गुरुवार, 29 अगस्त 2013

तंम्बूओं में तंग जिंदगी जीने को मजबूर हैं आपदा प्रभावित

तंम्बूओं में तंग जिंदगी जीने को मजबूर हैं आपदा प्रभावित
राजेन्द्र जोशी
देहरादून : उत्तराखण्ड त्रासदी के दो महीने होने को हैं, आपदा के बाद आपदा प्रभावित पिछले डेढ़ महीने से तम्बुओं में दिन गुजार रहे हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित केदारघाटी के वो गांव हैं, जहंा प्रकृति ने अपना सबसे ज्यादा कहर बरपाया है। इन गांवों के लोग तम्बुओं में तंग जिंदगी जीने को मजबूर हैं। आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की शिकायत है कि सरकार उन्हें तंबु देकर भूल गई है। आज भी प्रभावित क्षेत्रों के अधिकांश ग्रामीण अपने गांव से इतर तम्बूओं में जीवन काटने को मजबूर है, प्रदेश सरकार उनके स्थाई घरौंदों को लेकर जरा भी गंभीर नहीं दिखाई दे रही है। उनकी जिंदगी हर रात मौत के खौफ में कटती है और हर दिन कुछ नए आश्वासन के आस में। सरकार द्वारा दिए गए टैंट न उनकी सर्दी ही बचा पा रहे हैं और न ही जंगली जानवरों के खौफ को। टिहरी के हडियाना मल्ला गांव के लोगों के सर की छत आपदा से छीन ली है। खस्ता हाल घरों में रहना खतरे से खाली नहीं है, इस गांव के 26 परिवार पिछले डेढ़ महीने से टैंट के नीचे जिंदगी बीता रहे हैं, न इनके पास खाने का कोई सामान है और न ही पीने का पानी। सबसे खास बात तो यह है कि जिला प्रशासन ने आज तक इनकी खबर नहीं ली। जहां तक सरकारी दस्तावेजों की बात की जाए, तो सरकारी दस्तावेजों में इस गांव का सिर्फ एक ही परिवार दर्ज, जिसका आशियाना छीना गया है, लेकिन गांव के 26 परिवार आज भी अपना नाम सरकार के उन दस्तावेजों में दर्ज कराने के लिए भटक रहे हैं। कमोबेश यही हालत मंदाकिनी घाटी सहित भ्यूंडार घाटी, गंगा घाटी और देवाल क्षेत्र की भी है राहत के नाम पर दावें तो बहुत बड़े-बड़े हुए, लेकिन आपदा प्रभावितों तक एक दाना अन्न का भी नहीं पहुंच पाया, हां जहंा तक सड़क है, उसके आस-पास के गांवों तक तो राहत पहुंचने की बात ग्रामीण कबूलतें है, लेकिन दूरस्थ इलाकों में आज भी अन्न के एक-एक दाने के लिए लोग मोहताज हैं। जहां तक भूस्खलन और भूधंसाव के खतरे से जूझ रहे पूर्व के 233 गांवों के अलावा आपदा के बाद रहने योग्य न रहने वाले गांवों की संख्या बढ़कर लगभग 475 के करीब हो गई को लेकर राज्य सरकार की अभी तक कोई नीति साफ नजर नहीं आई है। यही कारण है कि प्रभावित क्षेत्रों के गांवों के ग्रामीणा में सरकार के प्रति धीरे-धीरे आक्रोश बढ़ता जा रहा है। प्रभावित क्षेत्र के लोग अब यह सोचने पर मजबूर हैं कि आखिर वे तम्बूओं में तंग जिंदगी कैसे जियेंगे।