आईएमए से जुड़े डाक्टरों के दबाव के आगे स्वास्थ्य महकमा झुका
राजेन्द्र जोशीदेहरादून । राज्य में पब्लिक को राहत देने की सरकार की कितनी कोशिश है। इसकी बानगी स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती से लगाया जा सकता है। पब्लिक को राहत पंहुचाने की जगह सरकार निजि डाक्टरों की आगे झुकती नजर आ रही है। यही कारण है कि कई माह बीत जाने के बावजदू भी राज्य में क्लिनिकल स्टेब्लीस्टमेंट एक्ट लागू नहीं हो पाया है। हालात यह है कि आईएमए से जुड़े डाक्टरों के दबाव के आगे स्वास्थ्य महकमा झुक गया है और इस एक्ट को अब निजि अस्पतालों और नर्सिंग होम के लिए अनिवार्य करने की जगह सरकारी अस्पतालों में लागू करने की योजना बनाई जा रही है।
राज्य में पहले ही स्वास्थ्य सेवा पटरी से उतरी हुई है। जिसका सीधा फायदा निजि अस्पतालों और नर्सिंग होम चलाने वाले डाक्टरों को हो रहा है। सरकारी अस्पतालों में जनता को बेहतर इलाज नहीं मिलने से मरीजों की भीड़ प्राईवेट अस्पतालों और क्लिीनिक की ओर लगी हुई है। निजि अस्पताल भी पब्लिक की मजबूरी का फायदा उठा कर महंगा उपचार करने में लगे हुए हैं। राजधानी में ताबड़तोड़ निजि अस्पतालों की बाढ़ आ गई है। लेकिन इसके बावजूद भी पाईवेट क्लिीनिक और नर्सिंग होम चलाने वाले ज्यादातर डाक्टरों को सरकार द्वारा लागू की जाने वाली क्लिीनिकल स्टेब्लीस्टमेंट एक्ट से डर लग रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि यदि सरकार इस एक्ट को लागू करती है तो कई छोटे अस्पताल और क्लिीनिक बंदी के कगार पर पंहुच जाऐंगे। जिससे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इनमें से कई क्लिीनिक और अस्पताल ऐसे हैं जो एक्ट की शर्तो पर खरे नहीं उतरते हैं। इस एक्ट के लागू होने से राज्य की जनता को फायदा होगा। जहां निजि अस्पतालों में ट्रेंड स्टॉफ मिलेगा। वहीं उपचार पर मनमाफिक बढ़ाई जा रही फीस वृद्घि पर भी लगाम लग सकती है।
यही कारण है कि निजि डाक्टर इस एक्ट के पक्ष में नहीं हैं। हाल ही में इस एक्ट को लेकर प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में आईएमए से जुड़े डाक्टरों की बैठक भी हुई जिसमें उनके सुझाव भी मांगे गए थे। लेकिन सूत्रों की माने तो बैठक के बाद भी राज्य में एक्ट के लागू होने का रास्ता साफ नहीं हो पाया है। निजि डाक्टरों के दबाव के आगे शासन और स्वास्थ्य महकमा दिख रहा है। जिसके चलते अब इस योजना को फिलहाल सरकारी अस्पतालों में लागू करने पर विचार किया जा रहा है। यदि सरकार निजि अस्पतालों पर क्लिीनिकल स्टेब्लीस्टमेंट लागू करने में विफल रहती हैं तो इसका सीधा फायदा इन अस्पताल के चलाने वाले संचालकों को ही मिलेगा और जनता को मनमाफिक इलाज का खर्च बताने पर लगाम नहीं लग पाएगी।
देहरादून : उत्तराखंड के काबिना मंत्री यदि यह सोच रहे हैं कि उनके कृत्यों को कोई नही देख रहा है तो वे यह गलफहमी न पालें. मुख्यमंत्री सहित केंद्र सरकार की निगाहों में उनका वह सब कला चिट्ठा दर्ज हो रहा है जिस पर वे पर्दा पड़ा समझ रहे हैं. मुख्यमंत्री हरीश रावत की मज़बूरी चाहे जो भी या उनके आँखों में शर्म हो वे इसलिए नही कह पा रहे है लेकिन केंद्र सरकार के दो बड़े अधिकारियों ने बीते दिनों गुप-चुप तरीके से राज्य के मंत्रियों के कृत्यों का काला चिट्ठा जो तैयार किया है वह बहुत ही चौंकाने वाला है, इन अधिकारियों में एक ने गढ़वाल इलाके का दौरा कर आम जनता से बात कर राज्य के मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है तो दुसरे ने कुमायूं इलाके के मंत्रियों का. रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों ही विभागों के मंत्रियों का विभाग पर नियंत्रण नहीं है.
राजेन्द्र जोशी 
देहरादून । अभी तक रोजगार की तलाश में युवकों का ही पलायन उत्तराखंड से अन्य राज्यों या विदेशों की तरफ सुनाई देता था लेकिन सरकार की लचर शिक्षा व्यवस्था के चलते अब सरकारी स्कूलों में पढने वाले छात्र भी प्राइवेट स्कूलों की तरफ पलायन करने लगे हैं यह तो तब है जब राज्य सरकार के राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सरकार द्वारा तमाम सुविधाएं मुहैया करा रही है इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या साल दर साल लगातार घटती जा रही है। सरकार द्वारा राजकीय विद्यालयों की ओर छात्रों को आकर्षित करने के लिए तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं लेकिन नतीजे सिफर हैं। हर वर्ष शिक्षा के लिए भारी भरकम बजट की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन छात्र सरकारी विद्यालयों को छोड़कर पब्लिक स्कूलों और निजी विद्यालयों की ओर रूख कर रहे हैं। इसके लिए कहीं न कहीं अध्यापक भी दोषी माने ने जा सकते हैं जो छात्रों वह गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं जिसकी उनके अभिवावकों को दरकार है.