समुद्र के किनारे स्थित उत्तरपूर्वी देशों की तर्ज पर बड़े-बड़े तैरते रेस्टोरेंट व मरीना तो इस सरोवर में दिखाई ही देंगे साथ ही लॉस वेगास की तर्ज पर कैसिनो को खोलने की भी सरकार की योजना है. नेपाल के पोखरा की तर्ज पर सैलानियों को हिमालय दर्शन जहाँ हवाई जहाज व हेलीकाप्टर से कराने की सरकार की योंजना है तो इस सरोवर से सी प्लेन उड़ाने के सपने भी सरकार देख रही है, इतना ही नही इस सरोवर में क्रूज चलाकर सैकड़ों बेरोजगारों को स्वरोजगार से भी जोड़ने की सरकार की योजना है.
  प्रदेश सरकार इस श्री देव सुमन सरोवर के चारों तरफ की 45 हज़ार हेक्टेयर भूमि को विश्व स्तरीय पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना चाहती है इसके लिए सरकार ने डीपीआर तैयार कर दी है, इस योजना के तहत झील के चरों तरफ एक रिंग रोड का निर्माण किया जायेगा जिस पर कई इस तरह के स्थान चिन्हित होंगे जहाँ विभिन्न तरह की पर्यटन गतिविधियाँ की जाएँगी, पर्यटन सचिव उमाकांत पंवार के अनुसार राज्य सरकार ने इसके विकास के लिए एक महायोजना तैयार कर ली है, क्योंकि अभी शुरुआती दौर में ही इसकी योजना ठोस होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस इलाके अनियंत्रित निर्माण न हो जिनकी वजह से इसकी ख़ूबसूरती पर कोई प्रभाव न पड़े. उन्होंने बताया कि पर्यटन विभाग इन सभी योजनाओं के लिए सिंगल विंडो योजना शुरू करेगा ताकि यहाँ निवेश करने वालों को कोई परेशानी न हो,
 पर्यटन सचिव उमाकांत पंवार ने बताया कि उनका उद्देश्य यहाँ की संस्कृति को संजोकर रख पर्यटन विकास की है ताकि देश विदेश से आने वाले पर्यटक यहाँ की संस्कृति से रूबरू भी हो सकें, उनका कहना है कि टिहरी एक ऐतिहासिक शहर था लिहाज़ा पर्यटकों  को यहाँ के इतिहास की जानकारी होनी जरुरी है, उन्होंने बताया यहाँ ग्रामीण पर्यटन को विकसित करके स्थानीय ग्रामीणों को स्वरोजगार से जोड़ने की भी सरकार की योजना है, इतना ही नहीं सरकार चाइना व ऋषिकेश की तर्ज पर यहाँ स्वास्थ्य पर्यटन को भी बढ़ाना चाहती है, सरकार की योजना है कि सरोवर इलाके के ऊँचाई वाले स्थानों को केबल कार व रोपवे से जोड़ा जाये ताकि पर्यटन से और भी रोज़गार प्राप्त हो सके.  वहीँ 44 वर्ग किलोमीटर की इस झील में जितने भी साहसिक खेल होते हैं प्रदेश सरकार उनको भी यहाँ करने की योजना बना रही है. इसके लिए देश विदेश के पर्यटन उद्योग में काम करने वाले लोगों व कंपनियों से सरकार बात कर रही है. इतना ही नहीं इस इलाके को हवाई सेवा से जोड़ने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने चिन्यालीसौड़ हवाई अड्डे को विकसित करने जा रही है जो अगले अक्टूबर तक तैयार हो जायेगा. इससे अस्तित्व में आने के बाद देश व विदेश से हवाई सेवा होने से समय की बचत भी हो सकेगी जिसका सीधा लाभ पर्यटकों को मिलेगा. टिहरी सरोवर में आयोजित हुए दो दिवसीय साहसिक खेलों के आयोजन से सरकार सहित स्थानीय युवाओं में उम्मीदें जगी हैं जिसका लाभ बेरोजगारों के साथ ही यहाँ के पर्यटन को भी मिलेगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है.