बुधवार, 14 जनवरी 2015

आपदा प्रबंधन विभाग फिर फेल, मौसम विभाग को भी नहीं लगी बर्फीले तूफान की खबर

आपदा प्रबंधन विभाग ने न तो कोई तैयारी की है और न ही केदारनाथ आपदा से लिया कोई सबक

 देहरादून। सूबे के आपदा प्रबंधन विभाग ने केदारनाथ आपदा के बाद भी कोई सबक नहीं लिया है। यही वजह है कि उच्च पर्वतीय क्षेत्र में इस तूफान की चपेट में आए लोगों की वक्त पर कोई मदद नहीं की जा सकी। लगभग आठ घंटे बाद सूचना राजधानी पहुंची तो सीएम की पहल पर अलर्ट जारी किया गया। इस मामले में आपदा प्रबंधन और मौसम विभाग दोनों ही पूरी तरह से फेल साबित हुए है।
   16 जून 2013 को केदारनाथ में कुदरत ने कहर ढाया है। उस वक्त दो रोज तक इसकी सूचना ही सरकार को नहीं मिल सकी थी। मीडिया ने अपने तंत्र के आधार पर इसका खुलासा किया तो सरकार की ओर से बचाव और राहत कार्य शुरु किया था। उसी वक्त से कहा जा रहा है कि आपदा प्रबंधन विभाग को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। ताकि इस तरह की आपदा के वक्त लोगों को वक्त पर राहत दी जा सके। लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया।
  विगत दिवस चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों के ऊंचाई वाले इलाकों में इस बर्फीले तूफान ने अपना कहर ढाया। इससे कोई जनहानि होने की खबर तो अब तक नहीं है, लेकिन लोगों का काफी नुकसान हुआ है। सैकड़ों मकानों के क्षतिग्रस्त होने की खबर है। अहम बात यह है कि इस तूफान के बारे में सरकार को लगभग आठ घंटे बाद ही जानकारी हो सकी। इन जिलों का आपदा प्रबंधन विभाग सोता रहा। किसी भी जिले से राज्य मुख्यालय को इस बारे में कोई इनपुट वक्त पर नहीं मिला। प्रभावित लोगों ने खुद ही किसी तरह से फोन करके इस बारे में सूचना दी तो सरकारी मशीनरी हरकत में आई। इसके बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देश पर सात जिलों को अलर्ट जारी किया गया।
   इस मामले में राज्य मौसम विभाग भी फेल साबित हुआ है। नए साल की शुरुआत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने चार और पांच जनवरी को इस तरह के तूफान के आने की आशंका जाहिर की थी। इस पर राज्य मौसम विभाग ने इस तरह के किसी तूफान के आने की आशंका से ही इंकार कर दिया। नतीजा यह रहा है कि प्राधिकरण की चेतावनी को नजर अंदाज कर दिया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि राज्य मौसम विभाग क्या करता रहा। उसने प्राधिकरण की चेतावनी को तो गलत बताने में देरी नहीं की ,लेकिन सटीक अनुमान खुद भी नहीं लगा सका। माना जा रहा है कि अगर प्राधिकरण की चेतावनी को ध्यान में रखते हुए ही कोई तैयारी कर ली गई होती तो लोगों को इस तूफान का सामना नहीं करना होता। सौभाग्य से कोई जनहानि नहीं हुई अगर दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ हो जाता तो इसकी जिम्मेदारी किसके सर आती। बहरहाल, एक बार फिर साबित हुआ है कि राज्य में आपदा प्रबंधन विभाग ने न तो कोई तैयारी की है और न ही केदारनाथ आपदा से कोई सबक लिया है। इतना ही नहीं मौसम विभाग भी कारगर भूमिका नहीं निभा पा रहा है।

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

उत्तराखंडी समाज और संस्कृति के लिए कुछ प्रयास जरूर करें.......!

वर्ष में एक-दो बार अपने घर-गाँव का रुख अवश्य करें
वसुंधरा नेगी ( लाजो )

किसी भी समाज की पहचान का आधार उस समाज की संस्कृति से होता हैं जिसमें उस समाज के रीति रिवाज, जीवन-शैली, खानपान, बोली-भाषा, परम्पराएं, सामाजिक और धार्मिक मान्यताएं, वेश-भूषा आदि सम्मलित होती हैं । अपने उत्तराखंड के परिपेक्ष में बात करें तो इसे देवभूमि के अलंकरण से बिभुषित किया गया हैं और ये बार अक्षरत: सत्य हैं कि इसी देवभूमि के अलंकरण के कारण यहाँ देश-दुनियां के शैलानी और तीर्थयात्री वर्ष भर अपनी उपस्थति दर्ज करातें रहतें हैं, जो इस प्रदेश के निवासियों की आजीविका के महत्वपूर्ण आधार हैं | इस प्रदेश को शोर्य की धरती भी कहा जाता हैं, यहाँ के अनेक बेटे देश की आन-बान-शान के लिए शहीद हो गए ! प्रकृति ने इस प्रदेश को इतनी नेमत बक्शी हैं कि इसका दीदार करने लोग दूर-दूर से आकर इसकी गोद में सकून पातें हैं !
इस सब के बावजूद क्या आप को नहीं लगता देव भूमि उत्तराखंड दिन-प्रतिदिन अपनी पहचान खोती जा रही हैं, हम इसके प्रति लापरवाहीपूर्ण व्यवहार करने की तरफ बढ़ रहे हैं ! सोशियल साइट्स जैसे फेस बुक आदि पर बहुतायात लोग अनगिनत कमेंट्स पोस्ट जैसे गर्व से कहो हम उत्तराखंडी हैं, मेरा प्यारा उत्तराखंड आदि करते हैं .... कुछ लोग उसको पढ़ते हैं, वो या उस पर कमेंट्स करेंगें या लाइक करेंगें, जितने लाइक मिले और कितने कमेन्ट मिले हम इस पर इतराते फिरते हैं ! हम इसी को समाज सेवा मान बैठतें हैं, शहरों में बसने वाले लोग साल में एक-दो मंचीय कार्यक्रम करा दें तो हो गयी उनकी ओर से संस्कृति व अपनी विरासत की रक्षा !
हमको ये पता रहता हैं कि फ़िल्मी तारिकाएं कितने बॉय फ्रेंड बदलती, ये भी पता है कि अमुख फ़िल्मी कलाकार ने क्या खाया-पीया-कहा, मगर ये पता नहीं कि आज उत्तराखंड में कितने मांए अपने बेटे के फ़ोन का इन्तजार करते-करते सोयी होंगी, कितनी माएं पथराई नजरों से अपने बेटे की राह तक रही हैं ! कितने दलालों ने झूठे दस्तखत करवा कर कितने पैसे खाए और कितने लोगों की जमीन हड़पी हैं, किसके घर में खुशिया आई और कितने घर में मातम मना हैं !
एक समय था जब अपनी देवभूमि में घरों पर ताले लगाना अशुभ माना जाता था किन्तु आज उत्तराखंड के कई घरों पर ताले लग चुके हैं, कई घर खंडर तो कई इसकी खंडर होने की तरफ बढ़ रहे हैं, सब रोजी-रोटी, शिक्षा और बेहतर जीवन की आस में घरों को छोड़-छोड़कर शहर की तरफ भागे जा रहे हैं, इस भागम-भाग का नतीजा ये हैं कि गांव युवा-विहीन होते जा रहे हैं, गाँवों की जग्वाल की जिम्मेदारी बुजुर्ग कन्धों पर आ गयी हैं, क्या पता ये बुजुर्ग काँधे कब तय ये बोझ उठाने लायक रहते हैं ! जो किसी तरह शहर नहीं पहुँच पाए वो नवीन सड़क संस्कृति के कारण वसे कस्बों को अपना आशियाना बना रहे हैं, एक अलग प्रकार के समाज और संस्कृति की नीवं अपने पहाड़ में पड़ चुकी हैं, जहां ना आत्मीयता हैं कोई ना अपनापन, नजरिये ही बदल गए, पहाड़ी होने के !
मूल प्रश्न ये हैं कि आना-जाना लगा रहा हैं और ये लगा रहेगा किन्तु हमको अपने आप से ये सवाल जरूर करना चाहिए कि कहीं हम अपने घर, गाँव, समाज और संस्कृति के प्रति लापरवाह तो नहीं बने हुए हैं ! आखिर ! क्यों हमको चोकलेट डे, रोज डे, वेलेन्टाइन दे याद हैं किन्तु अपनी संगराद और माह में आने वाले त्यौहार ऐसे ही निकल जाते हैं ! हम अपने बच्चों को हिन्दी अंग्रेजी सहित दुनियां की अनेक भाषाओँ के ज्ञान कराने के लिए लालायित रहते हैं किन्तु अपनी जौनसारी, गढ़वाली और कुमाउनी बोली-भाषा से इनको दूर रखते हैं ! हम दुनियां भर के परिधानों को अंगीकृत करते हैं किन्तु अपने पारम्परिक परिधानों को पिछडेपन का सूचक मानने लगे हैं ! अब ढोल-दमाऊ की थाप पर हमारे पाँव थिरकते हैं, डिस्को के अभ्यस्त जो हो चले हैं, आने वाली पीढ़ी को हम शैलानी बनाने पर तुले हैं जो नाम से तो पहाड़ी होंगे किन्तु बोली-भाषा-यहाँ के संस्कारों के नाम पर उनके पास बड़ा सा शून्य होगा ! क्या इस स्थिति में बच पाएगी हम सब और साथ ही देवभूमि की पहचान, मेरी नजर से बिल्कुल नहीं !
अपने उत्तराखंड के प्रति यदि हमारे मन में थोड़ा भी अनुराग हैं तो हमको एक बार जरूर विचार करना चाहिए इसकी वर्तमान स्थिति पर कि यदि ऐसे ही चलता रहा तो होगा क्या इस देवभूमि का (?) सम्भव हों तो कुछ प्रयास अवश्य करें जैसे कि वर्ष में एक-दो बार अपने घर-गाँव का रुख अवश्य करें, देश-दुनियां में जो परिवर्तन हो रहे हैं उससे जो अभी भी गाँव में लोग रह रहे हैं उनसे परिचित कराएं, लोगों के साथ सम्वाद बनाने का प्रयत्न करें, वर्तमान में जिस भी स्थान पर रह रहे हैं, वहाँ अपने तीज-त्यौहार की याद ताजा करने के लिए उनको मनाने का प्रयास जरूर करें, इससे एक तो अपने समाज के लोग एक साथ जुडेंगें, दूसरे इन त्योहारों से अन्य समाज के लोग भी परिचित होंगें ! इस कार्य से एक महत्वपूर्ण काम और होगा कि जो बच्चे शहरों में पैदा हुए हैं या पाले-बढ़े हैं उनका भी इनके बारें में ज्ञान वर्धन होगा ! अपने घरों में अपनी दुधबोली बोले जाने का माहौल बनाने का प्रयत्न करों ! यदि ऐसा कर पाएं तो वो दिन दूर नहीं जब देवभूमि की सांस्कृतिक सुंगंध पहाड़ क्या देश की फिजाओं को भी अनवरत महकाती रहेगी !

आपदा प्रबंधन विभाग फिर फेल, मौसम विभाग को भी नहीं लगी बर्फीले तूफान की खबर

आपदा प्रबंधन विभाग ने न तो कोई तैयारी की है और न ही केदारनाथ आपदा से लिया कोई सबक

 देहरादून। सूबे के आपदा प्रबंधन विभाग ने केदारनाथ आपदा के बाद भी कोई सबक नहीं लिया है। यही वजह है कि उच्च पर्वतीय क्षेत्र में इस तूफान की चपेट में आए लोगों की वक्त पर कोई मदद नहीं की जा सकी। लगभग आठ घंटे बाद सूचना राजधानी पहुंची तो सीएम की पहल पर अलर्ट जारी किया गया। इस मामले में आपदा प्रबंधन और मौसम विभाग दोनों ही पूरी तरह से फेल साबित हुए है।
   16 जून 2013 को केदारनाथ में कुदरत ने कहर ढाया है। उस वक्त दो रोज तक इसकी सूचना ही सरकार को नहीं मिल सकी थी। मीडिया ने अपने तंत्र के आधार पर इसका खुलासा किया तो सरकार की ओर से बचाव और राहत कार्य शुरु किया था। उसी वक्त से कहा जा रहा है कि आपदा प्रबंधन विभाग को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। ताकि इस तरह की आपदा के वक्त लोगों को वक्त पर राहत दी जा सके। लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया।
  विगत दिवस चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों के ऊंचाई वाले इलाकों में इस बर्फीले तूफान ने अपना कहर ढाया। इससे कोई जनहानि होने की खबर तो अब तक नहीं है, लेकिन लोगों का काफी नुकसान हुआ है। सैकड़ों मकानों के क्षतिग्रस्त होने की खबर है। अहम बात यह है कि इस तूफान के बारे में सरकार को लगभग आठ घंटे बाद ही जानकारी हो सकी। इन जिलों का आपदा प्रबंधन विभाग सोता रहा। किसी भी जिले से राज्य मुख्यालय को इस बारे में कोई इनपुट वक्त पर नहीं मिला। प्रभावित लोगों ने खुद ही किसी तरह से फोन करके इस बारे में सूचना दी तो सरकारी मशीनरी हरकत में आई। इसके बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देश पर सात जिलों को अलर्ट जारी किया गया।
   इस मामले में राज्य मौसम विभाग भी फेल साबित हुआ है। नए साल की शुरुआत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने चार और पांच जनवरी को इस तरह के तूफान के आने की आशंका जाहिर की थी। इस पर राज्य मौसम विभाग ने इस तरह के किसी तूफान के आने की आशंका से ही इंकार कर दिया। नतीजा यह रहा है कि प्राधिकरण की चेतावनी को नजर अंदाज कर दिया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि राज्य मौसम विभाग क्या करता रहा। उसने प्राधिकरण की चेतावनी को तो गलत बताने में देरी नहीं की ,लेकिन सटीक अनुमान खुद भी नहीं लगा सका। माना जा रहा है कि अगर प्राधिकरण की चेतावनी को ध्यान में रखते हुए ही कोई तैयारी कर ली गई होती तो लोगों को इस तूफान का सामना नहीं करना होता। सौभाग्य से कोई जनहानि नहीं हुई अगर दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ हो जाता तो इसकी जिम्मेदारी किसके सर आती। बहरहाल, एक बार फिर साबित हुआ है कि राज्य में आपदा प्रबंधन विभाग ने न तो कोई तैयारी की है और न ही केदारनाथ आपदा से कोई सबक लिया है। इतना ही नहीं मौसम विभाग भी कारगर भूमिका नहीं निभा पा रहा है।

चमोली जिले मे बर्फीले तूफान का कोहराम,115 घर उड़े , अलर्ट पर पर्वतीय जिले

गोपेश्वर : उत्तराखंड के चमोली जिले की सबसे दूरस्थ निजमुला घाटी के गांवों में बर्फीले तूफान ने कहर मचा दिया। यहां पाणा, ईराणी, भनाली, बौंणा और झींझी गांवों में बर्फीले तूफान से करीब 115 आवासीय भवनों की छतें उड़ गई हैं। जिससे घाटी में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। सहमे ग्रामीणों ने पेड़ों और प्राकृतिक गुफाओं में शरण लेकर अपनी जान बचाई। घाटी में रात्रि बुधवार रात दो बजे से ही ग्रामीणों में अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है। क्षेत्र में बुधवार रात से बर्फीला तूफान शुरू हुआ जो लगातार गुरुवार को सुबह 11 बजे तक चलता रहा। प्रशासन ने ग्रामीणों की सूचना पर आपदा और तहसील प्रशासन की दो टीमें सेटेलाइट फोन के साथ प्रभावित गांवों के लिए रवाना कर दी गई हैं। अपर जिलाधिकारी एमएस बिष्ट ने बताया कि तूफान से कोई जनहानि की सूचना नहीं है। प्रशासन ने टीम के साथ बीस कंबल और बीस तिरपाल भी भेजे हैं। टीम देर रात्रि तक ही प्रभावित क्षेत्र में पहुंचेगी।
    जिले की निजमुला घाटी विषम भौगोलिक परिस्थितियों की घाटी है। घाटी के ग्रामीणों को अपने गांवों तक जाने के लिए आज भी करीब 10 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। क्षेत्र में संचार और स्वास्थ्य सुविधा नहीं है, जिससे यहां होने वाली कोई भी घटना की तत्काल जानकारी नहीं मिल पाती है। ताजा घटनाक्रम के मुताबिक ईराणी गांव के ग्रामीण महिपाल सिंह ने तूफान के दौरान ही गांव से चार किमी दूर आकर एक पहाड़ी से डब्ल्यूएलएल फोन से सुबह साढे़ नौ बजे गोपेश्वर में अपने ही गांव के मोहन सिंह नेगी को तूफान की सूचना दी। उन्होंने तत्काल क्षेत्र के अन्य ग्रामीणों के साथ ही जिला प्रशासन व जिला आपदा प्रबंधन विभाग को इसकी सूचना दी। जिसके बाद प्रशासन ने नायब तहसीलदार सुशीला कोठियाल के साथ ही आपदा प्रबंधन के छह कर्मचारी प्रभावित गांवों के लिए रवाना हुए।

खानापूर्ति तक सिमटा रहा एनडीआरएफ का अलर्ट
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भारत सरकार ने बीती 4 व 5 जनवरी को चमोली जिले में हिमस्खलन का अलर्ट जारी किया था। जिसके बाद जिला प्रशासन ने इस अलर्ट को सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित रखा। अलर्ट में बताया गया कि करीब 2500 मीटर की ऊंचाई तक के क्षेत्र इससे प्रभावित हो सकते हैं, जबकि जिले का पाणा और ईराणी गांव करीब 21 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। इसके बावजूद भी ग्रामीणों को अलर्ट नहीं किया गया।
   जिला आपदा प्रबंधन विभाग  का भी कहना है कि जब हिम्माच्छादित क्षेत्रों में हिमस्खलन होता है तो हिम्माच्छादित क्षेत्र के समीप वाले हिस्से में बर्फीले तूफान का खतरा बना रहता है।निजमुला घाटी के ठीक पीछे त्रिशूल और नंदा घुंघटी की बर्फीली चोटियां मौजूद हैं। हिमालय का यह क्षेत्र वर्षभर हिमाच्छादित रहता है। शीतकाल में जब इन चोटियों पर नई बर्फ जमती है तो यहां हिमस्खलन की छोटी-छीटी घटनाएं होती रहती हैं, जिनका इन आवादी क्षेत्रों में कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार यहां हिमस्खलन बडे़ पैमाने पर हुआ है। शीतकाल में बर्फबारी के बाद पाणा, ईराणी और झींझी गांव भी बर्फ से ढके रहते हैं। इन गांवों में इन दिनों एक से पांच फीट तक बर्फ जमी हुई है। स्थानीय निवासी भरत सिंह, भजन सिंह, महेंद्र सिंह, कमल सिंह और इंद्र सिंह का कहना है कि गांव के ठीक पीछे स्थित त्रिशूल पर्वत पर बीते वर्षों में छिटपुट हिमस्खलन की घटनाएं देखी गई हैं।

मौसम परिवर्तन तूफान का कारण
निजमुला घाटी में इस बार समय से पहले बर्फबारी हुई है। अमोमन यहां 15 जनवरी के बाद ही बर्फबारी होती है, लेकिन इस बार ठीक एक माह पूर्व यानि 14 दिसंबर को भारी बर्फबारी हुई। इसके बाद भी दो बार बर्फबारी हुई, जिससे घाटी के गांव अभी भी करीब दो फीट बर्फ की आगोश में हैं। इसे मौसम में हो रहे परिवर्तन का असर भी माना जा रहा है।निजमुला घाटी में बर्फीले तूफान के बाद मची अफरा-तफरी के बाद भी जिले में आपदा प्रबंधन का सेवन डेस्क सिस्टम हरकत में नहीं आया। जिससे जिले में एक बार फिर आपदा प्रबंधन की पोल खुल कर रह गई है।
बीती रात जब घाटी में बर्फीले तूफान का कहर रहा तो जिले के आला अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं थी। सुबह जब साढे़ नौ बजे एक ग्रामीण द्वारा फोन पर यह सूचना दी गई तो इसके बाद भी कोई अलर्ट जारी नहीं हुआ। जब मीडिया कर्मियों द्वारा विभागीय अधिकारियों से मामले की जानकारी मांगी गई, इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और तहसील व आपदा प्रबंधन की टीमें प्रभावित क्षेत्र के लिए रवाना की गई।

मौसम को देखते हुए जनपद में आपदा राहत एवं बचाव की टीम अलर्ट पर रहे

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जनपद चमोली, रूद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चम्पावत व नैनीताल के जिलाधिकारियों को निर्देश दिये है कि मौसम को देखते हुए जनपद में आपदा राहत एवं बचाव की टीम अलर्ट पर रहे। जिन पर्वतीय क्षेत्रों में भारी बर्फभारी होने की संभावना है, वहां पर समय से सभी व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर ली जाय। लोगो को खाद्यान्न आदि की समस्या नही होनी चाहिए। बर्फबारी के कारण यदि कही पर कोई मार्ग बंद हो जाता है, तो उसके लिए जे.सी.बी. आदि की व्यवस्था की जाय। किसी भी प्रकार की आपात स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय सहित मुख्य सचिव को तत्काल सूचित किया जाय। मुख्यमंत्री ने कहा है कि जन सामान्य को किसी भी प्रकार से भयभीत होने की आवश्यकता नही है। आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा भी बताया गया है कि अभी तक किसी भी प्रकार की जानमाल की क्षति नही हुई है।

जाते -जाते उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति का ''खेल'' कर गए कुरैशी

 BREAKING NEWS:------

देहरादून। उत्तराखण्ड से जाते-जाते डा. अजीज कुरैशी कुलाधिपति की हैसियत से उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति कर गए। कार्यभार छोड़ने के ठीक पहले उन्होंने वर्तमान कुलपति को ही अगले तीन वर्ष के लिए फिर कुलपति बनाने का आदेश जारी कर दिया। कुलाधिपति के इस तरह के आदेशों से शंकाओं के सुई अब कुलाधिपति की ओर धूम गयी है कि आखिर न्थानानान्तरण हो जाने के बाद उनको इस तरह के आदेश क्यों करने पडे़। 
निवर्तमान राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी ने उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के भावी कुलपति के लिए भी वर्तमान कुलपति डा. सतेंद्र प्रसाद मिश्रा की नियुक्ति कर दी। डा. सतेंद्र मिश्रा पूर्व में जनवरी 2010 में विश्वविद्यालय के प्रथम   कुलपति नियुक्त हुए थे। जनवरी 2013 में उनका कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही उन्हें एक वर्ष के लिए सेवा दे दिया गया। सेवा विस्तार के बाद उनका कार्यकाल आगामी 15 जनवरी को समाप्त होने वाला था। 
    विगत दिनों कुलपति का कार्यकाल समाप्त होने की तिथि नजदीक आने पर सरकार ने नए कुलपति के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाध्ीश की अध्यक्षता में सर्च कमेटी का गठन किया था। बताया जा रहा है कि विगत दिनों सर्च   कमेटी की बैठक ऋषिकेश में हुई थी। जिसमें डा. मिश्रा को ही पुनः कुलपति बनाने की संस्तुति की गई। इस बीच भारत सरकार ने राज्यपाल डा. अजीज कुरैशी का स्थानांतरण मिजोरम के लिए कर दिया था। स्थानांतरणाधीन होते हुए भी डा. कुरैशी विगत 7 जनवरी को डा. सतेंद्र प्रसाद मिश्रा को कुलपति नियुक्त करने का आदेश जारी कर गए। 
गत 7 जनवरी को ही नए राज्यपाल डा. कृष्णकांत पाॅल देहरादून पहुंच चुके थे। उन्हें 8 जनवरी को शपथ लेनी थी। उनके शपथ लेने से पहले ही अगले कुलपति के आदेश हो गए। डा. सतेंद्र मिश्रा सेवा विस्तार का कार्यकाल संपन्न होने की तिथि के बाद कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से अगले तीन वर्ष तक के लिए पिफर कुलपति नियुक्त किए गए हैं। सूत्रोे से मिली जानकारी के अनुसार आयुर्वेद विश्वविद्यालय के एक चर्चित अधिकारी ने डा. सत्येंद्र मिश्रा के कार्यकाल को बढ़वाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।

रविवार, 4 जनवरी 2015

कहीं सलाहकार ही न ले डूबें मुखिया को !

अब तक के मुखियाओं  के सलाहकारों ने ही उनकी लुटिया डूबाने में महत्वपूर्ण भूमिका की अदा 

राजेन्द्र जोशी 

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड को राजनेताओं ने नरक बना दिया है। इन चौदह वर्षों में विकास के नाम पर लूटपाट का क्रम जारी है। जो नेता इस राज्य में ग्राम प्रधान का चुनाव नहीं जीत सकते थे वे आज दुर्भाग्य से मंत्री बने बैठे हैं। यही हाल सचिवालय व विधानसभा में बैठे उन अफसरों का भी है जो इस काबिल थे ही नहीं। हालात यह है कि सचिवालय तो लोगों के अरमानों का कब्रगाह बना हुआ है। काम होना तो दूर फाइलों को खिसकने में भी महीनों लग जाते है लेकिन किसी को भी कोई चिन्ता नहीं है। शायद ही कोई ऐसा विभाग हो जो भ्रष्टाचार से अछूता न हो।
      कांग्रेस व भाजपा की इस प्रदेश में बारी बारी से सरकार रही लेकिन इन दोनों ही पार्टियों ने विकास की बजाय प्रदेश को विनाश की गर्त में धकेला है। यह दोनों ही पार्टियां भले ही एक दूसरे को कोसती हों लेकिन हकीकत यह है कि एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ। उम्मीद जगी थी कि हरीश रावत के सत्ता में आने के बाद स्थित में कुछ सुधार आयेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकार की उपलब्धियां केवल कागजों तक ही सीमित हैं। सरकार का नौकरशाहों पर कोई नियंत्रण नहीं है। कई मंत्री व विधायक नौकरशाहों की मनमानी को लेकर मुख्यमंत्री के दरबार में अपनी गुहार लगा चुके हैं। उसके बावजूद नौकरशाहों पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया है।
    किसी भी राज्य के मुखिया की यश कीर्ति व उसके कामों को जनता तक पहुंचाने के लिए ईमानदार व कुशाग्र बुद्वि वाले सलाहकार की आवश्यकता होती है। इस राज्य का दुर्भाग्य है कि यहां ऐसे सलाहकार नियुक्त हैं जो निहायत बेईमान व भ्रष्ट रहे हैं। ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि राज्य का विकास होगा। आज तक जितनी भी सरकार इस प्रदेश में बनी है उनके मुखिया के सलाहकारों ने ही उनकी लुटिया डूबाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। कहते है अकबर के नौ रत्न थे और सभी लाजबाब व अपने कामों में माहिर थे। उन्हीं की वजह से अकबर की कीर्ति पताका फहरी व अकबर दी ग्रेट कहलाये। इस प्रदेश का हाल यह है कि यहां के मुखिया के सलाहकार अपने घर में कोई सलाह नहीं दे सकते तो ऐसे में मुखिया को क्या सलाह देंगे यह प्रदेश की जनता को भलीभांति मालूम है।
     हरीश रावत ने भी ऐसे सलाहकार बनाये हुए हैं जो किसी भी कसौटी में खरे नहीं उतरते। वहीं प्रदेश के लोगों को मुखिया से मिलने के लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं। सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मियों के व्यवहार से मुलाकातियों की जो फजीहत होती है वह सर्वविदित है। रही सही कसर उन भ्रष्ट आईएएस अफसरों ने पूरी कर दी जो कतई इस प्रदेश का विकास नही चाहते हैं लेकिन ऐसे अफसर हर मुखिया के कार्यकाल में अपनी पैठ बनाकर काबिज हो जाता है। शायद सरकार को भी ऐसे दुधारू अफसर की जरूरत रहती है जो उन्हें कमाई का जरिया बता सके। इस स्थित में इस प्रदेश का बंटाधार होना तय हैं। भगवान को ही अब यहां उतरकर जनता का उद्वार करना होगा अन्यथा यह प्रदेश राजनेताओं, अफसरों व माफियाओं का चारागाह बनता जायेगा।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

केंद्र की मोदी सरकार नये साल में नया करेगी आखिर क्या-क्या

नये साल में नया क्या-क्या

हर खेत तक पहुंचेगा पानी
नये साल में किसानों को पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ से कृषि सिंचाई योजना की सौगात मिलेगी। इसके तहत हर खेत तक पानी पहुंचाने की घोषणा को अमली जामा पहनाया जाएगा। कृषि सिंचाई योजना को गति देने के लिए पीएम मोदी ने इसमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का सहयोग लेने को कहा है। इसके साथ ही सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराने को लेकर नदी जोड़ो परियोजना की पहचान करने और उन पर काम चालू करने का भी पीएम ने निर्देश दिया है ताकि उस दिशा में तत्काल कार्य शुरू किया जा सके।
सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल
नये साल में भी पेट्रोलियम उत्पादों में कटौती का जश्न जारी रहने के आसार हैं। अगले एक से दो दिनों के भीतर सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल के साथ ही रसोई गैस की कीमतों को घटाने पर विचार कर रही हैं। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पेट्रोल, डीजल के साथ ही रसोई गैस और कुछ अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कमी की जायेगी। यह कटौती एक-दो दिन में हो सकती है। पेट्रोल और डीजल की कीमत में एक रुपये और रसोई गैस की कीमत में लगभग 35 रुपये प्रति सिलेंडर की कमी की जा सकती है।

डाक्टरों को सैंपल अब नहीं
आज से फार्मा कंपनियों की तरफ से डॉक्टरों को गिफ्ट के तौर पर मेडिकल सैंपल, पर्सनल गिफ्ट, फ्री हॉलीडे प्लान आदि नहीं दिए जा सकेंगे। सरकार के अनुसार यह कंपनियों का प्रोडक्ट प्रमोशन करने का गलत तरीका है, जिसे 1 जनवरी से बैन किया जा रहा है। इसके अलावा पहली जनवरी से कंपनियों के फेसबुक पेज के पोस्ट किसी यूजर की प्रोफाइल पर कम से कम दिखेंगे। फेसबुक कल से अपनी डाटा नीति, कुकीज़ पॉलिसी और शर्तों को भी अपडेट करेगा। इसके अलावा डीडीए की हाउसिंग स्कीम के विजेताओं को पहली जनवरी से फ्लैट मिलने शुरू हो जाएंगे।
एलपीजी सब्सिडी बैंक खाते में
देशभर में पहली जनवरी से रसोई गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी अब सीधे उपभोक्ताओं के बैंक खातों में हस्तांतरित की जायेगी। इसके बाद उन्हें रसोई गैस सिलेंडर बाजार भाव पर खरीदना होगा। घरेलू एलपीजी ग्राहक जैसे ही इस प्रत्यक्ष हस्तांतरण लाभ योजना से जुड़ेगा, उसके तुरंत बाद उसके बैंक खाते में 568 रूपए आ जाएंगे ताकि वह 14.2 किलो का घरेलू उपयोग वाला एलपीजी सिलेंडर बाजार मूल्य पर खरीद सके। ग्राहक को अग्रिम राशि के रूप में यह रकम मिलेगी, ताकि बाजार मूल्य पर सिलेंडर खरीदने के लिए उसके पास धन की तंगी नहीं हो।
कार, एसी, फ्रिज होंगे महंगे
खबर है कि नये साल की पहली तारीख से कारें, एसयूवी और दोपहिया वाहन और भी महंगे हो जायेंगे। इसको लेकर सरकार ने वाहन कंपनियों को दी जा रही उत्पाद शुल्कों में छूट की व्यवस्था 31 दिसंबर से आगे नहीं बढ़ाने का फैसला लिया है। इस पर वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए कहा कि सरकार वाहन कंपनियों के लिए उत्पाद शुल्क में छूट की अवधि अब और बढ़ाने नहीं जा रही है। गौरतलब है कि फरवरी में पेश होने वाले अंतरिम आम बजट में केंद्र की पिछली सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती कर दी थी।
बुढ़ापा पेंशन में बढ़ोतरी
हरियाणा सरकार ने जनवरी-2015 से पेंशन में 200 रुपये मासिक की बढ़ोतरी करके 1200 रुपये महीना देने की तैयारी भी शुरू कर दी है।सरकार की बुजुर्गों, विधवाओं एवं विकलांगों को बैंकों के माध्यम से जनवरी से पेंशन देने की योजना सिरे नहीं चढ़ी है। इस योजना को लागू होने में अभी कुछ और समय लगेगा। ऐसे में राज्य के इन वर्गों को जनवरी महीने में मिलने वाली पेंशन पहले की तरह ही मिलेगी। बताते हैं कि बैंकों द्वारा अधिक ब्याज मांगा जा रहा है और सरकार कम ब्याज पर उन्हें राजी करने की कोशिश में जुटी है।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

राज्य में लागू नहीं हो पाया क्लिनिकल स्टेब्लीस्टमेंट एक्ट

आईएमए से जुड़े डाक्टरों के दबाव के आगे स्वास्थ्य महकमा झुका 

राजेन्द्र जोशी
देहरादून । राज्य में पब्लिक को राहत देने की सरकार की कितनी कोशिश है। इसकी बानगी स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती से लगाया जा सकता है। पब्लिक को राहत पंहुचाने की जगह सरकार निजि डाक्टरों की आगे झुकती नजर आ रही है। यही कारण है कि कई माह बीत जाने के बावजदू भी राज्य में क्लिनिकल स्टेब्लीस्टमेंट एक्ट लागू नहीं हो पाया है। हालात यह है कि आईएमए से जुड़े डाक्टरों के दबाव के आगे स्वास्थ्य महकमा झुक गया है और इस एक्ट को अब निजि अस्पतालों और नर्सिंग होम के लिए अनिवार्य करने की जगह सरकारी अस्पतालों में लागू करने की योजना बनाई जा रही है। 
   राज्य में पहले ही स्वास्थ्य सेवा पटरी से उतरी हुई है। जिसका सीधा फायदा निजि अस्पतालों और नर्सिंग होम चलाने वाले डाक्टरों को हो रहा है। सरकारी अस्पतालों में जनता को बेहतर इलाज नहीं मिलने से मरीजों की भीड़ प्राईवेट अस्पतालों और क्लिीनिक की ओर लगी हुई है। निजि अस्पताल भी पब्लिक की मजबूरी का फायदा उठा कर महंगा उपचार करने में लगे हुए हैं। राजधानी में ताबड़तोड़ निजि अस्पतालों की बाढ़ आ गई है। लेकिन इसके बावजूद भी पाईवेट क्लिीनिक और नर्सिंग होम चलाने वाले ज्यादातर डाक्टरों को सरकार द्वारा लागू की जाने वाली क्लिीनिकल स्टेब्लीस्टमेंट एक्ट से डर लग रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि यदि सरकार इस एक्ट को लागू करती है तो कई छोटे अस्पताल और क्लिीनिक बंदी के कगार पर पंहुच जाऐंगे। जिससे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इनमें से कई क्लिीनिक और अस्पताल ऐसे हैं जो एक्ट की शर्तो पर खरे नहीं उतरते हैं। इस एक्ट के लागू होने से राज्य की जनता को फायदा होगा। जहां निजि अस्पतालों में ट्रेंड स्टॉफ मिलेगा। वहीं उपचार पर मनमाफिक बढ़ाई जा रही फीस वृद्घि पर भी लगाम लग सकती है।
    यही कारण है कि निजि डाक्टर इस एक्ट के पक्ष में नहीं हैं। हाल ही में इस एक्ट को लेकर प्रमुख सचिव की अध्यक्षता  में आईएमए से जुड़े डाक्टरों की बैठक भी हुई जिसमें उनके सुझाव भी मांगे गए थे। लेकिन सूत्रों की माने तो बैठक के बाद भी राज्य में एक्ट के लागू होने का रास्ता साफ नहीं हो पाया है। निजि डाक्टरों के दबाव के आगे शासन और स्वास्थ्य महकमा दिख रहा है। जिसके चलते अब इस योजना को फिलहाल सरकारी अस्पतालों में लागू करने पर विचार किया जा रहा है। यदि सरकार निजि अस्पतालों पर क्लिीनिकल स्टेब्लीस्टमेंट लागू करने में विफल रहती हैं तो इसका सीधा फायदा इन अस्पताल के चलाने वाले संचालकों को ही मिलेगा और जनता को मनमाफिक इलाज का खर्च बताने पर लगाम नहीं लग पाएगी।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

उत्तराखंड की चिकित्सा व शिक्षा व्यवस्था बदहाल : एक रिपोर्ट


मंत्री व अधिकारी सरकारी धन की लूट खसोट में व्यस्त 

राजेन्द्र जोशी 
देहरादून : उत्तराखंड के काबिना मंत्री यदि यह सोच रहे हैं कि उनके कृत्यों को कोई नही देख रहा है तो वे यह गलफहमी न पालें. मुख्यमंत्री सहित केंद्र सरकार की निगाहों में उनका वह सब कला चिट्ठा दर्ज हो रहा है जिस पर वे पर्दा पड़ा समझ रहे हैं. मुख्यमंत्री हरीश रावत की मज़बूरी चाहे जो भी या उनके आँखों में शर्म हो वे इसलिए नही कह पा रहे है लेकिन केंद्र सरकार के दो बड़े अधिकारियों ने बीते दिनों गुप-चुप तरीके से राज्य के मंत्रियों के कृत्यों का काला चिट्ठा जो तैयार किया है वह बहुत ही चौंकाने वाला है, इन अधिकारियों में एक ने गढ़वाल इलाके का दौरा कर आम जनता से बात कर राज्य के मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है तो दुसरे ने कुमायूं इलाके के मंत्रियों का. रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों ही विभागों के मंत्रियों का विभाग पर नियंत्रण नहीं है. 
हमारे हाथ लगी रिपोर्ट के अनुसार केंद्र के इन दोनों अधिकारियों ने राज्य सरकार तक को कठघरे में खड़ा किया है कि उसका राज्य के मंत्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है. दोनों अधिकारियों ने राज्य की चिकित्सा व शिक्षा व्यवस्था पर जमकर टिपण्णी की है और यहाँ तक कहा है दोनों विभागों में भ्रष्टाचार चरम पर है और चिकित्सा विभाग में तो सरकारी धन की लूट -खसोट की जा रही है. पर्वतीय इलाकों में न तो डॉक्टर है और न अस्पतालों में दवाएं ही और न स्टाफ, वहीँ शिक्षा विभाग में प्राथमिक शिक्षा का इतना बुरा हाल आज़ादी के बाद से अब तक का रिकॉर्ड है , स्कूलों में जहाँ छात्रों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी है तो कहीं बिना छात्रों के विद्यालयों में कई अध्यापक यह स्थिति पर्वतीय इलाकों की है. पर्वतीय इलाकों के सुदूरवर्ती स्कूलों में तो कोई देखने ही नही जाता कि वहां अध्यापक जाते भी हैं या नहीं. 
चिकित्सा विभाग में भी कमोवेश यही हाल है पर्वतीय इलाकों में अधिकांश अस्पतालों में डॉक्टर हैं ही नहीं. जनता द्वारा बताया गया कि पहले डॉक्टर नही होता था तो अस्पतालों में तैनात फार्मासिस्ट ही दवा दे दिया करता था और यदि वह भी छुट्टी चला जाता था तो वार्डबॉय ही उनका इलाज कर देता था लेकिन पिछले दो वर्षों से तो वहां भी ताले पड़ गए हैं लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है. ठीक इसी तरह की टिपण्णी कुमायूं इलाके गए अधिकारी ने वहां के अस्पतालों पर की है. 
दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केंद्र द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का उत्तराखंड में बहुत बुरा हाल है. चाहे शिक्षा विभाग हो या चिकित्सा विभाग दोनों की विभागों में केंद्र द्वारा वित्तपोषित योजनाओं में भरी गड़बड़ी की जा रही है फर्जी आंकड़ों के सहारे योजनाओं का पैसा ठिकाने लगाया जा रहा है. वह चाहे सर्व शिक्षा अभियान हो अथवा एनआरएचएम द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ ग्रामीण इलाके की जनता को नही मिला पा रहा है. विभाग व ठेकेदार इस पैसे को आपस में ही बाँट रहे हैं. 
अंत में इस रिपोर्ट में कहा गया है यदि राज्य सरकार ने इन दोनों विभागों पर कठोर नियंत्रण नहीं लगाया तो स्थिति और भी भयावह हो जाएगी और पर्वतीय इलाके के लोग चिकित्सा व शिक्षा को लेकर सड़कों पर उतर आयेंगे.

उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में महिलाओं का शराब व शराबियों के खिलाफ अभियान ने दिखाया रंग

ये महिलाएं शराबियों की पिटाई ही नही करती  बल्कि बिच्छू घास से सिकाई तक भी करती हैं 

राजेन्द्र जोशी 
देहरादून : राज्य सरकार के लिए भले ही शराब का धंधा कमाई का जरिया हो लेकिन आपदा प्रभावित मन्दाकिनी घाटी सहित गंगा घाटी सहित गढ़वाल मंडल के कई गांवों की महिलाओं ने अपने- अपने गांवों में शराब के खिलाफ कमर कस ली है। इन इलाकों के पुरुषों की शराबखोरी पर लगाम लगाने के लिए इन्होंने लाठियां थामी और जरूरत पड़ने पर शराबियों की पिटाई ही नही की बल्कि बिच्छू घास से सिकाई तक की। महिलाओं का यह आन्दोलन यदि परवान चढ़ा तो आने वाले दिनों में  ‘सूर्य अस्त- पहाड़ मस्त ' की बात केवल कहने की ही रह जाएगी. राज्य के पर्वतीय अंचलों में शराबियों व शराब के खिलाफ महिलाओं की मुहिम का असर कई गांवों भी दिखायी देने लगा है। कई गांव अब शराबियों के उत्पात से मुक्त हो चुके हैं। उत्तराखंड के गुप्तकाशी में करीब तीन सौ परिवारों वाले नारायणकोटी गांव की महिलाओं ने शराबबंदी को लेकर जो मुहिम छेड़ी, उसके कारण अब यहां कोई शराब नहीं पीता। वहीँ गंगा घाटी में उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लाक के टकनौर क्षेत्र के कई गांवों में महिलाओं ने आठ सदस्यीय समिति गठित कर शराब विरोधी अभियान चला रखा है। वह शादी में शराब परोसने का विरोध करने के साथ नशे से होने वाले नुकसान के बारे में भी बता रही हैं। महिलाओं की जागरूकता के चलते उत्तराखंड के कई गांवों में शराब का प्रचलन बंद हो गया है। इसी ब्लाक के कमद, कुमारकोट, ठांडी, बागी, भडकोट, मानपुर लक्षेश्वर बाडाहाट तथा चिन्यालीसौड़ ब्लाक की बचनौरा क्षेत्र की महिलाओं ने भी नशामुक्ति अभियान चलाने के लिए समिति बनाई है। वहीँ टिहरी के थौलधार ब्लाक में नगुण पट्टी के गांव भरदार तिरछा में बीती अगस्त में दो शराबी जो हुड़दंग मचा रहे थे। रोज-रोज के ऐसे किस्सों से परेशान पत्नियों ने उन्हें रस्सी से बांध दिया। प्रत्येक पर पांच सौ रुपए का जुर्माना लेने के बाद उन्हें छोड़ा गया। मन्दाकिनी घाटी के नारायणकोटी गांव की महिला मंगल दल की अध्यक्ष शीलावती धनाई का कहना है कि पहले गांव के बच्चे भी शराब के नशे में रहते थे। शाम को महिलाओं का घरों से बाहर निकलना मुश्किल था। मैंने ग्राम प्रधान व महिलाओं से बातचीत कर संगठन तैयार किया। अब हमने पूर्ण शराबबंदी का संकल्प लिया है।
   शराब विरोधी अभियान की ये महिलाएं एकजुट होकर शाम को शराबियों को रंगे हाथ पकड़ने के लिए पूरे गांव का दौरा करती हैं। इन्होंने तय किया कि पहली बार शराब पीते पकड़ जाने पर महिला मंगल दल पांच हजार रुपए का जुर्माना व माफीनामा लेगा। लेकिन दूसरी बार सामाजिक बहिष्कार के साथ पुलिस को भी सौंपा जाएगा। गौर्ताब हो कि लगभग सात-आठ सालों में शराब से गांव के दो लोगों की मौत हो गई थी। उस समय भी कुछ लोगों ने शराब का विरोध किया लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। कई साल बाद महिलाओं ने गांव में पूर्णरूप से शराबबंदी का संकल्प लिया। इसके लिए महिला मंगल दल अध्यक्ष शीलावती धनाई और ग्राम प्रधान जमुना देवी पुजारी ने सभी महिलाओं को संगठित कर रेकी टीम बनाई। इस टीम में सुलेखा देवी, नर्मदा रावत, बैशाखी देवी, सुशीला राणा सहित अन्य महिलाएं शामिल हैं। इसके बाद महिला मंगल दल की अध्यक्ष उषा पंवार, सरोजनी, उमा, पार्वती , रेखा, जशोदा आदि महिलाओं ने पंचायत कर शराब पीने पर पांच सौ जुर्माना और सामाजिक बहिष्कार का निर्णय लिया। इसके बाद से शराबियों के हुड़दंग का कोई मामला सामने नहीं आया।
वहीँ गोपेश्वर के समीप पाडुली गांव की महिलाओं ने भी शराब पीकर उत्पात मचाने वालों से जुर्माना वसूलने का निर्णय लिया है। महिलाओं ने बीते नवंबर में रात्रि पहरे की योजना बनाई थी। एक माह में ही इसका असर दिखाई देने लगा है। पाडुली के समीप करीब सात गांव हैं जिनको शराबियों के हुड़दंग से काफी हद तक मुक्ति मिल गई है।
गुप्तकाशी के नारायणकोटी गांव में महिला मंगल दल के नेतृत्व में शराबंबदी को लेकर 12 नवंबर से अभियान शुरू किया। यह दल हर रोज शाम को गांव से लेकर स्थानीय बाजार में यह देखती हैं कि कही गांव का कोई व्यक्ति शराब पीकर उत्पात तो नहीं मचा रहा है। वहीँ शादी-विवाह में रात के 10 बजे तक ये डंडा लेकर गश्त करती हैं। अब तक ये चार-पांच शराबियों की पिटाई भी कर चुकी हैं।
गोपेश्वर के समीप पाडुली गांव की महिलाओं ने अब शराब के विरोध में रात में पहरा देना शुरू कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव में एक माह के भीतर तीन शादी समारोह हुए लेकिन किसी भी समारोह में शराब नहीं परोसी गई और न आम रास्तों और गांव में कोई शराब पीकर झूमता दिखाई दिया। वहीँ उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लाक के टकनौर क्षेत्र की महिलाओं ने शराब विरोधी अभियान के लिए आठ सदस्यीय समिति गठित कर रखी है। यह समिति कई सालों से क्षेत्र में शराब विरोधी अभियान चलाए हुए हैं। फलस्वरूप क्षेत्र के कई गांवों में शराब का प्रचलन बंद हो गया है। टिहरी के थौलधार ब्लाक में ग्राम पंचायत भरदार तिरछा में महिलाओं का शराबबंदी आंदोलन रंग लाया है। इन्होंने पंचायत कर शराबियों पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगाने और उसका सामाजिक बहिष्कार करने का निर्णय लिया। इसके बाद गांव में अभी तक किसी भी विवाह समारोह या कार्यक्रम में कॉकटेल पार्टी नहीं हुई। जबकि भरदार के तिरछा गांव के पूर्व प्रधान वीरेंद्र पाल का कहना है कि शराबियों को पकड़कर जुर्माना वसूलने के बाद गांव में पांच-छह विवाह समारोह हुए हैं, लेकिन महिलाओं की डर से कहीं भी कॉकटेल पार्टी नहीं हुई है। जबकि इससे पहले शादी से पूर्व मैदानी जिलों की तर्ज पर यहाँ भी कॉकटेल पार्टी हुआ करती थी.

अब छात्रों का भी सरकारी स्कूलों से प्राइवेट स्कूलों की तरफ पलायन


गुणवत्तापरक शिक्षा न दे पाने के लिए अध्यापक भी दोषी 

राजेन्द्र जोशी
   देहरादून ।  अभी तक रोजगार की तलाश में युवकों का ही पलायन उत्तराखंड से अन्य राज्यों या विदेशों की तरफ सुनाई देता था लेकिन सरकार  की लचर शिक्षा व्यवस्था के चलते अब सरकारी स्कूलों में पढने वाले छात्र भी प्राइवेट स्कूलों की तरफ पलायन करने लगे हैं यह तो तब है जब राज्य सरकार के राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सरकार द्वारा तमाम सुविधाएं मुहैया करा रही है इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या साल दर साल लगातार घटती जा रही है। सरकार द्वारा राजकीय विद्यालयों की ओर छात्रों को आकर्षित करने के लिए तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं लेकिन नतीजे सिफर हैं। हर वर्ष शिक्षा के लिए भारी भरकम बजट की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन छात्र सरकारी विद्यालयों को छोड़कर पब्लिक स्कूलों और निजी विद्यालयों की ओर रूख कर रहे हैं। इसके लिए कहीं न कहीं अध्यापक भी दोषी माने ने जा सकते हैं जो छात्रों वह गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं दे पा  रहे हैं जिसकी उनके अभिवावकों को दरकार है. 
       राजकीय विद्यालयों की ओर छात्रों को आकर्षित करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा मध्याह्न भोजन योजना, चाइल्ड फ्रेंडली प्रोग्राम, निःशुल्क शिक्षा, निःशुल्क ड्रेस, छात्रवृत्ति योजना, राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कंप्यूटर लर्निंग प्रोग्राम समेत तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन उसके बावजूद इन विद्यालयों में छात्र संख्या में लगातार कमी आ रही है। राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में हर वर्ष छात्र संख्या तेजी से घटती जा रही है। निजी और पब्लिक स्कूलों में महंगी शिक्षा होने के बावजूद अभिभावक अपने बच्चों को इन्हीं विद्यालयों में पढ़ाना पसंद कर रहे हैं।
     वर्ष 2011-12 में राज्य के राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 8,68,392 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत थे, जिनमें कि 4,07,642 छात्र और 4,60,750 छात्राएं शामिल थीं। वर्ष 2012-13 में राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या घटकर 8,28,938 रह गई, जिनमें कि 3,88,453 छात्र और 4,40,485 छात्राएं शामिल थीं। शैक्षिक सत्र 2013-14 में राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या घटकर 7,92,937 रह गई, जिसमें कि 3,72,199 छात्र और 4,20,738 छात्राएं शामिल हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष छात्र संख्या 36,001 घट गई है। प्रदेश में राजकीय प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 12,510 है, जिनमें कि 27,077 शिक्षक नियुक्त हैं। जबकि राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 2,807 है जिनमें कि 9,580 शिक्षक नियुक्त हैं। हर वर्ष शिक्षा के लिए भारी भरकम बजट की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन छात्र संख्या लगातार घट रही है। 
   जिला स्तर पर यदि देखा जाए तो वर्ष 2011-12 में अल्मोड़ा जिले के राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 74,427 विद्यार्थी, 2012-13 में 69,105 विद्यार्थी अध्ययनरत थे, जबकि इस वर्ष 62,748 विद्यार्थी रह गए हैं। बागेश्वर जिले में वर्ष 2011-12 में 33,594 विद्यार्थी, 2013-14 में 28,723 विद्यार्थी पंजीकृत थे जबकि 2013-14 में विद्यार्थियों की संख्या 27,188 रह गई है। चमोली जिले में 2011-12 में 48,060 विद्यार्थी और 2012-13 में 45,637 विद्यार्थी पंजीकृत थे, इस शैक्षिक सत्र में विद्यार्थियों की संख्या घटकर 43,154 रह गई है। चंपावत जिले में वर्ष 2011-12 में 33,174 विद्यार्थी और 2012-13 में 31,692 विद्यार्थी पंजीकृत थे, वर्ष 2013-14 में विद्यार्थियों की संख्या घटकर 30,096 रह गई है। देहरादून जिले में वर्ष 2011-12 में विद्यार्थियों की संख्या 81,802, वर्ष 2012-13 में 79,246 छात्र संख्या थी, इस वर्ष यह संख्या घटकर 75,421 रह गई है। पौड़ी जिले में वर्ष 2011-12 में 70,994 विद्यार्थी, 2012-13 में 66,232 विद्यार्थी पंजीकृत थे, 2013-14 में 62,346 विद्यार्थी रह गए हैं।
     हरिद्वार जिले में वर्ष 2011-12 में 1,18,410 विद्यार्थी, 2012-13 में 1,18,803 विद्यार्थी थे, 2013-14 में यह संख्या घटकर 1,18,379 रह गई है। नैनीताल जिले में 2011-12 में 74,486 विद्यार्थी, 2012-13 में 71,413 विद्यार्थी थे, इस शैक्षिक सत्र में विद्यार्थियों की संख्या 70,051 रह गई है। पिथौरागढ़ जिले में वर्ष 2011-12 में 49,814 विद्यार्थी, 2012-13 में 47,122 विद्यार्थी और 2013-14 में विद्यार्थियों की संख्या घटकर 44,345 रह गई है। रूद्रप्रयाग जिले में वर्ष 2011-12 में 31,209 विद्याथी, 2012-13 में 29,049 विद्यार्थी थे, वर्ष 2013-14 में विद्यार्थियों की संख्या 27,309 रह गई है। टिहरी जिले में वर्ष 2011-12 में 81,787 विद्यार्थी, 2012-13 में 76,152 विद्यार्थी पंजीकृत थे, इस वर्ष 71,251 रह गए हैं। उधमसिंहनगर जिले में वर्ष 2011-12 में 1,33,287, 2012-13 में 1,26,936 पंजीकृत थे, वर्ष 2013-14 में विद्यार्थियों की संख्या घटकर 1,23,931 रह गई है। उत्तरकाशी जिले में वर्ष 2011-12 में 40,348 विद्यार्थी, 2012-13 में 38,828 विद्यार्थी पंजीकृत थे, वर्ष 2013-14 के शैक्षणिक सत्र में राजकीय प्राथमिक और उ़च्च प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या घटकर 36,718 रह गई है।