शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

एमडीडीए आखिर बिना लाभ हानि का खेल किसके लिए रहा है खेल

एमडीडीए आखिर बिना लाभ हानि का खेल किसके लिए रहा है खेल
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। राजधानीवासियों को यह समझ नहीं आ रहा है कि घंटाघर से कृष्णापैलेस तक की इमारतों को ध्वस्त कर वहां बहुमंजिले शापिंग सेन्टर व आवासीय फ्लैट बनाने में जब फायदा नहीं है तो आखिरकार ये योजना किसके फायदे के लिए बनायी जा रही है? पुश्तों से दुकानदारी कर अपने परिवार का भरणपोषण कर इन लोगों को उजाड़ने की योजना से किसको फायदा होगा यह तो एमडीडीए कभी भी नहीं बताने वाला लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसके पीछे किसी राजनैतिक व्यक्ति का दिमाग काम कर रहा है जो अपने पुत्र सहित एक बिल्डर को इसका लाभ देना चाहता है।
 उल्लेखनीय है कि घंटाघर का बॉटल नेक खोले हुए अभी चंद समय भी नहीं हुआ कि मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण महानगर योजना के तहत दिग्विजय सिनेमा से कृष्णा पैलेस तक की इमारतों को ध्वस्त कराकर उन पर छह मंजिला इमारतें बनाने के लिए दिल्ली-चंडीगढ़ के एक बड़े बिल्डर से रणनीति के तहत एक बड़ा खेल खेलने की तैयारी चल रही है। आशंका यहां तक उठ रही है कि इस पूरी डील में एक राजनेता का पुत्र भी शामिल है जोकि बिल्डर का मित्र बताया जा रहा है। इस पूरे खेल के पीछे यह रणनीति तैयार की जा रही है कि जमीन सरकारी होगी और उसका निर्माण बिल्डर करेगा तथा जिनकी कामर्शियल में दुकानें व संस्थान हैं उन्हें उसी आधार पर उसका कब्जा मिलेगा और जिनके मकान टूटेंगे उन्हें फ्लैट दिया जायेगा और बाकी के जो फ्लोर खाली रहेंगे उन पर बिल्डर का अधिकार होगा। इस डील में अरबों रुपए का खेल होने की आशंकाएं उठ रही हैं।
  विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण ने घंटाघर दिग्विजय सिनेमा से चकराता रोड में कृष्णा पैलेस के समीप तक की सारी इमारतें ध्वस्त कर महानगर योजना के तहत वहां छह मंजिला इमारत बनाने के लिए एक बड़ा खाका तैयार किया है। इस खाके पर एमडीडीए के उपाध्यक्ष तेजी के साथ काम करते हुए नजर आ रहे हैं। उनकी इस योजना के प्रति कितनी उत्सुकता है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि पिछले चंद दिनों के भीतर कई बार एमडीडीए उपाध्यक्ष ने दिग्विजय इमारत में मौजूद सभी दुकानदारों से विभाग की योजना के बारे मंे सहमति देने का प्रयास किया और इतना ही नहीं उन्होने व्यापारियों व वहां रह रहे परिवारों सें कहा कि एमडीडीए दिग्विजय सिनेमा से कृष्णा पैलेस तक के पीछे की सारी इमारतें तोड़कर वहां छह मंजिला इमारतों के चार ब्लाक बनायेगी। नेता पुत्र की इस महत्वाकांक्षी योजना को छह से आठ महीने के रिकार्ड समय के भीतर पूरा कर लिया जायेगा। दिग्विजय इमारत के दुकानदारों को यह भी लालच दिया गया है कि जिसकी दुकान व संस्थान कॉमर्शियल में हैं उन्हें कॉमर्शियल में जगह दी जाएगी और जो दुकान व फ्लैट बनाए जाएंगे वह पीड़ित पक्ष को नो प्रॉफिट व नो लॉस पर दिये जाएंगे। यहां वर्षों से रह रहे कई परिवारों व दुकानदारों का साफ आरोप है कि एमडीडीए उपाध्यक्ष ने उन्हें इस योजना के प्रति यहां तक धमकाया कि अगर उन्होंने एमडीडीए को इमारत तोड़ने के लिए मना किया तो इस जमीन को अधिग्रहण कर लिया जायेगा।
वहीं दूसरी ओर इस महानगर योजना को लेकर कई दुकानदारों का आरोप है कि एमडीडीए महानगर योजना के तहत इस स्थान पर जो छह मंजिला इमारत बनाने की रणनीति तैयार कर रहा है उससे आखिरकार सरकार को कोई लाभ होने वाला तो है नहीं। चर्चा यहां तक है कि इस महायोजना को घंटाघर से कृष्णा पैलेस तक लागू कराने के लिए एक राजनेता का पुत्र पर्दे के पीछे रहकर बड़ा खेल खेल रहा है। यहां तक  चर्चा है कि नेता पुत्र का बिल्डर मित्र चंडीगढ़ व दिल्ली में बड़ा व्यवसाय करता है और इस बिल्डर को बड़ा लाभ दिलाने के लिए नेता पुत्र इस योजना के निर्माण का काम मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण से दिलाने के लिए पूरा खाका गोपनीय तरीके से तैयार किया जा चुका है। दिग्विजय सिनेमा के अंतर्गत मौजूद एक दुकानदार ने बताया कि एमडीडीए इस महानगर योजना को जल्द से जल्द शुरू करने के लिए काफी उतावला हो रखा है। चूंकि दिग्विजय सिनेमा का प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है इसलिए एमडीडीए वहां के दुकानदारों व सिनेमा मालिक से यह सहमति लेने की कोशिश कर रहा है कि जब न्यायालय का फैसला किसी के पक्ष में आएगा तो उसका हिस्सा मिल जायेगा। लेकिन एमडीडीए के इस विचार से दुकानदार सहमत नहीं दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिस जगह पर यह योजना लागू करनी है वहां डेढ़ से दो लाख रुपए गज जमीन का बाजार भाव है। ऐसे में अगर बिल्डर नो प्रॉफिट व नो लॉस पर पीड़ितों को दुकानें व मकान देता भी है तो भी लगभग चार फ्लोर बिल्डर के पास बच जाएंगे। ऐसे में उसे अरबों रुपए का फायदा होगा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिरकार किसी बिल्डर को लाभ दिलाने के लिए ऐसा खेल एमडीडीए क्यों खेलना चाह रहा है। यह अब चर्चा का विषय बनता जा रहा है। यह योजना अगर लागू हुई तो इस पूरे खेल में बिल्डर व राजनेता के पुत्र के खजाने में अरबों रुपया भर जायेगा जबकि सरकार को इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

ई-बिलिंग से सरकार को राजस्व आय में वृद्धि होगी: बहुगुणा

ई-बिलिंग से सरकार को राजस्व आय में वृद्धि होगी: बहुगुणा
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 12 फरवरी । प्रदेश में राजस्व आय बढ़ाने के लिए सरकार गंभीर है। सीमित संसाधनों का दोहन कर राजस्व बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे है। राज्य में ई-गर्वनेस को बढ़ावा दिया जा रहा है। आबकारी को भी ई-गर्वनेंस से जोडने की दिशा में सरकार ने कदम उठा दिये है। ई-बिलिंग से सरकार को राजस्व आय में वृद्धि होगी। अब किसी भी प्रकार की गड़बड़ी होने की कोई गुंजाईश नही रहेगी। यह बात मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मंगलवार को सचिवालय में आबकारी विभाग की ई-बिलिंग योजना के शुभारंभ अवसर पर कही।
मंगलवार को मुख्यमंत्री बहुगुणा ने सचिवालय में आबकारी व्यवसायियों और उनके प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। बैठक में मुख्यमंत्री ने आगामी आबकारी नीति को और अधिक प्रभावी व पारदर्शी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने व्यवसायियों से सुझाव मांगे साथ ही उनकी समस्याआंें को भी जाना। मुख्यमंत्री श्री बहुगुणा ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश में राजस्व आय बढ़ाने के प्रति गंभीर है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखेगी कि इससे किसी को कोई असुविधा न हो। उन्होंने कहा कि विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकार को धन की आवश्यकता है और इसके लिए जरूरी है कि राजस्व आय में वृद्धि हो। उन्होंने कहा कि आबकारी विभाग को ई-गर्वनेंस सेवा से जोड़ा गया है, ताकि पारदर्शिता आये। उन्होंने कहा कि आबकारी विभाग को पूर्ण रूप से कम्प्यूटरीकृत किया जा रहा है। इससे राजस्व आय में वृद्धि होगी और किसी प्रकार की गडबड़ी भी नही हो सकेगी। उन्होंने कहा कि ई-बिलिंग के साथ ही ऑन लॉइन व्यवस्था पर भी जोर दिया जा रहा है, इससे अब ऑनलॉइन बिलिंग हो सकेगी। साथ ही व्यवसायियों को भी सुविधा होगी।
मुख्यमंत्री श्री बहुगुणा ने कहा कि राज्यवासियों का हित सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि राजस्व आय में वृद्धि के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहे है। उन्होंने बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिये कि आगामी आबकारी नीति को प्रभावी बनाया जाय। उन्होंने निर्देश दिये कि कम्प्यूटरीकृत करने की दिशा में तेजी से कार्य किया जाय। ताकि भविष्य में परमिट भी ऑन लॉइन व्यवस्था से जारी किये जा सके। उन्होंने कहा कि सरकार पारदर्शी शासन व्यवस्था देने के लिए वचनबद्ध है।
बैठक में प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री डी.के.कोटिया, प्रमुख सचिव वित्त राधा रतूड़ी, अपर सचिव मुख्यमंत्री एवं आयुक्त आबकारी दिलीप जावलकर, एनआईसी व आबकारी विभाग के अधिकारी आदि उपस्थित थे।

सोमवार, 7 जनवरी 2013

क्या मुख्यमंत्री गठबंधन को जारी रख पाएंगे?

क्या मुख्यमंत्री गठबंधन को जारी रख पाएंगे?
राजेन्द्र जोशी
देहरादून 07 दिसंबर। लालबत्तियों के लिए मारामारी के चलते मुख्यमंत्री के सामने गठबंधन धर्म को निभाने की समस्या आन खड़ी हुई है। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा हो गया है कि क्या वे गठबंधन को जारी रख पाएंगे। राज्य में कांग्रेस को उत्तराखंड में सरकार बनाए लगभग 10 माह हो चुके है और अब सरकार पर अपने कार्यकर्ताओं सहित चुनाव मेे हारे नेताओं को लेकर लालबत्तियों के लिए सरकार पर संगठन का भारी दबाव है।
गौरतलब हो कि राज्य में सम्पन्न विधान सभा चुनाव के परिणाम आने के बाद जहां भाजपा को 31 और कांग्रेस को 32 विधान सभा सीटें मिल पायी थी जो सरकार बनाने के लिए नाकाफी थी, लेकिन कांग्रेस ने जोड़ तोड़कर बहुमत हासिल कर राज्य में सरकार बना डाली। वर्तमान में राज्य में बहुगुणा सरकार को तीन निर्दलीय विधायकों सहित एक यूकेडी व तीन बसपा के सदस्यों का समर्थन प्राप्त है वहीं संख्या बल बढ़ाने के लिए मनोनीत एक एंग्लो इंडियन सदस्य का साथ भी कांग्रेस के साथ है।
सरकार का साथ दे रहे गठबंधन दलों में प्रदेश मंत्रिमंडल में बसपा के सुरेंद्र राकेश जहां परिवहन मंत्रालय संभाले हुए हैं वहीं उत्तराखंड क्रांति दल के प्रीतम पंवार शहरी विकास मंत्रालय तो निर्दलीय मंत्री प्रसाद नैथानी शिक्षा विभाग व हरीश चंद्र दुर्गापाल सहकारिता विभाग का दायित्व देख रहे हैं, वहीं विधायक दिनेश धनै को बहुगुणा सरकार ने गढ़वाल मंडल विकास निगम के अध्यक्ष का दायित्व दिया है। वैसे देखा जाय तो कांग्रेस के पास अपने कार्यकर्ताआंे की बडी लंबी फेहरिस्त है जो लालबत्ती की दौड़ में मुख्यमंत्री के नाक में दम किए हुए हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने आगे कुंआ तो पीछे  खाई की स्थिति आ खड़ी हुई है। उनके सामने यह समस्या भी आन खड़ी हुई है कि वे सरकार को समर्थन दे रहे दलों के साथ गठबंधन धर्म निभाएं या फिर गठबंधन तोड़ अपने कार्यकर्ताओं को लालबत्तियों से नवाजे। ऐसे में यदि वे गठबंधन धर्म तोड़ते हैं तो सरकार तो संख्या बल के हिसाब से उनकी सरकार तो बच जाएगी लेकिन सरकार तलवार की धार पर नजर आएगी।
 राज्य सरकार में वर्तमान में सुरेंद्र राकेश बसपा कोटे से बहुगुणा मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री हैं और उनके साथ विधायक हरीदास और शरबत करीम अंसारी सरकार को समर्थन दे रहे हैं, और मुख्यमंत्री ने बसपा के इन दोनों विधायकों को लालबत्ती देकर फिलहाल बसपा का दबाव कम किया है। वहीं मंत्री प्रसाद नैथानी के पीछे सांसद सतपाल महाराज का वरदहस्त है तो हरीश चंद्र दुर्गापाल के साथ कांग्रेस की वरिष्ठ नेता डा. इन्दिरा हृदयेश पाठक का हाथ है ऐसे में शहरी विकास मंत्रालय विभाग देख रहे प्रीतम सिंह पंवार ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जिनका कोई गॉड फादर उत्तराखंड की राजनीति में नजर नहीं आता। वहीं वे वर्तमान में यूकेडी (पी) व यूकेडी (डी) के बीच जारी शीत युद्ध में पिस रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने सबसे कमजोर कड़ी के रूप में यूकेडी विधायक प्रीतम सिंह पंवार ही बचते है जिनका सिर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को लालबत्ती से नवाजे जाने के एवज में कलम किया जा सकता है।   

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

राजधानी मसला कितनी हकीकत कितना छलावा

राजधानी मसला कितनी हकीकत कितना छलावा
राजेन्द्र जोशी

 राजधानी को लेकर सरकार कितनी संजींदा है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि राज्य के हुक्मरानों की नीति और नीयति कितनी साफ है। राज्य सरकार जहां एक ओर गैरसैंण से लगे भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की बात कर रही है तो वहीं देहरादून के पास रायपुर क्षेत्र में विधान भवन के लिए भूमि की तलाश शुरू कर दी गई है। राजधानी को लेकर राज्यवासियों से कहीं सरकार छलावा तो नहीं कर रही है राज्यवासियों को अब भी सरकार के नीयत पर संदेह है कि इस छोटे से प्रदेश में दो- दो राजधानियां आखिर क्यों और किसके लिए?
उत्तराखंड राज्य की लडाई में गैरसैंण को प्रतीक मानते हुए आंदोलन चलाया गया था। राज्य आंदोलनकारियों का सपना था कि राज्य बनने के बाद इस पर्वतीय प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनेगी लेकिन राज्य बनने के बाद राजनीतिक दलों ने अपने सहूलियतों को देखते हुए और जनभावनों को दरकिनार करते हुए देहरादून को अस्थाई राजधानी के लिए चुना। 12 साल में राज्य में काबिज भाजपा और कांग्रेस की सरकार  ने जनभावनाओं को  दरकिनार करते हुए देहरादून से ही राज्य का काम काज चलाया।
 राज्य में तीसरी बार हुए विधानसभा चुनाव के बाद व कांग्रेस की सरकार आने के बाद बहुगुणा सरकार ने राजधानी के इस संवेदनशील मामले को छुआ। इसे बहुगुणा सरकार की राजनीतिक दूरदर्शिता कहा जाय या राजनैतिक महत्वाकांक्षा, मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के छह महीने बाद उन्हें गैरसैंण की याद आई और उन्होंने गैरसैंण में राज्य के इतिहास में पहली बार कैबिनेट बैठक बुलाकर राज्यवासियों सहित तमाम राजनैतिक दलों का ध्यान गैरसैंण की ओर आकर्षित भी  किया। वहीं उन्होंने उसी दिन गैरसैंण में राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करते हुए आगामी 14 जनवरी मकर सक्रान्ति के पर्व पर  शिलान्यास की घोषणा तक भी कर डाली। इतना ही नहीं बहुगुणा सरकार ने जहां गैरसैंण मंे राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान की खोज के लिए विधान सभा उपाध्यक्ष अनुसुया प्रसाद मैखुरी के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया जिसने  गैरसैंण के निकट स्थित सात स्थानों में से भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए उपयुक्त पाया वहीं अब मकर सक्रान्ति को इस स्थान पर ग्रीष्मकालीन राजधानी का शिलान्यास कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी करने वालीह है। जबकि वहीं गुरूवार (आज) को मुख्यमंत्री बहुगुणा सहित विधान सभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल की टीम ने रायपुर क्षेत्र में विधान भवन के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश की।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य आंदोलनकारी शहीदों की अंतिम इच्छा गैरसैंण को राज्य की स्थाई राजधानी के रूप में देखना रहा है। इनका कहना है कि अस्थाई राजधानी से पर्वतीय क्षेत्र को क्या मिलेगा यदि स्थाई राजधानी बनती तो पर्वतीय क्षेत्र का और अधिक विकास होता इनका मानना है कि यदि सरकार की नीति और नीयति साफ है तो देहरादून में विधानभवन के लिए भूमि की तलाश क्यों ? क्यों नहीं गैरसैंण को ही स्थाई राजधानी के रूप में विकसित किया जाता। इनका मानना है गैरसैंण में राजधानी बनने के बाद जहां विकास की बाट जोह रहे इस पर्वतीय क्षेत्र में विकास की किरण पहुंचेगी जो इन बारह सालों में नहीं पहुंच पायी और इससे पलायन रोकने में भी मदद मिलेगी।

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

दरिंदगी के दाग से देवभूमि भी है दागदार

दरिंदगी के दाग से देवभूमि भी है दागदार
राजेन्द्र जोशी
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए गैंगरेप से समूचा देश सदमे में है। इस घटना के बाद लोगों के बीच जो प्रतिक्रिया आ रही है उससे साफ जाहिर होता है कि देश गुस्से में भी है। गैंगरेप के खिलाफ दिल्ली से लेकर आर्थिक राजधानी मुंबई तक लोग सड़कांे पर निकले, हवा में उछल रहे हाथों में जो तख्तियां लहरा  रही थी, उसमें लिखे संदेशों से स्पष्ट था कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार किसी भी सूरत में मंजूर नहीं, ऐसे लोगों को भारतीय दंड संहिता में सीधे  सजा-ए-मौत की लोग मांग कर रहे हैं।
   ऐसा ही नजारा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी दिखा, जहां विभिन्न संस्थानों के छात्र-छात्राएं,  सामाजिक और राजनीतिक संगठन भी सड़कों पर  उतरा। दिल्ली के गुनहगारों को सजा-ए-मौत के नारे राजधानी की फिजाओं में तैर रहे हैं। ये लोग दिल्ली में हुए गैंगरेप पर अपना गुस्सा बयां कर रहे थे, ये गुस्सा जाजय भी है, बिडंबना देखिए कि दिल्ली की हवा के रूख में सभी बहे लेकिन किसी ने भी उत्तराखंड में हुए उन जघन्य अपराधों और अपराधियों के खिलाफ  कोई आवाज नहीं उठाई, जिन अपराधों ने देवभूमि के दामन पर भी दरिंदगी के दाग लगाये।
   ऋषि-मुनियों की तपस्थली और देवताओं की इस भूमि को भी दरिंदों ने कई बार घिनौनी हरकत से ना सिर्फ खून से लतपथ किया बल्कि कई मासूमों की जिंदगी को तबाह और बर्बाद की। चुप और  खामोश रहने वाले पहाड़ों में भी महिलाएं महफूज नहीं हैं, तो मैदानी और शहरी इलाकों के हाल इससे कई गुना ज्यादा खराब हैं, जहां महिलाएं घर से बाहर निकलते ही अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित रहती है। ये हालात उस पहाड़ी मुल्क में है जहां कभी घरों में ताले तक नहीं लगाये जाते हैं, पिछले दो दशक में ऐसा क्या घट गया कि अब लोगों को अपनी सुरक्षा की चिंता ज्यादा सताने लगी है। खैर दिल्ली में हुई इस घटना को लेकर समूचे देश में हो हल्ला मचा हुआ है। लेकिन उत्तराखंड की बात करें तो यहां हुए कई जघन्य अपराधों के खिलाफ जनता क्यों मुखर नहीं हुई। देहरादून में हुए अंशू हत्याकांड को लेकर क्यों चुप्पी  साधी हुई है, कुमाऊं में गीता खोलिया प्रकरण ठंडे बस्ते में समा गया है।

हरिद्वार में कविता हत्याकांड का हश्र क्या हुआ आप सब जानते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कितनी अंशू, कितनी गीता और कितनी कविताएं हैवनियत की शिकार होंगी। इन के परिवार वालों से जरा पूछिये कि उनकी आत्मा क्या कहती होगी, हर रोज पुलिस दफ्तर पर अपनी फरियाद लेकर पहुंच जाते हैं, लेकिन अपराधी आज भी कानून के शिकंजे से दूर हैं। आखिर न्याय की देवी की आंखों से काली पट्टी हटेगी और कब इन लोगों न्याय मिलेगा।
 जरा सोचिए क्या यह अपराध देश की राजधानी में हुआ और इसलिए ये ज्यादा बड़ा है, देवभूमि उत्तराखंड के दामन पर जिन जघन्य अपराधों के छींटे पड़े  क्या वो इसलिए भुला दिये जायेंगे कि वो एक पहाड़ी राज्य में हुए। ऐसा नहीं चलेगा! देवभूमि में हुए जघन्य अपराधों को लेकर क्या कोई सड़कों पर उतरा, क्या प्रदेश की विधानसभा में किसी ने भी उन मासूमों के लिए आवाज उठाई, जिनकी आवाज हवस की खातिर हमेशा के लिए फ़ना हो गई। लिहाजा अगर देश की राजधानी में हुए गैंगरेप पर समूचा देश में उबाल आता है तो फिर इन मासूमों के परिजनों को न्याय दिलाने की खातिर उत्तराखंड के लोग सड़कों पर क्यों नहीं उतर सकते?

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्री छोड गए राजधानी भगवान भरोसे

मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्री छोड गए राजधानी भगवान भरोसे
आंदोलनों की आग से झुलस रही राजधानी
नेताओं की आस में आम आदमी, जनप्रतिनिधि जूते घिसने को मजबूर
राजेन्द्र जोशी

देहरादून, 20 दिसम्बर,। दून घाटी आज कल आंदोलनों की आग से झुलस रही है, लेकिन आग बुझाने वाले मातहत गायब हैं। आंदोलनकारियों को आखिर समझाए तो कौन समझाए। यहां तक कि आंदोलनकारियों से ज्ञापन लेने के लिए अदने से अधिकारियों की जिम्मेदारी लगाई गई है। राजधानी में यदि कुछ हो गया, तो निर्णय लेने वाला भी कोई नहीं है। राज्य का मुख्यमंत्री विदेश दौरे पर तो राज्यपाल मध्यप्रदेश के दौरे पर हैं, वहीं कुछ मंत्रीगण तो अपने घरों में आराम फरमा रहे हैं और कुछ अपनी विधानसभा क्षेत्रों में बताए गए हैं। विधानसभा वीरान पड़ा है और समस्याओं के पुलिंदे लिए राज्य के सुदूरवर्ती अंचलों के जनप्रतिनिधि सचिवालय और विधानसभा के बीच झूल रहे हैं। यह उस राज्य की दशा है, जिसे बने अभी मात्र 12 वर्ष हुए हैं।
    आंदोलनों की आग में सूबे की राजधानी दून गुरूवार और भड़क गई। जहां सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने प्रोन्नति में आरक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों को जमकर कोसा वहीं उनकी शव यात्रा निकालकर पुतला दहन किया। इसके साथ ही दिल्ली में हुए सामूहिक गैंगरेप के विरोध में छात्राओं ने राजधानी की सड़कों पर रैली निकालकर आरोपियों को फांसी पर लटकाने की मांग की। वहीं समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आरक्षण को
समर्थन देने के विरोध में भाजपा और कांग्रेस दोनों पर के खिलाफ प्रदर्शन किया। इधर हड़ताल कर रहे बैंक कर्मियों ने धरने-प्रदर्शन और जुलूस निकालकर निकाल राजधानी की सड़कों पर केन्द्र सरकार के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया। उधर उत्तराखंड परिवहन महासंघ द्वारा कर्मिशियल वाहनों पर पंजीकरण शुल्क बढ़ाये जाने के विरोध में धरना दिया और सरकार को चेतावनी दी कि अगर सरकार ने अपना निर्णय वापस नहीं लिया तो वह अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले जायेंगे। स्वास्थ्य विभाग के लैब टेक्नीशियल अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गये जिसके कारण अस्पतालों में मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। रोज की तरह उधर मिनिस्ट्रियल कर्मियों का आंदोलन भी गुरूवार को जारी रहा। विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों और कर्मचारियों के इन          राजधानी दून की सड़कें पूरी तरह से आंदोलनों से पटी पड़ी हैं, जिसके कारण प्रशासन की हालत खस्ता होती जा रही है और आम आदमी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। धरने-प्रदर्शनों से राजधानी की सड़कों पर जाम की स्थिति बननी अब आम हो गई है, राज्य सभा में प्रोन्नति में आरक्षण के बाबत लाये जाने वाले संविधान संशोधन बिल के विरोध में सामान्य वर्ग के कर्मचारियों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते गुरूवार को भी इन कर्मचारियों ने परेड ग्राउंड में जनसभा कर भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही जमकर खरी-खोटी सुनाई वहीं इन कर्मचारियों ने नुक्कड नाटक के माध्यम से सरकार को कटघरे में खड़ा किया। इन कर्मचारियों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों की शव यात्रा निकाली, उनकी यह शव यात्रा घंटाघर व पल्टन बाजार होती हुई लक्खीबाग पंहुची जहां कर्मचारियों ने इनके पुतले दहन किये।
    राज्य के मातहत नेता राज्य को भगवान भरोसे छोड़ अपनी-अपनी यात्राओं में मशगूल हैं, मुख्यमंत्री अफ्रीकी देशों सहित यूरोपीय देशों की यात्रा पर हैं, तो राज्यपाल अपने निजी दौरे पर अपनी कर्मस्थली रहे भोपाल के दौरे पर। ऐसा ही हाल मंत्रियों का भी है, कोई अपनी विधानसभा क्षेत्र में रहने की बात कहकर राजधानी से किनारा किए हुए है, तो कोई अपने निजी दौरे पर। राज्य के अधिकारियों का भी बुरा हाल है। ऐसे में दूरदराज से आए जनप्रतिनिधि व समस्याओं से जूझ रहे लोगों के जहां विधानसभा और सचिवालय के बीच जूते तो घिस रहे हैं, वहीं उनकी जेबों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ रहा है। 12 साल के इस राज्य में नेताओं का इतना गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कभी नहीं देखा गया। राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि राज्य सही दिशा पर न चलकर अपने विकास के मार्ग से भटक गया है। उन्होंने इसकी सारी जिम्मेदारी राज्य के नेताओं पर डालते हुए कहा कि नेता राज्य को दिशा देता है, लेकिन जब नेता ही राज्य के प्रति लापरवाह हो तो वह राज्य कैसे उन्नति कर सकता है, यह विचारणीय है।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

योजना पर अमल की तैयारी, सरकार चली गैरसैंण

योजना पर अमल की तैयारी, सरकार चली गैरसैंण
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 18 दिसम्बर। कांग्रेस सरकार ने अपने कदम अब उत्तराखंड में गैंरसैण की ओर बढ़ाना शुरू कर दिया हैं। बीती तीन नवंबर राज्य के इतिहास में पहली बार गैरसैंण में आयोजित हुई कैबिनेट की बैठक में लिये गये निर्णयों पर अमल के लिए सरकार ने अब ठोस पहल करनी शुरू कर दी है। दस अधिकारियों का एक दल 18 दिसम्बर को को गैंरसैण रवाना हो गया, जो 19 दिसंबर से लेकर 21 दिंसबर तीन दिन गैरसैंण में कैंंिपंग करेंगा और सरकार की घोषणाओं के आधार पर यहां पर बनाये जाने वाले भवनों के निर्माण के लिए सर्वेक्षण करेगा।
    उल्लेखनीय हो कि सरकार ने कैबिनेट की बैठक में निर्णय लिया था कि गैरसैंण में शीघ्र ही विधानभवन बनाया जायेंगा विधानसभा का एक सत्र यहां हर साल आयोजित किया जायेंगा। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा की गई घोषणा कि 14 जनवरी 2013 को गैरसैंण में विधनसभा भवन का शिलान्यास किया जायेंगा। इस घोषणा पर अमल के लिए अब सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है। गैंरसैण में सत्र चलाये जाने की परिकल्पना को पूरा करने के लिए यहां चार बड़े भवनों के निर्माण की जरूरत है जिसमें विधानसभा भवन, मिनी सचिवालय, विधायक व मंत्री आवास एंव अधिकारी आवास प्रमुख हैं। इन भवनों के निर्माण के लिए भूमि का चयन एंव अन्य तमाम जरूरतों को पूरा करने के लिए सर्वेक्षण जरूरी हैं। इन भवनों के सर्वेक्षण के लिए सचिव आवास एंव सचिव राज्य संपत्ति के अलावा पीडब्ल्यूडी और विधानसभा के उच्च अधिकारी भूगर्भ विशेषज्ञ कल से गैरसैंण में रहकर सर्वेक्षण करेंगे। इस क्षेत्र में भवनों के निर्माण के साथ-साथ सड़क बिजली, पानी और हैलीकॉप्टर लेंडिग के लिए जमीन की तलाश की जायेंगी। अपने इस कैंप के दौरान यह अधिकारी इन भवनों के निर्माण का खाका तैयार करेंगे। इस पहल से यह साफ हो गया है कि सरकार ने अपनी घोषणाओं को पूरा करने के लिए ठोस पहल शुरू कर दी हैं। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा है कि 14 जनवरी 2013 को होने वाले शिलान्यास में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को बुलाया जायेगा। वहीं इस मामले में सांसद सतपाल महाराज ने केन्द्र सरकार से 50 करोड़ रुपये अतिरिक्त धन मुहैया कराने की मांग की है। वहीं एक जानकारी के अनुसार विधानसभा उपाध्यक्ष अनुसुया प्रसाद मैखुरी व राज्य के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं ने विदेशी पशु प्रजनन प्रक्षेत्र भरारीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए उपयुक्त बताया है। इनका कहना है कि भरारीसैंण में सरकार को कई आवासीय भवन सहित बैठक के लिए सभागार और कार्यालय भवन पर कम खर्च के बावजूद सुविधा मिल जाएगी, क्योंकि दो दशक पूर्व यहां पर विदेशी पशु प्रजनन प्रक्षेत्र का अच्छा खासा कार्यालय था, जो राज्य बनने के बाद लगभग खाली सा हो गया है, वहीं इसी स्थान पर विधानभवन और मिनी सचिवालय के निर्माण को भी हरी झण्डी मिल सकती है, क्यांेकि इस स्थान पर बिजली, पानी सहित हैलोड्रम तक बनाने के लिए जमीन उपलब्ध है। इससे जहां सरकार पुराने भवनों को इस्तेमाल में लाकर खर्चा बचा सकती है, वहीं इनका उपयोग भी ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए किया जा सकता है।

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

इधर कर्मचारी हड़ताल पर, उधर मुख्यमंत्री विदेश यात्रा पर !

इधर कर्मचारी हड़ताल पर, उधर मुख्यमंत्री विदेश यात्रा पर !
 
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दिख रही उत्तराखण्ड में
 
राजेन्द्र जोशी
देहरादून 17 दिसम्बर। इसे उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस राज्य के 56 विभागों के छहः लाख कर्मचारी हड़ताल पर हों और मुख्यमंत्री विदेश जाने की तैयारी में लगा हो  इससे पहले भी प्रदेशवासी राज्य के नेताओं की राज्यवासियों से बेरुखी उस वक़्त देख चुके हैं तब राज्य में आपदा के  दौरान जहां एक ओर उत्तरकाशी, बागेश्वर और रूद्रप्रयाग जिले के सैकड़ों लोग जीवन और मौत से लड़ रहे थे,  वहीं उस वक़्त राज्य के कुछ कबीना मंत्री व विधायक इंग्लैंड में गुलछर्रे उड़ा रहे थे।
    पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ चल रहे आंदोलन में राज्य के 56 विभागों के लगभग छहः लाख कर्मचारी आंदोलन पर हैं, सोमवार को राज्य के इन 56 विभागों के कार्यालयों में या तो ताले पड़े रहे या कार्यालयों में सन्नाटा पसरा रहा। शासन से लेकर मण्डलीय स्तर और जिले से लेकर तहसील स्तर और यहां तक ब्लॉक स्तर तक के कर्मचारियों के काम पर न आने से सरकारी कामकाज बुरी तरह प्रभावित रहा। वैसे आरक्षण समर्थक कुछ कर्मचारी जरूर काम पर आए, लेकिन इनकी संख्या प्रभावी न होने के कारण ये लोगों की दिक्कतों को दूर नहीं कर पाए। राज्य के लगभग सभी कर्मचारी संगठन मिलकर ताकत के साथ इस आंदोलन में प्रतिभाग कर रहे हैं। राज्य स्तरीय संगठनों में उत्तराखण्ड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ, उत्तराखण्ड कर्मचारी शिक्षक संगठन, पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद, उत्तराखण्ड चालक महासंघ, उत्तराखण्ड कर्मचारी निगम महासंघ, वन निगम महासंघ और उत्तराखण्ड मिनिस्ट्रीयल फैडरेशन जैसे संगठन मैदान में है। ऐसे में राज्य के मंत्रियों व विधायकों के दौरे के बाद अब मुख्यमंत्री का 10 दिवसीय व्यक्तिगत विदेशी दौरा विवादों में आ गया है।
    एक जानकारी के अनुसार आज (सोमवार) मुख्यमंत्री देहरादून से दिल्ली जाएंगे, जहां से वे मंगलवार को मुंबई पहुंचेंगे, चर्चा है कि उनके साथ उनके परिवार के लगभग 24 लोग भी साथ  जा रहे हैं, जो 19 दिसम्बर को मुंबई से दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील तथा जर्मनी सहित कई अन्य यूरोपीय व दक्षिण अफ्रीकी देशों की यात्रा भी करेंगे । इस दौरान वे केपटाउन, जोहांसबर्ग व रिओ डी जनेरिओ की यात्रा भी करेंगे.  सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में सहारनपुर निवासी खनन व्यवसायी राकेश कुमार गुप्ता के मेहमान बनकर जा रहे हैं, सूत्रों ने तो यह भी बताया कि इस पूरी यात्रा के प्रायोजक दक्षिण अफ्रीका का यह व्यवसायी ही हैं, जो भारत के उत्तराखण्ड प्रांत में खनन और होटल व्यवसाय में अपने हाथ आजमाने को तैयार हैं। जिनके दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा की तीसरी पत्नी के पुत्र डुडुजानी जैकब व्यवसायिक हिस्सेदार हैं।
    राजनीतिक जानकारों का कहना है जहां एक ओर राज्य के छहः लाख कर्मचारी हड़ताल पर हों और राज्य का मुख्यमंत्री अपनी विदेश यात्रा की तैयारी पर, इससे यह साफ झलकता है कि वह राज्य के प्रति कितने संजीदा हैं। जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने से लेकर आज तक मुख्यमंत्री ने इस राज्य को केवल राज्य में काम करने वाले ब्यूरोक्रेट्स की तरह ही लिया है, वे सत्ता में मात्र पांच दिन ही देहरादून में प्रवास करते हैं और शनिवार व रविवार उनका दिल्ली में ही गुजरता हैं । विश्लेषकों का मानना है कि इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि एक और जहाँ राज्य के छह लाख कर्मचारी हड़ताल पर है और राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो और मुख्यमंत्री विदेश यात्रा पर जा रहा हो इससे पता चलता है कि वह राज्य के प्रति कितना संजीदा है। इतना ही नहीं प्रदेशवासी राज्य में काबिज कांग्रेस सरकार के मंत्रियों का राज्य के प्रति संजीदगी उस समय भी देख देख चुके हैं जब बादल फटने की घटना के चलते तीन सितंबर को ऊखीमठ, रूद्रप्रयाग और बागेश्वर जिलों के सैकड़ों लोग जहां जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे, उस दौरान राज्य के मंत्री इंग्लैंड में ओलपिंक का मजा ले रहे थे। मंत्रियों की इस यात्रा पर राज्य के लोगों का आक्रोश भी उस समय भी देखने को मिला था।

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

रोजगार तो नहीं दे पाई सरकार नशे का कर लिया इंतजाम



रोजगार तो नहीं दे पाई सरकार नशे का कर लिया इंतजाम

उत्तराखण्ड़ी महिलाओं को दुख पहुंचाने वाला है सरकार का निर्णय: शमशेर सिंह बिष्ट

राजेन्द्र जोशी
देहरादून 15 दिसम्बर। ‘‘नशा नहीं रोजगार दो‘‘ के नारे उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंगठनों द्वारा लगभग तीन दशक से लगाए जाते रहे हैं, सरकार बेरोजगारों को रोजगार तो उपलब्ध नहीं करा पाई, लेकिन नौनिहालों को नशे की गर्त में धकेलने का इंतजामात सरकार ने जरूर कर दिए हैं। अब सरकार शराब के रास्ते लोगों को रोजगार देने और माफियाओं को पैसे बटोरने का पूरा इंतजाम खुद ही कर रही है। सरकार के इस निर्णय से शराब माफियाओं अथवा शराब के कारोबारियों और सरकार के बीच गहरा रिश्ता स्वतः ही उजागर हो गया है।
    बीते दिन विधानसभा सत्र की समाप्ति के बाद हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने विदेशी तर्ज पर और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के रास्ते पर चलते हुए राज्य में बार लाईसेंस वाले होटल और रेस्तरा में माईक्रोपब ब्रूवरी खोलने का रास्ता साफ हो कर दिया। इनमें स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले खाद्यानों से बीयर बनाई जाएगी। जिसमें पांच फीसदी ऐल्काहॉल होगा, इतना ही नहीं बार लाईसेंस वाले होटर और रेस्टोरेंट मात्र तीन करोड़ का उपकरण लगाकर पीने वालों के लिए बीयर दे सकेंगे। इससे राज्य को प्रति ईकाइ 300 बल्क लीटर क्षमता वाली मात्र एक फैक्ट्री से प्रतिवर्ष 18.46 लाख का राजस्व मिलेगा। इतना ही नहीं सरकार ने राज्य में बॉटलिंग प्लांट (बोतल भरने की व्यवस्था) के रास्ते भी खोल दिए हैं। इससे बाहरी प्रदेश अथवा देशों  से आने वाली मदिरा की बॉटलिंग प्रदेश में ही की जाएगी। सरकार ने अनुमान के अनुसार एक माह में लगभग इस प्लांट में लगभग छहः लाख बोतले भरी जाएंगी और इससे सरकार को प्रतिवर्ष 19.46 करोड़ का राजस्व मिलेगा। यह बॉटलिंग प्लांट हरिद्वार नगर निगम के पूरे क्षेत्र, ऋषिकेश नगर और आस-पास जिसमें र्स्वग आश्रम, मुनुकीरेती, लक्ष्मणझूला और तपोवन में नहीं लगाया जा सकेगा।
    आखिर सरकार को राज्य में शराब व्यवसाय को पनपाने के पीछे क्या गणित नजर आई, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन सरकार का तर्क है कि इससे राज्य में शराब पीने वालों कई तरह की शराब मिल पाएगी और आपसी प्रतिस्पर्द्धा के चलते शराबियों को शराब की कीमत कम देनी पडे़गी और ऐसे शराब विक्रेता निर्यात शुल्क देकर ऐसी शराब का निर्यात भी कर सकेंगे। राज्य में वर्तमान में उधमसिंह नगर में खेतान, देहरादून में बोर्डमैन, काशीपुर में आईजीएल पहले से ही शराब की बॉटलिंग कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य में शराब व्यवसाय सरकार को एक कमाउ सौदा नजर आ रहा है, लेकिन राज्य सरकार को राज्य के बेरोजगारों की कतई चिंता नहीं दिखाई दे रही है कि राज्य के लगभग साढ़े आठ लाख बेरोजगारों के लिए राज्य सरकार ने क्या किया। जबकि राज्य के पर्वतीय इलाकों में नशा नहीं रोजगार दो के नारों से पूरो उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र आज भी गूंज रहा है। लोगों के पास रोजगार नहीं है और वे रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं, विश्लेषकों का कहना है कि जब राज्य के बेरोजगारों के हाथ में रोजगार नहीं होगा और जेब में पैसे नहीं होंगे तो सरकार की शराब को कौन खरीदेगा। विश्लेषकों का मानना है कि कहीं सरकार शराब के व्यवसाय को फैलाकर राज्य के युवाओं को नशेड़ी तो नहीं बनाने जा रही है। इस मामले पर लोक वाहिनी तथा नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के मुखिया रहे शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि यह राज्य 200 साल तक शराब विहीन था अंग्रेजों ने यहां शराब लाकर राज्य को बर्बाद करने का कार्य किया, जिसे कांग्रेस सरकार आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा उत्तराखण्ड की महिलाओं का शराब के खिलाफ आंदोलन और राज्य सरकार का यह निर्णय महिलाओं को दुख पहुंचाने वाला है। उन्होंने बताया कि नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के कार्यकर्ता सरकार के इस निर्णय का पुरजोर विरोध करेंगे।
    सरकार का यह निर्णय राजनेताओं, अफसारशाहों और शराब माफियाओं के बीच गठजोड़ का नमूना है, सरकार का यह निर्णय इस बात की भी तस्दीक करता है कि राज्य में शराब व्यवसाय में शराब व्यवसायियों और सफेद पोशों नेताओं व अधिकारियों के बीच कितना मित्रतापूर्ण संबंध है। सूत्रों ने तो यहां तक बताया है कि यह निर्णय बीती 17 नवंबर को पोंटी चढ्ढा हत्याकाण्ड से पहले पोंटी चढ्ढा व राज्य के दो आईएएस अधिकारियों के बीच हुई डील का परिणाम है, जिसे सरकार ने अब जाकर मूर्त रूप दिया है।