बुधवार, 3 अप्रैल 2013

सरकार ने लगाई हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर

सरकार ने लगाई हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर
15 साल से रहने वाले स्थायी निवासी
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 2 अप्रैल। स्थाई निवास और जाति प्रमाण पत्र को जारी करने के लिए प्रदेश सरकार ने मंगलवार को अपनी स्थिति साफ करते हुए नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार किया। राज्य गठन नौ नवम्बर 2000 से पहले रहने वाले (जो 15 वर्षों से उत्तराखण्ड में रह रहा है) को स्थायी निवासी माना जएगा तथा 1985 से पहले से रहने वालों को जाति प्रमाण पत्र जारी किए जाएंगे, जिसके लिए मंगलवार को सरकार ने शासनादेश जारी कर दिया है।
    पहले प्रदेश में स्थाई निवास और जाति प्रमाण पत्रों को जारी करने में 1950 की व्यवस्था थी। पूर्व भाजपा सरकार ने स्थाई व जाति प्रमाण पत्रों को जारी करने के लिए 1950 के भूमि से संबंधित दस्तावेजों को शामिल करना अनिवार्य किया हुआ था। जिसको लेकर राज्य में मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने आपत्ति जताई थी और आंदोलन कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश भी की थी। अजय कुमार ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ नैनीताल उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें सरकार के स्थाई और जाति प्रमाण पत्रों को निर्गत करने वाले आदेशों को अदालत में चुनौती दी गई थी। 17 अगस्त 2012 को नैनीताल हाईकोर्ट की एकल बैंच ने याचिकाकर्ता के तथ्यों से सहमति जताते हुए सरकार को आदेश किए थे कि वह नौ नवम्बर 2000 को कट ऑफ डेट मानते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग को जाति प्रमाण पत्र जारी करें और उन्हें स्थाई निवासी माना जाए। राज्य आंदोलनकारियों के साथ ही कई राजनैतिक दलों ने भी अदालत के इस आदेश के बाद आपत्ति जताते हुए एक दिन का बंद किया था और कहा था कि इसका लाभ उन लोगों को मिलेगा जो राज्य निर्माण से पहले यहां आकर रहने लगे हैं इसके खिलाफ जमकर हंगामा व प्रदर्शन भी हुआ था।
मंगलवार को यहां मुख्य सचिव आलोक कुमार जैन ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि नौ नवम्बर 2000 को कट ऑफ डेट मानते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को जाति प्रमाण पत्र जारी करें और उन्हें स्थाई निवासी माना जाए तथा अन्य लोगों को जो 1985 से उत्तराखण्ड में रह रहे हैं को जाति प्रमाण पत्र जारी करें। उन्होंने कहा कि ऐेसे लेागों को भूमि से संबंधित या यहां रहने वाले प्रमाण पत्रों के आधार पर ही जाति प्रमाण पत्रों को जारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई किरायेदार है और उसके पास किराये की रसदी है तो उसको भी दस्तावेजों में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा जिनका यहां आवास है और वह रोजगार के लिए बाहर चला गया है को भी जाति और स्थाई निवास प्रमाण पत्रों को जाारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नैनीताल हाईकोर्ट की एकल बैंच का यह निर्णय है, जिसे सरकार ने माना है और इस मामले में दो और याचिकाएं रविन्द्र जुगरान व त्रिवेन्द्र सिंह पंवार की पर अभी कोई निर्णय नहीं हो पाया है यदि इस मामले में हाईकोर्ट अपना फैसला देती है तो उसे अंतिम माना जाएगा।


शुक्रवार, 29 मार्च 2013

उत्तराखंड में अफसरशाही सरकारों पर भारी!

अफसरशाही सरकारों पर भारी!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य गठन से लोगों को उम्मीद थी कि उनके अपने पहाड़ी राज्य में भ्रष्टाचार जैसी बीमारी नहीं फैलेगी और प्रदेश के अफसर भी अपने काम में ईमानदारी के साथ प्रदेश की जनता की परेशानियों का निस्तारण करेंगे, लेकिन प्रदेश के प्रदेश की जनता की सोच गलत साबि हुई। उत्तराखण्ड राज्य के 12 साल के इतिहास में अफसरशाही हमेशा से ही यहां की सरकारों पर हावी रही और राज्य में आज भी कई अफसर अपनी मनमानी करते हैं और मंत्रियों व विधायकों के आदेशों को ठंेगा दिखा रहे हैं, इतना ही प्रदेश के मुखिया के सामने कई बार यह मामला उठाया जा चुका है, लेकिन फिर भी अफसरशाही पर सरकार लगाम लगाने में नाकामयाब साबित हो रही है। इतना ही नहीं स्टर्डिया मामले में अधिकारियांे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को गुमराह किया यह तक न्यायालय तक टिप्पणी कर चुका है, लेकिन यह राज्य का दुर्भाग्य ही होना कि जिनके दामन में दाग हैं ऐसे दागदार एक भी अधिकारी के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं हो पाई है।
राज्य के 12 साल के इस सफर में अधिकांश सरकारी महकमों के बड़े अधिकारियों की सोच व आचरण में कोई बदलाव नहीं आया। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पहाड़ी राज्य की जरूरतों को समझते हुए मजबूत इच्छाशक्ति के साथ ही विकास करने की बात हो या सर्विस मैनुअल्स के मुताबिक
अपने आचरण में सुधार की बात, आमजनता का काम न करने के लिए अफसरों ने हर मामलों में अपनी टांग उपर रखी है।
यह अपने आप में एक बड़ा दुर्भाग्य है कि स्वयं पार्क अधिकारियों द्वारा राजाजी नेशनल पार्क के कोर जोन कासरो में परिवार समेत होली मिलन समारोह मनाने के सनसनीखेज खुलासे ने अधिकारियों की हिटलरशाही की पद्रेश की जनता के सामने पोल खोल दी है, जबकि इस जोन में वन एवं वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने नियम कानून बना रखे हैं। प्रदेश के इतिहास में कई मंत्री और विधायक ने अपनी ही सरकार में बेलगाम होती अफसरशाही से खासे नाराज पाए गए और उन्होंने अपने दुख को लगातार प्रदेश के मुख्यमंत्री के सामने रखा। कांग्रेस व भाजपा सरकारों के शासनकाल में कई बड़े ऐसे अधिकारियों पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते आए हैं, लेकिन किसी भी सरकार के मुखिया ने इन अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने का दम नहीं दिखाया और नही वह इन भ्रष्ट अधिकारी को जेल की सलाखों के पीछे डाल सके। मौजूदा समय में भाटी आयोग की जांच में टीडीसी में तैनात रहे दो बड़े अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। लेकिन सरकार ने इन अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर करने तक का दम नहीं दिखाया और केवल नाटक कर अधिकारियों पर लगे आरोपों की जांच मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव करेंगे।

गुरुवार, 28 मार्च 2013

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी में सरकार !! !

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 23 मार्च। सिडकुल की रूद्रपुर और हरिद्वार की जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचने के बाद अब राज्य सरकार देहरादून स्थित आईटी पार्क की वह जमीन बेचने जा रही है जिस पर कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का सपना देखा था।
पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी जिन्हें भविष्यदृष्टा के रूप में जाना जाता है का सपना था कि रूद्रपुर,सितारगंज,भगवानपुर,हरि
द्वार, रोशनाबाद, सेलाकुई,कोटद्वार तथा काशीपुर में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कर राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार उपलब्ध कराने में इन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका हो ताकि राज्य से पलायन को रोकने के साथ ही स्थानीय लोगों को उनके पास ही रोजगार उपलब्ध हो सके। तिवारी शासनकाल में इन औद्योगिक क्षेत्रों की ओर औद्योगिक घरानों ने रूख भी किया। लेकिन सरकार की थकाऊ कार्यप्रणाली से आजीज आ चुके कई उद्योग समूह यहां के अधिकारियों व नेताओं का गैर सहयोगी व्यवहार देखते हुए वापस चले गए। परिणामस्वरूप किसानों को उजाड़ कर औद्योगिक क्षेत्रों में सरकार द्वारा खरीदी गई सैकड़ों एकड़ भूमि बंजर हो गई। बहुगुणा सरकार के आने के बाद राज्य के कुछ नौकरशाहों और बड़े नेताओं की नजरे इन जमीनों पर जा टिकी और उन्होंने इन जमीनों पर कंक्रीट के बहुमंजिले भवनों का सपना देखना शुरू कर दिया और इन जमीनों को बेचने के लिए मुफीद भूूमाफियों की तलाश शुरू कर दी। इसी तलाशी के दौरान उन्हें वह बिल्डर मिल गया जो उनकी हर ख्वाहिश पूरी कर सकता था और राज्य सरकार ने उसे औने -पौने दामों पर बेच भी डाला।
ठीक इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने राजधानी के सहस्त्रधारा रोड़ पर आईटी पार्क की स्थापना कर राज्य के बेरोजगारों को रोजगाार का सपना देखा था। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों और बड़े नेताओं की गिद्ध दृष्टि इस जमीन पर भी पड़ गई है। सूत्रों ने बताया कि राज्य सरकार के कुछ बडे़ अधिकारी इस जमीन को किसी बिल्डर को बेचने जा रहे हैं। जिसके लिए अखबारों में दिखावे के लिए विज्ञापन भी प्रकाशित किए जा चुके हैं। जिस भूमि को आईटी पार्क के लिए खरीदा गया था और जिस पर अंर्तराष्ट्रीय स्तर की आईटी कम्पनियों को अपने संस्थान खोलने से वह भूमि भी सिडकुल की भूमि की तरह बिकने को तैयार है ऐसे में अब यह सवाल उठता है कि राज्य की बेशकीमती जमीनों को यदि इसी तरह खुर्द -बुर्द किया जाता रहा तो भविष्य में राज्य में सिडकुल और आईटी पार्क जैसे आस्थानों के लिए भूमि ही नहीं बचेगी।

अपने पर छींटे पड़ते देख पीछे हटे भाटी!

अपने पर छींटे पड़ते देख पीछे हटे भाटी!
अपने एससी त्रिपाठी को दी गई कमान
सत्य के सामने इस सरकार को झुकना पड़ा: रावत
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। भाजपा शासनकाल में हुई गड़बड़ियों को लेकर कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए भाटी आयोग के अध्यख केवल राम भाटी ने स्वंय पर पड़ रहे छींटों के बाद आखिरकार सोमवार देर शाम अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री को सौंप दिया। पूर्व आईएएस अधिकारी केवल राम भाटी की जगह पूर्व आईएएस अधिकारी एससी त्रिपाठी की अध्यक्षता में नया आयोग गठित किया गया है। यह आयोग 2007 से लेकर 2012 के बीच भाजपा शासनकाल के दौरान की अनियमितताओं की जांच करेगा। भाटी आयोग द्वारा प्रदेश सरकार को जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद भाटी पर आरोप लगे थे कि उन्होंने कांग्रेस से मिली भगत कर आयोग की रिपोर्ट को जहां मनगडण्त रूप से तैयार की, वहीं उनके और सरकार के द्वारा इस रिपोर्ट को विधानसभा में रखे जाने से पहले लीक कर दिया गया। इतना ही नहीं भाजपा के पूर्व मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने केवल राम भाटी पर आरोप लगाया था कि उनके और कांग्रेस के बीच सांठ-गांठ है, इसी के चलते केवल राम भाटी ने डिफेंस कॉलोनी स्थित अपना आवास वर्ष 2008 में मुख्यमंत्री के करीबी विधायक सुबोध उनियाल को दिया था, जिस पर विधायक और प्रदेश के महाधिवक्ता रहते हैं। इतना ही नहीं बीज एवं तराई विकास निगम (पीडीसी) के पूर्व अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने भाटी आयोग की रिपोर्ट को नैनीताल उच्च न्यायालय में चुनौति देते हुए भाटी को ही पक्षकार बना डाला था, जिससे भाटी के सामने और समस्या खड़ी हो गई थी। इतना ही नहीं राजनैतिक दलों के बीच में फंसे भाटी को यह डर भी सताने लगा था कि यदि भविष्य में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो वह उनसे गिन-गिन कर बदला लेगी। यही कारण है कि इन झमेलों में फंसने के बजाए भाटी ने बीती दिन देर शाम मुख्यमंत्री को अपना इस्तीफा सौंप दिया। 13 अप्रैल 2012 को भाटी आयोग के गठन को नोटिफिकेशन जारी हुआ था, वहीं 10 मई 2012 को आयोग को सौंप सौंपने का नोटिफिकेशन किया गया, पांच मार्च 2013 को भाटी आयोग द्वारा पीडीसी पर पहली जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी गई और 19 मार्च 2013 को सरकार ने यह रिपोर्ट विधानसभा में रखी।
    भाटी आयोग पर पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का कहना है कि भाटी जांच आयोग पर दबाव बनाकर प्रदेश में काबिज कांग्रेस सरकार ने बंद कमरे में रिपोर्ट तैयार कराई, इतना ही नहीं जांच आयोग ने अधिनियम के सेक्शन आठ-बी का भी उल्लंघन किया। उनके अनुसार आरोपियों का पक्ष भी जांच रिपोर्ट में आना चाहिए था, जो कि नहीं आया। भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट और सिडकुल घोटाले को लेकर बीती 14 मार्च से आहुल विधानसभा सत्र मात्र पांच दिन ही चल पाया, जिसमें जहंा भाजपा ने सिडकुल घोटाले को हथियार बनाकर विधानसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी, वहीं कांग्रेस ने भाटी आयोग का डर दिखाकर भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश की। अंततः चार दिन पूर्व भाटी आयोग की रिपोर्ट को एफआईआर मानते हुए कृषि अनुभाग के महावीर सिंह नेगी द्वारा कोतवाली में बेनामी रिपोर्ट दर्ज करा दी गई, जिसके बाद से भाजपा का पारा सातवें आसमान पर था।
    राजनैतिक हलकों में अभी यह मामला चल ही रहा था कि बीती शाम के.आर. भाटी ने मुख्यमंत्री को इस्तीफा सौंप दिया और प्रदेश सरकार ने यू.पी. कॉडर के रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर सुशील चंद त्रिपाठी की अध्यक्षता में एक सदस्यी जांच आयोग का गठन कर डाला। अब भाटी आयोग द्वारा उत्तराखण्ड बीज एवं तराई विकास निगम की रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने के बाद त्रिपाठी आयोग के पास स्टर्जिया बायो कैमिकल, सूक्ष्म एवं लद्यु जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में धांधली, महाकुंभ घोटाला, आपदा राहत घोटाला और वर्ष 2007 से 2012 के बीच केंद्र पोषित योजनाओं में अनियमितताओं की जांच के साथ ही 2010 में ढेंचा बीज घोटाला और कार्बेट नेशनल पार्क में भूमि के विक्रय हस्तांतरण की जांच की जिम्मेदारी अब त्रिपाठी आयोग पर है। त्रिपाठी आयोग के गठन पर भाजपा नेता व पूर्व कृषि मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि सरकार द्वारा भाजपा पर दबाव बनाने की नियत से रिटायर्ड आईएएस अधिकारियों के नेतृत्व में आयोग का गठन किया जा रहा है, जो कि सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस सरकार में थोड़ी भी ईमानदारी बची है तो उसे वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के नेतृत्व में आयोग गठित करने की जगह किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच करानी चाहिए।
वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने कहा कि भाटी आयोग के चेयरमैन के0आर0 भाटी के त्यागपत्र पर कांग्रेस का यह कहना कि राजनीति में सुचिता के लिए यह त्यागपत्र हुआ है। कांगेस्र का यह कहना कि यह त्यागपत्र लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और आयोग की सुचिता बनाये रखने के लिए किया गया है, पूर्णतः असत्य है क्यों कि यह सर्वविदित है कि जिस प्रकार से भाटी आयोग ने अनान-फानन में अपनी रिपोर्ट दी और बिना किसी ठोस सबूत पर लोगांे पर दोष मढे, ऐसा आज तक भारत के इतिहास में कहीं नही हुआ। तीरथ सिंह रावत ने अपने सभी विधायक, नेता प्रतिपक्ष को बधाई देते हुए कहा कि जिस प्रकार से सदन के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया गया वह प्रदेश की जनता के लिए और जन लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक था और सत्य के सामने इस सरकार को झुकना पड़ा। उन्होंने कहा कि सिड़कलु घोटाला जो कि हजारों, करोड़ों रूपये का है, पर भारतीय जनता पार्टी का संर्घष सदन के अन्दर और बाहर जारी रहेगा। त

कांग्रेस में किसी बड़े परिवर्तन की संभावना!

कांग्रेस में किसी बड़े परिवर्तन की संभावना!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून  । राहुल गांधी के दौरे के बाद प्रदेश की राजनीति में परिवर्तन की उम्मीदें जगने लगी थी। क्योंकि कार्यकर्ताओं से फीडबैक के बाद राहुल गांधी को यह कहना पड़ा था कि राज्य में कोई बड़ा परिवर्तन हो सकता है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बहुत जल्द प्रदेश में कांग्रेस संगठन का नेतृत्व जहंा सतपाल महाराज के हाथ आने की उम्मीद बतायी जा रही है वहीं प्रदेश में सत्ता नेतृत्व में भी परिवर्तन के आसार नजर आने लगे हैं। इतना ही नहीं जानकारी के अनुसार कांग्रेस में सत्ता, संगठन और सरकार में आमूल चूल परिवर्तन की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
     राज्य के अस्तित्व में आने के दिन से लेकर आज तक प्रदेश में राजनैतिक अस्थिरता व्याप्त रही है, प्रदेश में चाहे भाजपा की सरकार सत्तासीन रही हो अथवा कांग्रेस की दोनों ही दल प्रदेश को स्थायी नेतृत्व देने में नाकामयाब ही रहे हैं। कहने को तिवारी सरकार ने ही पूरे पांच साल तक सत्ता तो चलाई लेकिन उनकी भी पूरे पांच साल तक टांग ख्ंिाचाई रही अन्तः उन्होने चुनाव की घोषणा के बाद अपने के मुख्यमंत्री आवास के भीतर ही रखा और चुनाव प्रचार में भाग नहीं लिया। राजनैतिक दिग्गज बताते हैं कि यदि तिवारी बाहर निकल चुनाव में थोड़ा भी समय देते तो 2007 में प्रदेश में भाजपा की जगह एक बार फिर कांग्रेस की सरकार होगी। कमोवेश इस बार भी ऐसा ही हो रहा है कांग्रेस के नेता हरीश रावत के काफी मेहनत-मशक्कत के बाद प्रदेश में कांग्रेय की सरकार बन तो गयी लेकिन कांग्रेस ने सत्ता विजय बहुगुणा के हाथों सौंप दी। बस तब से ही सत्ता संघर्ष जारी है।
होली के माहौल के बीच कांग्रेस संगठन और सत्ता में फेरबदल की खबरें सोमवार को चर्चाओं के केन्द्र में रही। जहां एक ओर दिल्ली कांग्रेस आलाकमान द्वारा नये प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा को लेकर कांग्रेसी नेताओं को आपस में चर्चा करते हुए देखा गया वहीं निगम चुनावों को लेकर होने वाले आरक्षण का मुद्दा भी चर्चाओं के केन्द्र में है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य को बदले जाने की कवायद लंबे समय से जारी है लेकिन बीते दिनों उनके विरोधी खेमे द्वारा कांग्रेस संगठन का कामकाज ठीक न चलने और एक व्यक्ति एक पद को आधार बनाकर उन्हें इस पद से हटाये जाने की मांग की जा रही है। यह मुद्दा अब तक टिहरी लोकसभा उपचुनाव के कारण लटका रहा था और अब वर्तमान समय में होने वाले निकाय और पंचायत चुनावों के मद्देनजर इससे टाले जाने की खबरें थी लेकिन दिल्ली के सूत्रों के अनुसार अब इससे और अधिक समय तक नहीं टाला जायेगा और संभावत जल्द ही नये प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा की जा सकती है। हालांकि अभी कुछ कांग्रेसी नेताओं का यह भी कहना है कि अब जो कुछ होगा वह होली के बाद ही होगा। प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य वर्तमान में राज्य कैबिनेट में मंत्री भी है उन्हें मंत्री बनाए जाने के बाद से ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की बागडोर युवा हाथों में सौंपने की मांग की जा रही थी साथ ही कैबिनेट मंत्री होने की वजह से संगठन का कामकाज ठीक से न चला पाने का आरोप लगाया जा रहा था। कांग्रेस में एक व्यक्ति एक पद की पंरपरा का भी तर्क कुछ कांग्रेसियों द्वारा दिया जा रहा है राहुल गांधी के दून दौरे में भी नये अध्यक्ष की घोषणा का मुद्दा चर्चाओं में था।
   यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नये प्रदेश अध्यक्ष के लिए अब तक कई नाम सामने आ चुके है जिनमें संासद प्रदीप टम्टा से लेकर सांसद सतपाल महाराज के नाम शामिल है। वर्तमान समय में यह भी चर्चा आम है कि इस दौड़ में सतपाल महाराज सबसे आगे है और हरीश रावत भी उनके नाम पर सहमति जता चुके है। उधर निगम के मेयर पद को लेकर भी दिग्गज नेताओं की लंबी कतार है। हालांकि निर्वाचन आयोग द्वारा परिसीमन और आरक्षण के बारे में अभी निर्णय लिया जाना है लेकिन चर्चा है कि देहरादून निगम में मेयर का पद दलित महिला अथवा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित किया जा रहा है। इस खबर के बाद कई कांग्रेसी दिग्गज नेताओं के सपने तार-तार हो सकते हैं। कई स्तर पर कांग्रेस में फेरबदल की तैयारियां जारी है और इस फेरबदल के बीच कांग्रेसियों के बीच चर्चाएं जोरों पर है। सत्ता से लेकर संगठन तक में होने वाले इस फेरबदल को लेकर कांग्रेस में खासी हलचल दिखाई दे रही है।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

29 साल पहले मरे व्यक्ति से खरीदी आईपीएस सिद्धू ने जमीन

29 साल पहले मरे व्यक्ति से खरीदी आईपीएस सिद्धू ने जमीन
वन भूमि पर बढ़ रहे हैं बेतहाशा कब्जे, वन विभाग की चुप्पी पर सवालिया निशान!
राजेन्द्र जोशी

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे जंगलों में राजधानी में तैनात कई अधिकारी वन भूमि को कब्जाने पर लगे हैं। इसका ताजा उदाहरण राजपुर क्षेत्र में एक आईपीएस अधिकारी द्वारा खरीदी गई उस विवादास्पद जमीन का है जिसका मालिक 1983 में स्वर्ग सिधार गया था और बीते महीने इस आईपीएस अधिकारी ने उससे जमीन का सौदा कर जमीन अपने नाम करा दी। ठीक इसी तरह राजधानी क्षेत्र के कई और स्थानों पर भी वन भूमि पर कब्जा करने की नियत से जंगलो का सफाया आज भी जारी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पुलिस के इस अधिकारी के मातहत पुलिस कर्मी अब वन अधिकारियों को धमकानें पर जुट गये हैं कि वे इस मामले में चुप्पी साध लें।  

पुलिस मुख्यालय में तैनात इस आईपीएस अधिकारी ने राजपुर क्षेत्र के वीरगिर वाली गांव के जगंल की जमीन पर बीते दिन 25 हरे साल के पेड़ कटवा डाले। इस जमीन पर यह अधिकारी फार्म हाऊस बनाना चाहता है ऐसा सूत्रों ने बताया है। इतना ही नहीं 7450 वर्ग मीटर इस जमीन पर लगभग तीन 100 से ज्यादा साल के हरे वृक्ष खड़े हैं। जिनमें से लगभग 25 पेड़ों को बीते दिन काट दिया गया है। एक जानकारी के अनुसार आईपीएस सिद्धू ने जिस जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करवाई है उस जमीन पर 55 साल पुराना मकान दिखाया गया है जबकि मौके पर वहां मकान का एक खंडर ही मौजूद है। इतना ही नहीं आईपीएस अधिकारी द्वारा जमीन की रजिस्ट्री को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों ने बताया है कि जिस नत्थूराम पुत्र मटकूमल्ल से आईपीएस ने जमीन खरीदी है उसकी मौत 1983 में हो चुकी है। 29 साल पहले मर चुके नत्थूराम से आईपीएस अधिकारी ने राजस्व अभिलेखों के अनुसार खसरा नम्बर एक (क) पुराना नम्बर 1/1 खतौनी संख्या 6 की 1.490 हेक्टेयर जमीन खरीदी है। जिसके एवज में नत्थूराम को एक करोड़ 20 लाख रूपये दिये गये जिस पर 35 लाख की स्टांप डियूटी भी चुकायी गई जबकि इस जमीन का दाम सरकारी दरों के हिसाब से लगभग साढ़े छह करोड़ बताया गया है। एक जानकारी के अनुसार नत्थूराम के पोते शरदसूद ने वन विभाग के अधिकारियों के बताया कि उसके दादा के नाम से किसी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भूमि बेच डाली है। जबकि उनका कहना है कि उसके दादा नत्थू राम के मृत्यु आज से 29 साल पहले हो चुकी है और यह जमीन हमारे परिजनों यशपाल,सत्यपाल, राजपाल, विजयपाल तथा मेरे दादा नत्थू राम के नाम दर्ज है, 
    राजधानी से लगे तमाम इलाको में वन भूमि पर कब्जे को लेकर कमोवेश यही स्थिति है। जोहड़ी गांव के जंगल से लगी वन भूमि में भी बीते दिन 20 पेड़ों को काट वन भूमि को हड़पने की कोशिश का मामला सामने आया है। वहीं भगवंतपुर, पुरकुल, सहस्त्रधारा, नवादा, दुधली, सहसपुर, ऋषिकेश, विकासनगर आदि क्षेत्रांे में भी वन भूमि कब्जाने का मामला लगातार सुर्खियों में रहा है, लेकिन कभी पुलिस के बड़े अधिकारियों, कभी राजस्व के बड़े अधिकारियों और कभी आला प्रशासनिक अधिकारियों और नेताओं द्वारा वन भूमि पर कब्जे को लेकर मामले तो दर्ज हुए लेकिन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। परिणामस्वरूप वन भूमि पर कब्जे करने वालों के हौसले बुलंद हैं और वन विभाग की चुप्पी पर सवालिया निशान।

सोमवार, 25 मार्च 2013

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी!

सिडकुल के बाद अब आईटी पार्क की ज़मीन बेचने की तैयारी!
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 23 मार्च। सिडकुल की रूद्रपुर और हरिद्वार की जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचने के बाद अब राज्य सरकार देहरादून स्थित आईटी पार्क की वह जमीन बेचने जा रही है जिस पर कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने बेरोजगारों को रोजगार दिलाने का सपना देखा था।
पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी जिन्हें भविष्यदृष्टा के रूप में जाना जाता है का सपना था कि रूद्रपुर,सितारगंज,भगवानपुर,हरि
द्वार, रोशनाबाद, सेलाकुई,कोटद्वार तथा काशीपुर में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कर राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार उपलब्ध कराने में इन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका हो ताकि राज्य से पलायन को रोकने के साथ ही स्थानीय लोगों को उनके पास ही रोजगार उपलब्ध हो सके। तिवारी शासनकाल में इन औद्योगिक क्षेत्रों की ओर औद्योगिक घरानों ने रूख भी किया। लेकिन सरकार की थकाऊ कार्यप्रणाली से आजीज आ चुके कई उद्योग समूह यहां के अधिकारियों व नेताओं का गैर सहयोगी व्यवहार देखते हुए वापस चले गए। परिणामस्वरूप किसानों को उजाड़ कर औद्योगिक क्षेत्रों में सरकार द्वारा खरीदी गई सैकड़ों एकड़ भूमि बंजर हो गई। बहुगुणा सरकार के आने के बाद राज्य के कुछ नौकरशाहों और बड़े नेताओं की नजरे इन जमीनों पर जा टिकी और उन्होंने इन जमीनों पर कंक्रीट के बहुमंजिले भवनों का सपना देखना शुरू कर दिया और इन जमीनों को बेचने के लिए मुफीद भूूमाफियों की तलाश शुरू कर दी। इसी तलाशी के दौरान उन्हें वह बिल्डर मिल गया जो उनकी हर ख्वाहिश पूरी कर सकता था और राज्य सरकार ने उसे औने -पौने दामों पर बेच भी डाला।
ठीक इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने राजधानी के सहस्त्रधारा रोड़ पर आईटी पार्क की स्थापना कर राज्य के बेरोजगारों को रोजगाार का सपना देखा था। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों और बड़े नेताओं की गिद्ध दृष्टि इस जमीन पर भी पड़ गई है। सूत्रों ने बताया कि राज्य सरकार के कुछ बडे़ अधिकारी इस जमीन को किसी बिल्डर को बेचने जा रहे हैं। जिसके लिए अखबारों में दिखावे के लिए विज्ञापन भी प्रकाशित किए जा चुके हैं। जिस भूमि को आईटी पार्क के लिए खरीदा गया था और जिस पर अंर्तराष्ट्रीय स्तर की आईटी कम्पनियों को अपने संस्थान खोलने से वह भूमि भी सिडकुल की भूमि की तरह बिकने को तैयार है ऐसे में अब यह सवाल उठता है कि राज्य की बेशकीमती जमीनों को यदि इसी तरह खुर्द -बुर्द किया जाता रहा तो भविष्य में राज्य में सिडकुल और आईटी पार्क जैसे आस्थानों के लिए भूमि ही नहीं बचेगी।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

एमडीडीए आखिर बिना लाभ हानि का खेल किसके लिए रहा है खेल

एमडीडीए आखिर बिना लाभ हानि का खेल किसके लिए रहा है खेल
राजेन्द्र जोशी
देहरादून। राजधानीवासियों को यह समझ नहीं आ रहा है कि घंटाघर से कृष्णापैलेस तक की इमारतों को ध्वस्त कर वहां बहुमंजिले शापिंग सेन्टर व आवासीय फ्लैट बनाने में जब फायदा नहीं है तो आखिरकार ये योजना किसके फायदे के लिए बनायी जा रही है? पुश्तों से दुकानदारी कर अपने परिवार का भरणपोषण कर इन लोगों को उजाड़ने की योजना से किसको फायदा होगा यह तो एमडीडीए कभी भी नहीं बताने वाला लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसके पीछे किसी राजनैतिक व्यक्ति का दिमाग काम कर रहा है जो अपने पुत्र सहित एक बिल्डर को इसका लाभ देना चाहता है।
 उल्लेखनीय है कि घंटाघर का बॉटल नेक खोले हुए अभी चंद समय भी नहीं हुआ कि मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण महानगर योजना के तहत दिग्विजय सिनेमा से कृष्णा पैलेस तक की इमारतों को ध्वस्त कराकर उन पर छह मंजिला इमारतें बनाने के लिए दिल्ली-चंडीगढ़ के एक बड़े बिल्डर से रणनीति के तहत एक बड़ा खेल खेलने की तैयारी चल रही है। आशंका यहां तक उठ रही है कि इस पूरी डील में एक राजनेता का पुत्र भी शामिल है जोकि बिल्डर का मित्र बताया जा रहा है। इस पूरे खेल के पीछे यह रणनीति तैयार की जा रही है कि जमीन सरकारी होगी और उसका निर्माण बिल्डर करेगा तथा जिनकी कामर्शियल में दुकानें व संस्थान हैं उन्हें उसी आधार पर उसका कब्जा मिलेगा और जिनके मकान टूटेंगे उन्हें फ्लैट दिया जायेगा और बाकी के जो फ्लोर खाली रहेंगे उन पर बिल्डर का अधिकार होगा। इस डील में अरबों रुपए का खेल होने की आशंकाएं उठ रही हैं।
  विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण ने घंटाघर दिग्विजय सिनेमा से चकराता रोड में कृष्णा पैलेस के समीप तक की सारी इमारतें ध्वस्त कर महानगर योजना के तहत वहां छह मंजिला इमारत बनाने के लिए एक बड़ा खाका तैयार किया है। इस खाके पर एमडीडीए के उपाध्यक्ष तेजी के साथ काम करते हुए नजर आ रहे हैं। उनकी इस योजना के प्रति कितनी उत्सुकता है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि पिछले चंद दिनों के भीतर कई बार एमडीडीए उपाध्यक्ष ने दिग्विजय इमारत में मौजूद सभी दुकानदारों से विभाग की योजना के बारे मंे सहमति देने का प्रयास किया और इतना ही नहीं उन्होने व्यापारियों व वहां रह रहे परिवारों सें कहा कि एमडीडीए दिग्विजय सिनेमा से कृष्णा पैलेस तक के पीछे की सारी इमारतें तोड़कर वहां छह मंजिला इमारतों के चार ब्लाक बनायेगी। नेता पुत्र की इस महत्वाकांक्षी योजना को छह से आठ महीने के रिकार्ड समय के भीतर पूरा कर लिया जायेगा। दिग्विजय इमारत के दुकानदारों को यह भी लालच दिया गया है कि जिसकी दुकान व संस्थान कॉमर्शियल में हैं उन्हें कॉमर्शियल में जगह दी जाएगी और जो दुकान व फ्लैट बनाए जाएंगे वह पीड़ित पक्ष को नो प्रॉफिट व नो लॉस पर दिये जाएंगे। यहां वर्षों से रह रहे कई परिवारों व दुकानदारों का साफ आरोप है कि एमडीडीए उपाध्यक्ष ने उन्हें इस योजना के प्रति यहां तक धमकाया कि अगर उन्होंने एमडीडीए को इमारत तोड़ने के लिए मना किया तो इस जमीन को अधिग्रहण कर लिया जायेगा।
वहीं दूसरी ओर इस महानगर योजना को लेकर कई दुकानदारों का आरोप है कि एमडीडीए महानगर योजना के तहत इस स्थान पर जो छह मंजिला इमारत बनाने की रणनीति तैयार कर रहा है उससे आखिरकार सरकार को कोई लाभ होने वाला तो है नहीं। चर्चा यहां तक है कि इस महायोजना को घंटाघर से कृष्णा पैलेस तक लागू कराने के लिए एक राजनेता का पुत्र पर्दे के पीछे रहकर बड़ा खेल खेल रहा है। यहां तक  चर्चा है कि नेता पुत्र का बिल्डर मित्र चंडीगढ़ व दिल्ली में बड़ा व्यवसाय करता है और इस बिल्डर को बड़ा लाभ दिलाने के लिए नेता पुत्र इस योजना के निर्माण का काम मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण से दिलाने के लिए पूरा खाका गोपनीय तरीके से तैयार किया जा चुका है। दिग्विजय सिनेमा के अंतर्गत मौजूद एक दुकानदार ने बताया कि एमडीडीए इस महानगर योजना को जल्द से जल्द शुरू करने के लिए काफी उतावला हो रखा है। चूंकि दिग्विजय सिनेमा का प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है इसलिए एमडीडीए वहां के दुकानदारों व सिनेमा मालिक से यह सहमति लेने की कोशिश कर रहा है कि जब न्यायालय का फैसला किसी के पक्ष में आएगा तो उसका हिस्सा मिल जायेगा। लेकिन एमडीडीए के इस विचार से दुकानदार सहमत नहीं दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिस जगह पर यह योजना लागू करनी है वहां डेढ़ से दो लाख रुपए गज जमीन का बाजार भाव है। ऐसे में अगर बिल्डर नो प्रॉफिट व नो लॉस पर पीड़ितों को दुकानें व मकान देता भी है तो भी लगभग चार फ्लोर बिल्डर के पास बच जाएंगे। ऐसे में उसे अरबों रुपए का फायदा होगा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिरकार किसी बिल्डर को लाभ दिलाने के लिए ऐसा खेल एमडीडीए क्यों खेलना चाह रहा है। यह अब चर्चा का विषय बनता जा रहा है। यह योजना अगर लागू हुई तो इस पूरे खेल में बिल्डर व राजनेता के पुत्र के खजाने में अरबों रुपया भर जायेगा जबकि सरकार को इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

ई-बिलिंग से सरकार को राजस्व आय में वृद्धि होगी: बहुगुणा

ई-बिलिंग से सरकार को राजस्व आय में वृद्धि होगी: बहुगुणा
राजेन्द्र जोशी
देहरादून, 12 फरवरी । प्रदेश में राजस्व आय बढ़ाने के लिए सरकार गंभीर है। सीमित संसाधनों का दोहन कर राजस्व बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे है। राज्य में ई-गर्वनेस को बढ़ावा दिया जा रहा है। आबकारी को भी ई-गर्वनेंस से जोडने की दिशा में सरकार ने कदम उठा दिये है। ई-बिलिंग से सरकार को राजस्व आय में वृद्धि होगी। अब किसी भी प्रकार की गड़बड़ी होने की कोई गुंजाईश नही रहेगी। यह बात मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मंगलवार को सचिवालय में आबकारी विभाग की ई-बिलिंग योजना के शुभारंभ अवसर पर कही।
मंगलवार को मुख्यमंत्री बहुगुणा ने सचिवालय में आबकारी व्यवसायियों और उनके प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। बैठक में मुख्यमंत्री ने आगामी आबकारी नीति को और अधिक प्रभावी व पारदर्शी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने व्यवसायियों से सुझाव मांगे साथ ही उनकी समस्याआंें को भी जाना। मुख्यमंत्री श्री बहुगुणा ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश में राजस्व आय बढ़ाने के प्रति गंभीर है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखेगी कि इससे किसी को कोई असुविधा न हो। उन्होंने कहा कि विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकार को धन की आवश्यकता है और इसके लिए जरूरी है कि राजस्व आय में वृद्धि हो। उन्होंने कहा कि आबकारी विभाग को ई-गर्वनेंस सेवा से जोड़ा गया है, ताकि पारदर्शिता आये। उन्होंने कहा कि आबकारी विभाग को पूर्ण रूप से कम्प्यूटरीकृत किया जा रहा है। इससे राजस्व आय में वृद्धि होगी और किसी प्रकार की गडबड़ी भी नही हो सकेगी। उन्होंने कहा कि ई-बिलिंग के साथ ही ऑन लॉइन व्यवस्था पर भी जोर दिया जा रहा है, इससे अब ऑनलॉइन बिलिंग हो सकेगी। साथ ही व्यवसायियों को भी सुविधा होगी।
मुख्यमंत्री श्री बहुगुणा ने कहा कि राज्यवासियों का हित सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि राजस्व आय में वृद्धि के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहे है। उन्होंने बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिये कि आगामी आबकारी नीति को प्रभावी बनाया जाय। उन्होंने निर्देश दिये कि कम्प्यूटरीकृत करने की दिशा में तेजी से कार्य किया जाय। ताकि भविष्य में परमिट भी ऑन लॉइन व्यवस्था से जारी किये जा सके। उन्होंने कहा कि सरकार पारदर्शी शासन व्यवस्था देने के लिए वचनबद्ध है।
बैठक में प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री डी.के.कोटिया, प्रमुख सचिव वित्त राधा रतूड़ी, अपर सचिव मुख्यमंत्री एवं आयुक्त आबकारी दिलीप जावलकर, एनआईसी व आबकारी विभाग के अधिकारी आदि उपस्थित थे।

सोमवार, 7 जनवरी 2013

क्या मुख्यमंत्री गठबंधन को जारी रख पाएंगे?

क्या मुख्यमंत्री गठबंधन को जारी रख पाएंगे?
राजेन्द्र जोशी
देहरादून 07 दिसंबर। लालबत्तियों के लिए मारामारी के चलते मुख्यमंत्री के सामने गठबंधन धर्म को निभाने की समस्या आन खड़ी हुई है। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा हो गया है कि क्या वे गठबंधन को जारी रख पाएंगे। राज्य में कांग्रेस को उत्तराखंड में सरकार बनाए लगभग 10 माह हो चुके है और अब सरकार पर अपने कार्यकर्ताओं सहित चुनाव मेे हारे नेताओं को लेकर लालबत्तियों के लिए सरकार पर संगठन का भारी दबाव है।
गौरतलब हो कि राज्य में सम्पन्न विधान सभा चुनाव के परिणाम आने के बाद जहां भाजपा को 31 और कांग्रेस को 32 विधान सभा सीटें मिल पायी थी जो सरकार बनाने के लिए नाकाफी थी, लेकिन कांग्रेस ने जोड़ तोड़कर बहुमत हासिल कर राज्य में सरकार बना डाली। वर्तमान में राज्य में बहुगुणा सरकार को तीन निर्दलीय विधायकों सहित एक यूकेडी व तीन बसपा के सदस्यों का समर्थन प्राप्त है वहीं संख्या बल बढ़ाने के लिए मनोनीत एक एंग्लो इंडियन सदस्य का साथ भी कांग्रेस के साथ है।
सरकार का साथ दे रहे गठबंधन दलों में प्रदेश मंत्रिमंडल में बसपा के सुरेंद्र राकेश जहां परिवहन मंत्रालय संभाले हुए हैं वहीं उत्तराखंड क्रांति दल के प्रीतम पंवार शहरी विकास मंत्रालय तो निर्दलीय मंत्री प्रसाद नैथानी शिक्षा विभाग व हरीश चंद्र दुर्गापाल सहकारिता विभाग का दायित्व देख रहे हैं, वहीं विधायक दिनेश धनै को बहुगुणा सरकार ने गढ़वाल मंडल विकास निगम के अध्यक्ष का दायित्व दिया है। वैसे देखा जाय तो कांग्रेस के पास अपने कार्यकर्ताआंे की बडी लंबी फेहरिस्त है जो लालबत्ती की दौड़ में मुख्यमंत्री के नाक में दम किए हुए हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने आगे कुंआ तो पीछे  खाई की स्थिति आ खड़ी हुई है। उनके सामने यह समस्या भी आन खड़ी हुई है कि वे सरकार को समर्थन दे रहे दलों के साथ गठबंधन धर्म निभाएं या फिर गठबंधन तोड़ अपने कार्यकर्ताओं को लालबत्तियों से नवाजे। ऐसे में यदि वे गठबंधन धर्म तोड़ते हैं तो सरकार तो संख्या बल के हिसाब से उनकी सरकार तो बच जाएगी लेकिन सरकार तलवार की धार पर नजर आएगी।
 राज्य सरकार में वर्तमान में सुरेंद्र राकेश बसपा कोटे से बहुगुणा मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री हैं और उनके साथ विधायक हरीदास और शरबत करीम अंसारी सरकार को समर्थन दे रहे हैं, और मुख्यमंत्री ने बसपा के इन दोनों विधायकों को लालबत्ती देकर फिलहाल बसपा का दबाव कम किया है। वहीं मंत्री प्रसाद नैथानी के पीछे सांसद सतपाल महाराज का वरदहस्त है तो हरीश चंद्र दुर्गापाल के साथ कांग्रेस की वरिष्ठ नेता डा. इन्दिरा हृदयेश पाठक का हाथ है ऐसे में शहरी विकास मंत्रालय विभाग देख रहे प्रीतम सिंह पंवार ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जिनका कोई गॉड फादर उत्तराखंड की राजनीति में नजर नहीं आता। वहीं वे वर्तमान में यूकेडी (पी) व यूकेडी (डी) के बीच जारी शीत युद्ध में पिस रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने सबसे कमजोर कड़ी के रूप में यूकेडी विधायक प्रीतम सिंह पंवार ही बचते है जिनका सिर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को लालबत्ती से नवाजे जाने के एवज में कलम किया जा सकता है।   

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

राजधानी मसला कितनी हकीकत कितना छलावा

राजधानी मसला कितनी हकीकत कितना छलावा
राजेन्द्र जोशी

 राजधानी को लेकर सरकार कितनी संजींदा है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि राज्य के हुक्मरानों की नीति और नीयति कितनी साफ है। राज्य सरकार जहां एक ओर गैरसैंण से लगे भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की बात कर रही है तो वहीं देहरादून के पास रायपुर क्षेत्र में विधान भवन के लिए भूमि की तलाश शुरू कर दी गई है। राजधानी को लेकर राज्यवासियों से कहीं सरकार छलावा तो नहीं कर रही है राज्यवासियों को अब भी सरकार के नीयत पर संदेह है कि इस छोटे से प्रदेश में दो- दो राजधानियां आखिर क्यों और किसके लिए?
उत्तराखंड राज्य की लडाई में गैरसैंण को प्रतीक मानते हुए आंदोलन चलाया गया था। राज्य आंदोलनकारियों का सपना था कि राज्य बनने के बाद इस पर्वतीय प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनेगी लेकिन राज्य बनने के बाद राजनीतिक दलों ने अपने सहूलियतों को देखते हुए और जनभावनों को दरकिनार करते हुए देहरादून को अस्थाई राजधानी के लिए चुना। 12 साल में राज्य में काबिज भाजपा और कांग्रेस की सरकार  ने जनभावनाओं को  दरकिनार करते हुए देहरादून से ही राज्य का काम काज चलाया।
 राज्य में तीसरी बार हुए विधानसभा चुनाव के बाद व कांग्रेस की सरकार आने के बाद बहुगुणा सरकार ने राजधानी के इस संवेदनशील मामले को छुआ। इसे बहुगुणा सरकार की राजनीतिक दूरदर्शिता कहा जाय या राजनैतिक महत्वाकांक्षा, मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के छह महीने बाद उन्हें गैरसैंण की याद आई और उन्होंने गैरसैंण में राज्य के इतिहास में पहली बार कैबिनेट बैठक बुलाकर राज्यवासियों सहित तमाम राजनैतिक दलों का ध्यान गैरसैंण की ओर आकर्षित भी  किया। वहीं उन्होंने उसी दिन गैरसैंण में राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करते हुए आगामी 14 जनवरी मकर सक्रान्ति के पर्व पर  शिलान्यास की घोषणा तक भी कर डाली। इतना ही नहीं बहुगुणा सरकार ने जहां गैरसैंण मंे राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान की खोज के लिए विधान सभा उपाध्यक्ष अनुसुया प्रसाद मैखुरी के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया जिसने  गैरसैंण के निकट स्थित सात स्थानों में से भराड़ीसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए उपयुक्त पाया वहीं अब मकर सक्रान्ति को इस स्थान पर ग्रीष्मकालीन राजधानी का शिलान्यास कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी करने वालीह है। जबकि वहीं गुरूवार (आज) को मुख्यमंत्री बहुगुणा सहित विधान सभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल की टीम ने रायपुर क्षेत्र में विधान भवन के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश की।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य आंदोलनकारी शहीदों की अंतिम इच्छा गैरसैंण को राज्य की स्थाई राजधानी के रूप में देखना रहा है। इनका कहना है कि अस्थाई राजधानी से पर्वतीय क्षेत्र को क्या मिलेगा यदि स्थाई राजधानी बनती तो पर्वतीय क्षेत्र का और अधिक विकास होता इनका मानना है कि यदि सरकार की नीति और नीयति साफ है तो देहरादून में विधानभवन के लिए भूमि की तलाश क्यों ? क्यों नहीं गैरसैंण को ही स्थाई राजधानी के रूप में विकसित किया जाता। इनका मानना है गैरसैंण में राजधानी बनने के बाद जहां विकास की बाट जोह रहे इस पर्वतीय क्षेत्र में विकास की किरण पहुंचेगी जो इन बारह सालों में नहीं पहुंच पायी और इससे पलायन रोकने में भी मदद मिलेगी।

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

दरिंदगी के दाग से देवभूमि भी है दागदार

दरिंदगी के दाग से देवभूमि भी है दागदार
राजेन्द्र जोशी
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए गैंगरेप से समूचा देश सदमे में है। इस घटना के बाद लोगों के बीच जो प्रतिक्रिया आ रही है उससे साफ जाहिर होता है कि देश गुस्से में भी है। गैंगरेप के खिलाफ दिल्ली से लेकर आर्थिक राजधानी मुंबई तक लोग सड़कांे पर निकले, हवा में उछल रहे हाथों में जो तख्तियां लहरा  रही थी, उसमें लिखे संदेशों से स्पष्ट था कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार किसी भी सूरत में मंजूर नहीं, ऐसे लोगों को भारतीय दंड संहिता में सीधे  सजा-ए-मौत की लोग मांग कर रहे हैं।
   ऐसा ही नजारा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी दिखा, जहां विभिन्न संस्थानों के छात्र-छात्राएं,  सामाजिक और राजनीतिक संगठन भी सड़कों पर  उतरा। दिल्ली के गुनहगारों को सजा-ए-मौत के नारे राजधानी की फिजाओं में तैर रहे हैं। ये लोग दिल्ली में हुए गैंगरेप पर अपना गुस्सा बयां कर रहे थे, ये गुस्सा जाजय भी है, बिडंबना देखिए कि दिल्ली की हवा के रूख में सभी बहे लेकिन किसी ने भी उत्तराखंड में हुए उन जघन्य अपराधों और अपराधियों के खिलाफ  कोई आवाज नहीं उठाई, जिन अपराधों ने देवभूमि के दामन पर भी दरिंदगी के दाग लगाये।
   ऋषि-मुनियों की तपस्थली और देवताओं की इस भूमि को भी दरिंदों ने कई बार घिनौनी हरकत से ना सिर्फ खून से लतपथ किया बल्कि कई मासूमों की जिंदगी को तबाह और बर्बाद की। चुप और  खामोश रहने वाले पहाड़ों में भी महिलाएं महफूज नहीं हैं, तो मैदानी और शहरी इलाकों के हाल इससे कई गुना ज्यादा खराब हैं, जहां महिलाएं घर से बाहर निकलते ही अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित रहती है। ये हालात उस पहाड़ी मुल्क में है जहां कभी घरों में ताले तक नहीं लगाये जाते हैं, पिछले दो दशक में ऐसा क्या घट गया कि अब लोगों को अपनी सुरक्षा की चिंता ज्यादा सताने लगी है। खैर दिल्ली में हुई इस घटना को लेकर समूचे देश में हो हल्ला मचा हुआ है। लेकिन उत्तराखंड की बात करें तो यहां हुए कई जघन्य अपराधों के खिलाफ जनता क्यों मुखर नहीं हुई। देहरादून में हुए अंशू हत्याकांड को लेकर क्यों चुप्पी  साधी हुई है, कुमाऊं में गीता खोलिया प्रकरण ठंडे बस्ते में समा गया है।

हरिद्वार में कविता हत्याकांड का हश्र क्या हुआ आप सब जानते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कितनी अंशू, कितनी गीता और कितनी कविताएं हैवनियत की शिकार होंगी। इन के परिवार वालों से जरा पूछिये कि उनकी आत्मा क्या कहती होगी, हर रोज पुलिस दफ्तर पर अपनी फरियाद लेकर पहुंच जाते हैं, लेकिन अपराधी आज भी कानून के शिकंजे से दूर हैं। आखिर न्याय की देवी की आंखों से काली पट्टी हटेगी और कब इन लोगों न्याय मिलेगा।
 जरा सोचिए क्या यह अपराध देश की राजधानी में हुआ और इसलिए ये ज्यादा बड़ा है, देवभूमि उत्तराखंड के दामन पर जिन जघन्य अपराधों के छींटे पड़े  क्या वो इसलिए भुला दिये जायेंगे कि वो एक पहाड़ी राज्य में हुए। ऐसा नहीं चलेगा! देवभूमि में हुए जघन्य अपराधों को लेकर क्या कोई सड़कों पर उतरा, क्या प्रदेश की विधानसभा में किसी ने भी उन मासूमों के लिए आवाज उठाई, जिनकी आवाज हवस की खातिर हमेशा के लिए फ़ना हो गई। लिहाजा अगर देश की राजधानी में हुए गैंगरेप पर समूचा देश में उबाल आता है तो फिर इन मासूमों के परिजनों को न्याय दिलाने की खातिर उत्तराखंड के लोग सड़कों पर क्यों नहीं उतर सकते?