मंगलवार, 4 नवंबर 2014

रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदे की पूरी कहानी

नई दिल्ली: चेहरे पर रोबीली मूँछें, आंखों पर चश्मा और तनी हुई मांसपेशियों वाला गठीला बदन. ये चेहरा कभी कभार ही मीडिया के कैमरों पर चमकता है लेकिन इसका शुमार देश की मशहूर और रसूखदार शख्सियतों के बीच होता है क्योकि ये हैं देश के सबसे ताक़तवर राजनीतिक घराने गांधी परिवार के दामाद हैं रॉबर्ट वाड्रा. सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी के बाद गांधी परिवार के चौथे स्तंभ माने जाते हैं रॉबर्ट वाड्रा. इसीलिए रॉबर्ट वाड्रा पर भी इल्जामों के तीर बरसते रहे हैं. रॉबर्ट वाड्रा हरियाणा में जमीन के सौदों को लेकर विवादों में रहे हैं उन पर हेराफेरी और चार सौ बीसी के भी संगीन इल्जाम लगते रहे हैं. और इन्हीं इल्जामों को लेकर जब शनिवार रात उनसे सवाल पूछा गया तो कुछ इस तरह गुस्से से उबल पड़े कि उन्होंने रिपोर्टर के माइक पर को झटक दिया.
   व्यक्ति विशेष में आज हम आपको बताएंगे आखिर क्यों और किस बात पर आ रहा है रॉबर्ट वाड्रा को इतना गुस्सा. साथ ही पड़ताल इस बात की भी करेंगे कि दिल्ली और हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनने के बाद क्या अब जेल जाएंगे सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा.
   शनिवार रात को दिल्ली के अशोक होटल में जैसे ही सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से रिपोर्टर ने सवाल पूछा तो उन्होंने गुस्से से भर कर रिपोर्टर के माइक को झटक दिया. रॉबर्ट वाड्रा यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने रिपोर्टर पर जी भर कर भड़ास निकाली और उसे अपशब्द भी कहे. वीडियो में साफ नजर आ रहा है कि पहले तो रॉबर्ट वाड्रा रिपोर्टर के सवालों का जवाब बडे ही इत्मिनान से देते रहे लेकिन जब रिपोर्टर ने उनके हरियाणा में जमीन सौदे से जुड़ा सवाल पूछा तो रॉबर्ट वाड्रा को जैसे करंट मार गया और उन्होंने तैश में आकर रिपोर्टर का माइक झटक दिया, फुटेज डिलीट कराने को कहा और रिपोर्टर की जमकर लानत मलामत कर डाली.
दरअसल हरियाणा में जमीन के सौदे को लेकर प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा विवादों में रहे हैं. इसको लेकर बीजेपी लगातार चुनावों में गांधी परिवार को घेरती रही हैं. लेकिन शनिवार रात वाड्रा ने मीडिया के साथ जो सलूक किया उससे वो एक बार फिर सुर्खियों में आ गए हैं.

नई सरकार आने के बाद मुश्किल

सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक बार फिर राजनीति गर्म है. दरअसल जमीन सौदों को लेकर रॉबर्ट वाड्रा इसलिए भी परेशान चल रहे हैं क्योंकि हरियाणा में नई बीजेपी सरकार ने वाड्रा के जमीन सौदों की जांच कराने की बात कही है. जमीन सौदों पर सीएजी की वो ड्राफ्ट रिपोर्ट भी रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किल बढ़ा सकती है जिस रिपोर्ट पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर छापी है. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सीएजी ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा है कि वाड्रा की स्काईलाइड हॉस्पिटिलिटी प्राइवेट लिमिटेड को कमर्शियल कॉलोनी डेवलप करने की इजाजत तब दी गई जब उसके पास सिर्फ एक लाख रुपये थे. हरियाणा के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने कंपनी की वित्तीय क्षमताओं की अनदेखी की. वाड्रा की कंपनी गुड़गांव के शिकोहपुर में कॉलोनी बनाने वाली थी.

खेमका का खेल
  वाड्रा की कंपनी ने डीएलएफ को 58 करोड़ में जमीन बेचकर खुद 43 करोड़ 66 लाख का मुनाफा कमाया. हरियाणा सरकार औऱ वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक क़ॉलोनी बनाने के बाद कंपनी को सिर्फ 2 करोड़ 15 लाख रुपये रखने थे. बाकी रकम सरकारी खजाने में जानी चाहिए थी. वाड्रा की कंपनी ने शिकोहपुर में जमीन खरीदने में साढ़े सात लाख रुपये और लाइसेंस फीस जैसे मद में 6 करोड़ 84 लाख रुपये खर्च किए. सीएजी का मानना है कि हरियाणा सरकार को वाड्रा की कंपनी से 41 करोड़ 50 लाख रुपये वसूल करने चाहिए थे.
सीएजी ने उसी जमीन सौदे की जांच की है जिसके म्युटेशन हरियाणा के आईएएस अफसर अशोक खेमका ने रद्द कर दिया था.
सीएजी ने अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट 22 सितंबर को हरियाणा की कांग्रेस सरकार को भेज दी थी तब मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा थे लेकिन अब बीजेपी सरकार को सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट पर अपनी राय देनी है. हरियाणा के सीएम अब सीएम मनोहर लाल खट्टर हैं जो वाड्रा जमीन सौदे की जांच की बात पहले ही कह चुके हैं.



सीएजी रिपोर्ट के बाद मुश्किल
रॉबर्ट वाड्रा के जमीन सौदे पर सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट की इस नई कहानी के बाद अब बात उन आरोपों की जो चुनावी सभाओं में रॉबर्ट वाड्रा के बहाने विरोधी दल नेहरु - गांधी परिवार पर लगाते रहे है.
दरअसल रॉबर्ट वाड्रा पर हरियाणा में जमीन सौदों को लेकर दस्तावेजों में हेराफेरी के आरोप लगते रहे हैं. मशहूर रियलटी कंपनी डीएलएफ के साथ जमीन विवाद को लेकर भी वाड्रा पर आरोप लगे हैं और इन्हीं इल्जामों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चुनावी रैलियों में रॉबर्ट वाड्रा पर निशाना साधते रहे हैं लेकिन वाड्रा पर इल्जामों की बौछार सबसे पहले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने की थी.
केजरीवाल का कहना है, पहले तो 65 करोड़ दे दिए. औऱ फिर कहा कि इन 65 करोड़ से तुम हमारी प्रापर्टी खरीद लो. औऱ वो अपनी प्रापर्टी उन्होंने इतने सस्ते में दे दी कि पांच करोड में 35 करोड़ की प्रापर्टी दे दी. तो इसमें डीएलएफ को क्या फायदा हुआ डीएलएफ ने ऐसा क्या किया रॉबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ को क्या फायदा पहुंचाया ये कई सारे प्रश्न हैं.



वाड्रा का बिजनेस

राजनीति से दूर और बिजनेस में मशगूल रहने वाले रॉबर्ट वाड्रा ने साल 2007 और 2008 में पचास लाख की पूंजी से पांच कंपनियां शुरु की. और रीयल एस्टेट के धंधे में उतर गए थे लेकिन अरविंद केजरीवाल ने स्काई लाइट हास्पिटालिटी प्राइवेट लिमिटेड समेत रॉबर्ट वाड्रा की पांच कंपनियों के बही खातों पर सवाल खडे किए थे और जमीनों से जुड़े यही इल्जाम आज भी रॉबर्ट वाड्रा का पीछा कर रहे हैं.
रियल स्टेट कंपनी डीएलएफ के साथ जिस जमीन सौदे को लेकर रॉबर्ट वाड्रा फिर सुर्खियों में हैं उस जमीन सौदे को आईएएस ऑफिसर अशोक खेमका ने रद्द कर दिया था. हरियाणा सरकार को उन्होंने अपनी जो रिपोर्ट सौंपी थी उसमें भी कहा गया था कि रॉबर्ट वाड्रा ने जमीन सौदे के लिए दस्तावेज में हेराफेरी की थी.
अशोक खेमका का कहना है कि देखिए एक दिन में सात करोड़ अगर 58 करोड़ बन जाए तो मुझे बताइए कि किस नैतिकता से किस कानून नीति के आधार पर कि सिर्फ सरकार के एक लाइसेंस से साढ़े साल 58 करोड़ बन जाए वो कैसे सही हो सकता है. फरवरी में जमीन खरीदी गई साढ़े सात करोड़ की सौदा तुरंत कट गया 58 करोड़ का तो साढ़े सात का 58 होना आपको नहीं लगता कि इसमें कुछ गलती है कुछ प्रॉबलम है.
रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच जमीन सौदे की जांच के आदेश देने वाले आईएएस अफसर अशोक खेमका का तबादला 11 अक्टूबर 2012 को सीड विकास निगम में कर दिया गया था. लेकिन उन्होंने जाते-जाते रॉबर्ट वाड्रा औऱ डीएलएफ के बीच हुई डील में ही पेंच डाल दिया था. खेमका ने खुलासा किया था कि 12 फरवरी 2008 को रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ने गुडगांव जिले के शिखोहपुर में 3.5 एकड़ जमीन 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी जिसे इसी साल 18 सितंबर को डीएलएफ को 58 करोड़ में दोबारा बेच दिया गया.
आरोप है कि म्यूटेशन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई और म्यूटेशन ऐसे अधिकारी ने किया जिसके पास इसका अधिकार ही नहीं था. लेकिन वाड्रा- डीएलएफ के बीच जमीन के इस सौदे के पीछे का खेल कुछ और भी है.


कैसे साढे सात करोड महज दो महीने में 58 करोड़ बन गए समझिए खुद खेमका की ज़ुबानी जमीन सौदे के इस खेल की ये कहानी.
अशोक खेमका का कहना है कि कृषि भूमि का जो भूमि परिवर्तन दिया जाता है या लाइसेंस दिया जाता है कालोनाइजेशन के लिए उसमें भी सस्ते घर नहीं बनते. क्योंकि भूमि अधिग्रहण होते हैं. लोगों को सस्ते घर नहीं मिलते और ना ही सरकार को अपना पूरा राजस्व मिलता है. तो ऐसी नीति होनी चाहिए कि जिसमें की लाइसेंसिंग ऐसी होनी चाहिए कि उसका जो प्रीमियम है वो कम से कम हो और उसका जो पूरा फायदा है जो कृषि योग्य भूमि से नान एग्रीकल्चर यूज में जो कनवर्ट होती है उसका जो पूरा प्रीमियम है या पूरा फायदा जो है वो या तो उपभोक्ता को मिले या फिर सरकार के राजस्व में जाए बिचौलियों को जो मुनाफा मिलता है वो कम से कम होना चाहिए. हमें इस सारी डील से बस एक ही सीख यही मिलती है.
अशोक खेमका जो बात कही वो सीधे रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच हुई डील की गहराई तक पहुंचती है. दरअसल खेमका ने अपनी रिपोर्ट में भी कहा था कि रॉबर्ट वाड्रा ने शिखोहपुर की जमीन पर हाउसिंग कालोनी बनाने का जो लाइसेंस टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से लिया था वो बिक नहीं सकता था लेकिन वो लाइसेंस जमीन के साथ ही डीएलएफ को बेच दिया गया.
अशोक खेमका का कहना है कि लाइसेंस लेना या फिर उसे रिनिव्यू कराना या फिर उसे आगे बेचना एक दूसरे एक्ट से गवर्न है जो टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट का है. लेकिन अगर कोई लाइसेंस लेता है तो वो एक एप्लीकेशन देता है कि मैं एक कालोनी बनाउंगा और इसके लिए मेरे पास वित्तीय संसाधन हैं. तो अगर वो अपने वादे के मुताबिक आचरण ना करे तो कार्रवाई होनी चाहिए. और अगर विभाग ने बगैर ऐसे किसी वादे के लाइसेंस दिया है तो विभाग के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के जीडी टी सी गुप्ता का कहना है कि उन्होंने जो अपने आर्डर के अंदर जो टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेटं के बारे में टिप्पणी की है. वो तथ्यों से परे है उसके अंदर बिल्कुल तथ्य गलत लिखे हुए हैं. उसके अंदर कानूनी रुप से बहुत खामियां है तथा ये एडमिनस्ट्रेटिव प्रोप्राइटी का उलंघन है. इसीलिए मैंने मुख्य सचिव महोदय को जो सारी चीजें है जो फैक्ट हैं जो लीगल पोजीशन है वो सारी चीज लिखकर ये अनुरोध किया है कि उनहोंने जो आरोप लगाए है उसके जांच के लिए जो समिति बनाई है उसी समिति के पास में हमारा ये लेटर भेज दिया जाए हमारे सारे रिकार्ड देख लिए जाएं.
दरअसल वाड्रा को शिखोहपुर की जमीन पर हाउसिंग कालोनी बनाने के लिए मार्च 2008 में ही हरियाणा के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से लाइसेंस मिल गया था. लेकिन लाइसेंस मिलने के 65 दिन बाद ही उन्होंने डीएलएफ को 58 करोड में ये जमीन बेच दी जिसका जून 2008 में ही उन्हें पांच करोड बयाना भी मिला. और जब जुलाई 2012 में वाड्रा को डीएलएफ ने पूरी रकम चुका दी तो सितंबर 2012 में उन्होनें जमीन डीएलएफ के नाम ट्रांसफर करा दी.
अशोक खेमका का कहना है कि सरकार के पास लाइसेंस देने का एक राइट है तो आप जमीन खरीदिए. या जमीन सरकार से ट्रांसफर कराइए, लाइसेंस लीजिए औऱ उसको पैकेज के रुप में बिजनेस माडल बनाकर आगे बेचें तो मुनाफा किसने खाया. उपभोक्ता को तो नहीं मिला मुनाफा सस्ते घर के रुप में. कितने लोग हैं जो झुग्गी झोपडी में रहते हैं. कोई ऐसा लाइसेंस पचास करोड़ के पैंट हाउस के लिए भी नहीं होता, कोई हाउसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर थोडे ना है. हाउसिंग इनफ्रास्ट्रेक्चर होता है इडब्ल्यूएस हाउजिंग. गरीब लोगों के लिए हासिंग होती है अगर सरकार जमीन दे लाइसेंस दे तो आप गरीबों के लिए हाउसिंग बनाइए.
पंद्रह अक्टूबर 2012 को अशोक खेमका ने रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच 3.53 एकड़ जमीन का सौदा रद्द कर दिया था. आईएएस अफसर अशोक खेमका ने वाड्रा की कंपनी के उस साढ़े सात करोड़ की रकम पर भी सवाल उठाए थे जिससे साढ़े तीन एकड़ जमीन खरीदी गई थी. खेमका का सवाल था कि कंपनी के पास जमीन खरीदने के लिए साढ़े सात करोड़ कहां से आए थे. खेमका को शक था कि कंपनी ने अपने पैसे से जमीन नहीं खरीदी थी. खेमका की आपत्तियों पर अब सीएजी ड्राफ्ट रिपोर्ट की मुहर लगती है. और इसीलिए रॉबर्ट वाड्रा का हरियाणा जमीन सौदे को लेकर पूछे गए सवाल पर ऐसा रिएक्शन उनकी बढती परेशानी को बयान कर रहा है.

राज्यसभा को लेकर बहुगुणा खेमें की बढ़ी दुश्वारियां


राजेन्द्र जोशी
राज्यसभा की उम्मीदवारी का नामांकन दस नवंबर तक होना है इसलिए पार्टी जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहती वहीँ मुख्यमंत्री हरीश रावत भले ही राज्य सभा के लिए कौन उपयुक्त है पर न बोलें लेकिन कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति में दखल रखने वाले प्रदेश अद्यक्ष किशोर उपाध्याय को राज्यसभा में भेजने के पक्षधर हैं,इसके पीछे उनका तर्क भी वाजिब है कि प्रदेश अद्यक्ष किशोर को यदि राज्यसभा में भेजा जाता है तो इससे पार्टी को ही फायदा होगा क्योंकि राज्यसभा में पहुँचने पर उनको जहाँ एक तरफ सरकारी सुविधाएँ मिलेंगी जिनका प्रयोग संगठन के हित में किया जा सकता हैवहीँ उनका कहना है कि विजय बहुगुणा वैसे भी राज्य विधानमंडल के सदस्य हैं ऐसे में उनको राज्यसभा भेजने से राज्य में जहाँ सितारगंज विधानसभा की सीट रिक्त होगी वही मोदी लहर के चलते यह तय नहीं है कि उपचुनाव में यह सीट एक बार फिर कांग्रेस की ही झोली में जाये. वही ऐसे में राज्य विधानमंडल में कांग्रेस की पीडीएफ पर निर्भरता बढ़ जाएगी ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के होते हुए पीडीएफ सरकार को जैसे चाहे ब्लैक मेल करेगी.
   वहीं बहुगुणा कैंप ने विजय बहुगुणा की उम्मीदवारी कटने पर लखनऊ कैंट से विधायक और उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी का नाम उछाला है यह सब हरीश रावत कैंप को राजनीतिक पटखनी देने के उद्देश्य से किया जा रहा है जबकि रीता बहुगुणा जोशी का उत्तराखंड की राजनीति में कोई महत्वपूर्ण स्थान नही हैसूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बहुगुणा कैंप यह केवल इसलिए करना चाहता है कि उनकी कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गाँधी से नजदीकियां है और यही ऐसे में उत्तराखंड से राज्यसभा के लिए यदि उनका नाम आया तो वे मना नही कर पाएंगी.लेकिन उनके नाम पर राज्यवासी सहित कांग्रेस के अधिकांश विधायक तैयार नहीं हैंकई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का खाना है जब पैराशूट प्रत्याशी ही राज्यसभा के लिए मैदान में उतरना है तो कांग्रेस के वरिष्ठ  नेताओं में गुलाम नवी आजाद अथवा अम्बिका सोनी जैसे लोगों को उतारा जा सकता है. वहीँ राज्यसभा की इस लडाई में अब एक और नाम सामने आया है वह है राहुल गाँधी के नजदीकी प्रकाश जोशी का. प्रकाश जोशी वर्तमान में  कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं। ऐसे समय में प्रकाश जोशी का नाम सामने आने से बहुगुणा खेमे की पुख्ता दावेदारी को करारा झटका लगा है वहीँ राज्यसभा उम्मीदवारी को लेकर केंद्रीय नेतृत्व भी पशोपेश में है।
  कांग्रेस को अपना उम्मीदवार जिताने के लिए 36 विधायकों की आवश्यकता है। कांग्रेस को सात अन्य सहयोगी विधायकों का भी समर्थन है। उस हिसाब से कांग्रेस के पास 43 विधायकों  की पर्याप्त संख्या हैलेकिन कुल तीन या चार विधायक जिनमें सुबोध उनियाल,विजय पाल सजवाणविक्रम सिंह नेगी व शेलेन्द्र मोहन सिंघल ही बहुगुणा के खासे करीब हैजबकि लगभग आठ विधायक ढुलमुल की स्थिति में हैं जो न तो हरीश रावत के साथ हैं और ना ही विजय बहुगुणा के साथ हैं जो कांग्रेस आलाकमान द्वारा प्रत्याशी घोषित होने पर संगठन के साथ मतदान करेंगे. वहीँ मंत्रियों में हरक सिंह रावतप्रीतम सिंह और यशपाल आर्य की किन्हीं कारणों से मुख्यमंत्री से नाराज बताये जा रहे हैं है। जबकि  विधायकों में राजेंद्र भंडारीअमृता रावतअनुसुइया प्रसाद मैखुरी सतपाल महाराज खेमे के होने के कारण न तक बहुगुणा खेमे के साथ ही खुलकर आ रहे हैं और न ही मुख्यमंत्री खेमे के सामने.
  वहीँ कुछ विधायकों के सामने आगामी दिनों में जहाँ स्वयं को मंत्री पद व अपने समर्थकों को सरकार में एडजस्ट करने का भी दबाव है ऐसे में वे जहाँ खुलकर मुख्यमंत्री खेमे का विरोध नहीं कर सकते वहीँ दुसरे खेमे में भी जाने की नहीं सोच सकते वे केवल दिखावे के लिए दोनों तरफ नज़र आ रहे हैं ताकि पासा पलटने पर उनकी हर खेमे में पेशबंदी रहे. वहीँ बहुगुणा की कुर्सी छिनने के गम से ग़मज़दा बहुना कैंप से जुड़े विधायक इस बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं कि राज्यसभा की उम्मीदवारी किसी भी कीमत पर सीएम कैंप के पास न जा पाए।
   

गढ़वाल मण्डल विकास निगम में पर्यावरण अध्ययन के नाम पर करोड़ों का वित्तीय घोटाला

एक ही प्रकृति के दो कार्यों के लिए अलग -अलग दरें वह भी करोड़ों में 

राजेन्द्र जोशी
  उत्तराखंड ही शायद देश का एक मात्र ऐसा राज्य होगा जहाँ राज्य सरकारों के विभागों में तालमेल की भारी कमी है वह भी एक जैसे प्रकृति के कार्यों पर जहाँ एक विभाग करोड़ों खर्च करता है तो उसकी काम के लिए दूसरा विभाग भी उस पर करोड़ों उड़ा डालता है जबकि यदि इनमे आपसी तालमेल होता तो एक ही विभाग के पैसे से दोनों का काम चल सकता था लेकिन मितव्यता ही और किसी का ध्यान नहीं गया.
उल्लेखनीय है कि विभिन्न सरकारी एजेंसियो द्वारा नदी तल उपखनिज लाटों के पर्यावरणीय स्वीकृतिया प्राप्त होने के उपरांत  खनन शुरू कराया गया है । नियमों के अनुसार प्रत्येक छः माह की कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार कर पर्यावरण के संबन्धित कार्यालयों को भेजनी पड़ती है।
  एक जानकारी के अनुसार विगत वर्ष 2013  वन विकास निगम ने अपने स्वीकृत 18 खनन लाटों के लिए कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार करने हेतु कंसल्टेंट का चयन करने हेतु टेंडर प्रक्रिया अपनाते हुए मैसर्स ज़ी आर सी (रि एंड क्री) प्रा॰ लि॰ नोएडा का चयन किया था जिसे  विभिन्न जिलों  में  स्थित 18 खनन लाटों  के  कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार करने के लिए डेढ़ लाख रुपये प्रति लाट प्रति वर्ष  की दर से  तीन वर्षों के लिए लगभग 81 लाख में ठेका दे दिया गया।
 वहीँ वर्ष 2014 में सरकार की ही दूसरी एजेंसी गढ़वाल मण्डल विकास निगम द्वारा भी समान कार्य के लिए अपने स्वीकृत 102 लाटों के लिए कमप्लायन्स  रिपोर्ट तैयार करने हेतु कंसल्टेंट का चयन करने हेतु  शॉर्ट टर्म टेंडर प्रक्रिया अपनायी  जिसमे तीन कंपनियो ने भाग लिया. इस टेंडर प्रक्रिया में दो कंपनियो के निविदाओं में न तो टेंडर फीस थी और न ही धरोहर राशि जमा की गयी थी अतः दोनों कंपनियों के टेंडर प्रथम चरण में ही निरस्त हो गए थे मात्र एक टेंडर  से ही सारी प्रक्रिया सम्पन्न कर ली गयी और  मै॰ ज़ी आर सी (रि एव क्री) प्रा॰ लि॰ नोएडा का चयन किया गया  जिसे  पाँच हेक्टेयर  से कम के लाटों के लिए 2.40 लाख रुपये प्रति वर्ष व पाँच हेक्टेयर से पचास हेक्टयर तक के लाटों के लिए 3.04 लाख रुपये वर्ष एवं पचास हेक्टेयर से अधिक  के लाटों के लिए 3.40 लाख रुपये प्रति वर्ष  की दर से पाँच वर्षों के लिए लगभग 15.0 करोड़ रुपये  में कांट्रैक्ट किया गया।
 इन निविदाओं के बाद यह बात आमने आई कि एक ही प्रकृति के कार्यों के लिए आमंत्रित निविदाओ में आखिर निविदा दरों में इतना बड़ा अन्तर कैसे हो गया जबकि यह कार्य गढ़वाल मण्डल विकास निगम यदि वन विकास निगम  की दरों के हिसाब से मात्र रु 1.53 करोड़ रुपये वर्ष की दर से  पाँच वर्ष के लिए मात्र 7.65 करोड़ रूपए में करा सकता था। इससे यह साफ़ है कि  इस कार्य में लगभग 7.35 करोड़ का घोटाला किया गया है।
 वहीँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब सामान प्रकृति के कार्य जब वन विकास निगम व गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा करवाए जा रहे थे तो गढ़वाल मंडल विकास निगम ने वन निगम की दरों का संज्ञान क्यों नही लिया जबकि यदि संज्ञान लिया जाता तो करोड़ों रुपये बचाए जा सकते थे. यहाँ सबसे चौकांने वाली बात तो यह है कि वन विकास निगम के लाटों का क्षेत्रफल गढ़वाल मण्डल विकास निगम के लाटों के क्षेत्रफल से बहुत अधिक है फिर भी वन विकास निगम  कि दरें कम है जबकि गढ़वाल मण्डल विकास निगम दरें अविश्वसनीय रूप से दुगनी या उससे भी अधिक है इससे यह साफ़ है कि इस प्रक्रिया में बड़ा घोटाला किया गया है वह भी जानबूझकर. इतना ही नहीं यह बात भी समझ से परे है जब एक ही प्रकृति के कार्य एक की निविदादाता से करवाया गया तो फिर भी समान कार्य के लिए दरों में इतना भारी अंतर क्यों ? इसका गढ़वाल मण्डल विकास निगम के पास कोई जवाब नही है.
 मामले में घोटाले की बू तब साफ़ आती है जब गढ़वाल मण्डल विकास निगम द्वारा अपनायी गयी टेंडर प्रक्रिया में जब दो कंपनियों के टेंडर प्रथम चरण में ही निरस्त हो गए थे तो केवल एक टेंडर को खोलने के बजाय टेंडर प्रक्रिया निरस्त क्यों नहीं कि गयी. इसमी यह शंका भी साफ़ है कि कहीं ऐसा तो नहीं था कि निविदा में शामिल अन्य दो कंपनीयों को केवल दिखावे के लिए अथवा कागजी खानापूर्ति के लिए तो नहीं रखा गया था क्योंकि यह कैसे संभव है कि कोई कंपनी टेंडर प्रक्रिया में भाग ले और  धरोहर राशि  और यहाँ तक कि टेंडर फीस  तक जमा करना भूल जाए। इस निविदा प्रक्रिया में भाग लेने वाले संस्थान की निविदा दरें एक विभगा के लिए कुछ और, और दूसरे विभाग के लिए कुछ और यानि गढ़वाल मण्डल विकास निगम में निविदा के बाद स्वीकृत दरें ही सारी कहानी खुद बयान कर रही है कि मामले में कोई बड़ा घोटाला हुआ है। इस सारी प्रक्रिया के बाद अब मांग उठने लगी है कि सरकार इस सम्पूर्ण निविदा प्रक्रिया को निरस्त कर घोटाले की उच्च स्तरीय जांच करे तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करे।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

पलायन रोकने में कारगर साबित होगी झील : हरीश रावत

टिहरी झील से होंगे पेरिस,पोखरा गोवा और डल झील के दर्शन

राजेन्द्र जोशी

टिहरी बाँध ने जिस तरह से गंगा का पानी रोक दिया है ठीक वैसे ही प्रदेश सरकार इस बाँध के अथाह जल को रोज़गार से जोड़कर पलायन को भी रोकना चाहती है, यदि सरकार की योजना परवान चढ़ी तो वह दिन दूर नहीं जब टिहरी बाँध जिसे प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने श्रीदेव सुमन सागर का नाम दिया है, उसमें पेरिस ही नहीं बल्कि गोवा व कश्मीर की डल झील में चलते हुए शिकारे व हाउस बोट के दीदार होंगे जिसमे सैर करने को दुनिया तरसती है. पेरिस  की तर्ज पर यहाँ सैलानियों को जलक्रीडा के लिए वाटर स्कूटर तो चलेंगे ही साथ ही पॉवर बोट के पीछे रस्सी के सहारे वाटर सर्फिंग के नज़ारे भी देखने को मिलेंगे, गोवा व समुद्र के किनारे स्थित उत्तरपूर्वी देशों की तर्ज पर बड़े-बड़े तैरते रेस्टोरेंट व मरीना तो इस सरोवर में दिखाई ही देंगे साथ ही लॉस वेगास की तर्ज पर कैसिनो को खोलने की भी सरकार की योजना है. नेपाल के पोखरा की तर्ज पर सैलानियों को हिमालय दर्शन जहाँ हवाई जहाज व हेलीकाप्टर से कराने की सरकार की योंजना है तो इस सरोवर से सी प्लेन उड़ाने के सपने भी सरकार देख रही है, इतना ही नही इस सरोवर में क्रूज चलाकर सैकड़ों बेरोजगारों को स्वरोजगार से भी जोड़ने की सरकार की योजना है.
  प्रदेश सरकार इस श्री देव सुमन सरोवर के चारों तरफ की 45 हज़ार हेक्टेयर भूमि को विश्व स्तरीय पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना चाहती है इसके लिए सरकार ने डीपीआर तैयार कर दी है, इस योजना के तहत झील के चरों तरफ एक रिंग रोड का निर्माण किया जायेगा जिस पर कई इस तरह के स्थान चिन्हित होंगे जहाँ विभिन्न तरह की पर्यटन गतिविधियाँ की जाएँगी, पर्यटन सचिव उमाकांत पंवार के अनुसार राज्य सरकार ने इसके विकास के लिए एक महायोजना तैयार कर ली है, क्योंकि अभी शुरुआती दौर में ही इसकी योजना ठोस होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस इलाके अनियंत्रित निर्माण न हो जिनकी वजह से इसकी ख़ूबसूरती पर कोई प्रभाव न पड़े. उन्होंने बताया कि पर्यटन विभाग इन सभी योजनाओं के लिए सिंगल विंडो योजना शुरू करेगा ताकि यहाँ निवेश करने वालों को कोई परेशानी न हो,
 पर्यटन सचिव उमाकांत पंवार ने बताया कि उनका उद्देश्य यहाँ की संस्कृति को संजोकर रख पर्यटन विकास की है ताकि देश विदेश से आने वाले पर्यटक यहाँ की संस्कृति से रूबरू भी हो सकें, उनका कहना है कि टिहरी एक ऐतिहासिक शहर था लिहाज़ा पर्यटकों  को यहाँ के इतिहास की जानकारी होनी जरुरी है, उन्होंने बताया यहाँ ग्रामीण पर्यटन को विकसित करके स्थानीय ग्रामीणों को स्वरोजगार से जोड़ने की भी सरकार की योजना है, इतना ही नहीं सरकार चाइना व ऋषिकेश की तर्ज पर यहाँ स्वास्थ्य पर्यटन को भी बढ़ाना चाहती है, सरकार की योजना है कि सरोवर इलाके के ऊँचाई वाले स्थानों को केबल कार व रोपवे से जोड़ा जाये ताकि पर्यटन से और भी रोज़गार प्राप्त हो सके.  वहीँ 44 वर्ग किलोमीटर की इस झील में जितने भी साहसिक खेल होते हैं प्रदेश सरकार उनको भी यहाँ करने की योजना बना रही है. इसके लिए देश विदेश के पर्यटन उद्योग में काम करने वाले लोगों व कंपनियों से सरकार बात कर रही है. इतना ही नहीं इस इलाके को हवाई सेवा से जोड़ने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने चिन्यालीसौड़ हवाई अड्डे को विकसित करने जा रही है जो अगले अक्टूबर तक तैयार हो जायेगा. इससे अस्तित्व में आने के बाद देश व विदेश से हवाई सेवा होने से समय की बचत भी हो सकेगी जिसका सीधा लाभ पर्यटकों को मिलेगा. टिहरी सरोवर में आयोजित हुए दो दिवसीय साहसिक खेलों के आयोजन से सरकार सहित स्थानीय युवाओं में उम्मीदें जगी हैं जिसका लाभ बेरोजगारों के साथ ही यहाँ के पर्यटन को भी मिलेगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है. 

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

देवभूमि मीडिया: आखिर ऋषिकेश और उत्तरकाशी में ट्रामा सेंटर में आखिर...

देवभूमि मीडिया: आखिर ऋषिकेश और उत्तरकाशी में ट्रामा सेंटर में आखिर...: एक्सक्लूसिव स्टोरी ---- अपने-लाभ-के-लिए-खरीद-नीति-ही-बदलने-पर-आमादा-चर्चित-नौकरशाह-‘’राका’’ सीटी स्कैन मशीनों का इंतजार करते ट्राम...

हिमालय क्षेत्र में संतुलित विकास की आवश्यकता

उत्तराखंड में 337 गांव विस्थापन के लिए चिन्हित

राज्य स्तरीय पुनर्वास आधारित जनपैरवी कार्यशाला आयोजित

देव भूमि मीडिया ब्यूरो  

देहरादून । जनदेश स्वैच्छिक संगठन, उत्तराखंड जन कारवां मंच और नदी बचाओ अभियान द्वारा राज्य स्तरीय पुनर्वास आधारित जनपैरवी कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में दिल्ली के वरिष्ठ लेखक और वैज्ञानिक प्रभु नारायण ने कहा कि हिमालय क्षेत्र में निरंतर जलवायु परिर्वतन के कारण सूखा, बाढ़, भू-स्खलन, बादल फटने की स्थिति बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र में संतुलित विकास की आवश्यकता है। 
      द्रोण होटल में आयोजित इस कार्यशाला में प्रभु नारायण ने कहा कि यहां पर्यावरणीय पहलू के साथ लोक विज्ञान को महत्व दिया जाना जरूरी है। निरंतर दैवीय आपदा की घटनाओं को देखते हुए यहां के विकास के लिए अलग नीति निर्माण की आवश्यकता है। हिमालय पूरे दुनिया की जलवायु को नियंत्रित करता है। निरंतर बर्फ पिघलने की घटना, सूखा, बाढ़, की स्थिति आने वाले समय बड़ी आपदा का आमंत्रण है। इससे आपदा के न्यूनीकरण जनआधारित पुनर्वास के मुद्दे पर गंभीरता से एक नीति के साथ ढांचागत विकास का विकेंद्रित स्वरूप से विचार रखा। उन्होंने कहा कि हिमालयी राज्यों में सशक्त सूचना तंत्र की प्रणाली विकसित करने की जरूरत है। मौसम विभाग, विज्ञान प्रौद्योगिकी, आपदा सेना, पंचायतों, आपदा प्रबंधन तंत्र के बीच सक्रिय समन्वय बेहद जरूरी है। 
     कार्यशाला में जनदेश संस्था के सचिव लक्ष्मण सिंह नेगी ने कहा कि उत्तराखंड की जन आधारित पुनर्वास नीति नहीं है। आज संपूर्ण उत्तराखंड में 337 गांव विस्थापन के लिए चिन्हित किए गए हैं, जिसमें चमोली में 61, बागेश्वर में 42, पौड़ी में 26, पिथौरागढ़ में 126, टिहरी में 26, अल्मोड़ा में 9, नैनीताल में 6, उत्तरकाशी में 8, देहरादून में 2, रूद्रप्रयाग में 16 और उधमसिंहनगर में 1 गांव पुनर्वास के लिए चिन्हित हैं। इन गांवों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन राज्य बनने के 14 वर्षों बाद भी राज्य की नीतियां नहीं होने के कारण उनका पुनर्वास नहीं हो पा रहा है। राष्ट्रीय आपदा नीति में भी सुधार की आवश्यकता है। ग्राम स्तर पर भी आपदा कोष पंचायत में होना चाहिए, जिसमें 1.50 की रकम होनी चाहिए, इसके अलावा जलनीति, वन नीति, महिला नीति, पंचायत नीति, भू नीति, जनपक्षीय कृषि नीति नहीं होने के कारण भी आपदा पुनर्वास के कार्य नहीं हो रहे हैं। शीघ्र ही सरकार को नीतियां घोषित करनी चाहिए।

     उत्तराखंड जन कारवां के राज्य समन्वयक दुर्गा प्रसाद कंसवाल ने राष्ट्रीय पुनर्वास नीति के बारे में बताया। राज्य आंदोलनकारी बहादुर सिंह रावत ने कहा कि राज्य में कृषि भूमि के वर्तमान में कोई सही आंकड़े नहीं हैं। शीघ्र पैमाइश होनी चाहिए, जिससे सही रूप से पुनर्वास हो सकें। जनदेश के सहसचिव हरीश परमार ने कहा कि वन नीति राज्य की नहीं होने के कारण पुनर्वास जैसी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। बीज बचाओ आंदोलन के विजय जड़धारी ने कहा कि शहरों में भी लोग अधिकांश नदी, नालों, के किनारे घर बना रहे हैं, जिससे बारिश के समय भारी नुकसान हो रहा है। गांवों में बुनियादी सुविधा के अलावा लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, जिससे शहर में आ रहे हैं। कार्यशाला में दिनेश लाल, विनीता देवी, गुरुकुली देवी, राकेश अग्रवाल, कल्याण सिंह रावत, सतेश्वरी देवी, शकुंतला देवी आदि ने भी विचार रखे।

आखिर ऋषिकेश और उत्तरकाशी में ट्रामा सेंटर में आखिर क्यों नहीं लग पाई सीटी स्कैन मशीन!

एक्सक्लूसिव स्टोरी ----

अपने-लाभ-के-लिए-खरीद-नीति-ही-बदलने-पर-आमादा-चर्चित-नौकरशाह-‘’राका’’

सीटी स्कैन मशीनों का इंतजार करते ट्रामा सेंटर

मुख्यमंत्री की घोषणा को भी नही तवज्जो

राजेन्द्र जोशी
हर खरीद में कमीशन, हर काम में कमीशन, हर नौकरी में रिश्वत, हर ट्रान्सफर में घूसखोरी, हर भुगतान पर डाका ,न्यायालयों के आदेशों से बेपरवाह और काम के मामले में जमकर हरामखोरी, बिना -लिए दिए यहाँ कोई काम हो हो गया तो समझो आप भाग्यशाली हैं..   यह है उत्तराखंड का सच. जिसको स्वीकार करने में आज किसी भी उत्तराखंडी को शायद कोई हर्ज़ नहीं होगा.....राज्य के एक चर्चित नौकरशाह ने तो इस राज्य को घोटाला प्रदेश बना डाला है आखिर राज्य के निर्माण को लेकर अपनी जान न्योछावर करने वाले शहीद भी स्वर्ग में क्या सोचते होंगे कि क्या इसी प्रदेश के लिए हमने अपने प्राण दिए थे....
  यह मामला राज्य के सबसे ज्यादा आपदा ग्रस्त उत्तरकाशी व ऋषिकेश का है जहाँ पर मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद दो ट्रामा सेंटर बनकर तैयार है लेकिन वहां पिछले छह माह से इंतजार हो रहा है सीटी स्कैन मशीनों का, स्वास्थ्य निदेशालय ने इसके लिए टेंडर भी काफी पहले कर दिए थे ताकि ट्रामा सेंटर बनते ही वहां मशीनें भी लग जाएँ और प्रदेश के जनता सहित देश के लोगों को इस सुविधा का लाभ भी मिलने लगे..लेकिन एक चर्चित अधिकारी ’’राका’’ ने यहाँ भी पेंच फंसा दिया है हालाँकि स्वास्थ्य विभाग उनके पास नहीं है लेकिन वित्त विभाग का सर्वे सर्वा होने के चलते राज्य के लगभग सभी विभागों पर उनकी पकड़ है क्योंकि हर वित्तीय स्वीकृति उन्ही के द्वारा की जाती है .दूसरी भाषा में यदि कहा जाये तो वे उत्तराखंड के कुबेर की भूमिका में हैं.
  सीटी स्कैन की मशीनों का उत्पादन भारत में नहीं होता है यदि होता भी है तो वो केवल एसम्बलिंग का काम,बहुतायत में ऐसी मशीने विदेशों से ही मंगाई जाती हैं जिनका मार्केटिंग विभाग दिल्ली से कार्य करता है और इनकी कीमत भी करोड़ों में होती है तो कमीशन भी लाखों में होता है. राज्य सरकार के स्वास्थ्य बिभाग को लगा कि उत्तरकाशी व ऋषिकेश सहित अल्मोड़ा व पिथोड़ागढ़ में इन मशीनों को लगाया जाना चाहिए. पहले गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी व ऋषिकेश में इन मशीनों को लगाने की योजना बनायीं गयी क्योंकि उत्तरकाशी तो वैसे भी आपदाग्रस्त एरिया में आता है जबकि ऋषिकेश गढ़वाल का बेस सेंटर पड़ता है किसी भी ट्रोमा या एक्सीडेंटल केस में सबसे पहले सिटी स्कैन ही कराया जाता है इसलिए जीवन रक्षक उपकरण होने की वजह से दोनों ही जगह इस मशीन का होना बहुत ही ज़रूरी था , इसलिए वर्ष 2013 -14 वितीय वर्ष में दो सिटी स्कैन की मशीन की खरीद के टेंडर आमंत्रित किये गये.  दो -दो बार टेंडर करने के बाद जब दो कंपनियों ( ERBIS तोशिबा जापान एवं  विप्रो GE USA ) के वितीय दरों का पत्र मार्च 2014 में खोला गया , जिसमे एर्बिस के दर  विप्रो GE  से कम आये स्वास्थ्य महानिदेशालय ने मार्च 2014 में ही निविदा की इस फाइल को स्वीकृति के लिए सचिवालय भेज दिया. चर्चा यह है कि यह फाइल चर्चित अधिकारी की जिद की वजह से वित्त विभाग में ही अटक गई और इस पर बिना सिर पैर की आपतियां लगती रही. अपने इस इंटरेस्ट की वजह से इन्होने कोई भी  ठोस कारण न होते हुए फाइल को न तो स्वीकृत किया और न ही रिजेक्ट ..जबकि इसी फाइल में  दूसरी आइटम फिजियोथेरेपी की भी है पर सिटी स्कैन मशीनों के खरीद में पेंच फंस जाने के कारण वह भी नही हो पा रही है. एक जानकारी के अनुसार इस चर्चित अधिकारी की धींगामुश्ती तो देखिये पहले उन्होंने यह जिद पकड़ी कि स्वास्थ्य महानिदेशालय में तैनात CMSD (केंद्रीय स्टोर निदेशक) निदेशक डॉ आर्य को हटाया जाय तो फिर सीटी स्कैन मशीनों की फाइल स्वीकृत करूँगा लेकिन जब स्वास्थ्य निदेशालय से बिना वजह निदेशक को हटाया गया तो उसके बाद भी यह स्वीकृति नहीं मिली और नतीजा शून्य रहा और अब यह चर्चित अधिकारी इस बात पर अड़े हुए है कि वर्ष 2007 -08  की खरीद नीति पुरानी हो गयी है और यह खरीद नीति गलत है और अब उसको परिवेर्तन करने की जिद पर अड़े है अब नयी खरीद नीति बनाये जाए. जबकि उस खरीद नीति में अब तक कोई भी कमी सामने नहीं आई है और न ही अब तक किस्सी भी विभाग ने इस पर ऐतराज़ ही किया है.
  सारा मामला यह है कि जिस सीटी स्कैन कंपनी को यह चर्चित अधिकारी खरीद का आदेश दिलवाना चाहते हैं वह राज्य सरकार की खरीद नीति के पैमाने पर फिट नहीं बैठती और वह येन-केन-प्रकारेण GE को यह आदेश दिलवाना चाहते हैं.
सबसे मजेदार और हैरान कर देने वाला यह मामला बीते दिन मुख्यमंत्री की विधानसभावार बैठक में जब गंगोत्री के विधायक विजयपाल सजवाण ने यह मामला उठाया तो प्रमुख सचिव स्वाथ्य ने भी यहाँ झूठ बोल दिया और  बताया कि यह मामला काफी पुराना हो गया है अब सिटी स्कैन का नया टेंडर करवाया जायेगा लेकिन वे यह नहीं बता पाए कि आखिर सीटी स्कैन मशीन खरीद में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है और क्यों .लेकिन इस मामले में यह भी जानकारी सामने आई है कि राज्य के इन चर्चित अधिकारी को भनक लग गयी थी कि यह मामल उठाना वाला है लिहाज़ा उन्होंने प्रमुख सचिव स्वास्थ्य व अपर सचिव स्वास्थ्य को इस मामले में कुछ भी न बोलने के निर्देश दे दिए थे. इस मामले के बाद यह बात सामने आई है कि राज्य का यह चर्चित अधिकारी अपने से नीचे वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को धमका कर और ऊपर वालों को झूठ बोल कर इस देव भूमि को अपनी मन मर्ज़ी से चला कर  तबाह कर रहा है ...   

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

राका का खनन का खेल,देखिये किस -किस से है उसका मेल

हरीश रावत जैसे जमीनी नेता पर कहीं उत्तराखंड का ‘’यदुरप्पा’’ का टैग न लग जाए

राजेन्द्र जोशी
राका’’ नए गेम को धरातल में क्रियान्वयन की तैयारी में है इस बार उसका गेम काफी बड़ा लगता है। राका ने प्रदेश के खनिज भंडारों को हथियाने की तैयारी पूरी कर ली है जिसमे उसके कुछ साथी जिनमे एक टी वी चैनल का पत्रकार तथा दूसरा हरियाणा का खनन माफिया जो अभी अभी भाजपा में शामिल चौधरी वीरेन्द्र सिंह का करीबी बताया जाता है तथा खनन विभाग का एक अधिकारी शामिल है। एक जानकारी के अनुसार इस उद्योग पति ने खनन विभाग के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर विगत एक वर्ष में प्रदेश के लगभग सारे खनिज क्षेत्रों की सूक्ष्म जानकारियाँ एकत्रित कर ली है। जिनमे जनपद वागेश्वर के क्षेत्र में 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के सोपस्टोन भंडार, चमोली जनपद के घाट इलाके के सोप स्टोन के भंडार, जनपद उत्तरकाशी के सिलिका सेंड भंडार जनपद अलमोड़ा के धातु भंडार तथा जनपद देहारादून,टिहरी के चूना पत्थर भंडार शामिल है। इस गुट ने प्रदेश् में जहां जहां भी जल विधयुत परियोजना निर्माणाधीन है वहाँ कंपनियों से दवाब बना कर उपखनिज की सप्लाई का ठेका लिया जा रहा है। विगत 2011 के बाद से प्रदेश के राजनेतिक स्थिति   डांवाड़ोल चल रही है पहले खंडुरी, फिर बहुगुणा और अब रावत जी आज गए कल गए की स्थिति है। इसी अवसर का लाभ उठा कर ‘’राका’’ अपना काम करता रहा है । उसने कुछ राजनैतिक लोगों व कुछ कथित पत्रकारों को भी साथ मिला रखा है जो गाहे –बगाहे उसके इर्द गिर्द घूमते रहते हैं और उसके काले धंधे में शामिल हैं ।
   “राका” ने अपनी इस गेम प्लान के अंतर्गत दो चार दिन पहले ही खनन विभाग में अधिकारियों की कुर्सिया उसी हिसाब से लगाने का हुक्म सुनाया है, अपने एक खासम खास अधिकारी को उसने दो वरिष्ठ अधिकारियों के विभाग में तैनात रहने के बावजूद स्वतंत्र प्रभार देकर कुछ इशारा दे दिया है। राज नीति में तो यह संभव है कि प्रधान मंत्री, किसी राज्य मंत्री को केबिनेट मंत्री के होते हुए भी उसे नज़र अंदाज कर सीधे प्रधान मंत्री को पत्रावली प्रस्तुत करने का आदेश जारी कर सकता है। किन्तु सरकारी व्यवस्था में यह संभव नहीं है कि दो दो जाइंट डाइरेक्टर के मौजूद होने के बावजूद भी एक उप निदेशक स्तर के अधिकारी को स्वतंत्र प्रभार दिया जाय।
     चर्चा तो यहाँ तक है ‘’राका’’ ने खनन विभाग के पर्वतीय अधिकारियों को दरकिनार कर अन्यत्र के अधिकारियों को राज्य के 9 जिलों का काम दे दिया है, सुनील पंवार, राजपाल लेघा व एस एल पेट्रिक पर मेहरबान ‘’राका’’ के ख़ास इन अधिकारियों के खनन माफियाओं से रिश्ते किसी से छिपे भी नहीं हैं यही कारण है कि एक बार तो ‘’राका’’ ने इनसे सीनियर अधिकारी को इनसे जूनियर बना डाला उसको उसके अधिकार तब मिले जब वाह ‘’राका’’ के निर्णय के खिलाफ न्यायालय से आदेश करा लाया . जानकारी तो यहाँ तक आई है कि इन्ही अधिकारियों के जरिये राज्य में ‘’राका’’ का खनन का खेल चल रहा है. वहीँ सुनने में तो यह भी आया है कि पहले तो राका ने खनन विभाग में अलग से खनन सेग्मेंट बना कर इन्ही मुंह लगे अधिकारियों के सहारे पूरे प्रदेश का खनन प्रशासन चलवाया और अब राज्य के मालदार जिलों का काम भी इनको दे दिया,
    प्रदेश में चल रहे खनन के इस खेल में स्थानीय अधिकारियों को किनारे कर अपने मुंह लगे अधिकारियों को आगे कर ‘’राका’’ का खेल चल रहा है । जहाँ हमारे राज नेता तो अपनी कुर्सी बचाने में ही व्यस्त हैं वहीँ ‘’राका’’ अपना खेल खेलने में व्यस्त है। प्रदेश के बुद्धिजीवियों का कहना है कि समय रहते यदि इस षड्यंत्र का भंडाफोड़ कर इन सब को तितर बितर नहीं किया गया। तो प्रदेश के सारे खनिज भंडारों पर राका की किसी कंपनी का कब्जा हो जाएगा उसके करीबी कुछ राजनेताओं को चवन्नी अठन्नी तो मिल जाएगी लेकिन राज्य वासियों के हाथ बाबा जी का ठुल्लू ही लगेगा । वही यदि मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तत्काल इस नेक्सेस को नहीं तोडा तो हरीश रावत जैसा जमीनी नेता पर कहीं उत्तराखंड का ‘’यदुरप्पा’’ का टैग न लग जाए.